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ग़ज़ल:तरकश प्रदीप

Written By Manik Chittorgarh on मंगलवार, अप्रैल 15, 2014 | मंगलवार, अप्रैल 15, 2014

           साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका            
'अपनी माटी' 
(ISSN 2322-0724 Apni Maati
इस अप्रैल-2014 अंक से दूसरे वर्ष में प्रवेश
चित्रांकन:रोहित रूसिया,छिन्दवाड़ा



1

रहा जो अनछुआ अब तक, छुआ जाए !
नहीं जिनका कोई, उनका हुआ जाए !

बनी रहमत, कभी लौटी, नहीं देखा,
न जाने, किस जहाँ मेरी, दुआ जाए !

मेरा मिलना तेरे मिलने पे निर्भर है,
ये मग़रूरी का मौसम है, मुआ जाए !

जुए के खेल सा ये इश्क़ है 'तरकश'
तो खेला क्यूँ नहीं फिर ये जुआ जाए !


2.

जब ज़रूरत हो दख़ल देना ज़रूरी है !
अब रियाया को बदल देना ज़रूरी है !

बात ये बस बात बन के रह नहीं जाए,
साथ सच का दरअसल देना ज़रूरी है !

जब कभी मंज़िल पुकारे नींद में आ के,
बाँध के बिस्तर को चल देना ज़रूरी है !

इश्क़ का कर्ज़ा लिया है तो चुकाओ भी,
सूद है सो है, असल देना ज़रूरी है !

हो ख़यालों की गली में कोई हंगामा,
लब को अपने तब ग़ज़ल देना ज़रूरी है !

ज्ञान 'तरकश' बाँटते रहते हो जब देखो,
ख़ुद को पर पहले अकल देना ज़रूरी है ! 

तरकश प्रदीप 
{वास्तविक नाम: प्रदीप बिश्नोई}
राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक बाल विद्यालय, 
मालवीयनगर, नई दिल्ली में अध्यापक
पता : 470, प्रथम तल, 
मैदान गढ़ी, नई दिल्ली-110068
मूल निवासी : गाँव- रामपुरा नारायणपुरा, 
तहसील-त. अबोहर, 
जिला: फ़ाज़िलका, 
पंजाब-152116
मो- :08745992929
ई-मेल:prdpbishnoi929@gmail.com

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