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शोध:प्रेमचंद-पूर्व हिन्दी कथा साहित्य में उभरता समाज और शैल्पिक प्रविधियाँ /डॉ. राजेश कुमारी कौशिक

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on रविवार, अगस्त 03, 2014 | रविवार, अगस्त 03, 2014

            साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका           
'अपनी माटी'
          वर्ष-2 ,अंक-15 ,जुलाई-सितम्बर,2014                       
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चित्रांकन:उत्तमराव क्षीरसागर,बालाघाट 
गद्य और पद्य साहित्य के दो रूप माने गए हैं। ’गद्य’ शब्द का अर्थ है-कही जाने वाली बात। मनुष्य ने जब से बोलना सीखा, गद्य तभी से अस्तित्त्व में आ गया था। लेकिन प्राचीन उपलब्ध साहित्य में पद्य पहले मिलता है जबकि गद्य के उदाहरण विरल हैं। गद्य की प्रचुरता आधुनिक हिंदी साहित्य की महत्त्वपूर्ण विशेषता है। कदाचित इसीलिए हिंदी का आधुनिक काल गद्य युग कहलाया। आधुनिक युग में जिस गति से गद्य साहित्य की रचना हुई उतनी पद्य की नहीं। 

हिंदी कथा साहित्य का आरम्भ 1800 के लगभग होता है। उस समय तक कहानी और उपन्यास का अंतर स्पष्ट नहीं हो पाया था। उस समय की कहानी को उपन्यास के अंतर्गत ही समाहित माना जाता था। भारतेन्दु से पूर्व का कथा (उपन्यास एवं कहानी) साहित्य पौराणिक आख्यानों पर आधारित है तथा लेखक रागात्मक कल्पनाओं से प्रेरित हैं। भारतेन्दु से पूर्व (1800 से 1858) हिन्दी गद्य साहित्य में हमें तीन महत्त्वपूर्ण ग्रंथ उपलब्ध होते हैं। पहला लल्लूलाल का ’प्रेमसागर’ (1803) दूसरा सदल मिश्र का ’नासिकेतोपाख्यान’(1803) और तीसरा सैयद इंशा अल्ला खाँ की ’रानी केतकी की कहानी’ (1800 से 1810 के बीच)।  ’नासिकेतोपाख्यान’ तथा ’प्रेमसागर’ पौराणिक आधार पर लिखे ग्रन्थ हैं। इसलिए सभी पात्र परम्परागत संस्कृत पुराणों के अनुरूप हैं। ’रानी केतकी की कहानी’ को एक मौलिक रचना माना जाता है। इसके प्रायः सभी पात्र उच्च मध्यवर्गीय हैं। 

’रानी केतकी की कहानी’ के पश्चात् पं0 श्रीलाल विरचित ’धर्मसिंह का वृतांत’ ईस्ट इंडिया कम्पनी के शासन काल की एक अविस्मरणीय गद्य कथा है जिसमें एक सत्यनिष्ठजमींदार की यथार्थवादी कहानी है। आदर्शोन्मुख यथार्थवाद इसकी विशेषता है। पं0 श्रीलाल कृत ’सूरजपुर की कहानी’ (भाग-1) भी तत्कालीन युग की एक लोकप्रिय कहानी है। इसमें यथार्थवाद की स्वच्छ धारा प्रवाहित हुई है। इसके द्वितीय भाग के रचनाकार मुंशी नज़्म अलादीन थे। राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द प्रणीत ’वीरसिंह का वृतांत’ (प्रथम सं0 1855 ई0) ’वामा मनरंजन’ (प्रथम सं0 1856 ई0) ’लड़कों की कहानी’ (द्वितीय सं0 1861 ई0) आदि पूर्व भारतेन्दुयुगीन मौलिक गद्य-कथाएं हैं। ”पूरी उन्नीसवीं शताब्दी में केवल दो कहानियाँ ही और लिखी गई। एक राजा शिवप्रसाद ’सितारेहिन्द’ की उपदेशात्मक कहानी ’राजा भोज का सपना’ और दूसरी भारतेन्दु हरिश्चंद्र्र की हास्यरस प्रधान कहानी ’अद्भुत अपूर्व सपना’। इसके बाद यद्यपि उपन्यास अनेक लिखे गए लेकिन कहानी बीसवीं शताब्दी में आकर लिखी गई।”   इस प्रकार कहा जा सकता है कि हरिश्चन्द्र से पूर्व तक का हिन्दी कथा साहित्य उपन्यास और कहानी किसी भी क्षेत्र में नहीं आ सकता क्योंकि न इसमें उपन्यास-कहानी की कोई शिल्प विधि थी और न कोई भाव विशेष।

