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समीक्षा:वर्तमान संदर्भ में 'संशय की एक रात' /डॉ. नूतन पाण्‍डेय

Written By Manik Chittorgarh on शनिवार, फ़रवरी 15, 2014 | शनिवार, फ़रवरी 15, 2014

साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका            'अपनी माटी' (ISSN 2322-0724 Apni Maati )                 फरवरी-2014 


चित्रांकन:इरा टाक,जयपुर 
'तारसप्‍तक' के यशस्‍वी कवि तथा 'उत्‍सव पुरुष' नरेश मेहता सनातन मूल्‍यों के पुरोधा तथा वैष्‍णवी आस्‍था के कवि के रूप में लब्‍धप्रतिष्‍ठ हैं। भारत के दो प्राचीन ऐतिहासिक महाकाव्‍य रामायण और महाभारत के महत्‍वपूर्ण विमर्शों को अपनी सृजन- प्रतिभा से युगानुकूल वाणी देने वाले नरेश मेहता ने प्राचीन मि‍थकों को आधुनिकता की कसौटी पर कसकर उन्‍हें आधुनिक संदर्भ में अति प्रासंगिक बना दिया है। युगीन राजनैतिक, सामाजिक और मानसिक स्थितियों की अभिव्‍यक्ति के लिए नरेश मेहता ने पुराण एवं इतिहास की महत्‍वपूर्ण घटनाओं एवं मार्मिक प्रसंगों को आधार बनाकर संशय की एक रात्,प्रवाद पर्व, शबरी और महाप्रस्‍थान जैसे उल्‍लेखनीय खंडकाव्‍यों की रचना कर हिंदी साहित्‍य को गौरव गरिमा प्रदान की है।

     अपने प्रथम खंडकाव्‍य 'संशय की एक रात' में नरेश मेहता ने उपजीव्‍य कथा के रूप में रामायण के महत्‍वपूर्ण बीजप्रसंग 'सिंधु तट पर सेतुबंध के पश्‍चात् की घटना' को इस काव्‍य का आधार बनाया है। सन् 1962 में 'चीन-युद्ध की पृष्‍ठभूमि में लिखा गया यह खंड-काव्‍य युगीन संदर्भ में अति प्रासंगिक है, जिसमें युद्ध जैसे आदिम और सनातन काल से चले आ रहे प्रश्‍न को मर्यादा पुरुषोत्‍तम श्रीराम के चरित्र के माध्‍यम से उठाया गया है। भारतीय संस्‍कृति के आदर्श पुरुष और शील शक्ति, सौंदर्य के गुणों से युक्‍त श्रीराम के मिथक में कवि ने सामान्‍य जन की प्रश्‍नाकुलता, युद्ध के प्रति संशयग्रस्‍त मन और युद्ध की विभीषिका से भयभीत संवेदनशील चरित्र को अभिव्‍यक्ति दी है। अपनी इसी विशेषता के कारण खंडकाव्‍य सामान्‍य जन से तादात्‍म्‍य स्‍थापित करने में सफल हुआ है, वहीं युगानुरूप परिस्थितियों में प्रासंगिक भी बन पड़ा है।

     'संशय' मानव मन की वह सहजात प्रवृत्ति है जो तर्कबुद्धि पर आधारित होती है। प्रसिद्ध पाश्‍चात्‍य विद्वान डेकार्टे का मानना है- 'मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ, जो आदमी सोचता नहीं, विचार नहीं करता, संदेह नहीं करता, वह वस्‍तुत: अपनी अस्मिता को अपने होने के अहसास को प्रतिष्ठित भी नहीं करता।' किसी वस्‍तु स्थिति या घटना के बहुविध पक्षों के बारे में चिंतन मनन, तर्क-वितर्क और वाद-विवाद की लंबी प्रक्रिया के पश्‍चात ही किसी निर्णय पर पहुँचा जा सकता है। मनुष्‍य की यही स्‍वाभाविक प्रवृत्ति उसे अन्‍य प्राणियों से बेहतर सिद्ध करती है और निर्णय की गुणवत्‍ता को असंदिग्‍ध बनाती है।

