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शोध:शमशेर की कविता में प्रगतिशील मूल्य /धवल जायसवाल

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on गुरुवार, जनवरी 16, 2014 | गुरुवार, जनवरी 16, 2014

साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका            'अपनी माटी' (ISSN 2322-0724 Apni Maati )                 जनवरी-2013 
        
चित्रांकन:निशा मिश्रा,दिल्ली 
अगर मेरी वाणी में इन्सान का दर्द है- छोटा सा ही दर्द सही, मगर सच्चा दर्द ... भावुकता, ललक, आकांक्षा, तड़प और आशा कभी घोर रूप से निराशा भी लिए हुए कभी उदासी कभी-कभी उल्लास भी.... एक प्रेमी कवि कलाकार, एक मध्यवर्गीय भावुक नागरिक का, जो मार्क्सवाद से रोशनी भी ले रहा है और उर्जा के श्रोत भी ( अपनी सीमा में अपनी शक्ति भर ) तलाश कर रहा है| एक ऐसा व्यक्ति जिसको सभी देशों और सभी धर्मों और सभी भाषाओँ और साहित्य से प्यार है और सबसे अपने दिल को जोड़ता है ( प्रेम की भावुकता ने जो बीज बोया है वह मैं देखता हूँ कि अकारथ नहीं गया क्योंकि पूरी मनुष्य जाति से प्रेम, युद्ध से नफरत और शान्ति की समस्याओं से दिलचस्पी- ये सब बातें उसी से धीरे-धीरे मेरे अंदर पैदा हुईं...) तो उपर्युक्त तमाम सूत्रों से मैं इंसान के साथ जुड़ता हूँ तो मेरे लिए इतना ही काफी है|”1            ( उदिता की भूमिका से)

     
शमशेर
कवि शमशेर द्वारा स्वयं के कवि व्यक्तित्व पर की गई यह टिप्पणी उनकी कविता और उसके प्रगतिशील मूल्यों को समझने में एक सार्थक संकेत प्रस्तुत करती है| शमशेर मूलतः कवि हैं| कोई उन्हें ‘कवियों का कवि कहता है’ तो कोई ‘शब्दों के बीच की नीरवता कवि’ | कोई उन्हें ‘देह का कवि’ मानता है तो कोई ‘मितकथन का कवि’ | वास्तव में इस प्रकार के सामान्यीकृत विशेषण शमशेर के कवि व्यक्तित्व को एक सीमित दायरे में बाँधने की कोशिश है, जो निश्चय ही कवि की सम्पूर्णता के साथ न्याय नहीं है| शमशेर की शमशेरियत इसी बात में है कि उनकी कविताओं का मिज़ाज जरा हटके है| विचार के स्तर पर जो कवि मार्क्सवाद से प्राणवायु प्राप्त करता हो, वही कविताओं में कभी व्यक्तिवादी कभी रीतिवादी और कभी-कभी रूपवादी नजर आने लगता है| विडंबना तो यह है कि पहले तो इन्हें अलग-अलग किया गया अपने -अपने सांचो में फिट करने का प्रयास जबकि कवि को इस बात पर हैरत होती है कि
-

शतरंज का एक खाना है
जिसमें तुम मुझे उठाकर रखता हो|”2

लेकिन शमशेर है कि शतरंज का मोहरा बनने को तैयार ही नहीं है| न खुद| न उनकी कविता| तभी तो वे स्पष्ट रूप से घोषणा करते हैं-

बात बोलेगी हम नहीं
भेद खोलेगी बात ही|
सत्य का मुख झूठ की आँखें क्या देखें|
सत्य का रुख समय का रुख है
अभय जनता को
सत्य ही सुख है सत्य ही सुख है”3