उन्नीसवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध हिन्दी गद्य साहित्य के आरम्भिक विकास में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। हिन्दी उपन्यासों का उद्भव इसी काल में हुआ। इस काल तक आते-आते देश की सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक परिस्थितियों ने उपन्यासों के उद्भव एवं विकास के लिए अनुकूल वातावरण तैयार कर दिया था। राजनीति की दृष्टि से यह काल अपना विशेष महत्त्व रखता है।  हिन्दी साहित्य में उपन्यास के स्वरूप निर्धारण एवं विकास में प्रेमचन्द का महत्त्वपूर्ण योगदान है। इसलिए विद्वानों ने हिन्दी उपन्यासों के वर्गीकरण में प्रेमचन्द को आधार माना है। ’प्रेमचन्द पूर्व के उपन्यासों को पूर्व-प्रेमचन्द उपन्यास कहना केवल काल का नहीं, बल्कि विकास के सोपान का और उस सोपान की कुछ विशिष्ट प्रवृत्तियों का परिचायक है। इसी प्रकार प्रेमचन्द युग और प्रेमचन्दोत्तर युग कहना भी उपन्यास की दो विशिष्ट धाराओं का द्योतन करता है। अर्थात् प्रेमचन्द बीच में स्थित होकर अपने पूर्ववर्ती और परवर्ती उपन्यास साहित्य के मानदण्ड के रूप में प्रतीत होते हैैं।   हिन्दी उपन्यास की विकास यात्रा को सुविधा की दृष्टि से चार युगों में विभाजित किया जा सकता है। 

  • प्रेमचन्द-पूर्व युग (सन् 1882 से 1918 तक)
  • प्रेमचन्द युग (सन् 1918 से 1936 तक)
  • प्रेमचन्दोत्तर युग (सन् 1936 से 1960 तक)
  • साठोत्तर युग (सन् 1960 से ....... )  


हिन्दी में सर्वप्रथम अनूदित उपन्यास ’रॉबिन्सन क्रूसो का इतिहास’ है। इसका प्रथम प्रकाशन 1860 ई0 में हुआ। अंग्रेजी उपन्यासकार डैनियल डीफो के उपन्यास ’राबिन्सन-क्रूसो’ का हिन्दी अनुवाद पं0 बदरीलाल ने किया था। तदन्तर अनेक हिन्दीत्तर उपन्यासों के हिन्दी अनुवाद प्रकाशित हुए। हिन्दी में मौलिक उपन्यासों से पूर्व अनूदित उपन्यास ही आए। 

1870 ई0 में पं0 गौरीदत्त कृत मौलिक उपन्यास ’देवरानी जेठानी की कहानी’ का प्रकाशन हुआ। प्रेमचन्द-पूर्व हिन्दी उपन्यासों में यथार्थवाद की एक विशिष्ट परम्परा थी। इस परम्परा का श्रीगणेश इसी उपन्यास से हुआ। मेरठ के मुंशी ईश्वरी प्रसाद और मुंशी कल्याण राय ने 1872 ई0 में ’वामाशिक्षक’ अर्थात् ’दो भाई और चार बहनों की कहानी’ नामक उपन्यास की रचना की। यह स्त्री शिक्षा प्रधान मौलिक उपन्यास है। नवोदित शहरी मध्यमवर्ग के सामाजिक जीवन पर आधारित यह उपन्यास तत्कालीन भारतीय समाज का दर्पण है। 1877 ई0 में पं0 श्रद्धाराम फिल्लौरी द्वारा विरचित तथा 1887 ई0 में प्रकाशित ’भाग्यवती’ उपन्यास स्त्री शिक्षा हेतु लिखा गया था।  यदि हम ’देवरानी जेठानी की कहानी’, ’वामाशिक्षक’ तथा ’भाग्यवती’ एक साथ पढ़ें तो 1870 के दशक में हमारे परम्परागत समाज में जिस रीति से नये शहरी मध्यम वर्ग का उदय हुआ, उसकी एक अच्छी झाँकी मिल जाती है।”  ’सुंदर’ एक मौलिक यथार्थवादी उपन्यास है। यह ’परीक्षागुरु’ से पूर्व का उपन्यास है। इस उपन्यास में मद्यनिषेद्य, स्त्री सुधार, देशभक्ति, नवजागरण, वेश्यावृत्ति, बाल विवाह, बाल वैधव्य, रोजगार के प्रति उन्मुख शिक्षा, विवाह के प्रति प्रगतिशील दृष्टिकोण आदि का चित्रण किया गया है। सामाजिक जागरुकता का यह उपन्यास पूर्व-प्रेमचन्द युगीन यथार्थवाद का उत्कृष्ट उदाहरण है। राधाकृष्णदास ने 1881 ई0 में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के परामर्श से मात्र सोलह वर्ष की आयु में ’निस्सहाय हिन्दू’ उपन्यास की रचना की जो 1890 ई0 में पहली बार प्रकाशित हुआ। गोवध निवारण के उद्देश्य से इसकी रचना हुई थी। इसमें हिंदू समाज ही नहीं, मुस्लिम समाज का भी चित्रण किया गया है। इसके पूर्व के उपन्यासों में मुस्लिम समाज का चित्रण नहीं किया गया था। 

