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शोध:मोहभंग का कवि धूमिल और उनकी ‘पटकथा’/मधु

Written By Manik Chittorgarh on मंगलवार, अप्रैल 15, 2014 | मंगलवार, अप्रैल 15, 2014

      साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका            
'अपनी माटी' 
(ISSN 2322-0724 Apni Maati
                इस अप्रैल-2014 अंक से दूसरे वर्ष में प्रवेश             
                शोध:मोहभंग का कवि धूमिल और उनकी ‘पटकथा’/मधु

चित्रांकन:रोहित रूसिया,छिन्दवाड़ा
स्वतंत्रता के बाद से भारतीय जीवन और साहित्य में राजनीति का हस्तक्षेप तेजी से बढ़ा है, इसलिए समकालीन राजनीति से साक्षात्कार करना कवि का एक आवश्यक कर्म बन जाता है, क्योंकि राजनैतिक परिस्थितियों का प्रत्यक्ष प्रभाव आम आदमी के जीवन पर अनिवार्य रूप से पड़ता है | वह राजनैतिक गतिविधियों को आत्मसात् करता हुआ उसे अपना कथ्य बनाता है | साहित्यकार के लिए यह आवश्यक है कि वह समाज को जैसा, जिस रूप में देखे उसे अपनी निजी दृष्टि से तराशकर नूतन आकार प्रदान करे और यथार्थ अनुभवों से गुजरते हुए आम जनता को अपनी रचना के माध्यम से यथार्थ से परिचित कराए |

           सन् 1960 तक राजनीति में जो उथल पुथल मची उसके परिणामस्वरूप 1960 के बाद मोहभंग का दौर आया | मोहभंग कोई अवधारणा नहीं है, बल्कि यह एक स्थिति है जो स्वतंत्र भारत की राजनीति से उत्पन्न हुई, परन्तु यह अचानक से आई स्थिति नहीं थी | स्वतंत्रता के बाद से ही इस स्थिति के उत्पन्न होने के अंकुर फूटने लगे थे | इतिहास की अशांत, पेचीदा और निर्णायक घटनाओं से गुजरते हुए 1947 में आज़ादी मिलने के साथ हमारे स्वतंत्र भारत की रचना हुई | स्वतंत्रता के साथ भारत में परिवर्तन का नया दौर शुरू हुआ | अगस्त 1947 में सत्ता कांग्रेस के हाथ में आई | जिस कांग्रेस ने अब तक राष्ट्रीय आन्दोलन का नेतृत्त्व किया था | उसी ने अब देश का शासन संभाला, लेकिन आज़ादी मिलने के पीछे उसकी अनेक सीमाएं थी | देश में तमाम तरह की उथल-पुथल मची | अंग्रेजी शासन ने कांग्रेस के सामने जो योजनाएं रखी उसका परिणाम देश के विभाजन के रूप  में सामने आया |  इससे हुआ यह कि सत्ता तो कांग्रेस के हाथ में आई परन्तु देश दो खंडों में विभाजित हो गया | गाँधी की मृत्यु के बाद स्वतंत्र भारत की बागडौर नेहरु के हाथ में आयी | इसलिए 1947 से 1964 तक के दौर को ‘नेहरु-युग’  के नाम से जाना जाता है |

            नेहरु की अगुवाई में भारतीय संविधान की स्थापना के साथ ही स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व इन तीन संकल्पनाओं को लेकर भारत में लोकतंत्र  की स्थापना की गयी | इस सन्दर्भ में रजनी कोठारी ने कहा है - अगले दस वर्षों तक नेहरु का प्रताप-सूर्य मध्याह्न पर रहा | उनके जीवन के दो उद्देश्य थे :-लोकतंत्र और आर्थिक विकास | और उन्होंने सारी शक्ति से देश को इन लक्ष्यों की ओर ले जाने का यत्न किया |[1]लोकतंत्र की स्थापना से ऐसी शासन प्रणाली की इच्छा व्यक्त की गयी जो अपनी कार्य-पद्धति से गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा, बेरोजगारी, जाति, धर्म, लिंग, और भाषा के आधार पर व्याप्त सामाजिक भेदभाव, समाज में व्यापक रूप में फैले भ्रष्टाचार, आर्थिक असमानताओं को दूर करने के साथ-साथ न्याय आधारित समाज की स्थापना करे | परन्तु इस लोकतंत्र या जनतंत्र में न तो व्यवस्था इसका  सही स्वरुप समझ पाई और न ही जनता इसे समझ पाई | इसकी मोहकता के कारण जनता ने इसे स्वीकार किया | अभय कुमार दूबे ने इस स्थिति पर विचार करते हुए कहा –स्वतंत्रता के बाद की भारतीय राजनीति का इतिहास दरअसल वह कहानी है, जो बताती है कि आम जनता ने इस निमंत्रण को कैसे शुरू-शुरू में हिचकते हुए, फिर मनोरंजन की मुद्रा में और फिर प्रबल आवेग के साथ स्वीकार किया और अंततः वह इस खेल में रम गई |[2]
           