कविता सिर्फ विचारों का पुंज नहीं होती और न ही नारेबाजी| आधुनिक से आधुनिकतर होने की प्रक्रिया में प्रगतिशीलता का सामान्यीकरण किया जाने लगा और कला के जरिये सामाजिक संघर्ष का रास्ता अख्तियार करने वाले कवि के अनुभव को निजी बताकर शमशेर की शमशेरियत पर सवाल खड़े किये गए| ‘एक जनता का दुःख’ एक / हवा में उड़ती पताकाएं अनेक’ लिखने वाला कवि इसलिए भी सबसे न्यारा ,सबसे अलग है क्योंकि शमशेर की कविताएँ सिर्फ ‘टूटी हुई, बिखरी हुई’ नहीं है बल्कि “उन तमाम प्रगतिवादी कवियों की रचनाओं से बेहतर हैं जिनके नारों, सिद्धांतनुवादों का गुणगान करते हुए बड़े-बड़े आलोचक नहीं अघाते|”4 शमशेर अपनी बात को सरलीकृत ढंग से करने में यकीन नहीं रखते, बल्कि काव्यानुभव की एक व्यापक और जटिल दुनिया रचते हैं – बिम्बों के माध्यम से, जिसे बेधकर ही उनकी रचनात्मक विशेषता एवं वैचारिक आग्रहों को समझा जा सकता है|

      प्रगतिशील हिंदी में शमशेर की कविता का स्वर सबसे अलग है| यह विचारधारा मात्र या वाद के अर्थ में प्रगतिशीलता नहीं है उनकी प्रगतिशील चेतना का अर्थ है आधुनिक मानवीय अस्तित्व तथा उसकी सर्जनात्मकता की रक्षा  साथ ही साथ समकालीन जीवन की विद्रूपताओं से उभरने की चिंता| वे स्वयं कहते हैं कि मार्क्सवाद को मैं सामाजिक-राजनैतिक पहलुओं से नहीं देखता, बल्कि हमारे युग में वह मानव की गहनतम चिंताओं से जुड़ा है| शमशेर न तो क्रान्तिकारिता को हौवा बनाना चाहते हैं और न ही वर्ग संघर्ष की उत्तेजना में नारेबाजी करना चाहते हैं  जनता को एक करने के लिए कोई नारा न लगाते हुए कल्पनामयी, आकर्षक और आंतरिक बल पहुंचाने वाली उत्साह की कविता का एक उदाहरण देखिए-

      “सूरज उगाया जाता
        फूलों में
      यदि हम
      एक साथ
      हंस पड़ते
      चाँद आँगन बनाता
      आँखों में रास-भूमि यदि
      सौर-मंडल की मिलती5

आगे कवि कहता है कि हम काव्य के सार होते, भूत और भविष्य के प्रतिमान होते- यदि हम वर्तमान में एक साथ हँसते, रोते, गाते| एकता का यह गीत भले ही रोमानी हो परन्तु संवेदना कितनी अधिक है यहाँ| शमशेर की प्रगतिशीलता के संदर्भ में डॉ० गोविंद प्रसाद लिखते हैं- “ नारों और जुलुसों का सस्ता तराजिम नहीं है शमशेर की कविता और न ही उनकी कविता मार्क्सवाद की पुड़ियाओं में जीवन की आर्थिक मसाइल के नुस्खे बेच रही है| बल्कि उनकी कविता उनके कवि की आत्मा और अन्तःकरण का वह आयतन है जिसमें एक ही साथ ‘धुंआ-धुआँ सुलग रहा / ग्वालियर के मजूर का हृदय’ से लेकर , ‘एक ठोस बदन अष्ठ धातु का-सा’ तक में उनके कवि व्यक्तित्व में अदृश्य सागर का एक ही जुनून है जिसमें –‘ सब तुकें एक हैं/ यानि कि मेरा / खून’ ”|6 शमशेर की कविता में विचारधारा विशेष की नारेबाजी नहीं है और न ही अन्य  प्रगतिशील  कवियों की भांति समाजिकता की सपाट बयानी| शमशेर के लिए पार्टीलाइन पर बंधकर कविता लिखना मुमकिन नहीं था इसीलिए उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी की मशीन कहलाना गलत लगता था| उनका संघर्ष तो कला के जरिए है-