लाला श्रीनिवास दास कृत ’परीक्षागुरु’ उपन्यास की धारा में एक क्रान्तिकारी उपन्यास है। इसका द्वितीय संस्करण 1884 ई0 में प्रकाशित हुआ। पहली बार आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 1929 ई0 में हिन्दी शब्दसागर की प्रस्तावना में कहा कि ’अंग्रेजी ढंग का मौलिक उपन्यास पहले पहल हिन्दी में लाला श्रीनिवासदास का ’परीक्षागुरु’ ही निकला था।”  शुक्ल जी ने अपने इस अभिमत की पुनरावृत्ति ’हिन्दी साहित्य का इतिहास’ में भी की है। ”लाला श्रीनिवासदास ही प्रथम उपन्यासकार हैं जिन्होंने हिन्दी साहित्य में नया मार्ग दिखाया। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने संवत् 1934 में प्रकाशित श्रद्धाराम फिल्लौरी के ’भाग्यवती’ नामक सामाजिक उपन्यास का केवल उल्लेख किया है।  शुक्ल जी ने ’परीक्षागुरु’ को अंग्रेजी ढंग का मौलिक उपन्यास माना है। ’परीक्षागुरु’ के संबंध में स्वयं लेखक ने कहा है कि ’अपनी भाषा में यह नई चाल की पुस्तक होगी।’ लेखक ने अंग्रेजी में इसे ’नॉवेल’ बतलाया है और हिन्दी में अनुभव द्वारा उपदेश मिलने की एक संसारी वार्ता’ कहा है।  

हिन्दी का प्रथम उपन्यास किसे स्वीकार किया जाए, यह एक विवादास्पद प्रश्न है। विद्वानों ने अपने-अपने ढंग से लाला श्रीनिवासदास कृत ’परीक्षागुरु’, इंशाअल्ला खाँ की ’रानी केतकी की कहानी’ और श्रद्धाराम फिल्लौरी कृत ’भाग्यवती’ को हिन्दी का प्रथम उपन्यास सिद्ध करने का प्रयास किया है। अधिकतर विद्वानों ने सन् 1882 ई0 में प्रकाशित ’परीक्षागुरु’ को ही हिन्दी का प्रथम उपन्यास स्वीकार किया है क्योंकि यही अंग्रेजी ढंग का प्रथम उपन्यास है। स्वयं उपन्यासकार ने भी अपनी रचना पर अंग्रेजी प्रभाव को स्वीकार किया है। ’भारतेन्दु युग में लेखकों को उपन्यास रचना की प्रेरणा बंगला और अंग्रेजी के उपन्यासों से प्राप्त हुई। अंग्रेजी ढंग का पहला मौलिक उपन्यास लाला श्रीनिवास दास का ’परीक्षागुरु’ (1882) माना जाता है।”  

हिन्दी में प्रेमचन्द-पूर्व उपन्यास की प्रसिद्धि के दो मुख्य आधार हैं-एक नीतिपरक सामाजिकता तथा दूसरा मनोरंजन की प्रधानता। ऐय्यारी, तिलस्मी एवं जासूसी प्रकार के उपन्यास शुद्ध रूप से मनोरंजन की प्रवृत्ति पर आधारित थे। शुद्ध ऐतिहासिक उपन्यास इस युग में बहुत कम लिखे गए। सामाजिक जागरण की प्रेरणा से युक्त उपन्यास उपदेश प्रधान और सुधारवादी थे।  इनमें से कुछ उपन्यास सनातन धर्म की परम्परा के पोषण में प्रवृत्त थे और कुछ नवीन बौद्धिक जागरण के समर्थक नये सुधारों का समर्थन कर रहे थे। मनोरंजन का तत्त्व न्यूनाधिक प्रत्येक युग के कथा साहित्य का प्रेरक होता है। इस दृष्टि से सामाजिक जागरूकता से युक्त उपन्यास भी मनोरंजन के तत्त्व से शून्य नहीं थे। इसलिए विषय को दृष्टि में रखकर प्रेमचंद-पूर्व उपन्यासों को तीन वर्गों में बाँटा जा सकता हैः- 

1. शुद्ध मनोरंजन प्रधान उपन्यास (तिलस्मी, ऐय्यारी एवं जासूसी) 
2. उपदेश प्रधान सामाजिक उपन्यास ।
3. ऐतिहासिक उपन्यास । 

भारतेन्दु युग जीवन की नवीन परिस्थितियों एवं नूतन चेतना को लेकर अवतरित हुआ। भारतेन्दुयुगीन साहित्य में रुढ़िवादिता का विरोध, प्राचीन भारतीय संस्कृति से प्रेम, राष्ट्रीयता के प्रति आकर्षण, धर्मनिष्ठा और सामाजिक विकारों का उल्लेख उस युग की मूल विषय-वस्तु है। प्रेमचंद-पूर्व हिन्दी उपन्यास में परिवर्तित होते हुए भारतीय समाज के विभिन्न रूपों का प्रतिबिंब दिखाई देता है। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में विभिन्न राजनीतिक एवं सामाजिक कारणों से जनता की सामाजिक दशा, नैतिक भावना, धार्मिक विश्वास और मानव मूल्यों में हो रहे सामाजिक परिवर्तनों के फलस्वरूप नई स्थितियाँ उत्पन्न हुई। उनका प्रभाव हिन्दी उपन्यास पर भी लक्षित होता है। उपन्यासों में समाज, विशेष रूप से उभरते मध्यमवर्ग की समस्याओं की दृष्टि से प्रेमचंद-पूर्ववर्ती उपन्यासकारों में श्रद्धाराम फिल्लौरी, भारतेन्दु हरिश्चंद्र, श्रीनिवासदास, बालकृष्ण भट्ट, किशोरी लाल गोस्वामी, गोपाल राम गहमरी, देवकी नन्दन खत्री, लज्जाराम मेहता, अयोध्या सिंह उपाध्याय ’हरिऔध’ और ब्रजनन्दन सहाय आदि अनेक प्रमुख तथा गौण लेखकों की कृतियों में सामाजिक समस्याओं का विश्लेषण किया गया है। 