धूमिल
जनतंत्र की स्थापना के साथ-साथ ‘नेहरु-युग’ की सबसे बड़ी उपलब्धियाँ नेहरु की नीतियाँ थी, विशेषकर ‘विदेश-नीति’ जो भारतीय राजनीति में अपना विशेष स्थान रखती है | इतिहासकार बिपिन चन्द्र कहते हैं -
स्वतंत्र विदेश नीति पर चलने का प्रयत्न 1947 के बाद की भारतीय राजनीति की विशेषता थी | यह लम्बे इतिहास और हाल की घटनाओं की परिणति थी |[3] नेहरु अत्यंत संवेदनशील, कल्पनाशील परन्तु वैज्ञानिक टेक्नोलॉजी को महत्व देने वाले व्यक्ति थे | नेहरु देख रहे थे कि दुनिया द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद दो शक्तिशाली केन्द्रों में बंट गई – साम्यवादी और पूंजीवादी | फिर भी नेहरु मानते थे कि शक्ति मनुष्य को भ्रष्ट करती है, इसलिए उन्होंने ‘गुट निरपेक्षता’ की नीति तैयार की | ‘कोरियाई युद्ध’ गुट निरपेक्षता की कसौटी था और साथ ही शांति में उसके विश्वास की भी | इसके बाद 1950 में चीन ने तिब्बत पर हमला करके उसे बिना किसी विशेष प्रयत्न के अपने में मिला लिया | फलस्वरूप भारत को चुप रहना पड़ा |

             नेहरु ने पंचशील के पाँच सिद्धांतों को अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के क्षेत्र में प्रस्तुत किया | इसके अंतर्गत उन्होंने एक-दूसरे की प्रादेशिक अखंडता एवं संप्रभुता का सम्मान, अनाक्रमण, एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में अहस्तक्षेप, सम्मान एवं पारस्परिक लाभ एवं शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के सिद्धांतों को रखा | पंचशील का यह समझौता भारत-चीन संबंधों के मैत्री युग का चरम उत्कर्ष था | नेहरु यथार्थ में यह चाहते थे कि भारत और चीन को अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में साथ मिलकर कार्य करना चाहिए | इसलिए विश्वमंच पर खड़े होकर उन्होंने शांति कपोत उड़ाए | हिमालय पार बसने वाले चीन को अपना भाई घोषित कर ‘हिन्दी चीनी भाई भाई’ का नारा दिया और विश्वबंधुत्व और शांति का आदर्श प्रस्तुत करने की चेष्टा की | किन्तु नेहरु की सारी नीतियाँ, सिद्धांत, विश्वबंधुत्व, शांति और अहिंसा के सपने उस समय चूर-चूर हो गए जब ‘हिन्दी-चीनी भाई भाई’ के नारे के समर्थक चीन ने भारत पर दिसंबर 1962 में आक्रमण कर दिया | नेहरु यह समझ नहीं पाए की चीन का सह-अस्तित्व के सिद्धांत में कतई विश्वास नहीं था | उसका विश्वास था कि सीमा के प्रश्न केवल शक्ति प्रयोग से ही हल किए जा सकते हैं | और सबसे महत्त्वपूर्ण बात तो यह थी की तिब्बत को अपने अधीन करने की घटना से भी नेहरु चीन के साम्राज्य विस्तार के मंतव्य को नहीं भाप पाए | परन्तु चीन यह आसानी से समझ गया था कि भारत असंलग्न है, इसलिए वह पश्चिम से कोई सहायता नहीं लेगा | परिणामस्वरूप 1962में चीनी आक्रमण हुआ और यहीं से मोहभंग की शुरुआत होती है | नेहरु-युग की योजनाओं की पोल खुल जाती है | इससे विशव के अन्य राष्ट्रों के मित्र और शत्रु का भेद खुल गया | जनता के लिए ही नहीं बल्कि हमारे नेतृत्त्व के लिए भी मोहभंग की स्थिति पैदा हो गई |

            इन घटनाओं का प्रभाव भारतीय समाज पर बहुत गहरा पड़ा, इसलिए हिन्दी कविता भी इससे अछूती नहीं रही | इसलिए सन् 1960के बाद की कविता की संवेदना और अभिव्यक्ति के ढंग में बदलाव नज़र आने लगा | इस बदलाव में जिन कवियों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई उनमें धूमिल एक हैं | जिस तरह मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय, राजकमल चौधरी आदि कवि राजनीति से प्रभावित हुए उसी प्रकार समकालीन राजनीति का प्रभाव धूमिल पर भी प्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता है | धूमिल युवा वर्ग के रहे कवि हैं और वे स्वयं ये मानते थे कि युवा लेखन के लिए राजनीति से परिचित रहना बेहद जरुरी है | ‘कल सुनना मुझे’ में छपी ‘भाषा की रात में:धूमिल की भूमिका’ में स्वयं धूमिल कहते हैं -युवा लेखन के लिए राजनीतिक समझदारी जरुरी है | बिना इस राजनीतिक समझदारी के आज का लेखन संभव नहीं है |[4] इसलिए जब राजनीति में मोहभंग प्रारंभ हुआ तो धूमिल के काव्य में इस स्थिति को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है | वैसे तो 1963 के आस-पास धूमिल की कविताएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगी थीं, परन्तु उनका प्रथम काव्य-संग्रह ‘संसद से सड़क तक’ 1972 में प्रकाशित हुआ | इसके बाद 1977 में ‘कल सुनना मुझे’ प्रकाशित हुआ | ‘सुदामा पाण्डेय का प्रजातंत्र’ क्रमशः उनका तीसरा काव्य-संग्रह है, जो 1984 में प्रकाशित हुआ |

