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कविताएँ:एम.एल.डाकोत

Written By Manik Chittorgarh on बुधवार, मई 14, 2014 | बुधवार, मई 14, 2014

                 साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका           
    'अपनी माटी'
         (ISSN 2322-0724 Apni Maati)
    वर्ष-2 ,अंक-14 ,अप्रैल-जून,2014
“ रंग-चौखटे-शीर्षक ”

कैसे हो तुम?
मेरा हाथ पकड़कर
तस्वीर बनवाते हो,
खुद ही शीर्षक लिखते हो,
और रचनाकार की जगह
मेरा नाम लिख देते हो ।
ताकि मैं,
उसके मँढवाने का खर्चा वहन करूँ
उसको किसी शालीन “आर्ट गेलरी” में
स्थान दिलाऊँ ।

कृति
लाउड स्पीकर
या, टेप रेकार्डर नहीं हो सकती ।
कोयल की कूक,
पपीहे की पुकार,
या
मराली की मनुहार हो सकती है ।

इसे,
आँखें खोलकर नहीं,
बंद करके देखा जाता है ।
पार्थिव रंगों का अभिमान छोड़,
भावों से भरा जाता है ।

इसीलिए कहता हूँ
कैसी भी कृति को
कोई से चौखटे में मत जड़ो ।
न खुद रचनाकार का नाम लिखो ।

रचनाकार ही को चुनने दो
रंग !
चौखटे!!
शीर्षक!!!
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“ देह का संगीत ”

दृष्टि का अनुनाद
झनझना देता वीणा के तार
स्पर्श का आभास मात्र
देता है स्वर ।
तार सप्तक में
बजता जब राग
श्वास देता निरंतर ताल
तो
स्वेद बिन्दु नुपुर सम बीच
आ जाते
सम पर होता विस्फोट
और
हो जाती संभाव्य, 
नई सृष्टि ।
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“भेंट”

जब रोक न सका
पूजा में उठते हुए अपने ही हाथ
तो 
काट डाले ।
पुजारी स्तंभित हुआ
फिर 
धीरे से मुस्कराया
जय घोष किया
धन्य हो तुम्हारी पूजा
अद्वितीय है तुम्हारी भेंट
देवता प्रसन्न होंगे
तुम्हें
सहस्त्रबाहु बना देगें ।
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“ पद्मणी महल री सीढ़ी रो भाटों ”

अल्लाउद्दीन जद
महाराणी न देखण आयो
महाराणी म्हाराऊँ उपरला
भाई पर ही बैठी ही
राणी रा राता राता पग
म्हारी ही गोद म हा ।
अल्लाउद्दीन जद
गोखड़ा रा काच सू देख्यो
पदमणी री आँख्या नीची ही
पण म्ह देखी ही एक शैतानी
मुस्क्यान
ऊँख रग रग म
ऊँ खँकार न कटी मूछयाँ पर
दीनो ताव
और वी टेम पड़यो
महाराणी री आँख्याँ सू
एक गरम आँसू रो छाँटो
और छूटी एक गरम ऊँसास 
और म्हारी छाती तड़क गी ।।
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“ लाइट हाउस ”

मैं लाइट हाउस हूँ
जी हाँ लाइट हाउस ।
मीलों तक फैला है समुद्र
देखता रहता हूँ इसमें उठती
विकराल तरंगें ।

मैं खड़ा हूँ ऐसी चट्टान पर
जिसके कारण जहाज
दूर से ही रूख बदल लेते हैं ।

समय को मैंने
पल, दिन महीनों
या साल में गिनना छोड दिया है ।

जब कोई ‘एल्बेट्रास’ 
आ बैठती मुझ पर
मेरा समय गतिमान हो उठता है ।
उसके पंखों की हवा को,
भर लेता हूँ फेफड़ों में
उसके शब्द
होते हैं महाकाव्य
जिन्हें कर लेता हूँ मैं कंठस्थ
और सस्वर सुनाता हूँ हवाओं को

फिर उड़ जाती है चिड़िया
न जाने कहाँ, किस ओर

मैं गाता रहता हूँ शब्द
बनाता जाता हूँ अपनी चिता
और हो जाता हूं निःशेष
फिर अचानक लग उठती है आग
जो जला कर एकदम
मुझे खाक नही करती
वरन्
खड़ा रखकर मेरे ढांचे को
दूर तक दिखती रहती है
और मैं हो जाता हूँ प्रकाश स्तम्भ
जी हाँ लाइट हाउस ।।
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‘ साजिश ’

कितना खुला था आसमान
उगते चाँद डूबते सूरज को
आँखें उठाई और देख लिया करते थे ।

अब तो उग आई हैं अट्टालिकाएं
जिन्होंने धूप चाँदनी को
पाबन्द कर दिया है ।

उनके बोये ‘यूक्लिप्टिस’
चूस का धरती का हृदय
अट्टालिकाओं के समर्थन में खड़े हैं ।
पता नहीं बाकी जगह सन्नाटा क्यों है
सूरज चाँद भी मौन है
साजिश में शरीक हैं
कि देवता हो गये?
याकि आसमान के अफसर
धरती के नेता हो गये?
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“गणतंत्र ”

26 जनवरी को सुबह सुबह
फटे कपड़ो में लिपटा
झुके झुके चलता
जो दिखाई दिया
वह जनतंत्र था ।
बताया था उसने कि 
वह इतनी बार झुका है 
कि अब कमर सीधी ही नहीं होती ।
परेड देखने जा रहा था ।
वैसे यह परेड उसके लिए ही थी
पर वह जानता है कि
उसे कहीं जगह नहीं मिलेगी
इसलिए जल्दी में था ।
वह भी भाषणों से जानना चाहता था
कि वह कितना खुशहाल है ।
साल भर छाती पर चलते
भय आतंक के टेंकों को
कुछ देर दूर देखना चाहता था ।
उत्तराखंड पर मर्दानगी दिखाने वालो के
दर्शन करना चाहता था ।
पूछ रहा था, झाँकियों में
इस बार घोटालचंद होंगे कि नहीं
फर्जी मुटभेड़ में मारे युवकों की विधवाएं
कौन सा भजन गाती है, पूछ रहा था ।
कृशकाय कावेरी
पुरूलिया के हथियार तो होंगे?
द्रोपदी का अवतार है क्या? पूछ रहा था
प्रशासन का कुम्भकर्ण उसने देखा था
इसलिए “राव राज्य” को राम राज्य
कह रहा था- मैंने ध्यान दिलाया तो
उसने थोड़ा उच्चारण दोष आ गया होगा
कहकर आश्वस्त हो गया ।
पूछ रहा था 
बाबूजी
इतने करोड खाने के बाद
डकार आती है कि नहीं?
लंगडाते पाँव पर
बहुराष्ट्रीय पट्टी बँधी थी ।

शिक्षाविद एम एल डाकोत 
पूर्व प्राचार्य
109,स्कीम-छ ,कुम्भा नगर,
चित्तौड़गढ़-3012001
(राजस्थान
)
मो-09414778189


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