श्रद्धाराम फिल्लौरी ने एक ही उपन्यास ’भाग्यवती’ लिखा जिसमें दो दर्जन मुख्य एवं गौण पात्रों के माध्यम से अपने समय के समाज का पूरा चित्र प्रस्तुत कर दिया है। इन पात्रों में अधिकांश पुराने विचारों के हैं। लेकिन लेखक की सहानुभूति नये सुधारवादी विचारों के पोषक पात्रों के साथ उभरकर सामने आती है। ’भाग्यवती उपन्यास में नारी समस्या के साथ ही बाल विवाह, दहेज प्रथा, प्रदर्शनप्रियता, संयुक्त परिवार आदि समस्याओं का चित्रण किया है। बाल विवाह का विरोध करते हुए उमादत्त अपनी पत्नी से कहते हैं-’सुनो! विवाह उस समय करना चाहिए जब बालक आप ही स्त्री का भूखा हो। जिसका छोटी अवस्था में विवाह हो जाए उसका स्त्री में अत्यन्त प्रेम कभी नहीं हो सकता।”   विवाह का यही नियम कन्या के विषय में भी उपयुक्त समझना चाहिए। ”बाल विवाह की कुप्रथा के कारण ही समाज में बाल विधवाओं का बाहुल्य था। उसके क्या कुपरिणाम होते थे, इसके कई चित्र ’भाग्यवती’ में मिलते हैं। सेठ रामरत्न ने सात वर्ष की कन्या को ब्याहा। दो वर्ष बाद विधवा हो गई। माता-पिता और ससुराल वालों की प्रतिष्ठा धूल में मिला किसी कहार के साथ निकल गई।”  विवाह में अपव्यय के क्या कुपरिणाम होते थे, इसके भी कई दृष्टांत मिलते हैं। पं0 उमादत्त की गली में छजमल ने अपनी सामर्थ्य से बढ़ कर पाँच सहस्र रुपया कन्या के विवाह में लगा दिया था सो अब देनदार होकर देश-विदेश मारा-2 फिरता था। छोटे लाल ने उससे भी अधिक रुपये लगाये जिससे बाद में बाप-दादा के बनवाये मंदिर बेच देने पड़े।”  ’भाग्यवती’ में स्त्री शिक्षा पर बल देते हुए लालमणि की माँ कहती है-”मेरी समझ में वे लोग बड़े मूर्ख हैं जो अपने लड़के-लड़की को विद्या से हीन रखते हैं।  परिवार में पुत्र को कन्या से अधिक महत्त्व दिए जाने वाले रुढ़िगत विश्वास का खण्डन किया है। इस प्रकार तत्कालीन मध्यवर्गीय समाज में जितनी भी संभावित समस्याएं हो सकती है, फिल्लौरी जी ने उन सबका किसी न किसी रूप में चित्रण अवश्य किया है। 

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा लिखित ’पूर्णप्रकाश और चन्द्रप्रभा’ उपन्यास भी सामाजिक पृष्ठभूमि पर आधारित हैं। यह उपन्यास एक मराठी रचना से प्रेरित है। इसमें वृद्ध विवाह की कुप्रथा का विरोध करते हुए स्त्री शिक्षा का पूर्ण समर्थन किया गया है। भारतेन्दु जी ने ’एक कहानी: कुछ आपबीती कुछ जगबीती’ में मध्यवर्ग की चाटुकारिता एवं प्रदर्शनप्रियता का प्रमुखता से चित्रण किया है। मध्यवर्गीय समाज के विस्तृत अध्ययन की दृष्टि से श्रीनिवासदास का ’परीक्षागुरु’ प्रथम उपन्यास कहा जा सकता है। प्रेमचन्द-पूर्ववर्ती युग का यह उपन्यास न केवल अपने युग के लिए बल्कि उपन्यास की विकसित होती हुई धारा का भी प्रेरणा-स्रोत रहा है। लेखक ने इस उपन्यास में मध्यवर्ग की झूठी सम्मान भावना, चाटुकारिता, अकर्मण्यता, विदेशी सभ्यता की दासता, आर्थिक विषमता, बेकारी तथा शिक्षा की सोचनीय स्थिति आदि समस्याओं का चित्रण किया है। पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति की नकल को लेखक ने बुरा नहीं बताया है-’हिन्दुस्तानियों को आजकल हर बात में अंग्रेजों की नकल करने का चस्का पड़ गया है, तो वह भोजन वस्त्रादि निरर्थक बातों की नकल करने के बदले सद्गुणों की नकल क्यों नहीं करते ? देशोपकार, कारीगरी और व्यापार में उनकी सी उन्नति क्यों नहीं करते ?  