           ‘संसद से सड़क तक’ में प्रकाशित 25 कविताओं में से ‘पटकथा’ उनकी बेहद महत्त्वपूर्ण और चर्चित कविता है | यह कविता प्रहार और पर्दाफाश की कविता है| हमारे सामाजिक और राजनीतिक जीवन में जो मोहभंग और अव्यवस्था गहराती गई है, उसकी हू-ब-हू शक्ल इस कविता में प्रारम्भ से अंत तक आक्रोश और व्यंग्य के माध्यम से देखने को मिलती है | ‘पटकथा’ में प्रारम्भ से ही देखा गया है कि धूमिल पर मोहभंग का असर आजादी से शुरू होता हुआ नेहरु युग की असफलताओं के साथ गहराता जाता है | डॉ. नंदकिशोर नवल ने इस कविता के विषय में कहा है- ‘पटकथा’ धूमिल के यथार्थ बोध की परिपक्वता का चरम परिणाम है | उसमें नेहरु के प्रति उनके भाव और विचार बदले हुए हैं | इस प्रसंग का ज़िक्र यहाँ इसलिए किया गया है कि हम धूमिल की उस प्रक्रिया से अवगत हो सकें जिसे मोहभंग की प्रक्रिया के अलावा और कुछ नहीं कह सकते |[5]
           मोहभंग की बात की जाए तो नई कविता को इससे अलग करके नहीं देखा जा सकता | लेकिन प्रश्न यह उठता है कि धूमिल का मोहभंग नई कविता के कवियों से कैसे भिन्न है ? यह भिन्नता बहुत स्थूल न होकर सूक्ष्म है | नयी कविता के कवियों में मोहभंग से गहरी पीड़ा उत्पन्न होती है, लेकिन धूमिल को झटका तो लगता है परन्तु वे चीत्कार नहीं करते | वे तमाम चीज़ों को स्वाभाविक रूप में ले लेते हैं | वे अपने को जनतंत्र और व्यवस्था पर केन्द्रित करते हैं और उसकी असलियत उजागर करने लगते हैं |

           ‘पटकथा’ आत्मपरक ढंग से शुरू होती है | आरम्भ में ही धूमिल ने आज़ादी के प्रति अपने मोह को विस्तार से चित्रित किया है | वह उस आज़ादी के मिलने प्रसन्नता प्रकट करता है जिससे उसे बहुत उम्मीदें हैं | इस प्रसन्नता को प्रकट करता हुआ काव्य नायक ‘मैं’ कहता है-
            मैंने कहा आ-ज़ा-दी
            और दौड़ता हुआ खेतों की ओर गया |
            वहाँ कतार के कतार
            अनाज के अंकुए फूट रहे थे |[6]

            आज़ादी के लगभग दो दशक मोह और आशावाद में दूबे दिखाई देते हैं | भारत का बुद्धिजीवी वर्ग इसी आशावादिता के कारण एक नए भारत एक नए समाज और एक नई राजनीति का स्वप्न देख रहा था | इस युग के विषय में सुनील खिलनानी कहते हैं -उस युग में लोकतंत्र और समाज-सुधार की ऊँची-ऊँची बातें खूब की जाती थीं और शासन-पद्धति के तौर पर उस समय का भारतीय लोकतंत्र एक मिसाल था | संसदीय और दलीय कार्य विधियों का अनुपालन करने में बड़े गर्व का एहसास किया जाता था |[7] इसी कारण कविता का पात्र ‘मैं’ आशावादिता में डूबकर आज़ादी का स्वागत जोर-शोर से करता है, जैसे भारतीय जनता ने किया था | वह आजादी का सम्बन्ध हवा, धूप, घास, खेत, अनाज के अंकुए, कसरत करते हुए बच्चे, चिड़ियों की चहचहाहट, कांसे की बजती हुई घंटियों और बैल से जोड़ते हुए उसे एक व्यापक परिदृश्य प्रदान करता है | ‘मैं’ के इस भावोच्छावासित हृदय में आज़ादी ढेर सारी उम्मीदों और आकांक्षाओं को जन्म देती है | वह सोचता है कि उसके सभी प्रकार के दुखों का अंत अब निकट है-

            मैंने इंतज़ार किया
             अब कोई बच्चा
             भूखा रह कर स्कूल नहीं जायेगा
             अब कोई छत बारिश में
             नहीं टपकेगी |

                              अब कोई किसी की रोटी नहीं छिनेगा
             कोई किसी को नंगा नहीं करेगा
             अब यह ज़मीन अपनी है
              आसमान अपना है |[8]

            परन्तु आज़ादी के बाद स्वतंत्र भारत की सत्ता अंग्रेज पूंजीपति वर्ग के हाथ से निकलकर भारतीय पूँजीपति के हाथ में आ गयी थी, जिसके हित आम आदमी के हितों से अलग थे | भारतीय आज़ादी की इन विसंगतियों को समझकर ही आजादी का स्वागत करने और उससे उम्मीदें लगाने की जरुरत थीं | ‘मैं’ के लिए तो एक आम आदमी की भांति आज़ादी का मतलब सभी प्रकार के दुखों का अंत है | इसलिए कविता में आगे चलकर जब उसे अपनी उम्मीदें, आकांक्षायें पूरी होती दिखाई नहीं देती, तो वह निराश होता है | आजादी से उसका मोहभंग होता है | तब उसे भविष्य तो अंधकारमय लगता ही है, अतीत भी अंधकार में डूबा प्रतीत होता है | इस सन्दर्भ में डॉ. नंदकिशोर नवल कहते हैं -कवि इतना निराश है कि उसे भविष्य तो अंधकारपूर्ण दिखलाई देता ही है, जिस आज़ादी का उसने अत्यंत उत्साह के साथ स्वागत किया था उसे हासिल करने वाले देश का अतीत भी उसे अंधकारपूर्ण दिखलाई देता है |[9] 
  
