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पुस्तक समीक्षा:‘एक देश और मरे हुए लोग’ / राहुल देव

Written By Manik Chittorgarh on गुरुवार, जनवरी 16, 2014 | गुरुवार, जनवरी 16, 2014

साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका            'अपनी माटी' (ISSN 2322-0724 Apni Maati )                 जनवरी-2014 
चित्रांकन:निशा मिश्रा,दिल्ली 

‘एक देश और मरे हुए लोग’

एक समीक्षात्मक पाठकीय प्रतिक्रिया


हिंदी के सुपरिचित युवा कवि विमलेश त्रिपाठी के कविता-संग्रह ‘एक देश और मरे हुए लोग’ की कविताओं की शुरुवात होती है मुक्तिबोध की इन चार गर्भित पंक्तियों के साथ- ‘अब तक क्या किया,/जीवन क्या जिया,/ज्यादा लिया और दिया बहुत-बहुत कम/ मर गया देश, अरे, जीवित रह गये तुम....!’आज जब मैं ‘एक देश और मरे हुए लोग’ कविता-संग्रह की कविताएँ पढ़ने के लिए लेकर बैठा तो बस पढ़ता ही चला गया । विचार विचार और अनन्य भाव उमड़ते चले गए। इस संग्रह की कवितायेँ पांच खण्डों में हैं- इस तरह मैं, बिना नाम की नदियाँ, दुखसुख का संगीत, कविता नहीं तथा एक देश और मरे हुए लोग |यह युवा कवि भी देश के उन्हीं युवाओं में से एक है जो कुछ अच्छी संभावनाओं की तलाश में अपना गाँव-घर छोड़कर शहर में आके बस गए हैं लेकिन शहर की भागमभाग, भौतिकता और आत्मीयता रहित वातावरण उसे रह-रहकर अपने गाँव की याद दिलाता है | पाठक इसकी पहली कविता के साथ ही कवि से जुड़ जाता है | संग्रह की पहली कविता ‘एक गाँव हूँ’ उसके कुछ इन्ही भावों की अभिव्यक्तियाँ हैं जब वह कहता है, ‘मेरे अन्दर एक बूढ़ा गाँव हांफता....!’

शहरीकरण और औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप वृक्षों की अंधाधुंध कटाई हो रही है | हम अपनी सुविधा के लिए पशु-पक्षियों के प्राकृतिक आवास छीन रहे हैं अगली कविता ‘कहीं जाऊंगा नहीं’ में उसने अपनी इस पीड़ा को शब्द दिए हैं जब उसे वह चिड़िया याद आती है जो रोज आकर उसके घर की मुंडेर पर बैठती थी, अब नहीं आती |कवि की कविता ‘यह वही शहर’ पढ़ते हुए यह साफ़ पता चलता है कि कवि भले ही शहर में बस गया हो मगर उसका मन इस शहर को कभी अपना नहीं सका या यूँ कह लें कि यह शहर इस निपट अकेले को शायद अपना नहीं सका | विमलेश कविता के माध्यम से अपने-आप को खोजते दीख पड़ते हैं जो शायद इसी शहर में कहीं गुम गया है | यहाँ तक कि उसे अपने आस-पास कविता के अलावा कोई भी ऐसा नहीं दिखता जिससे वह अपने मन की व्यथा खुलकर कह सके |

कभी-कभी कविमन सोचता है कि जब इस कठिन समय में अधिकांश लोग एक ही धार में बह रहे हैं | वह तथाकथित बड़े लोग अक्सर कला और साहित्य को जीने वाले कुछ मनुष्यों को मूर्ख व पागल बताते पाए जाते हैं | कवि को उनपर बरबस ही हंसी आती है, शायद वे नहीं जानते कि कवि होना एक बेहतर मनुष्य होना है और इसीलिए अपनी ‘स्वीकार’ शीर्षक कविता में वह हंसी-ख़ुशी मूर्खता का वरण करने को तैयार है | उसके शब्दों में- ‘आज के समय में बुद्धिमान होना/ बेईमान और बेशरम होना है |’

कैसी अजीब विडंबना है कि आज कौन कितना बड़ा आदमी है इसकी कसौटी सिर्फ और सिर्फ ‘पैसा’ बन गया है ! जीवन के नैतिकमूल्यों और मानवीय संवेदनाओं का दिनोंदिन मरते जाना, आदमी का मर जाना नहीं तो और क्या है !