बालकृष्ण भट्ट लिखित ’नूतन ब्रह्मचारी’ एवं ’सौ अजान एक सुजान’ को सामाजिक उपन्यासों की श्रेणी में रखा जा सकता है। ’नूतन ब्रह्मचारी’ एक आदर्शपरक सुधारवादी उपन्यास है जिसमेें नायक विनायक के चरित्रबल से डाकुओं की प्रवृत्ति के सुधर जाने की कथा वर्णित है। इस कृति में समाज एवं युग का चित्रण कम है तथा स्त्री पात्रों का भी अभाव है। जगमोहन सिंह का ’श्यामा स्वप्न’ भी एक सामाजिक उपन्यास है जिसमें काल्पनिक कहानी होते हुए भी ब्राह्मणकुमारी श्यामा और क्षत्रियकुमार श्याम सुन्दर के प्रणय सम्बन्ध की संभावना की ओर संकेत करके नव्य समाज की नवीन मान्यताओं का प्रतिनिधित्व किया गया है। राधाकृष्णदास ने ’निस्सहाय हिन्दू’ नामक उपन्यास ’गोवध निवारण’ की भावना से प्रेरित होकर लिखा। 

मेहता लज्जाराम शर्मा के ’धूर्त रसिक लाल’ (सन् 1889) ’स्वतंत्र रमा और परतंत्र लक्ष्मी’ (सन् 1899 ई0) आदर्श दम्पत्ति (सन् 1904) ’बिगड़े का सुधार’ तथा ’सती सुखदेवी’ (सन् 1907) तथा ’आदर्श हिन्दू’ (सन् 1914) आदि कई उपन्यास प्रसिद्ध हैं। लज्जाराम शर्मा के उपन्यासों में नई शिक्षा, नवीन आदर्श, पाश्चात्य प्रभावों की निन्दा की गई है तथा सती प्रथा, पर्दा-प्रथा, अशिक्षा आदि का समर्थन किया गया है। ’सुशीला विधवा’ में मध्यवर्ग की रुढ़िवादिता और परम्पराओं के समर्थन का जो चित्र मिलता है उसका मुख्य कारण लेखक की सनातन धर्म में आसक्ति है। ”सुशीला को जिस प्रकार उन्होंने चित्रित किया है, उनमें जीवन की गति नहीं, गतिशून्यता की चरमसीमा है। वह निर्जीव कठपुतली की भांँति उपन्यासकार के संकेतों पर परिक्रमा करती रहती है। उस पर यथार्थ की छाया नहीं, परम्पराओं एवं रुढ़ियों का अभिशाप है।” 

गोपालराम गहमरी ने ’डबल बीवी’, ’दो बहिनें’, ’तीन पतोहू’ आदि सामाजिक उपन्यास लिखे। ’डबल बीवी’ उपन्यास की समस्या पुत्र-प्राप्ति की कामना है। ’दो बहिनें’ एक सामाजिक उपन्यास है जिसमें दो बहनों की तुलनात्मक कहानी प्रस्तुत की गई है। ’तीन पतोहू’ भी एक पारिवारिक उपन्यास है। 

देवकीनंदन खत्री ने मुख्यतः मनोरंजन के लिए उपन्यासों की रचना की थी। उन्होंने तिलस्म और ऐय्यारी को जनसुलभ बनाने का सफल प्रयत्न किया। उनके द्वारा लिखित ’काजर की कोठरी’ सामाजिक समस्या को प्रस्तुत करने वाला उपन्यास है। इसमें जमींदार और वेश्या के जीवन पर प्रकाश डालकर समाज की गम्भीर समस्या और उसका समाधान प्रस्तुत किया है। इनके उपन्यासों के पात्र उच्चवर्ग से लिए गए हैं। प्रेम का उच्चतम हिन्दू आदर्श भी यहाँ आरोपित हुआ है। राजकुमार एवं राजकुमारी सच्चे और आदर्श प्रेमी हैं। इन उपन्यासों में कर्मफल से कोई भी पात्र बच नहीं पाता। बुरे कर्म का बुरा फल और अच्छे कर्म का अच्छा फल दिखाते हुए उपन्यास समाप्त होता है। 

किशोरी लाल गोस्वामी प्रेमचन्द पूर्व युग के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपन्यासकार हैं। इन्होंने 65 उपन्यासों की रचना की। गोस्वामी जी पक्के सनातन धर्मी थे।  सनातन धर्म की आदर्शवादी मान्यताएं उनके सभी उपन्यासों में मिलती हैं। सामाजिक उपन्यासों में ’त्रिवेणी या सौभाग्य श्रेणी, प्रणयिनी परिणय, तरुण तपस्विनी, पुनर्जन्म या सौतिया डाह, माधवी माधव व मदन मोहिनी, कुसुम कुमारी वा स्वर्गीय कुसुम, चपला वा नव्य समाज, अंगूठी का नगीना तथा लीलावती आदि उपन्यासों में सामाजिक समस्याओं का चित्रण किया गया है। गोस्वामी जी के उपन्यासों में मध्यवर्ग की नारी जीवन की समस्याओं का अंकन पुरातन रुढ़िवादी विचारों के आधार पर हुआ है। पतिव्रत संस्कारों की सीमाओं में अवरुद्ध नारी को गोस्वामी जी ने आदर्श माना है तथा पाश्चात्य शिक्षा, संस्कृति एवं प्रगतिशील विचारों का विरोध किया है। गोस्वामी जी के नारी पात्र परम्परागत संस्कारों में जकड़े हुए हैं, परन्तु लेखक की दृष्टि में वे ही आदर्श पात्र हैं। 

