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समीक्षा:विजेन्द्र की काव्य-यात्रा का प्रस्थान बिंदु/ अमीर चन्द वैश्य

Written By Manik Chittorgarh on बुधवार, मई 14, 2014 | बुधवार, मई 14, 2014

                 साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका           
    'अपनी माटी'
         (ISSN 2322-0724 Apni Maati)
    वर्ष-2 ,अंक-14 ,अप्रैल-जून,2014

चित्रांकन :शिरीष देशपांडे,बेलगाँव 
कहा जाता है कि हजारों मील का सफर पहले प्रयास से शुरू किया जाता है। यह कहावत प्रत्येक कर्मठ व्यक्ति पर लागू होती है। साधना-संलग्न कवि विजेन्द्र के सर्जनशील व्यक्तित्व पर यह कहावत चरितार्थ होती है। काव्य-सर्जना के क्षेत्र में उन्होंने पहला कदम ‘फाँसोगे गीत‘ रचना से सन् 1956 में प्रयास किया था। यह कविता, अनेक संशोधनों के बाद, कोलकाता से प्रकाशित ‘ज्ञानोदय‘ में प्रकाशित हुई थी। अपने काव्य-गुरू सिद्द कवि त्रिलोचन के सान्निध्य में रहकर काव्य-रचना के गुर सीखे। कविता रचने का अभ्यास किया। और संयोग से सन् 1958 में बिना किसी साक्षात्कार के, शारदा सदन महाविघालय, मुकुन्दगढ़ (शोखावटी,राज०) में अंग्रेजी प्राध्यापक के रूप में सक्रिय जीवन प्रारम्भ किया। साथ-ही-साथ संस्कृत भाषा और साहित्य का गम्भीर अध्ययन करते हुए काव्य-सर्जना भी करते रहे। अपने समय, समाज और इतिहास को देखने के लिए मार्क्सवादी दर्शन की तीसरी आँख का सदुपयोग किया।

इस सन्दर्भ में विजेन्द्र अपनी डायरी में लिखते है - “प्राध्यापन जब शुरू किया तो मार्क्सवाद कहीं-न-कहीं अचेतन में पनपता रहा। मैंने Marxist Philosphy किताब कई बार पढ़ी। मुझे लगा कि यह दर्शन अन्य दर्शनों से न सिर्फ अलग बल्कि ज्यादा व्यावहारिक भी है। मुझे यह भी लगने लगा कि अपनी धरती, समाज, इतिहास, तथा देश को, आदमी की धड़कनों के साथ, गहराई तक समझना है तो किसी वैज्ञानिक, व्यापक तथा विकासोन्मुख दर्शन के सहारे ही समझा जा सकता है। अन्त में यह समझ कविता और कवि-कर्म दोनों को ताकत देने लगी। मैंने मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्र की पहली किताब The Problems Of Modern Aesthetics बहुत समझ-समझ कर पढ़ी।” (कवि की अन्तर्यात्रा, पृ० 15,16)  

विजेंद्र जी 
वरिष्ठ चित्रकार और कवि
मार्क्सवादी चिंतक,
कविता,नाटक,डायरी विधा की 
लगभग बीस पुस्तकें प्रकाशित,
आधुनिक चित्रकारी शैली पर भी 
एक पुस्तक भी प्रकाशित 
सी - 133 , वैशालीनगर,
जयपुर (राजस्थान ) 
मो0 9928242515
ई-मेल kritioar@gmail.com
ब्लॉग http://poetvijendra.wordpress.com/
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और गम्भीर अध्ययन ने काव्य-सर्जना के लिए प्रेरित किया विजेन्द्र को। उनका पहला काव्य-संकलन ‘त्रास‘ सन् 1966 मेें प्रकाश में आया। साहित्य लोक प्रकाशन से। डा० रेयवती रमण ने इस संकलन के सन्दर्भ में लिखा है-

 ”विजेन्द्र की कविताओं का पहला संग्रह ‘त्रास‘ कवि त्रिलोचन को समर्पित पचपन कविताओं का भरा-पूरा संग्रह है, जिसमें मिश्रित संवेदना की कविताएँ संकलित हैं। इसमें आत्मान्वेषण और प्रकृति पर्यवेक्षण का मिला-जुला स्वर वृहत्तर संभावनाओं की आहट है।“ (कविता में समकाल, पृ० 128)