.... अरे कोई मुझे उस देश से निकालो /कोई तो मुझे मरने से बचा लो।‘

‘न रोको कोई’ शीर्षक कविता पढ़ते हुए बरबस ही कबीर याद आते हैं जब उन्होंने कहा था- ‘कबीरा खड़ा बज़ार में, लिए लुकाठी हाथ, जो घर बारै आपना, चलै हमारे साथ !’

तथाकथित सभ्य समाज के भाषणों और राजनीति के हवा-हवाई वादों के पीछे कवि की दूरदर्शी आँखें एक आमजन की कुछ ऐसी ही बात करती हैं | समाज के सबसे पीछे खड़ा वह व्यक्ति जिसका पक्ष कोई सुनना नहीं चाहता | जमीनी हकीकत से बेखबर शासनसत्ता सो रही है | एक और हमारे सामने बहुत सारी समस्याएं और बेहिसाब चुनौतियाँ हैं तो दूसरी और झूठे आकड़े दिखा-दिखाकर वाहवाही लूटी जा रही है फिर कविमन क्यूँकर आक्रोशित न हो | वह अपनी कविता के माध्यम से आवाज़ देता है कलम के सिपाहियों को कि वे उसका साथ दें और अगर साथ न भी दे सकें तो कोई गम नहीं, लेकिन वह इस दिशा में उसके बढ़ते क़दमों की रफ़्तार तो न रोकें | वह अकेले ही निकल पड़ा है अपने जीवन के इस सफ़र पर, जहाँ दो पथरायी आँखें सदियों से उस एक व्यक्ति की राह तक रहीं हैं | इस अप्रतिम पथ पर चलने से पूर्व कवि अपने ईश्वर से ‘सत्य’ को कह सकने और सहने की शक्ति के सिवा और कुछ नहीं चाहता | (‘यदि दे सको’ शीर्षक कविता)
                                                                                                             
विमलेश की कविता मनुष्य की कविता है जो आदमी में आदमी की तलाश करती है | वह देश जहाँ के लोग मानसिक गुलामी में इस कदर जकड़ गए हैं कि उनमें कोई हलचल ही नहीं होती, उन्हें अपने आस-पास न तो कुछ दिखाई देता है, न सुनाई देता है | कवि ऐसे लोगों को जिंदा नहीं मानता, देश के ऐसे लोग मरे हुए ही तो हैं ! कवि भी अक्सर स्वयं को चाहकर भी इस सबसे अलग नहीं कर पाता इसीलिए अपनी साफगोई में वह स्पष्ट स्वीकारता है कि जब तक वह कवितायेँ लिखता है तब तक जिंदा रहता है उसके बाद वह भी भीड़ हो जाता है |

‘एक शब्द है साँस/ एक शब्द है देह/ शब्दों से मिलकर ही बना हूँ /जब तक लिखता हूँ रहता जिन्दा/ बाद लिख चुकने के मर जाता ।‘

विमलेश की कविता हमारे समय की कविता है | भयानक भविष्य के प्रति आगाह करती ये कवितायेँ चेतावनी हैं, वैचारिक रूप से ये पाठक को अन्दर तक झिन्झोरती हैं, आंदोलित करती हैं !