अध्योध्या सिंह उपाध्याय ’हरिऔध’ ने मध्यवर्ग की विवाह तथा प्रेम की समस्या का चित्रण ’ठेठ हिन्दी का ठाठ’ तथा ’अधखिला फूल’ में किया है। पहले में अनमेल विवाह का दुष्परिणाम तथा दूसरे में धर्म की महत्ता प्रतिपादित की है और प्रसंगवश धार्मिक अंधविश्वासों के दुष्परिणाम भी दिखाए गए हैं। ’ठेठ हिन्दी का ठाठ’ में लेेखक ने देवनन्दन एवं देवबाला में बाल सुलभ स्नेह दिखाया है किन्तु देवबाला का पिता उसका विवाह पापाचारी रमानाथ से कर देता है जो उसे छोड़कर कलकत्ता में एक रखैल के साथ रहने लगता है। देवबाला एक स्थल पर कहती है-’पति नारी का देवता है, वह कैसा ही क्यों न हो पर तिरिया उसका अयोग और बुरा नहीं चाह सकती।”   देवबाला एक परम्परावादी आदर्श नारी है जिसमें लेखक ने पतिव्रत धर्म का आदर्श दिखाया है। यह उपन्यास देश की कुरीतियों, झूठे धार्मिक आडम्बरों, थोथी पारम्परिक मान्यताओं पर व्यंग्य है, साथ ही प्राचीनता के प्रति आस्था का भी परिचायक है। 

ब्रजनन्दन सहाय ने ’सौन्दर्योपासक’ ’राधाकान्त’, एवं ’अरण्यबाला’ उपन्यास लिखे। ’राधाकान्त’ और ’अरण्यबाला’ दोनों रचनाओं में देश की आर्थिक विषमता का विस्तार से चित्रण किया गया है। इन उपन्यासों के पात्र पाश्चात्य संस्कृति का समर्थन करते हैं। नवीन शिक्षा और प्रगतिशील विचारों का समर्थन इस बात का द्योतक है कि प्रेमचन्द-पूर्ववर्ती उपन्यासों में मध्यवर्ग की चेतना जागरूक हो रही थी। आर्थिक दुर्दशा, बेकारी, स्त्री-शिक्षा तथा देश की राजनीतिक उथल-पुथल जैसे प्रश्नों को उपन्यासों में उठाया गया है। 

मन्नन द्विवेदी कृत ’रामलाल’ (1917) एक सामाजिक उपन्यास है। इस उपन्यास में ग्रामीण जीवन का चित्र खींचा गया है। नगर और नागरिक लोग भी कहीं-कहीं आ गए हैं लेकिन मुख्य पात्र और घटनाएँ गाँवों से सम्बन्धित हैं। यह इस युग का सर्वप्रथम ऐसा उपन्यास है, जिसमें ग्रामीण जीवन का इतना यथार्थवादी चित्रण किया गया है। मन्नन द्विवेदी कृत ’कल्याणी’ उपन्यास भी शिक्षाप्रद सामाजिक रचना है। 

इस प्रकार प्रेमचन्द-पूर्ववर्ती युग के सामाजिक उपन्यासों में श्री उमराव सिंह लिखित ’आदर्श बहू’, ’भाई बहिन’ तथा ’प्रेमलता’, श्री गयाप्रसाद लिखित ’दुनिया’, मनोहर लाल कृत ’कान्ति माला’, देवकीनन्दन सिंह लिखित ’कौशल किशोर’, श्री गौरीदत्त लिखित ’गिरिजा’, श्री गंगा प्रसाद गुप्त लिखित ’लक्ष्मी देवी’ , श्री देवराज कृत ’कर्कशा सास’, गया प्रसाद मिश्र कृत ’दुनिया अर्थात् संसार की कुछ बातें’, आदि अनेक उपन्यास एवं उपन्यासकारों को परिगणित किया जा सकता है। किन्तु स्थानाभाव के कारण उनका उल्लेख न कर पाने की विवशता है। 
इस प्रकार प्रेमचन्द-पूर्ववर्ती समाज की समस्याओं का चित्रण सुधारवादी दृष्टिकोण से हुआ है। उस युग के प्रायः सभी लेखक सनातन धर्म में अटूट आस्था रखने वाले थे। उनके सांस्कृतिक मूल्यों तथा नैतिक दृष्टिकोण को निश्चित करने वाला प्रमुख तत्त्व सनातनधर्मी दृष्टिकोण है। सामान्यतः सामाजिक जीवन के जो चित्र इन उपन्यासकारों ने दिखाए हैं वे संकीर्ण, अनुदार और आज के प्रगतिशील युग में रूढ़िगत प्रतीत होते हैं। वस्तुतः इस युग का सामाजिक पक्ष अत्यन्त रुढ़िवादी परम्पराओं में आबद्ध दिखाई देता है। ”इस युग के सामाजिक उपन्यासकारों ने सामाजिक जीवन के प्रायः सभी क्षेत्रों से संबंधित समस्याओं का चित्रण करते हुए उनका सुधारपरक निदान प्रस्तुत किया है तथा युग के सामाजिक उपन्यास साहित्य के लिए एक पुष्ट आधारभूमि का कार्य किया है। 