उस समय ‘कल्पना‘ हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्रिका थी। उसमें नए रचनाकार की रचना का प्रकाशन गौरव की बात समझी जाती थी। संयोग से ‘कल्पना‘ पत्रिका में ‘त्रास‘ की समीक्षा छपी थी, जिसका संधान प्रसिद्व विद्वान सुवास कुमार ने किया है। वह लिखते हैं- “संयोग से मेरे हाथ कवि विजेन्द्र के पहले कविता-संग्रह ‘त्रास‘ की वह प्रति लगी, जो ‘कल्पना‘ में समीक्षार्थ भेजी गई थी और जिसे ‘कल्पना‘ के अक्टूबर 1966 वाले अंक में (190) समीक्षित किया गया था। समीक्षक ने पाया था कि कवि में ‘कोई गहरी संस्कार चेतना है‘, ‘विचारों और कल्पानाओं की उत्तेजना है‘, ‘जीवन की उद्विग्नता है‘, और ‘एक नए काव्यात्मक ढ़ाँचे की खोज उनमें स्पष्ट है‘। समीक्षक की कविताओं पर ‘मुक्तिबोध, त्रिलोचन और केदार जैसे कवियों को प्रभाव भी प्रतीत हुआ था और साथ ही उसने पाया था कि ‘कविताओं में ऐसे शब्दों की बड़ी संख्या है, जो आज की मनोदशा से काफी दूर हैं और इसलिए प्रभाव में निष्क्रिय, ठंडे और बेजान है।” और अन्त में समीक्षक ने सलाह दी कि कवि को अपनी भाषा को एकदम आज की संस्कार या ‘मुहावरा‘ देने की जरूरत है। (लेखन-सूत्र, अंक 4 पृ० 176)

‘त्रास‘ के समीक्षक ने जो सलाह रचयिता को दी थी, उसने उसका अनुपालन गम्भीर साधना और अपने परिवेश से जुड़कर किया। इसका प्रमाण हैं कवि विजेन्द्र के अन्य सभी संकलन, जो ‘त्रास‘ के बाद प्रकाश में आए हैं। अब विजेन्द्र का अपना काव्य-मुहावरा है। लोकोन्मुखी। जनपदीय पदावली से अन्वित। उसे पढ़कर उच्चभ्रू वाले आलोचक नाक-भाैंह सिकोड़ा करते हैं। सम्प्रति वह परिपक्व कवि हैं और उनका काव्य-संसार बहुरंगी है।

प्रसंगवश, उल्लेखनीय है कि विजेन्द्र के मित्र नन्द चतुर्वेदी ने त्रास के प्रकाशन पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए लिखा है- ”विजेन्द्र केे पहले काव्य-संग्रह का अप्रत्याशित और सहसा ही प्रकाशित होना जैसे मेरे लिए सुखद है, दूसरे सभी रसज्ञ  मित्रों के लिए भी सुखद होगा। इस संकलन को पढ़कर यह संतुष्टि मिलेगी कि कवि ने मात्र प्रकाशन के लिए अनुभूति को सतही नहीं होने दिया है और यह भी कि उसने कवि-कर्म के दायित्व को यथेष्ट श्रम के साथ ग्रहण किया है। संकलन की अधिकांश कविताएँ कवि के रचना-सामर्थ्य को व्यक्त करती हैं। सभी रचनाओं में कथन की एक ऐसी मंगिमा है, जिसे विजेन्द्र का वैशिष्ट्य कहना उचित होगा।“ (लहर,वर्ष-10, अंक-6-7, दिस०-जन०, 1967, पृ० 83)

नन्द चतुर्वेदी के उपर्युक्त अभिमत में रेखांकित वाक्य ध्यातव्य है। आज उनका यह अभिमत सार्थक सिद्व हो रहा है। अर्थात् विजेन्द्र ने, ‘काव्य शास्त्र विनोदेन‘ के लिए कवि-कर्म न अपनाकर, उसे ‘दायित्व को यथेष्ट श्रम के साथ ग्रहण किया है।‘ उनकी साधना-संलग्नता ने इसे सिद्ध भी कर दिया है। वह आज भी अपनी लोकोन्मुखी दृष्टि से जीवन-जगत् को देखकर उसे आलोचनात्मक ढंग से रच रहे हैं। यथास्थिति का विरोध कर रहे हैं।