‘मेरी कविताओं को प्यास से मरने से कोई बचाओ बाबा /कोई मुझे इस समय से निकलने का उपाय बताओ बाबा ।‘

झूठ और सच के दरमियाँन झूठों की फ़ौज इस कदर बढ़ गयी है कि लोग झूठ को ही सच समझ बैठे हैं | कवि फिर भी आशान्वित है कि शायद एक न एक दिन उसके सच को सच समझा जायेगा क्योंकि झूठ कितना ही सत्य होने का ढोंग करे वह झूठ ही रहता है | (‘इस आशा में’ और ‘हर बार सच’ शीर्षक कविता)

बीते इतिहास को मूढ़ों की तरह लादे हुए चलने वाले लोगों के बारे में कवि कहता है कि उन्हें उनका इतिहास मुबारक हो अपनी ‘आदमी’ शीर्षक कविता में वह तो बस अपने को कलम का एक मामूली सिपाही बताता है जोकि एक बेहतर मनुष्य होने के लिए सतत प्रयत्नशील है |कवि अगली कविता ‘जिंदा रहूँगा’ में कहता है कि पार्थिव रूप से उसकी मृत्यु भले ही हो जाय परन्तु उसके शब्द उसके पक्ष में हमेशा खड़े रहेंगे, वह जिंदा रहेगा अपनी कविताओं में वर्षों-वर्षों तक जब तक कि उसके शब्द विपक्ष रुपी अँधेरे को पराजित नहीं कर लेते |न जाने कितने युग और संवत्सर बीत गए वृक्ष मनुष्यता के प्रारंभकाल से ही आदमी के साथ रहते आये हैं | पेड़ जीवित होते हैं, मूक रहते हैं | उनकी अव्यक्त भाषा को कविमन कुछ-कुछ पढ़ सकने में अपने को सक्षम पा रहा है परन्तु आदमी की भाषा, उसकी प्रकृति वह लाख प्रयत्नों के बावजूद आज तक नहीं समझ पाया | व्यक्त मनुष्यों की व्यक्त भाषा कवि को अव्यक्त से भी कठिन प्रतीत होती है, वह ‘पेड़ से कहता है |’

कवि नामक जीव सचमुच सामान्य मनुष्यों से अलग ही होता है | दुनियादारी के नियमों से अनजान, एक खास किस्म की लापरवाही ओढ़े हुए वह कभी खुद से बातें करता है तो कभी फूलों, चिड़ियाँ, पेड़ों, खिड़कियों, दरवाज़ों, पानी, मछली, धरती और तमाम अन्य चीज़ों से बतिया लेता है, ठीक उनकी भाषा में | उनके न जाने कितने सुख-दुःख, कितनी-कितनी सारी बातें कविमन की भोली पर्तें यथार्थ का आश्रय लेकर कविता के रूप में मुखर हुई हैं, फलस्वरूप उत्पादित जीवन-संगीत की भावप्रवणता में पाठक सहज रूप से डूबता चला जाता है |अब हर कविता के बारे में अलग-अलग और कहाँ तक लिखूं...!! अगर एक-एक कविता पर विस्तार से लिखने बैठूं तो शायद एक अलग पुस्तक ही बन जाए, इसलिए अगर अत्यंत संक्षेप में व प्रचलित भाषा में कहूँ तो ये कवितायेँ भयानक ख़बर की कवितायेँ हैं एकदम सहज, सामान्य और साधारण शब्द, उच्च भावबोध, संवेदना जिनमें छिपे हैं अर्थ ही अर्थ, गंभीरता और विचार...

‘इस कठिन समय में बोलना और लिखना /सबसे दुष्कर होता जाता मेरे लिए।‘

‘देखो, गोलियां चलने लगीं हैं/ चैनलों पर लाशें दिखने लगीं हैं/ बहस करने लगा है वह लड़का/ जिसे इस देश से ज्यादा अपनी नौकरी बचाने की चिन्ता...’

इस संग्रह की कविताओं को मैं बार-बार पढ़ना चाहूँगा, और सिर्फ पढ़ना ही नहीं बल्कि गुनना भी चाहता हूँ | विमलेश की कविताओं में बहुत गहरे दायित्वबोध निहित हैं | मैं सोचता हूँ और खो जाता हूँ !