     सेतुबंध बन चुका है। दोनों पक्षों की सेनाएं आक्रमण के लिए सज्जित हैं। इस महत्‍वपूर्ण पड़ाव पर कवि द्वारा राम की द्वंद्वगत मनोस्थिति का चित्रण अत्‍यंत सोद्देश्‍य जान पड़ता है। युद्ध की पूर्वरात्रि पर सेनानायक श्रीराम के मन में यह प्रश्‍न उठना अत्‍यंत स्‍वाभाविक है कि क्‍या युद्ध अनिवार्य है \ क्‍या युद्ध के बिना शांति संभव नहीं \ राम के मन की दुविधाग्रस्‍त स्थिति के चरम विकास के लिए नरेश मेहता सिंधु तट को सर्वाधिक उचित मानते हैं। उनके मत में- 'अपने विशेष प्रयोजन के लिए राम कथा का मैंने यह स्‍थल चुना, जो घटनाहीन था, किंतु मेरी रचना संभावना के लिए उर्वर । राम जिस द्विधा को प्रस्‍तुत करते हैं, उसके लिए यही उपयुक्‍त स्‍थल था -

     यह अंतरीय मन का, स्‍थल का । पृष्‍ठ- 54

संशय की स्थिति में व्‍यक्ति किसी कार्य या परिस्थिति के करने न करने, होने, न होने की संभावना में उलझा रहता है और एक निर्णय पर पहुँचने तक इसी मनोदशा में डूबता-उतराता रहता है। राम भी संशय की स्थिति में युद्ध और शांति जैसे दो विपरीत ध्रुवों के मध्‍य चिरद्वंद्व की उस स्थिति में पहुँच जाते हैं, जहॉं मूल्‍यों की टकराहट होती है। राम की इसी संशयग्रस्‍त मनोदशा के माध्‍यम से युद्ध जैसे महत्‍वपूर्ण विषय पर किया गया विवेचन रचना को कालजयी बनाता है। राम जानते हैं कि-
             यदि मैं मात्र कर्म हूँ
             तो यह कर्म का संशय है ।
             यदि मैं मात्र क्षण हूँ तो यह क्षण का संशय है ।
             यदि मैं मात्र घटना हूँ, तो यह घटना का संशय है । पृष्‍ठ- 62

खंडकाव्‍य का कथानक चार सर्गों में विभक्‍त है :-
1)   सॉंझ का विस्‍तार और बालू तट ।
2)   वर्षा भीगे अंधकार का आगमन ।
3)   मध्‍यरात्रि की मंत्रणा और निर्णय ।
4)   संदिग्‍ध मन का संकल्‍प और सवेरा ।

     खंडकाव्‍य का प्रारंभ रामेश्‍वरम के सिंधु तट पर सेना की तैयारियों और राम के आत्‍म मंथन से शुरू होता है। युद्ध के लिए राम के आदेश की प्रतीक्षा है, लेकिन उसी समय राम के मन में उठ रहे संशय तीव्र हो जाते हैं । राम एक 'प्रज्ञा प्रतीक' के रूप में युद्ध के विभिन्‍न पहलुओं पर चिंतन करते हैं । घटना का मूल कथ्‍य ऐतिहासिक पौराणिक एवं अत्‍यंत संक्षिप्‍त होते हुए भी मानवीय संवेदनाओं और मनुष्‍य के अस्तित्‍व से जुड़ा है, इसलिए अत्‍यंत व्‍यापक और जटिल है। नरेश मेहता के अनुसार- 'युद्ध आज की प्रमुख समस्‍या है, संभवत: सभी युग की।' और इसी समस्‍या से चिंतित होकर उन्‍होंने राम के संशयाकुल मन को युद्ध के इन विभिन्‍न पहलुओं पर चिंतन करते हुए दिखाया है कि -

1)   युद्ध द्वारा ही असत्‍य पर सत्‍य की विजय हो सकती है, यानी युद्ध सत्‍य प्राप्ति का साधन है।
2)   मूल्‍यों के वैषम्‍य की एक प्रतिक्रिया है।
3)   युद्ध परिस्थितिजन्‍य कर्म है, परिस्थितियाँ युद्ध को जन्‍म देती हैं, मनुष्‍य नहीं।

     इस समय राम सामान्‍य जन के समान ही युद्ध के प्रति नकारात्‍मक भाव रखकर युद्ध करने से झिझकते हैं और कहते है :-