      “तुम कम्युनिष्ट हो
      यानि कलाकार
      का कर्म
      यानी भविष्य का मर्म्भाव
      आज के नाटक के अंत में
      उस नाटक का अंत मैं हूँ
      मैं शमशेर
            एक निरीह
                  फ़तह . . .!”7

शमशेर के लिए प्रगतिशीलता आधुनिक जीवन को समझने की एक दृष्टि है| एक ओर अतियांत्रिकता, शोषण आदि से त्रस्त मानव के प्रति सकर्मक सहानुभूति है तो दूसरी ओर काव्य में कला मूल्यों की रक्षा की तिलमिलाहट भी उपस्थित है|यह एक द्वंद्व की स्थिति उत्पन्न करता है, जो कवि के आत्मसंघर्ष का कारण है, जिसे रामविलास शर्मा ‘काव्य बोध’ का संघर्ष कहते हैं इसी सन्दर्भ में शमशेर कला को सबसे बड़ा संघर्ष मानते हैं और यही संघर्ष सौंदर्य का पर्याय भी है-

      “कला सबसे बड़ा संघर्ष बन जाती है
       मनुष्य की आत्मा का
      प्रेम का कँवल कितना विशाल हो जाता है
      आकाश जितना
      और केवल उसी के दूसरे अर्थ सौंदर्य हो जाते हैं
      मनुष्य की आत्मा में”8

शमशेर को ‘रातभर नींद क्यों नहीं’ आती? उन्हें ‘सारी दुनिया बैल क्यों मालूम होती है?’ ‘दैन्य दांव; काल / भीषण; क्रूर / स्थिति; कंगाल/ बुद्धि; घर मजदूर|’ लिखने वाला कवि ‘शासन के लिजलिजे हाथ’ के आगे आजाने से असहाय कटों महसूस करता है? ऐसे सवालों के जवाब को अगर देखा  जाए तो पता चल जाएगा कि शमशेर की चिंताएं बदलते हालात में इंसानी जरूरतों से जुड़ी थीं| इस प्रश्न के उत्तर में शायद शमशेर की चिंताओं के सूत्र भी जुड़े हैं| श्रम पर लिखी गई कविता बड़ी मार्मिकता से जीवन की विद्रूपताओं की ओर इशारा करती है-

मुझे वह इस तरह निचोड़ता है
जैसे घानी में एक-एक बीज कसकर दबा कर
पेरा जाता है
मेरे लहू की एक-एक बूँद किसके लिए
समर्पित होती है
ये तदपन किसके लिए होता है?
सुबह के अन्न देह के लिए
शाम के अन्न देह के लिए
जिसका नाम चारा है|”9

 यहाँ पीड़ा कितनी मर्मभेदी तथा करुणायुक्त है| करुणा शमशेर की प्रगतिशील  को ऐसा कोमल, वेदनामय, अन्तःस्पर्श और कहीं-कहीं व्यंग्यात्मकता देती है, जो सर्वथा करुणाग्रस्त रोमानी या रोदनशील कवियों से उन्हें अलग करती है| शमशेर कि अनुभूति स्पर्शी कविता बहिर्मुख भाषणधर्मी कविता की तुलना में शोषण की यातना और इससे जन्मने वाले प्रतिकार को अधिक सशक्त स्वर में व्यक्त करती है| व्यक्ति जीवन में सामाजिक जीवन की करुणार्द्र पुकार की कविता है ‘लेकर सीधा नारा|’ यहाँ ‘डूबती हुई पलकों’ और ‘आशाओं की अंतिम संध्याओं’ के बीच से एक पुकार सुनाई पड़ती है जो एक सीधा नारा है| वही जीने की नई वजह बन जाता है-

मैं समाज तो नहीं, न मैं कुल
      जीवन
कण समूह में हूँ मैं केवल
      एक कण
कौन सहारा
मेरा कौन सहारा|” 10