            आज़ादी से अपनी उम्मीदों को पूरा न होते देखकर भी कविता का नायक नेहरु को बार-बार चुनता है | उसे पता है कि जनतंत्र, स्वतंत्रता, शांति, मनुष्यता ये सब सत्ताधारी वर्ग की ओर से दिए गए सुनहरे वादे हैं, जो सुनने में मोहक लगते हैं | परन्तु आज नहीं तो कल सब कुछ सही होने की उम्मीद में वह अपनी बुद्धि से-

            उसी लोकनायक को
             बार-बार चुनता रहा
             जिसके पास हर शंका और सवाल का
             एक ही जवाब था
             यानी कि कोट के बटन होल में
             महकता हुआ एक फूल गुलाब का |[10]
                  

           कविता का नायक ‘मैं’ ही नहीं वरन् पूरा एक जनसमुदाय इस लोकनायक अर्थात् नेहरु के आभामंडल से सम्मोहित था | उसकी उन पर पूरी आस्था थी | पर जब ‘पंचशील’ और ‘विश्वशांति’ जैसे सिद्धांतों का परिणाम नकारात्मक रहा तो ‘मैं’ इस स्थिति को जानकर स्तब्ध रह जाता है | डॉ.बली सिंह इस सन्दर्भ में कहते है -माना कि ‘विश्वशांति’ और ‘पंचशील’ जैसे सिद्धांतों का स्वरुप साम्राज्य विरोधी था, परन्तु हुआ क्या? परिवर्तन के नाम पर पुरानी तस्वीरों को झाड़-पोंछकर दीवार पर फिर से उसी जगह लगा दिया गया | वन महोत्सव के नाम पर एक पौधा लगा दिया गया और विश्वशांति के नाम पर एक जोड़ा कबूतर ला कर खाली दरबे में डाल दिया गया | स्थिति ज्यों की त्यों बनी रही |[11] ‘पटकथा’ में यही स्वर दिखाई देता है |

           नेहरु ने जो पंचवर्षीय योजनाएं बनाई वे भी केवल मुख्यधारा के लोगों का ही विकास करती रही | विनोवा भावे ने पंचवर्षीय योजनाओं के विषय में अपना मत कहा -‘आपने जो ये योजना बनाई है ये रिसाव की योजना है | इस रिसाव की योजना और आर्थिक नीति से कई वर्ष लग जाएगें भारत से गैरबराबरी और गरीबी मिटाने में |’[12] इसके साथ ही 1962 के चीनी आक्रमण ने नेहरु की सारी नीतियों की पोल खोलकर रख दी | भारत चीन से इस युद्ध में पराजित हुआ | नेहरु की चीन नीति भी पूर्णतः असफल हुई | भारत-चीन युद्ध भारत के लिए दुर्भाग्य पूर्ण घटना थी | ‘पंचशील’ के समझौते की पूर्णतः उपेक्षा कर चीन ने भारत की ‘संप्रभुता’ और ‘प्रादेशिक अखंडता’ पर आक्रमण करते हुए भारत के विशाल भू-भाग को अपने नियंत्रण में लेते हुए युद्ध में भारत को अपमान जनक पराजय दी | इसका परिणाम यह हुआ कि चारों ओर अकाल, भुखमरी, गरीबी और मृत्यु का साम्राज्य फैल गया जो नेहरु की नीतियों की चरम असफलता थी | यहीं से भारतीय समाज, राजनीति और ‘पटकथा’ में मोहभंग की स्थिति गहराती जाती है | धूमिल को तब आज़ादी, जनतंत्र, जनता आदि के प्रति निराशा उत्पन्न होती है और उनकी मनोस्थिति निराश-हताश व्यक्ति की मनोस्थिति के रूप में सामने आती है | और वे कहते हैं-

               मैं सोचता रहा,
               और घूमता रहा-
               टूटे हुए पुलों के नीचे
               वीरान सड़कों पर /आँखों के
               अंधे रेगिस्तान में
               फटे हुए पालों की
               अधूरी जल-यात्राओं में
               टूटी हुई चीजों के ढेर में
               मैं खोई हुई आज़ादी का अर्थ ढूंढता रहा |[13]

           ‘मैं’ अर्थात् काव्य-नायक महसूस करता है कि वह वक़्त के ऐसे शर्मनाक दौर से गुजर रहा है जब-
               गोदाम अनाज से भरे पड़े थे और लोग
                भूखों मर रहे थे |

                                         अब ऐसा वक़्त आ गया है जब कोई
                  किसी का झुलसा हुआ चेहरा नहीं देखता है
                  अब न कोई किसी का खाली पेट
                  देखता है, न थरथराती हुई टाँगें |[14]