‘महज लिखनी नहीं होती हैं कविताएँ/ शब्दों की महीन लीक पर तय करनी होती है एक पूरी उम्र...’
                                                         

यह कवितायेँ पढ़े जाने के बाद भी कहीं न कहीं मस्तिष्क की पृष्ठभूमि में गूंजती रह जाती हैं | कथ्य, शिल्प और भाषाई तौर पर सारी कवितायेँ ऐसी हैं कि साधारण व सामान्य पाठक भी इन्हें आसानी से आत्मसात कर सकता है | यह कवि और उसकी कविता की सफलता है | मानो जो कुछ, जहाँ, जैसी तरंग उठी, वैसा का वैसा लिखा गया है | कवि के रचनाकर्म की जड़ें अपनी जमीन से जुड़ी हुई हैं इसलिए उसकी कविता सीधे पाठक के मन से जुड़ती है |

.... तुमने ही जना/ और तुम्हारे भीतर ही ढूँढ़ता मैं जवाब/ उन प्रश्नों के जिसे हजारों वर्ष की सभ्यता ने /लाद दिया है मेरी पीठ पर।‘

विमलेश साहित्य जगत में अपनी जानदार कविताओं के माध्यम से उम्मीद जगाते हैं | उनकी रचनाधर्मिता प्रभावी है और हमें आश्वस्त करती है | संग्रह की कविताओं से गुजरने के बाद मैं कह सकता हूँ की भई बहुत समय बाद ऐसी जबर्दस्त कविताएँ पढ़ने को मिलीं। आज ऐसे साहित्य की हमारे समाज में महती जरूरत है । आपके कुछ तिक्त जीवन अनुभव और सच्ची संवेदनाएं इन कविताओं के माध्यम से कुछ इस तरह अभिव्यक्त हुईं है कि इस देश का सामान्य व्यक्ति भी उनसे जुड़ाव महसूस करता है, मुझे लगता है कविता के लिए इतना बहुत है, अन्य सब बातें उसके आगे गौण हो जातीं हैं। यह कविताएँ सर्वहारा के सामाजिक सरोकारों की बात करती है, कुछ ऐसे बुनियादी प्रश्न जिनके उत्तर अनन्त काल से अनुत्तरित से ही है...और जिन्हें पढ़ते हुए मुक्तिबोध और धूमिल दोनों अनायास ही सामने आने लगते हैं ! शायद यह अन्त नहीं एक शुरूआत है, है न भन्ते! 

संग्रह की कुछ कवितायेँ जैसे- एक स्त्री के लिए, सपने, आम आदमी की कविता, तुम्हें ईद मुबारक हो सैफूदीन, नकार, तीसरा, एक पागल आदमी की चिट्ठी, एक देश और मरे हुए लोग का जिक्र मैं विशेष रूप से करना चाहूँगा यह कवितायेँ सजग और संतुलित शब्दार्थ साधना की बहुत उत्कृष्ट रचनाएँ बन पड़ी हैं |संग्रह के शीर्षक को सार्थक करता हुआ कुंवर रवीन्द्र का आवरण चित्र अर्थपूर्ण व कलात्मक है | इस बेहद विचारणीय, पठनीय और संग्रहणीय कविता-संग्रह को जनोपयोगी संस्करण के रूप में प्रस्तुत करने के लिए बोधि प्रकाशन को मैं हार्दिक धन्यवाद और साधुवाद देता हूँ | 152 पृष्ठ की इस पुस्तक का मूल्य भी एकदम वाजिब मात्र 99/- रूपये रखा गया है | अच्छे साहित्य के चाहने वालों को यह कविता-संग्रह अवश्य रुचेगा, ऐसा मेरा मानना है |

समीक्षकीय

राहुल देव
9/48 साहित्य सदन, 
कोतवाली मार्ग,
महमूदाबाद (अवध)
सीतापुर, उ.प्र. 261203
ईमेल- rahuldev.bly@gmail.com
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1 टिप्पणी:

  1. बहुत ही सुन्दर और प्रभावशाली ढंग से समीक्षा की है भाई राहुल देव जी, आपके समीक्षात्मक वैदुष्य की सराहना करनी होगी।

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