शमशेर की प्रगतिशील ता पर चर्चा करते हुए डॉ० विजयदेव नारायण साही लिखते हैं लिखते हैं-“ प्रगतिवाद शमशेर के लिए मात्र वह नहीं है जो वह है, बल्कि वह है जो उनकी निजी जरूरत को पूरा करता है; उनकी काव्यानुभूति की बनावट का अंग बनकर प्रस्तुत होता है| इसी अर्थ में उनके लिए अभिनय नहीं वास्तविकता है. . . . काव्यानुभूति और प्रगतिवाद एक तरह के सह अस्तित्व में आमने-सामने दर्पण की तरह रखे हुए हैं. . . . यह सह अस्तित्व निरपेक्षता नहीं साक्षात्कार है| रिश्ते का आभाव नहीं है, रिश्ते की संभावना है|”11 इसी सन्दर्भ में स्वयं शमशेर का भी कहना है कि “ हर कवि का मोटे तौर पर, एक निजी काव्य-संसार होता है जिसमें वह प्रायः रमा रहता है| अगर ऐसा नहीं है तो वह वास्तव में कवि ही नहीं है| जरूरत इस बात कि है की कवि अपने निजी काव्य-संसार को निरंतर अधिक से अधिक समृद्ध करता चले|”12 शमशेर का एक ‘व्यक्ति मन’ है जिसे वे कवि का ‘निजी काव्य-संसार कहते हैं पर देखना यह है कि क्या यह मात्र ‘व्यक्ति के लिए’ ही है या इसका कहीं प्रसार भी हुआ है? शमशेर की यह पंक्ति- ‘व्यक्ति मन रोता है, जन-मन के लिए’ पंक्ति भर नहीं है, उनके कुल काव्य-संसार का अक्स है| कवि युद्धरत दुनिया के विरुद्ध खड़ा हो जाता है, विवादों  और ईर्ष्या का जाल काटकर पूरी दुनिया को शान्ति की विराट गोद में देखना चाहता है, यानी जहां वह स्वयं है उसी प्रेमपाश में सारी दुनिया को बांधना चाहता है-

शराब
यानी इंसानियत की तलछट का छोड़ा हुआ
स्वाद
      मुझे दो
मगर पैमाना हो
फोनिमिक्स
उन भाषाओं का , पश्चिम और पूर्व की जो
मिलन सीमा को
आर्गनित करती हैं
बस, वहीं मेरा कवि
तुम्हारा अन्यतम”13

‘अमन का राग’ इस सन्दर्भ में अद्वितीय कविता है| यहाँ कवि के लिए दुनियाभर के भेदभाव तिरोहित हो जाते हैं और व्यापक सभ्यता दिखलाई पड़ती है| कवि को ‘अमेरिका का लिबर्टी स्टेचू उतना ही प्यारा है’, ‘जितना मास्को का लाल तारा’| कभी वह ‘कालिदास को वैमर के कुंजों में विहार करते हुए देखता  है’ तो कभी ‘गोर्की को होरी के आँगन में देखता है’| कवि के लिए ‘मेरा टैगोर मेरा हाफ़िज़ मेरा तुलसी मेरा ग़ालिब’ उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जितने पन्त और निराला| इसी कविता के सन्दर्भ में डॉ० रामविलास शर्मा शमशेर को नवरहस्यवादी घोषित करते हैं तो डॉ० विजयदेवनारायण साही के लिए यह एक यूटोपिया है जो काल को देश में परिवर्तित करता है| ठीक यही डॉ० कुंवरनारायण की एक टिप्पणी देखिए – “शमशेर की साहित्यिक चेतना में कला के सार्वभौमिक आदर्शों की व्याप्ति है| वे भारतीयता के नाम पर स्थानीयता या प्रादेशिकता के संकुचित दायरे नहीं बनाते बल्कि दोनों के अर्थ को विस्तृत करने की कोशिश करते हैं| एक ऐसी कला में जिसके सन्दर्भ बुनियादी जीवन मूल्यों और रचनात्मकता के नियमों का स्पर्श करते हों |” 14

शमशेर के काव्य में ‘व्यक्ति’ निरपेक्ष नहीं है वह ‘आदमी’ का ‘पर्याय’ है- मानव का एक गतिशील प्रत्यय है जो जन भी है| इसे ही काव्य का स्रोत कहा गया है-