          दरअसल इन पंक्तियों में आज़ादी के बाद मूल्यपरक अवधारणाओं के अर्थ में हुए परिवर्तन के माध्यम से धूमिल व्यवस्था की अमानवीयता और मूल्यहीनता का पर्दाफाश करते हुए उस पर तीखा प्रहार करते हैं | ‘पूर्वग्रह’ पत्रिका में छपे एक लेख में हरिनारायण व्यास कहते हैं -उसकी कविता एक बेचैन आदमी की नफरत है | अन्दर से ईमानदार आदमी की आंतरिक करुणा तथा सब कुछ ठीक और उचित होने की अभिलाषा की अभिव्यक्ति है | उसकी कविता प्रोटेस्ट की कविता है | एक वह आवाज़ है जो भीड़ के बीच में खड़ा होकर झूठ का विरोध करने वाले व्यक्ति के शब्दों से फूटती है |[15]  

           धूमिल के मोहभंग के क्रम में जनतंत्र सर्वोपरि है | जनतंत्र से मोहभंग का सबसे बड़ा कारण यह था कि जिस जनतंत्र में जनता की अहम् भूमिका होती है, उसी जनतंत्र में जनता और शासन तंत्र में इतनी दूरियां होती हैं कि शासन को जनता की आवाज़ भी सुनाई नहीं देती | उनमें संवादहीनता रहती है | इस विषय में योगेन्द्र यादव ने कहा है -आमतौर पर माना जाता है कि भारतीय लोकतंत्र के नेहरूवादी दौर में लोकतान्त्रिक व्यवस्था ने जड़ें जमायीं | ऐसा मानना सही भी है | आज़ादी के तुरंत बाद के नाज़ुक दौर में हुई उपलब्धियों के साथ-साथ नेहरु को यह श्रेय दिया ही जाना चाहिए कि उनके कारण लोकतंत्र को दीर्घकालीन संस्थागत आधार मिला, लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि ये उपलब्धियाँ ऐसे दौर में हुई थी, जब अभिजनों और जनसाधारण के बीच संवादहीनता की बहुत बड़ी खाई मौजूद थी |[16] धूमिल को जनतंत्र ताकतवर द्वारा कमज़ोर का शोषण करने की छूट लगने लगा | इसलिए वे कह उठते हैं
-
              यहाँ ऐसा जनतंत्र है जिसमें
               ज़िन्दा रहने के लिए
               घोड़े और घास को
               एक जैसी छूट है |[17]

          ऐसा क्यों है ? इस सन्दर्भ में सुनील खिलनानी कहते हैं -लोकतंत्र भारतीय समाज के अन्दर से निकले किसी लोकप्रिय दबाव का परिणाम नहीं था | न ही इसे जनसाधारण ने राज्य से जीता था | लोकतंत्र तो खास तरह के बुद्धिजीवी प्रभुवर्ग की राजनीतिक पसंद के कारण जनता को प्राप्त हुआ था |[18] वहीं किशन पटनायक कहते हैं -लोकतंत्र एक पहेली है -विशेषकर भारत के लिए |[19] इस पहेली को हल करते हुए धूमिल जनतंत्र के प्रति अपने मोहभंग को चित्रित करते हुए उसे अस्वीकार करते हैं | उनके लिए जनतंत्र ढकोसला मात्र है | इसलिए वे कह उठते हैं-

                दरअसल अपने यहाँ जनतंत्र
                  एक ऐसा तमाशा है
                  जिसकी जान
                  मदारी की भाषा है |[20]

           जनतंत्र को रघुवीर सहाय ने भी निशाना बनाया है लेकिन उनके यहाँ जनतंत्र के प्रति आलोचना का भाव है, जबकि धूमिल के यहाँ आक्रोश का भाव है | रघुवीर सहाय जहाँ कहते हैं-

                   लोकतंत्र का मज़ाक बनते देख
                    रहे हैं,बेहद बूढ़े
                    कुछ कम बूढ़े कहें कि
                    क्या यह लोकतंत्र है?[21]

             वहीं धूमिल के लिए यह मात्र सत्ता का षड्यंत्र बनकर रह जाता है-

                      न कोई प्रजा है
                       न कोई तंत्र है
                       यह आदमी का
                       आदमी के ख़िलाफ़
                       खुलासा षड्यंत्र है |[22]

           1967 के चुनाव भारतीय राजनीति में अपना विशेष स्थान रखते हैं | 1967 के चुनाव के सन्दर्भ में रजनी कोठारी का मत है -दो लड़ाइयों और आर्थिक संकट के बाद चुनाव हुआ, जिसने कांग्रेस की एकछत्रता और स्थिर सरकारों के युग का अंत कर दिया | 5 वर्षों के अन्दर इतनी घटनाओं के घटने से एक संकट का-सा वातावरण मालूम पड़ा | 1967 के चुनाव एक बड़े राजनैतिक परिवर्तन का द्योतक समझा गया | इसने इतने दिनों से चली आई कांग्रेस की प्रधानता का अंत कर दिया |[23]

            पटकथा में मोहभंग का परिणाम यह हुआ कि उनका विरोध धीरे-धीरे निषेध का पर्याय बन गया | 1967 के चुनाव से जहाँ सत्ता में इतना बड़ा परिवर्तन हुआ ,वहीँ धूमिल की दृष्टि में इसका अर्थ –

                बुरे और बुरे के बीच से
                किसी हद तक कम से कम बुरे को |[24] चुनना है |

