कविताएँ:अनुपमा तिवाड़ी(जयपुर) - अपनी माटी

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शनिवार, मार्च 15, 2014

कविताएँ:अनुपमा तिवाड़ी(जयपुर)

साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका            'अपनी माटी' (ISSN 2322-0724 Apni Maati )                 मार्च-2014 


एक कस्बे के रेलवे के बंगले में
छूट गईं थीं
बचपन की ढेर सारी यादें,
वो अब भी एक पोटली में बंधी रखी होंगी
किसी कोने में !
मां - पिता की अँगुलियों की छाप
अब भी टंगी होंगी
दरवाज़ों पर !
मैं अब भी डालती होऊँगी
भर - भर बाल्टी पानी
मोगरे, चमेली, गुलाब, गुडहल, चांदनी, तिकम्बे और मधुमालती में !
हम पच्चीस बरस पहले समेट लाये थे
सारा अपना साजो - सामान इस महानगर में !
पर, कितना ही समेटो
सारा कहाँ आ पाता है
साथ में !
कुछ ना कुछ छूट ही जाता है
यहाँ - वहाँ
बिखरा - बिखरा
कतरा - कतरा !
बस रह जाता है .......

आँखों में कुछ !
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दो और दो का मेल हमेशा, चार कहाँ होता है ?

जीरो से सौ तक रेंज होती है
रिश्तों की,
प्यार की,
रंगों की,
भेदभावों की.
इन सब में नहीं होती
स्पष्ट कोई रेखा
इनमें होता है ओवरलैप– सा
एक से दो के बीच.
इसलिए तुम क्लेम नहीं कर पाते हो असलियत को
कभी – कभी नहीं, बहुत बार.
जीवन गणित नहीं होता
एक और दो के बीच होते हैं
बहुत से धागों के रेशे
जिन्हें तुम पकड़ नहीं पाते हो
पर वो होते हैं ......
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जो किनारे पर खड़े हैं ....



जो किनारे पर खड़े हैं 

वही सबसे पहले डूबेंगे । 

सबसे पहले उनकी नौकरियाँ जाएँगी
सबसे पहले उन्हीं की बस्तियाँ,
आग के हवाले होंगी ।
सबसे पहले वही विस्थापन के नाम पर 
धकेले जाएँगे
यहाँ - वहाँ, वहाँ - यहाँ पर कहीं नहीं।
सबसे पहले उन्हीं की गलतियाँ अक्षम्य होंगीं
सबसे पहले उन्हीं की माँ - बहन बलात्कार की शिकार होंगी 
रोंदी जाएँगी, कुचली जाएँगी और अंततः मार दी जाएँगी
ये किनारों पर खड़े आदमी 
नहीं डरते हैं,
प्राकृतिक विपदाओं से 
नहीं डरते हैं
किसी अज्ञात ताकत से 
इन्हें डर है,
आदमी की ताकत का ।
कितना डर है, एक आदमी को, एक आदमी से ।
क्या तुम भी किसी से डरते हो ?
यदि डरते हो 
तो वह आदमी नहीं है 
जिससे तुम डरते हो ।


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अनुपमा तिवाड़ी:पिछले 25 वर्षों से विभिन्न मुद्दों पर काम करने वाली संस्थाओं में काम करती रही हैं जिनमें – घर से बिछड़े बच्चों को घर पहूंचाना, बाल अपचारी बच्चों, देह व्यापार में लिप्त परिवारों के बच्चों और मैला ढोने वाले परिवार के बच्चों की शिक्षा तथा पर्यावरण व प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे प्रमुख हैं.वर्तमान में अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन, राजस्थान में कार्य कर रही हैं जिसमें वे हिंदी की रिसोर्स पर्सन हैं. अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन सरकारी विद्यालयों के शिक्षकों का शैक्षिक संवर्धन का कार्य करता है.हिंदी व समाज शास्त्र में एम ए और पत्रकारिता और जनसंचार में स्नातक हैं.कवितायेँ लगभग 15 समाचार पत्र–पत्रिकाओं में और ई–मग्जीन में छपे हैं.2011 में प्रथम कविता संग्रह ''आइना भीगता है'' बोधि प्रकाशन जयपुर से प्रकाशित हुआ है.आकाशवाणी और कवि सम्मेलनों में भी शिरकत करती रही हैं.ई-मेल संपर्क है anupamatiwari91@gmail.com

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