“  समय के चौराहों के चकित केन्द्रों से
उदभूत होता है कोई : उसे व्यक्ति कहो
कि यही काव्य है
आत्मतम”15

किन्तु शमशेर के यहाँ ‘जन’ उस विशेष अर्थ में जन नहीं है जिस अर्थ में नागार्जुन या त्रिलोचन के यहाँ है यद्यपि जन की चिंता यहाँ भी है-

शरीर लड़े जा रहा है, लदे जारहा है
हृदय होम हो रहा है
धरती के मनुष्य सा
निरंतर निरंतर
उसे मीठी
नींद कब
आएगी
वह नींद
जो मीठी सुबह का
उजाला लाए
चतुर्दिक
सम्मान रूप
उजाला”                                           (संसार के चक्के पर है)

त्रिलोचन के यहाँ भी चिंता है कि ‘हाथो के दिन कब आएंगे’| शमशेर ने अपने समय के धार्मिक उन्मादों को देखा था| धर्म के नाम पर होने वाले दंगों ने समाज को विकृत बना दिया था| अतः वे धर्म पर प्रहार करने से नहीं चूकते-

जितना ही लाउडस्पीकर चीखा
उतना ही इश्वर दूर हुआ (अल्ला ईश्वर दूर हुए)
उतने ही दंगे फैले, जितने
दीन-धरम फैलाए गए|”15

सियासत ने भी इस फिरकापरस्ती को बढ़ावा दिया और इंसान आग की लपटों में झुलस कर रह गया| मंदिर- मस्जिद का टूटना दिलों का टूटना है| कबीर १५वीं सदी में ‘बहरा हुआ खुदाए’ की बात करते हैं और शमशेर बीसवीं सदी में| वक्त बदला,परिस्थितियाँ बदलीं मगर सियासी साजिशें एवं धार्मिक उन्माद समाप्त न हो सके |अपने समय की भाषाई साम्प्रदायिकता की उन्हें खूब पहचान थी –
“ईश्वर अगर मैंने अरबी में
प्रार्थना की तो तू मुझसे
 नाराज हो जाएगा
अल्लाह यदि मैंने संस्कृत में
संध्या कर ली तो तू
मुझे दोजख में डालेगा”       (ईश्वर अगर मैंने अरबी में प्रार्थना की )

भाषाई साम्प्रदायिकता के विरुद्ध शमशेर भाषाई एकता की बात करते हैं|वे कहते है कि ‘मैं उर्दू और हिंदी का दोआब हूँ’ और कभी कहते हैं कि ‘वो अपनों की बातें ,वो अपनों की खू-बू /हमारी ही हिंदी हमारी ही उर्दू |’ शमशेर की आत्मपरकता ने उनकी प्रगतिशीलता को जीवन्तता प्रदान की है| तभी वे कहते हैं कि सरकारें पलटती हैं जहां हम दर्द से / करवट बदलते हैं|  उनके बिम्बों में भी नवीनता हैं –

य शाम है
कि आसमान खेत है पके हुए अनाज का
लपक उठी लहू –भरी दरांतियाँ
            कि आग है
धुंआ-धुंआ सुलग रहा
ग्वालियर के मजूर का हृदय16

मलयज, शमशेर के यथार्थ बोध पर प्रश्न खड़ा करते हुए कहते हैं कि “ शमशेर मूड्स के कवि हैं किसी विजन के नहीं ... उनका यथार्थ बोध एक परिष्कृत यथार्थ बोध – उनकी विशेष मनोरचना के आंतरिक ताप से परिशुद्ध किया हुआ (कंडीशन) यथार्थ बोध है| यह नहीं कि वे यथार्थ के सीधे प्रभाव को स्वीकार करते हों, पर लगता है, अभिव्यक्ति में उस यथार्थ के प्रत्यक्ष प्रखर संवेदनों से अपने को बचा जाते हैं|” 17यही कारण है कि उनकी प्रगतिशील  कविताओं में नागार्जुन जैसी तीक्ष्णता या संघर्षशीलता का अभाव है| शिकायत है भी तो दबी जुबान से, विद्रोही स्वर का यहाँ आभाव है| मुक्तिबोध लिखते हैं कि –“ शमशेर की आत्मा ने अपनी अभिव्यक्ति का एक प्रभावशाली भवन अपने हाथों से तैयार किया है| उस भवन में जाने से डर लगता है- उसकी गंभीर प्रयत्न साध्य पवित्रता के कारण|”18 इस पवित्रता में प्रगतिशील मूल्य तो हैं किन्तु उनका तनाव नहीं है| प्रभावान्विति तो प्रबल है पर प्रतिरोध का आभाव है| कला के जरिए संघर्ष तो है पर कुछ-कुछ सुरक्षित किस्म का|