‘पटकथा’ में चुनावी-प्रक्रिया को धूमिल ने इस प्रकार चित्रित किया है-

                 इस देश में असंख्य रोग हैं
                 और उनका एकमात्र इलाज
                 चुनाव है |
                 लेकिन मुझे लगा कि एक विशाल दलदल के किनारे
                   बहुत बड़ा अधमरा पशु पड़ा हुआ है,
                   उसकी नाभि में एक सड़ा हुआ घाव है |
                   जिससे लगातार-भयानक बदबूदार मवाद
                   बह रहा है |[25]

          हर चुनाव के बाद ‘मैं’ को लगता है कि कोई ख़ास फ़र्क नहीं है | परिवर्तन का भ्रम मात्र है, वास्तविक परिवर्तन नहीं हुआ है | केवल ‘टोपियाँ बदल गई हैं, कुर्सियां वही हैं’ | इसीलिए उन्हें देश की धड़कन को प्रतिबिंबित करने वाली संसद केवल मात्र झूठ का गढ़ लगती है | इसीलिए धूमिल झुंझलाहट में कह उठते हैं-

                   अपने यहाँ संसद-तेली की वह घानी है
                    जिसमें आधा तेल है,
                    और आधा पानी है |[26]

         अर्थात् आधा सच और आधा झूठ है | इस जनतंत्र में समाजवाद महज दिखने के स्तर पर ही रह गया है | अंतर्वस्तु के धरातल पर नहीं | इसीलिए समाजवाद धूमिल के लिए-

                    मालगोदाम में लटकती हुई
                     उन बाल्टियों की तरह है जिस पर ‘आग’ लिखा है
                     और उनमें बालू और पानी भरा है |[27]

         ‘पटकथा’ में धूमिल का मोहभंग दो स्तरों पर होता है -पहला शोषण पर आधारित व्यवस्था से जिसमें जनतंत्र, चुनाव, संसद को अस्वीकृत करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप` वे अन्य प्रजातंत्र की तलाश की आवश्यकता तीव्रता से महसूस करते हैं | दूसरा आत्मकेंद्रित मध्यवर्ग से | दोनों की परिणति उन्हें घोर निराशा की ओर ले जाते हैं | देश की वर्तमान स्थिति को धूमिल अपनी इसी निराशा के रंग में रंग कर देखते हैं और कहते हैं-

                यह मेरा देश है......
                 यह मेरा देश है......
                 हिमालय से लेकर हिन्द महासागर तक
                 फैला हुआ
                 जली हुई मिट्टी का ढेर है |[28]

          इसी निराशा के चलते हिमालय से लेकर हिन्द महासागर तक फैला हुआ पूरा का पूरा देश जली हुई मिट्टी के ढेर में बदल गया है | दरअसल यह धूमिल की अपनी व्यक्तिगत निराशा है | यही निराशा आगे चलकर जनता के प्रति भी व्यक्त हुई | डॉ.नन्दकिशोर नवल ने भी माना है कि -अपनी निराशा को धूमिल ने सम्पूर्ण देश और जनता पर प्रक्षेपित कर दिया है |[29] धूमिल ने पटकथा में जनता को कोहरा, कीचड़ और कांच कहा है | वे मानते हैं कि यह जनता कीचड़ है, जो देश के बिगड़ते हुए हालात से बेख़बर पशुओं जैसा जीवन जी रही है | उन्होंने जनता को ‘भेड़’ की संज्ञा भी दे डाली है | उन्हें लगता है देश के राजनीतिक हालात में कहीं कोई हस्तक्षेप नहीं है और जनता केवल शोषण के लिए बनी है-

                 जनता क्या है ?
                 एक शब्द....सिर्फ एक शब्द है :
                 कुहरा और कीचड़ और कांच से बना हुआ.........
                 एक भेड़ है
                 जो दूसरों की ठण्ड के लिए
                 अपनी पीठ पर ऊन  की फसल ढो रही है |
                 एक पेड़ है
                 जो ढालन पर
                 हर आती-जाती हवा की ज़ुबान में
                 हाँssss…..हाँssss करता है |[30]

         यहाँ कीचड़ और कांच से बने होने में जनता के प्रति घृणा-भाव की अभिव्यक्ति हुई है | दूसरों की सुविधा के लिए अपनी पीठ पर बोझा ढोने और हरेक की हाँ में हाँ मिलाने में उसकी ताकत और समझ दोनों को नाकारा गया है | मुझे लगता है कि धूमिल ने उसी जनता को संघर्ष शक्ति रहित मान लिया है जिस ने स्वतंत्रता आन्दोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई थी | धूमिल स्वयं इसी जनता का हिस्सा हैं फिर भी इसे भेड़ मान लेते हैं | इस प्रकार वे अपनी भी आलोचना करते हैं | इस कविता में धूमिल ने वकील, वैज्ञानिक, अध्यापक, नेता आदि को ही जनता मान लिया है | समाज के निचले तबके की ओर धूमिल का ध्यान इस कविता में नहीं गया है | डॉ. नंदकिशोर नवल भी मानते हैं – धूमिल को जनता में आस्था नहीं है, क्योंकि उनके अनुसार देश की राजनीति में उसकी कोई भूमिका नहीं है |[31] इसीलिए वे कहते हैं कि एक तरफ देश की हालत बिगड़ती रही और दूसरी तरफ-
            
                          लोग अपने हिस्से का अनाज खाकर
             निरापद भाव से बच्चे जनते रहे |[32]

       परन्तु आगे चलकर धूमिल ने जनता के माध्यम से देश में पनपने वाली दो स्थितियों को सामने रखा है | एक है दया धर्म के नाम पर फैली हुई हथेली और दूसरी ओर वह मुट्ठी जिसमें अधिकार प्राप्त करने के लिए संघर्ष की आग है –