आइए, अब ‘त्रास‘ की कविताओं के वैशिष्ट्य से साक्षात्कार करें। कविताएँ समझने से पहले यह बात याद रखें कि ‘त्रास‘ संकलन कविवर त्रिलोचन को समर्पित हैं। उन्होंने ‘लोक‘ से कविता रचना सीखा था। परम्परा को आत्मसात करके अपने जनपद के ‘भूखे-दूखे‘ जनों का द्वन्द्वात्मक जीवन उनके परिवेश के साथ रूपायित किया था। विजेन्द्र का यह संकलन त्रिलोचन-काव्य के वैशिष्ट्य से प्रभावित है। सन् 1966 में प्रकाशित इस संकलन की कविताएँ कवि की कर्म-भूमि राजस्थान के प्रमुख नगर भरतपुर में रची गई हैं। लगभग आठ वर्ष की अवधि में। अर्थात् सन् 1958 से 1965 तक। इस अवधि में ‘नई कविता‘ के बोलबाला का था। और अकविता का भी। विजेन्द्र ने त्रिलोचन के सम्पर्क में रहने कारण स्वयं को ‘नई कविता‘ की धारा में बहने से रोका। और वह अकविता के प्रभाव से भी अछूते रहे। प्रसंगवश यहाँ यह उल्लेख अनिवार्य है कि युवा विजेन्द्र अज्ञेय-काव्य से प्रभावित थे। उन्होंने अपनी डायरी में लिखा है- “जब मैंने नई कविता में प्रवेश किया तो मुझे अज्ञेय ही महान नजर आते थे। बात है 1955 की। कहें 56 की। उस समय बनारस में था। अज्ञेय के सभी संकलन खरीदे। वे उस समय छाये थे। अज्ञेय की जब-जब मैंने तारीफ की। पर त्रिलोचन चुप रहे। मेरी अज्ञानता पर मंद-मंद मुस्कराते रहे। बाद में बहुत सी चीजें अपने आप साफ हो गई। व्यवहार आदमी को विवेकशील भी बनाता है। दरअसल उस समय अज्ञेय का वर्चस्व था। त्रिलोचन और केदार उगान पर थे।” (धरती के अदृश्य दृश्य,पृ० 64)

‘त्रास‘ में लम्बी, मझोली और छोटी कविताएँ संकलित हैं। इन तीनों काव्य-रूपों का विस्तार विजेन्द्र के सम्पूर्ण काव्य-संसार में लक्षित होता है। लम्बी कविताओं ने विजेन्द्र को अभिनव पहचान प्रदान की है। उनके सहृदय समालोचक डा० रेवती रमण ने ठीक लिखा है कि ‘त्रास‘ में ”आत्मान्वेषण और प्रकृति पर्यवेक्षण का मिला-जुला स्वर बृहत्तर संभावनाओं की आहट के साथ लक्षित होता है। कुछ कविताएँ आकार में बहुत संक्षिप्त हैं तो कुछ बड़ी भी। '' (कविता में समकाल, पृ० 128,129)

एक छोटी कविता का शीर्षक है- ‘त्रास भरे मार्ग चुन लिए हैं‘। यह कविता सुन्दरवन के मल्लाहों के श्रमशील जीवन का चित्र अंकित करती है। उनके जीवन में संत्रास है, क्योंकि “उन्होंने ही अपने ही बल पर/त्रास भरे मार्ग चुन लिए हैं।“ (त्रास, पृ० 101) मल्लाहोें का सम्बन्ध “सुन्दरवन के आगे फैलने वाले समुद्र से है। उन्हें अपनी जीविका के लिए रात-दिन कठोर श्रम करना पड़ता है। अपार समुद्र में अपनी नौकाएँ लेकर जाना उनके लिए ‘त्रास‘ का प्रमुख कारण है। इस प्रकार युवा कवि श्रम को अपनी कविता की अन्तर्वस्तु के रूप में प्रस्तुत करता है। इस भाव-भूमि पर रचित अन्य कविताएँ- जो धूप में तच कर सख्त हो गए हैं, फूलों की तलाश में, उस पथ से जाते समय, मरखना जाल उछाल दिया-उल्लेखनीय हैं।