शैल्पिक प्रविधियाँ 

शिल्प विधि का शाब्दिक अर्थ है - किसी चीज के बनाने या रचने का ढंग अथवा तरीका।  किसी वस्तु के रचने की जो-जो विधियाँ अथवा प्रक्रियायें होती हैं उनके समुच्चय को शिल्पविधि के नाम से पुकारा जाता है। सरल भाषा में यदि कहा जाए तो शिल्प से अभिप्राय हाथ से कोई वस्तु तैयार करने अथवा दस्तकारी या कारीगरी से है।  साहित्य एवं कला के सन्दर्भ में प्रयुक्त होने से शिल्प विधि का अर्थ होता है साहित्यिक कृति अथवा कलात्मक वस्तु के रचने का तरीका या ढंग। कला की रचना में जिन तरीकों, रीतियों और विधियों का उपयोग किया जाता है, वे ही उस कला की शिल्पविधि के नाम से पुकारी जाती हैं।  उपन्यास की शैल्पिक प्रविधि के अंतर्गत पाँच तत्त्व माने गए हैं- कथावस्तु, चरित्र-चित्रण, देशकाल, भाषा, कथोपकथन और उद्देश्य। विलियम हेनरी हडसन ने उपर्युक्त पाँच तत्त्वों के अतिरिक्त छठे तत्त्व शैली का भी उल्लेख किया है। ”  
प्रेमचन्द-पूर्व उपन्यास साहित्य शिल्प की दृष्टि से अपनी प्रारम्भिक अवस्था में था। इसलिए उसमें प्रयोगात्मक एवं अनगढ़ शिल्प का बोलबाला था। उपन्यास की शिल्पविधि के सभी तत्त्व अविकसित और अनगढ़ रूप में दिखाई पड़ते हैं। ”हिन्दी के प्रारम्भिक उपन्यासों का शिल्प किन्हीं सैद्धान्तिक नियमों के आधार पर परखा नहीं जा सकता। प्रारम्भिक युग में किसी विधा के सैद्धान्तिक नियम निर्धारित नहीं हो पाते और इसी कारण उसके मूल्यांकन के मानदंड भी निश्चित नहीं होते ।  हिन्दी के प्रारम्भिक उपन्यास साहित्य के संबंध में भी यह सत्य है। ”  

इन उपन्यासों की मूल प्रवृत्ति किसी न किसी रूप में उपदेश देने की रही है। यह प्रवृत्ति न केवल शिक्षाप्रद उपन्यासों में बल्कि मनोरंजन प्रधान तिलस्मी एवं जासूसी उपन्यासों में भी दिखाई देती है। घिसे-पिटे नीतिवाक्यों एवं उपदेशों अथवा कौतूहल जनक घटनाओं पर आधारित ये उपन्यास नीति, शिक्षा और मनोरंजन का लक्ष्य साधकर मानो नाक की सीध में चलते रहे हैं। 

प्रेमचन्द पूर्व उपन्यासों में उद्देश्य पक्ष के समान ही कथाशिल्प भी अपरिपक्व, अप्रौढ़ एवं सीधा-सादा है। कथावस्तु में उपन्यासकार ने  अपने पूर्व निर्धारित लक्ष्य की पूर्ति के अनुसार कथा का गठन एवं विकास किया है। शिक्षाप्रद उपन्यासों के कथानक सरल हैं तथा उनका विकास भी सरल है। कथा के प्रारम्भ में ही लेखक अपनी कथा के आधार और लक्ष्य के संबंध में सूचना दे देता है। उपन्यास के अन्त तक पहुंचते-2 उद्देश्य स्पष्ट हो जाता है। सामाजिक उपन्यासों की कथावस्तु सीधे-सादे ढंग पर चलती है किन्तु उद्धरणों के समावेश से बोझिल हो जाती है। ’परीक्षागुरु’ में कथा का विकास बड़े सरल और स्पष्ट ढंग से किया गया है।  प्रत्येक प्रकरण का नामकरण शिक्षाप्रद शीर्षकों द्वारा करके, कथा के साथ-साथ सुभाषित और फुटनोट में अंग्रेजी के उद्धरणों के अनुवाद देने की विधि अपनाई गई है। ’नूतन ब्रह्मचारी’ में भी परिच्छेदों के शीर्षक नीतिवाक्यों से भरपूर हैं। कथा बिना किसी उलझाव और उतार-चढ़ाव के विकास करती जाती है। प्रेमचंद-पूर्ववर्ती उपन्यासकार कथा में पेचीदगी लाने की कला से अनभिज्ञ थे, इसलिए कथा का विकास बहुत सरलतापूर्वक किया गया है। यह सरलता ही उसकी अप्रौढ़ता का परिचायक है। 