                 हम साधारण जन,
                 युद्ध प्रिय थे कभी नहीं ।

     खंड काव्‍य की समस्‍त घटनाएँ एक ही रात के भीतर घटित होती है । कथा का प्रत्‍येक पात्र मिथकीय होते हुए भी वर्तमान संदर्भ में अत्‍यंत प्रासंगिक है। इस एक रात का संघर्ष युद्ध और शांति का पक्ष-विपक्ष का, विपरीत ध्रुवों का संघर्ष है।  राम यदि संशयग्रस्‍त व्‍यक्ति के प्रतिनिधि हैं, तो लक्ष्‍मण लघु मानव के प्रतीक। 'राम जिस विराटत्‍व की कल्‍पना में क्षण के विवेक को निष्‍ठा और विकल्‍प को, कर्म और वर्चस्‍व को, शंकालु होकर अपने से अलग कर देना चाहते हैं, वहीं पर लक्ष्‍मण इनकी परंपरागत अर्थवत्‍ता में अर्थ के नए स्‍वर जोड़ते हैं।' (आधुनिक कविता की उपलब्धि : संशय की रात पृष्‍ठ- 7, लक्ष्‍मीकांत वर्मा)

     लक्ष्‍मण और हनुमान जहाँ प्रजा का प्रतिनिधित्‍व करते हैं, वहीं सीता साधारण जन की अपहृत स्‍वतंत्रता है, जिसको पाना उनका पुनीत कर्तव्‍य है :-

     हम कोटि-कोटि जनों की तो केवल प्रतीक है
     रावण अशोक बन की सीता,
     हम साधारण जन की अपहृत स्‍वतंत्रता

और अपनी इस सीता के प्रतीक को नरेश मेहता सुमित्रानंदन पंत प्रेरणा स्‍वरूप  अर्पित करते हैं।
     युद्ध वर्तमान समय की एक गंभीर समस्‍या है, जिसमें विश्‍व का प्रत्‍येक देश और मनुष्‍य भयभीत है। खंडकाव्‍य में जो संशय एक राजकुमार का संशय था, शायद इसीलिए साधारणीकरण का रूप ले लेता है। एक संवेदनशील साहित्‍यकार के रूप में नरेश मेहता ने विविध पात्रों की परस्‍पर बातचीत और कथनों के माध्‍यम से युद्ध और विश्‍व शांति के मुद्दों को बेबाकी से उठाया है। उनके पात्र युद्ध के कारणों, युद्ध की स्थितियों, संभावनाओं और परिणामों आदि पर गंभीर चिंतन करते हैं। जब कोई अन्‍यायी या कूटनीतिज्ञ सम्राट अपने अहं की तुष्टि या साम्राज्‍य विस्‍तार की पिपासा को शांत करने के लिए अपने क्षेत्र का अतिक्रमण कर दूसरे के क्षेत्र में अनधिकार प्रवेश चाहता है, तो युद्ध अवश्‍यंभावी हो जाता है । वि‍भीषण भी श्रीराम से संशय से ऊपर उठकर युद्ध करने का निवेदन करते हैं, वे युद्ध की अनिवार्यता पर जोर देकर कहते हैं:-

              युद्ध / मंत्रणा नहीं
              एक दर्शन है राम । अंतिम मार्ग है
              स्‍वत्‍व और अधिकार अर्जन का । पृष्‍ठ- 64

     लेकिन श्रीराम युद्ध की विभीषिका को जानते हुए ही, समस्‍त सृष्टि को युद्ध से बचाना चाहते हैं :-
              मानव में श्रेष्‍ठ जो विराजा है/उसको ही
              हाँ उसको ही जगाना चाहता रहा हूँ बंधु । पृष्‍ठ- 19

     वे जानते हैं कि युद्ध कितना भी अनिवार्य क्‍यों न हो, कितने ही सार्थक उद्देश्‍य के लिए क्‍यों न लड़ा जा रहा हो, दुष्‍परिणाम ही लाता है। वे पशु को उसकी पशुता से उत्‍तर नहीं देना चाहते। वे युद्धधोन्‍मत्‍त व्‍यक्ति का विवेक जागृत कर उसे युद्ध से विमुख करना चाहते हैं। उदात्‍त और मानवीय गुणों से परिपूर्ण यही सत्‍य उन्‍हें मानव से महामानव बनाने की ओर ले जाता है। श्रीराम को हिंसा बिल्‍कुल प्रिय नहीं, वे युद्ध से मुक्ति चाहते है :-