“मरखना जाल उछाल दिया” कविता का सम्बन्ध विजेन्द्र की जन्म-भूमि धरमपुर के कुण्डा (जल-कुण्ड) से है। कुण्डा में जाल उछाल कर मछलियाँ पकड़ी जाती थीं। अर्थात् जालवान कुण्डा के समीप बैठकर झख मारा करते थे। झख (झष) अर्थात् मछली। कवि अपनी इस स्मृति को कल्पना से रँगकर कुण्डा को नदी से जोड़कर अपने कथ्य का बिस्तार करता है- ”मुँह अँधियारे/उस खादर का धीमर/कन्धे पर/भारी जाल लादे आता/ पर्वत पठार लाँघ आया/तब बहती पार्वती नदी में/उसने बौखला कर/अपने मरखने जाल तान दिए/नदी तट सकेरता/तलकोरे छानता/खादर का जालवान अपने अचूक पाश से।“ (त्रास, पृ० 71,72)

इन कविताओं की प्रमुख विशेषता यह है कि कवि ने श्रम का सक्रिय रूप रूपायित किया है, जो उसके काव्य की सर्वप्रमुख विशेषता है। डा० रेवती रमण के अनुसार कवि का काव्य-संसार ऐसा है, जहाँ ‘शब्द जन्म लेते है, जीवन की क्रियाओं से।‘ (कविता में समकाल, पृ० 128)

प्रकति-सौन्दर्य-अनुरागी विजेन्द्र के त्रास संकलन में अनेक कविताएँ प्राकृतिक परिवेश के चित्रांकन से सम्बद्ध हैं। इस सन्दर्भ में सूखा पेड़, पहली वर्षा, अबाबीलों के झुण्ड, धुप, वे खेत, घास के सफेद फूल, हर छीटें में एक अन्तरंग सूर्य, भोर होते ही, तमाम दिन की तपन के बाद, सूर्य सिर से किंचित हट गया था, अदेह चितकबरी धूप में, सूर्य नमन, सूर्यस्त की भोर से शीर्षक कविताएँ पाठक का ध्यान आकृष्ट करती है। ये कविताएँ विजेन्द्र की वर्णन-क्षमता का निदर्शन हैं।

प्रसंगवश यहाँ उल्लेखनीय है कि विजेन्द्र की अनेक कविताओं में वर्णन की प्रधानता है। वर्णन में चित्रात्मकता है। और चित्रात्मकता में इन्द्रिय-बोध। नमूने के रूप में ‘सूखा पेड़ का चित्र देखिए- “पुराना सूखा पेड़/ताल के जल में/झाँकता है मौन/सूर्य बिम्बों से विकंपित जल में/आकाश विकल है/बेतरह/व्यग्र लहरों में/सूखा पेड़/रह/रह/काँपता है क्यों।”

प्रायः देखा गया है कि सूखे पेड़ की ओर ध्यान नहीं दिया जाता है। लेकिन विजेन्द्र ऐसे कवि है, जो, सूखे पेड़ पर भी अपना ध्यान केन्द्रित करके उसका चित्र अंकित करते हैं। निराला के ‘ठूँठ‘ के समान। मानवीकरण सूखे पेड़ को जीवंत रूप में प्रस्तुत करता है। और वह ”रह/रह/काँपता है क्यों।” प्रश्नात्मक वाक्य पेड़ के हरे-भरे अतीत की ओर इशारा कर रहा है। अर्थ-व्यंजना की दृष्टि से यह कविता इकहरी नहीं है। और जडी़भूत सौन्दर्य-अभिरूचि का निषेध भी करती है।

मानवीय करूणा से ओत-प्रोत एक अन्य महत्वपूर्ण कविता ‘एक व्याहत शुभ्र कपोत तड़प रहा है।‘ भी पठनीय है। ‘शुभ्र कपोत‘ की तड़फन के माध्यम से युद्ध का विरोध किया गया है। सुगठित और चित्रात्मक वर्णन गतिशीलता के बिम्ब से अन्वित है। देखिए - ”भूरी चील/उस अर्ध विमूर्छित कपोत को/छीनने के लिए/अपने मुलायम पंख/नुचवा रही है/और मैं इस दुर्धर्ष पक्षी-युद्ध को/धुँधले क्षितिज के सामने खड़े होकर/पीढ़ियों के अनहद नाद की तरह/निरन्तर सुन रह हँू।“ (त्रास, पृ० 62, 63) कविता का उद्घृत अंश कवि की कारूणिक विवशता का संकेतक है।