             एक ही संविधान के नीचे
              भूख से रिरियाती हथेली का नाम
              ‘दया’ है
              और भूख में
              तनी हुई मुट्ठी का नाम
              नक्सलबाड़ी है |[33]

                     दरअसल ‘पटकथा’ में स्वाधीन भारतीय नागरिक की पूरी यातना को यथार्थ की ज़मीन पर धूमिल ने रूपायित किया है | काव्य नायक के स्वर में निराशा है, किन्तु उसके हमशक्ल ‘हिन्दुस्तान’ में आशावाद का स्वर है | वह लोगों को उजाले से जोड़ने की चेष्टा में है, शापित होते हुए भी भयभीत नहीं है | बेचैनी के आगे राह पाने की उम्मीद में है | ‘पटकथा’ को मुक्तिबोध की लम्बी कविता के समक्ष माना गया है, किन्तु यह स्पष्ट है कि मुक्तिबोध जैसी व्यापकता, सघनता, गहराई और फैंटेसी के विविध रूप ‘पटकथा’ में नहीं है | ‘पटकथा’ में फैंटेसी के रूप में हिन्दुस्तान का रूप ज़रूर उभरा है, लेकिन उसमें उतनी जटिलता और प्रतीकात्मकता नहीं जैसी जैसी मुक्तिबोध की कविता में | आलोचना में प्रकाशित एक लेख में नामवर सिंह जी ने कहा है -पटकथा तो अंधेरे में की लगभग पैरोडी है | वह महत्वाकांक्षी कवि धूमिल की लिखी हुई एक अकाल-पक्व रचना है | धूमिल के यहाँ मुक्तिबोध जैसी व्यापकता और जटिलता नहीं है | परम्परा का वह स्वस्थ बोध भी नहीं है | ‘अंधेरे में’ तिलक, गाँधी, तोलस्तोय की जो भूमिका है उसे धूमिल नहीं आँक सके थे |[34]
          धूमिल राजकमल चौधरी से बहुत प्रभावित रहे हैं | राजकमल चौधरी की कविताओं में जहाँ एक ओर व्यक्ति की विकृतियों का, उसके पतन, पराजय बोध, टूटन और थकान का उद्घाटन है, वहीं दूसरी ओर जनतंत्र, राजनीति, चुनाव, पंचवर्षीय योजनाओं और सामाजिक विकृतियों के प्रति घृणा और तिक्तता है | राजकमल चौधरी की घृणा और तिक्तता धूमिल के यहाँ आक्रोश के रूप में प्रकट हुई है |

          इस कविता पर अशोक वाजपेयी अपनी प्रतिक्रिया प्रकट करते हुए कहते हैं -तमाम पंक्तियाँ क्या हिन्दुस्तान की अमानवीय हालत को इस तरह उपस्थित कर पाती हैं कि उससे हमारी समझ और संवेदना के इलाके में कोई क्रियात्मक हलचल हो सके ?............मुझे तो लगता है कि इस कविता में सूझ और शब्द के बीच ,कवि की बौद्धिक कुशलता और उसके अपने मुहावरे की ख़ास चमक ही अधिक है,जिसके बल पर उसने अपनी लगभग स्थिर होती बेचैनी को स्वातंत्र्योत्तर भारत की हालत से संयुक्त किया है |[35]

           अतः यह कहा जा सकता है कि ‘पटकथा’ मोहभंग की कविता तो है ,जो तत्कालीन राजनीति का परिणाम है परन्तु यह मोहभंग घोर निराशा में परिणत होता नज़र आ रहा है | एक आम आदमी की तत्कालीन परिस्थितियों के प्रति निराशा गन्दी राजनीति की अहम सफलता है | यह कविता जनता और देश के हालात तो ज्यो के त्यों पाठकों के सामने ले आती है परन्तु इस उपक्रम में यह कविता आम आदमी की संवेदना से बढ़कर राजनैतिक कविता बनकर रह गई है | कवि और नेता दोनों की वाणी एक जैसी लगने लगी | इस राजनीति ने विचार के स्तर पर भी इतना बड़ा परिवर्तन कर दिया है कि जिस देश के कवियों ने ‘अरुण यह मधुमय देश हमारा’ कहकर गौरवान्वित महसूस किया था, उसी देश के कवि को आज यह देश ‘जली हुई मिट्टी का ढेर’ प्रतीत हो रहा है |   


      आधार ग्रन्थ
Ø संसद से सड़क तक धूमिल –राजकमल प्रकाशन - प्र.सं.-1972, पांचवी आवृत्ति – 2003
  