              मैं सत्‍य चाहता हूँ युद्ध से नहीं
              खड्ग से भी नहीं
              मानव का मानव से सत्‍य चाहता हूँ
              क्‍या यह संभव है ।
              क्‍या यह नहीं है ।

     राम का प्रमुख संशय यही है कि मानव का अभीष्‍ट क्‍या है- युद्ध या शांति। युद्ध से क्‍या प्राप्‍त किया जा सकता है । व्‍यष्टि से समष्टि का द्वंद्व उन्‍हें मथता है। वे सोचते हैं कि सीता की प्राप्ति उनके व्‍यक्तिगत महत्‍व का बिंदु है, इसलिए व्‍यक्तिगत समस्‍या के समाधान के लिए पूरे समाज को युद्ध के गर्त में नहीं फेंकना चाहते। व्‍यक्तिगत मेरी समस्‍याएँ क्‍यों ऐति कारणों को जन्‍म दें। वे कहते हैं-

             धनुष, बाण, खडग और शिरस्‍त्राण
             मुझे ऐसी जय नहीं चाहिए
             बाणविद्ध पारसी सा विवश
             साम्राज्‍य नहीं चाहिए ।
             मानव के रक्‍त पर पग धरती आती
             सीता भी नहीं चाहिए, सीता भी नहीं ।

     राम हिंसा और अहिंसा के द्वंद्व में फंसकर दुविधाग्रस्‍त हो जाते हैं, क्‍योंकि उन्‍हें अहिंसा प्रिय है । नरेश मेहता भी गांधीवादी अहिंसा के पक्षधर हैं। उन्‍हें लगता है कि 'हमारी विकास-यात्रा हिंसा से अहिंसा की ओर रही है, जबकि शेष मानवता की यात्रा हिंसा से घोर हिंसा की ओर।' श्रीराम भी मानवता के पुजारी हैं, उनका मानना है कि युद्ध दायित्‍व है आवेश नहीं।

     जीवन में जितनी भी स्थितियॉं- परिस्थितियाँ आती हैं, उनके संबंध में जिज्ञासाऍं, संशय उठना, कार्य के निर्णय-अनिर्णय की स्थितियाँ बनना स्‍वाभाविक हैं। ऐसी ही स्थिति श्रीराम के शंकाकुल मन की है। उन्‍हें युद्ध जीतने/हारने का डर नहीं है, वे कापुरुष भी नहीं हैं :-

             लक्ष्‍मण मैं नहीं हूँ का पुरुष
             युद्ध मेरी नहीं है कुंठा
             पर युद्ध प्रिय भी नहीं ।

     लेकिन युद्ध की सार्थकता पर प्रश्‍नचिह्न लगाते हैं, उनके अनुसार जब तक हो सके, युद्ध को टालना चाहिए -

          इतिहास के हाथों बाण बनने से अधिक अच्‍छा है
          स्‍वयं हम अंधेरों में यात्रा करते हुए खो जाएँ,
          किसी के हाथों सही, पर विपत्ति खोना है ।

     वे सोचते हैं कि क्‍या रावण का वध किए बिना रावणत्‍व को खत्‍म किया जा सकता है। सीता रूपी समस्‍त मानवता को अंधकार रूपी रावण में विलीन होने दिया जाए या फिर युद्ध करके सृष्टि को आतंक से मुक्‍त कर रामराज्‍य की स्‍थापना का लक्ष्‍य पूरा किया जाए और नवीन आदर्श मानव समाज का निर्माण किया जाए वस्‍तुत: उनका द्वंद्व रावण से नहीं रावणत्‍व से आसुरी प्रवृत्तियों से है। इसीलिए वे रावण से वैर नहीं रखते और युद्ध का विकल्‍प खोजना चाहते हैं।

     राम युद्ध और उसके बाद होने वाले विनाश का उत्‍तरदायित्‍व नहीं, लेना चाहते। वे नहीं चाहते कि ब्रहमहत्‍या का पाप उन्‍हें लगे। पूरी रात वे स्‍वर्णमृग के पीछे भागने से लेकर अब तक की सभी घटनाओं के लिए खुद को दोषी मानते है:-