विजेन्द्र ने अपनी कविताओं में सक्रिय मानव या साधारण जन के अनेक चित्र अंकित किए हैं। इस दृष्टि से ‘त्रास‘ में संकलित कविता ‘जो धूप में तच कर सख्त हो गए हैं‘ पठनीय है। वर्णनात्मक और चाक्षुष बिम्बों की माला से युक्त यह कविता कवि की क्षमता अच्छा उदाहरण है। (त्रास, पृ० 11, 12) ।‘फसलों पर दहकता है‘ शीर्षक कविता में ‘नृशंस सूरज‘ का उल्लेख करके मरू भूमि की भीषण गरमी की व्यंजना की गई है। (त्रास, पृ० 15)

अक्सर सोचता था कि विजेन्द्र के पहले संकलन का नाम ‘त्रास‘ क्यों है। तब ‘त्रास‘ मेरे पास नहीं था। जब हाथ में आया, तब ध्यान से कई बार पढ़ा। विशेष रूप से पहली कविता ‘संक्रमण‘, जो अनतिदीर्थ है। इस कविता में ‘त्रास‘ पद से दो या तीन बार आया है। और ‘भोर होते ही‘ कविता में भी ‘त्रास‘ दो या तीन बार प्रयुक्त हुआ है।

‘संक्रमण‘ का अर्थ है ‘चलना‘ अथवा ‘गमन‘। संक्रान्ति का सम्बन्ध संक्रमण से है। दिनकर ने लिखा है युद्ध का उन्माद संक्रमणशील है। 

यह कविता संवादात्मक है। इसमें अवैध या जारज संतान इतिहास रूपी पिता से संवाद करती है। गीता के पहले अध्याय में अर्जुन श्रीकृष्ण से कहता है कि युद्ध के कारण स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं। उनके दूषण से वर्णसंकर उत्पन्न होते हैं। अर्थात् रक्त का मिश्रण हो जाता है। इसीलिए अन्तरजातीय विवाह वर्जित माना गया हैं। अभिज्ञान शाकुन्तलम् में कालिदास ने दिखाया है कि कण्व ऋषि द्वारा पालिता शंकुन्तला का अभूतपूर्व सौन्दर्य देखकर नायक दुष्यंत उस की जाति के बारे में सोच-विचार करता है कि मैं क्षत्रिय होकर ऋषि-कन्या का पाणिग्रहण कैसे कर सकता हूँ। वास्तविकता यह है कि शंकुन्तला ऋषि विश्वामित्र और अप्सरा मेनका की पुत्री है। रक्त-मिश्रण का परिणाम। जो लोग रक्त की शुद्धता पर विशेष ध्यान  देते हैं, उन्हें ज्ञात नहीं हैं कि मानव-इतिहास में रक्त का मिश्रण कितनी बार हुआ है और भविष्य में भी होता रहेगा। कवि रवीन्द्र ने भारत को महामानव-समुद्र बताया है। आशय यही है कि भारतीय संस्कृति की रचना में अनेक जातियों का योगदान है। एक मानव-समूह ने दूसरे से रागात्मक सम्बन्ध जोड़ा है। अतः ‘संक्रमण‘ के परिणाम स्वरूप जनमी वर्णसंकर संतति का त्रास झेलना उचित नहीं हैं। विजेन्द्र ने अपनी मार्क्सवादी जीवन-दृष्टि से इतिहास की परिघटनाओं को समझकर इस संवादात्मक कविता के माध्यम से मिथ्या धारणा का खंडन किया है। वर्णसंकर पर इतिहास पश्चाताप करता है। उसे बदनामी का त्रास संत्रस्त करता रहता है। वह अंधा है। अर्थात् विवेकहीन है। लेकिन इतिहास की वर्तमाान पीढ़ी का प्रतिनिधि अपने त्रास-ग्रस्त इतिहास रूपी अंधे पिता से कहता है।-“रहो आश्वस्त/आज मैं/सबके ऊर्ज स्पर्श से/यह बीज बोता हूूँ/वही मुक्ति होगी अँधेरे में/तुम्हारे भटकते प्रेत की/जो पारदृश्वा खो चुके तुम बहुत पहले ही/मुझ में रच रही अब नया दिनमान/अन्धक पिता मेरे।” (त्रास, पृ० 06) तात्पर्य है कि औरस पुत्र से ही नहीं अपितु वर्णसंकर संतान के द्वारा भी पिटा का उद्धार हो सकता है,इसीलिए कवि ने भारतीय समाज में प्रचलित वर्ण-व्यवस्था का प्रबल प्रतिरोध किया है। भक्ति-काल में भक्ति के आाधार पर वर्ण-व्यवस्था  को नकार दिया गया था। कबीर आदि भक्तों का जीवन और काव्य  इसका प्रमाण है।