सहायक ग्रन्थ

Ø आज़ादी के बाद का भारत 1947-2000-बिपिन चन्द्र - हिंदी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय - प्र.सं. - 2002
Ø कविता का जनपद-सं. अशोक वाजपेयी-राधाकृष्ण प्रकाशन- प्र.सं.-1992
Ø कविता की मुक्ति-डॉ.नंदकिशोर नवल-वाणी प्रकाशन- प्र.सं.-1980
Ø कविता की समकालीनता-डॉ.बली सिंह- शंकर प्रकाशन- प्र.सं.-2005
Ø कल सुनना मुझे-धूमिल-युगबोध प्रकाशन-प्र.सं.-1977
Ø धूमिल का प्रजातंत्र-धूमिल-वाणी प्रकाशन-सं.-2001
Ø भारत में राजनीति-रजनी कोठारी-अनुवादक अशोक जी-ओरिएंट लॉन्गमैन
Ø भारतीय राजनीति पर एक दृष्टि-गतिरोध,संभावना और चुनौतियाँ-किशन पटनायक- राजकमल प्रकाशन-प्र.सं.-2006
Ø भारतीय विदेश नीति की बदलती अवधारणाएँ-गोपाल कृष्ण शर्मा-प्रिंटवेल जयपुर-प्र.सं.-1991
Ø भारतनामा-सुनील खिलनानी-राजकमल प्रकाशन-पहला पेपरबैक्स संस्करण
Ø लोकतंत्र के सात अध्याय-सं.अभय कुमार दूबे-वाणी प्रकाशन- प्र.सं.-2002, दूसरा सं.-2005
Ø विपक्ष का कवि धूमिल-राहुल-नीरज बुक सेंटर-सं.-1992
Ø समकालीन काव्य-यात्रा-डॉ. नन्दकिशोर नवल-किताबघर नई दिल्ली- प्र.सं.-1994
Ø सीढ़ियों पर धूप में-रघुवीर सहाय-भारतीय ज्ञानपीठ ,काशी-प्र.सं.-1960

पत्रिकाएं
Ø आलोचना-डॉ.नामवर सिंह-अप्रैल-जून-1975
Ø पूर्वग्रह-सं.अशोक वाजपेयी-मार्च-अप्रैल-1975 

                                
मधु


शोधार्थी(हिन्दी)
दिल्ली विश्वविद्यालय,
एम.फिल.-दिल्ली विश्वविद्यालय
स्नातकोत्तर उपाधि पत्र 
(अंग्रेजी-हिंदी अनुवाद पाठ्यक्रम)|
साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में सक्रिय लेखन|
शहीद भगत सिंह (सांध्य) महाविद्यालय,
दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में 
तदर्थ प्रवक्ता के तौर पर कार्यरत|
संपर्क-39 सी,जे-पॉकेटशेख सराय-
नई दिल्ली-110017, 
ई-मेल-madhus.campus@gmail.com, 
फोन नं.-09868099920  





सन्दर्भ
[1] भारत में राजनीति-रजनी कोठारी-पृ.सं.-121
[2] लोकतंत्र के सात अध्याय-अभय कुमार दूबे-पृ.सं.-39
[3] आज़ादी के बाद का भारत 1947-2000-बिपिन चन्द्र-पृ.सं.-206
[4] कल सुनना मुझे-धूमिल-पृ.सं.-4
[5] समकालीन काव्य-यात्रा-नन्दकिशोर नवल-पृ.सं.-248
[6] संसद से सड़क तक-धूमिल-पृ.सं.-99
[7] भारतनामा-सुनील खिलनानी- पृ.सं-59
[8] संसद से सड़क तक-धूमिल- पृ.सं.-100-101
[9] कविता की मुक्ति-डॉ.नंदकिशोर नवल- पृ.सं.130
[10] संसद से सड़क तक-धूमिल- पृ.सं.-102
[11] कविता की समकालीनता-डॉ.बली सिंह- पृ.सं.-40
[12] कक्षा में दिए गए व्याख्यान से-प्रो.गोपेश्वर सिंह
[13] संसद से सड़क तक-धूमिल-पृ.सं.106
[14] संसद से सड़क तक-धूमिल-पृ.सं.108
[15] पूर्वग्रह-सं.अशोक वाजपेयी-मार्च-अप्रैल-1975-पृ.सं.-19
[16] लोकतंत्र के सात अध्याय-सं.अभय कुमार दूबे- पृ.सं.44
[17] संसद से सड़क तक-धूमिल- पृ.सं.-105
[18]भारतनामा-सुनील खिलनानी- पृ.सं.-53
[19] भारतीय राजनीति पर एक दृष्टि-गतिरोध,संभावना और चुनौतियाँ-किशन पटनायक- पृ.सं.-5
[20] संसद से सड़क तक-धूमिल- पृ.सं.-105
[21] सीढ़ियों पर धूप में-रघुवीर सहाय- पृ.सं.-140-141 
[22]सुदामा पाण्डेय का प्रजातंत्र-धूमिल   
[23] भारत में राजनीति-रजनी कोठारी- पृ.सं.-205
[24] संसद से सड़क तक-धूमिल- पृ.सं.-119
[25] संसद से सड़क तक-धूमिल- पृ.सं.-118-119
[26] संसद से सड़क तक-धूमिल- पृ.सं.-127
[27] संसद से सड़क तक-धूमिल- पृ.सं.-127
[28] संसद से सड़क तक-धूमिल- पृ.सं.-104
[29] कविता की मुक्ति-डॉ.नंदकिशोर नवल-पृ.सं.-139
[30] संसद से सड़क तक-धूमिल- पृ.सं.-105
[31] कविता की मुक्ति-डॉ.नंदकिशोर नवल-पृ.सं.-140
[32] संसद से सड़क तक-धूमिल- पृ.सं.-102
[33] संसद से सड़क तक-धूमिल- पृ.सं.-127
[34] आलोचना-डॉ.नामवर सिंह-अप्रैल-जून-1975- पृ.सं.-59
[35] कविता का जनपद-सं. अशोक वाजपेयी- पृ.सं.-205                                   

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