          हाय, आज तक मैं निमित्‍त ही रहा
          कुल के विनाश का ।
          लेकिन अब नहीं बनूँगा कारण
          जन के विनाश का ।

     राम के इन संशयों को दूर करने के लिए दशरथ की छाया कर्म के सिद्धांत का विश्‍लेषण कर उन्‍हें ऐसा कर्म करने को प्रेरित करती है, जिसमें कोई शंका या संशय न हो, सिर्फ यश प्राप्ति हो।
                  पुत्र मेरे
                  संशय या शंका नहीं, कर्म ही उत्‍तर है
                  यश जिसकी छाया है, उस कर्म को करो ।

     भोर की वेला में निर्णय व्‍यष्टि से समष्टि की ओर प्रस्‍थान करता है। परिषद् के बहुमत पर वे युद्धरत होते हैं। बावजूद आश्‍वस्ति के उनके व्‍यक्तित्‍व में विवशता का भाव स्‍पष्‍ट दीखता है-

               अब मैं निर्णय हूँ, सबका, अपना नहीं ।
 वैयक्तिक सोच भिन्‍न होने पर भी सामूहिक निर्णय का राम के द्वारा स्‍वीकारा जाना प्रजातांत्रिक मूल्‍यों को संबल प्रदान करता है:-

              मुझसे मत प्रश्‍न करो, ओ मेरे विवेक ।
              संशय की वेला अब नहीं रही ।

     यह उल्‍लेखनीय है कि इस पूरे खंडकाव्‍य में सिर्फ राम ही अपने दायित्‍वों के चलते संशयग्रस्‍त दीखते हैं।बाकी सभी पात्र युद्ध को एक दर्शन के रूप में स्‍वीकार कर उसे अवश्‍यंभावी मानते हैं।हनुमान जी भी अपनी दृष्टि स्‍पष्‍ट रखते हुए कहते हैं

             संभव है हमारे कारण ही
             अनागत युद्धों की नींव पड़े
             पर इस डर से
             क्‍या हम न्‍याय और अधिकार छोड़ दें ।

     वहीं लक्ष्‍मण भी संशय और विकल्‍प के स्‍थान पर निश्‍चय और संकल्‍प से युक्‍त दिखाई पड़ते हैं ।
    
डॉ. नूतन  पाण्‍डेय
केंद्रीय हिंदी निदेशालय
पश्चिमी खंड-7, रामकृष्‍णपुरम
नई दिल्‍ली-110066
मोबाइल नं. 9968284910
ई-मेल pandeynutan91@gmail.com
 नरेश मेहता ने राम के माध्‍यम से युगानुरूप नई धारणाएँ एवं मूल्‍य तलाशने की कोशिश की है। लक्ष्‍मीकांत वर्मा ने लिखा है- आधुनिक विसंगतियों का राम में आरोपण तथा उनके माध्‍यम से अपने युग की समस्‍याओं के समाधान के रूप्‍ में विपरीत मूल्‍यों, बोधों और मान्‍याताओं के बीच एक सही दृष्टि अपनाने की प्रेरणा ही मूल अभीष्‍ट है। यह समस्‍या अपने में कोई नई चीज नहीं है। इस प्रकार की स्थितियाँ मानव समाज तथा इतिहास में बराबर उठती रहीं है, लेकिन प्रत्‍येक युग का 'संशय' अपने ऐतिहासिक दाय और मजबूरी से अद्वितीय हो जाता है। पृष्‍ठ- 5

     इस प्रकार संशय की एक रात का सेतुबंध व्‍यष्ठि और समष्टि मन के सेतुबंध अर्थात् समन्वित मानव चेतना का प्रतीक है, जो युद्ध और शांति की आत्‍ममंथन और सामूहिक दायित्‍व बोध की, आधुनिक युग के खंडित व्‍यक्तित्‍व और भौतिकवादी सुखों के पीछे भागने जैसी प्रश्‍नों को उठाता है, और उनका समाधान खोजना चाहता है, लेकिन ऐसे प्रश्‍नों का समाधान खोज पाना सहज और आसान नहीं, लेकिन मानव की खोज निरंतर जारी रहेगी।
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1 टिप्पणी:

  1. THIS is HINDI as it should really be. अरसे बाद कुछ पढने को मिला. संशय की एक रात इन्टरनेट पर ढूँढ रहा था और यह पेज मिला.

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