‘भोर होते ही‘ शीर्षक कविता भी प्रभावपूर्ण है। वर्णन और विशेषण पदों के कारण। भोर होते ही कौए चारों दिशाओं में काँव-काँव करने लगते है। उनका भोजन बीभत्स पदार्थ है। मृतक के नाम पर दिया गया पिण्ड दान। वे बाएँ  नेत्र से काने होते है। क्यों। रामायणी कथा में यह आख्यान आया है कि एक बार इन्द्र के पुत्र जयन्त ने कौए का रूप धारण करके जानकी के/उरोज अथवा चरण पर चोंच से प्रहार किया था। उसी परिणाम स्वरूप राम ने, उसके शरणागत होने पर उसकी एक आँख वाण से बींध दी थी। ‘मानस‘ में चरण-प्रहार का उल्लेख है। और निराला की लम्बी कविता ‘स्फटिक शिला‘ में उन्नत उरोजों का वर्णन है। लेकिन ‘वर्तुल उठे हुए उरोज‘ किसी अन्य युवती के हैं। उन्हीं के बारे में निराला ने लिखा हैं।- ”वर्तुल उठे हुए उरोजों पर अड़ी थी निगाह/चोंच जैसे जयन्त की/“ (नि०र०ख० 2,पृ० 75)

इसी प्रसंग पर आधाति उर्पयुक्त कविता में कागों के शोर का वर्णन करने के बाद उनके त्रास का उल्लेख किया गया है- “समूचे धूम्र व्यापी व्योम में/टिड्डियों की तरह पंख मँडराते/अनादि से उद्भ्रान्त/जयन्त के गोत्रज/ढो रहे पीढ़ियों का त्रास।” (त्रास, पृ० 19) प्रश्न सामने है कि इस कविता का क्या महत्व है। उत्तर है कि कवि विजेन्द्र भदेस वस्तु को भी कविता की अन्तर्वस्तु बनाने में निपुण हैं। कोकिल की काकली अथवा उसकी मीठी बोली का वर्णन तो कवियों ने खूब किया है। लेकिन कुरूप और काले कौओं के रोर-शोर का वर्णन कौन करता है। काँव-काँव किसी भी व्यक्ति को नापसन्द मालूम होती हैं। कर्ण कटु ध्वनि कौन सुनना चाहता है। लेकिन कवि विजेन्द्र ने जयन्त के वंशजों के कुरूप और और बीभत्स स्वाभाव का वर्णन करके जड़ीभूत सौन्दर्य-अभिरूचि को बदला है। आप इस कविता पर मुक्तिबोध का प्रभाव देख सकते हैं। मुक्तिबोध ने ‘बबूल‘ जैसी भदेस वस्तु अथवा अनाकर्षक पेड़ को कविता की अन्तर्वस्तु के रूप में प्रस्तुत किया है- ”वह बबूूल भी/दुबला, धूलभरा, अप्रिय-सा, सहज उपेक्षित/श्याम, वक्र अस्तित्व लिये वह रंक तिरस्कृत/ पथ के एक ओर चुपचाप खड़ा है।“ (जन-कवि, स० वि०ब०सिंह पृ० 255)

हिन्दी की आधुनिक आलोचना में विजेन्द्र के पहले संकलन ‘त्रास‘ की चर्चा बहुत कम हुई है। इससे कवि को खिन्नता तो महसूस हुई होगी। लेकिन वह खिन्नता उनके कवि-कर्म को अवरूद्ध नहीं कर सकी। संकलन पर यह  आरोप आसानी से लगाया जा सकता है कि भाषिक संरचना में तत्सम पदावली की प्रधानता है। कभी-कभी तो अर्थ-बोध के लिए कोष देखना पड़ता है। इस आरोप के सन्दर्भ में मेरा कहना है कि ‘त्रास‘ में कवि विजेन्द्र की भाषा का प्रारम्भिक रूप है, जिस पर संस्कृत भाषा, काव्य  और काव्यशास्त्र के अध्ययन का तात्कालिक प्रभाव है। निराला ने भी तो संस्कृतनिष्ठ पदावली का प्रचुर प्रयोग किया है। उन्होंने अपनी काव्य-भाषा को नया रूप भी प्रदान किया है। विजेन्द्र ने भी ऐसा ही किया है। उनका समग्र काव्य इसका सबूत है।