‘चुका भी हूँ मैं नहीं’ नामक काव्य संग्रह में शमशेर कहते हैं कि “ काव्य कला समेत जीवन के सारे व्यापार एक लीला ही हैं – और यह लीला मनुष्य के सामाजिक जीवन के उत्कर्ष के लिए निरंतर संघर्ष की ही लीला है|”19 निरंतर संघर्ष की इस लीला में ही सौंदर्य का अवतरण है| यहाँ उनके आस-पास बिखरे सौंदर्य को अपने में घुला-मिला कर सजीव रूप देने का प्रयास कवि कर रहा है और यही उसका संघर्ष है| यहाँ देह के माध्यम से देह से ही बाहर जाने का भाव है| वह अपना अहं मिटा देना चाहता है| मम के ममेतर में मिल जाने की एक अकुलाहट व्याप्त है, यहाँ-

काश कि मैं न होऊं
न होऊं
तो कितना अधिक विस्तार
किसी पावन विशेष सौंदर्य का
अवतरित हो|
पावन विशेष सौंदर्य का” 20

शमशेर के काव्य में प्रेम की तीव्रता के साथ-साथ एंद्रियता का ज्वार बहुत अधिक है | यहाँ नारी देह के प्रति चरम आसक्ति तथा सम्मोहन है| स्त्री देह के भूगोल के प्रति एक तीव्र आकर्षण

  सुंदर उठाओ निज वक्ष और कस उभर
  रात का गहरा सांवलापन स्तनों का बिम्बित उभार लिए

वस्तुतः व्यापक अर्थों में शमशेर  प्रेम के कवि हैं| यहाँ प्रेम की सघन पीर है, प्रेम की उदात्ता है| प्रेम के आदर्शवादी रूप तथा प्रेम के भौतिक रूप की टकराहट उनके काव्यलोक में भारी उथलपुथल मचा देती है| यह विवशता अथाह मौन का रूप ले लेती है जिसे कवि अकेले ही सहता है| मौन से अज्ञेय ही नहीं शमशेर भी अभिभूत थे – ‘और अंदर चल रहा हूँ मैं / उसी के महातल के मौन में’, |शमशेर में यह मौन घोर व्यथा, अकेलेपन का अभाव का प्रतीक भी है-

यह  विवशता
बना देती सरल जीवन को
 खून की आंधी
यह विवशता
मौन में भी है    
अथाह|” 21

शमशेर की प्रगतिशीलता पर सबसे बड़ा आक्षेप स्त्री स्वर का अवहेलना का है| इनका प्रेम  इकहरा है जहां पुरुष पक्ष की ही प्रधानता है| नारी यहाँ मात्र ‘ठोस बदन अष्ठ धातु का सा’ ही हैं| उसकी भावनाएं, विचार, दुःख, दर्द इन् सबसे कवि बेखबर है यहाँ देश काल देह से लेकर देह तक ही सिमट जाता है| यहाँ भौतिक जगत का प्रबलतम कम्पन नहीं है| इसके बाद भी शमशेर के काव्य की अपनी एक शक्ति है| अंत में, शमशेर द्वारा कहे गए एक कथन को ही उनकी प्रगतिशील कविता की कसौटी के रूप में देखा जाना चाहिए “ मैं समझता हूँ कि कविता के अंदर मेरा यह एक बड़ा संघर्ष रहा है कि मैं प्रगतिशीलता के तत्व प्राप्त कर सकूं| मगर बेशक जबरदस्ती उन्हें ठूंसकर नहीं, बल्कि वह इसमें आंतरिक रूप से, अपने निसर्ग से पैदा हो|”22