मेरा अभिमत है कि ‘त्रास‘ में संकलित कविताओं की भाषिक संरचना लयात्मक है। संस्कृनिष्ठ होने पर भी बोलचाल की पदावली से युक्त है। वर्णनात्मक है। बिम्ब-विधान से युक्त है। सार्थक विशेषणों का प्रयोग किया गया है। वाक्य अधूरे नहीं पूरे हैं। कविताओं को ध्यान से पढ़ा जाए तो विजेन्द्र का रंग-बोध अनायास उजागर होने लगता है। यथा-“वे सारे पंख/अब धुँधलाने लगे है।/हलके बादामी और दूघाभ शुभ्र/अनेकानेक चित्रालोकित पंख/जिनके बाजुओं पर/कासनी और सीपिया गहरी/धारियाँ/कुहरिल पाश की तरह/अन्दर ही अन्दर पिघल चुकी हैं” (वह विषाद उड़ान,त्रास पृ०68)

फूलों की तलाश में, चाय पर, अदेह चितकबरी धूप में, पहली वर्षा, अबाबीलों के झुण्ड, वे खेत शीर्षक ऐसी कविताएँ है, जिनकी भाषिक संरचना में सहज बोधगम्य पदावली का प्रयोग अधिक किया गया है। तत्सम पदावली का प्रयोग न्यूनतम।

इस सन्दर्भ में अधोलिखित अंश पढ़िए-

        ”बूँदों के शोर में कुछ सुनाई नहीं पड़ता 
         छत की टीन और अलग-अलग सिम्तों में गिरने वाले 
         पतनालों के मिले जुले शब्द 
         हमारी चर्चाओं को आगे नहीं बढ़ने देते
         जब कि हम में से प्रत्येक 
         अपने-अपने तर्क प्रस्तुत करने के लिए 
         बेहद परेशान है। 
         
        हमें खुशी है
        आज अधिकांश गन्दगी घुल कर 
        नदी में जा मिलेगी
        और अधिक खतरनाक गन्दगियों के पोसने को
        अनेक घुली छते मिल सकेंगी
         
       किन्तु यह परिवर्तन इतना सूक्ष्म और सतही  होगा 
        जिससे न हमारे प्रश्नों की मुद्रओं में कोई अन्तर आएगा
        और न हमारे तर्को को 
        उबा देने वाली पद्धति बदलेगी।“
        (पहली वर्षा, त्रास पृ० 82, 83)

अमीर चन्द वैश्य
सेवानिवृत रीडर
हिन्दी विभाग,
एम्.जे.पी.रूहेलखंड विश्वविद्यालय,
बरेली,
द्वारा कम्यूटर क्लिनिक
चूना मंडी
बदायूं 243601
(उत्तर प्रदेश)
मो-
08533968269
इस सम्पूर्ण कविता की भाषिक संरचना में बोलचाल की पदावली की प्रधानता है। लेकिन अर्थ की दृष्टि से यह इकहरी नहीं है। एक ओर तो ‘पहली वर्षा‘ के पानी के वेग से गन्दगी साफ होने की बात कही गई है और दूसरी ओर कवि बेचैन है कि व्यापक परिवर्तन के लिए प्रश्नों पर निरन्तर बहस होती रहे। उसे वर्षा की आवाज रोके नहीं। इस प्रकार कवि ने अपनी  परिवर्तनकामी सामाजिक चेतना व्यक्त की है। उसने कविता के माध्यम से यथास्थिति का विरोध सदैव किया है। 

‘त्रास‘ संकलन विजेन्द्र-काव्य का मंगलाचरण है। इसमें उनके लगभग सभी काव्य-रूपों के बीज विद्यमान हैं। विजेन्द्र की काव्य-भाषा के कई रूप ‘त्रास‘ की भाषिक संरचना में लक्षित होते हैं। ‘त्रास‘ की कविताओं का अध्ययन करने का बाद ही विजेन्द्र की सम्पूर्ण काव्य-यात्रा का विकास समझ में आएगा। 
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