सन्दर्भ ग्रन्थ
1.      उदिता (अभिव्यक्ति का संघर्ष):काव्य संग्रह-शमशेर बहादुर सिंह, वाणी प्रकाशन, १९८०- भूमिका
2.       मेरे समय को- शमशेर, इतने पास अपने, राजकमल प्रकाशन, १९८०
3.    बात बोलेगी-शमशेर बहादुर सिंह, प्रतिनिधि कविताएँ,संपादक-डॉ० नामवरसिंह, राजकमल प्रकाशन, २००३, पृष्ठ संख्या - ४३
4.       हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास- बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, २००६, पृष्ठ संख्या -४३५
5.       सूरज उगाया जाता - शमशेर, कुछ और कविताएँ, राजकमल प्रकाशन
6.       कविता के सम्मुख- डॉ० गोविंद प्रसाद, वाणी प्रकाशन, २००२, पृष्ठ संख्या -४०४१
7.       प्रतिनिधि कविताएँ, पूर्वोक्त, पृष्ठ संख्या - ८२
8.       इतने पास अपने- शमशेर, पूर्वोक्त, पृष्ठ संख्या - ४४
9.       प्रतिनिधि कविताएं , पूर्वोक्त, पृष्ठ संख्या - १७१
10.    वही, लेकर सीधा नारा, पृष्ठ संख्या - ३१
11.   शमशेर की काव्यानुभूति की बनावट- डॉ० विजयदेवनारायण साही, विवेक के रंग, सम्पादक- देवीशंकर अवस्थी, वाणी प्रकाशन, १९८५, पृष्ठ संख्या - ७६-७७
12.   कवि कर्म:प्रतिमा और व्यक्तित्व-शमशेर, कुछ और गद्य रचनाएं, राजकमल],१९९५, पृ.सं.-२३३
13.   एक नीला दरिया बरस रहा है- राधकृष्ण प्रकाशन,पूर्वोक्त, १९९५, पृष्ठ संख्या - १६२
14.   शमशेर बहादुर सिंह:इतने पास अपनेकुंवरनारायण,आज और आज से पहले,राजकमल प्रकाशन, १९९३, पृष्ठ संख्या - १८६
15.   पूर्वोक्त, प्रतिनिधि कविताएँ, पृष्ठ संख्या - १७९
16.    वही, पृष्ठ संख्या - ४१
17.   शमशेर और आधुनिक कवितामलयज- शमशेर, सम्पादक- सर्वेश्वरदयाल सक्सेना और मलयज, पृष्ठ संख्या - ४०
18.   शमशेर मेरी दृष्टि में मुक्तिबोध निबन्धों की दुनिया- संपादक- निर्मला जैन, वाणी प्रकाशन, २००७, पृष्ठ संख्या - १७५
19.   चुका भी हूँ मैं नहीं- शमशेर, राधाकृष्ण प्रकाशन, १९७५, आभार ज्ञापन
20.   चुका भी हूँ मैं नहीं- शमशेर, पूर्वोक्त, पृष्ठ संख्या - ९९
21.   कुछ कविताएँ -शमशेर पूर्विक्त, पृष्ठ संख्या - ५१
22. प्रभाकर श्रोत्रिय,शमशेर बहादुर सिंह (भारतीय साहित्य के निर्माता),साहित्य अकादमी, १९९७, पृष्ठ संख्या -११०  
                      
  
धवल जायसवाल
शिक्षण सहायक
हिन्दी विभाग दिल्ली विश्वविद्यालय
जवाहरलाल  नेहरू विश्वविद्यालय से एम. ए.
दिल्ली विश्वविद्यालय में शोधरत 
मो-9873845841
ई-मेल :dhawaljaiswal7@gmail.com
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