इस युग के तिलस्मी और जासूसी उपन्यासों की कथा का विकास अधिक जटिल है। इन उपन्यासों की कथा का मूलाधार कल्पना है। लेखक ऐसी घटनाओं का निर्माण करता है कि कथासूत्र विलक्षण ढंग से एक दूसरे में गूंथे होकर भी उलझे हुए प्रतीत नहीं होते।  इनमें कथा के प्रारम्भ में पाठक को अनोखी आश्चर्यपूर्ण घटनाओं से रोमांचित कर अन्त में उस रहस्य से परिचित करा दिया जाता है। लेखक स्वयं ही रहस्य का सृजन करता है और स्वयं ही उसका उद्घाटन करता है। इनका उपसंहार पूर्व-निर्धारित होता है और कथा उसी के अनुसार विकसित होती चली जाती है। 

प्रेमचंद पूर्ववर्ती उपन्यासों की मुख्य विशेषता उनका घटना प्रधान होना है। घटना-चमत्कार के माध्यम से उन्होंने या तो मात्र मनोरंजन किया या उपदेश देना चाहा हैै।  इन उपन्यासों के ढाँचे पर टिप्पणी करते हुए रामदरश मिश्र कहते हैं-”सनसनी पैदा करने वाली, कौतूहलवर्द्धन करने वाली या किसी विशेष सुधारवादी अंत तक पाठक को पहुंचाने वाली घटनाओं को लेखक अपने ढंग से सजाता चलता है। स्पष्ट है कि इस प्रकार के घटना-नियोजन में कथानक का स्वाभाविक प्रवाह तथा पात्रों का सहज विकास सुरक्षित नहीं रह पाता। घटनाओं की संभाव्यता-असंभाव्यता पर भी लेखक का बहुत कम ध्यान रहता है।”  संयोग बहुलता, चौंकाने वाले प्रसंग, नाटकीयता आदि से भरपूर किशोरी लाल गोस्वामी, गोपाल राम गहमरी, बालकृष्ण, लज्जाराम शर्मा आदि के उपन्यास संरचना की दृष्टि से शिथिल और कमज़ोर हैं।  

प्रेमचंद पूर्व उपन्यासों में कथा शिल्प की भँाति चरित्र-चित्रण शिल्प भी अनगढ़ एवं प्रयोगात्मक अवस्था में था। इसका मुख्य कारण था कि कथाएं सोद्देश्य लिखी गई और इसी कारण पात्र भी उनके अनुकूल गढ़े गए। परिणामस्वरूप पात्रों का न तो समुचित विकास हो सका है और न उनका व्यक्तित्त्व ही उभरकर सामने आ सका है।  लेखक द्वारा ही पात्रों का परिचय मिलता है। कथोपकथन, अन्य पात्रों द्वारा टीका टिप्पणी, लेखक की प्रतिक्रियाएँ तथा कथाओं के शीर्षकों द्वारा भी पात्रों का परिचय मिल जाता है। उपन्यासों में असत्य पर सत्य की विजय दिखाने के लिए दो प्रकार के पात्र निर्मित किए गए हैं। एक ओर दुर्जन पात्र, दूसरी ओर सज्जन। दुर्जन संघर्ष में पराजित होते हैं और सज्जन अन्त में सुखी होते हैं।  

इन उपन्यासों के अधिकांश पात्र स्थिर हैं। लेखक के निर्देशन में ही वे गतिशील हैं। बहुत कम पात्र ऐसे हैं जो जीवन के यथार्थ से लिए गए हैं, जो जीवन संघर्ष से जूझते हुए अपना जीवन जीते हैं। ऐसे पात्रों में ’भाग्यवती’ उपन्यास की नायिका भाग्यवती यथार्थ के ठोस धरातल पर खड़ी है। उसके जीवन का संघर्ष, उतार-चढ़ाव और व्यथा आधुनिक नारी जीवन का प्रतीक है। भाग्यवती पहली नायिका है जो आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर है। ’अरण्यबाला’ की ब्रजमंजरी तथा ’दर्शनी हुण्डी’ की मंजरी भी सशक्त नारियाँ हैं। इस युग के सभी पात्र परम्परागत आदर्शों से युक्त हैं। इस कारण परस्पर साम्य रखते हैं।  

प्रेमचन्द पूर्ववर्ती उपन्यासों में संवाद या कथोपकथन का भी अभाव मिलता है। जो कथोपकथन मिलते हैं उनमेें भावाभिव्यक्ति का सामर्थ्य कम है, उनमें संक्षिप्तता एवं व्यंग्य का भी अभाव है। लम्बे-लम्बे भाषण जैसे प्रतीत होने वाले संवाद उपन्यास शिल्प की एक दुर्बल कड़ी है। ऐसे उपन्यास कम ही हैं जिनमें कथोपकथनों का समावेश सफलतापूर्वक किया गया है। वे संक्षिप्त एवं भावाभिव्यक्ति में भी पूर्ण हैं। ये संवाद पात्रों के चरित्र-चित्रण स्पष्ट करने तथा कथावस्तु का विकास करने में भी समर्थ हैं। ’भाग्यवती’ एवं ’परीक्षागुरु’ ऐसे ही उपन्यास हैं किन्तु ऐसे उपन्यास संख्या में कम ही हैं। 

प्रेमचन्द पूर्ववर्ती उपन्यासों में हिन्दी गद्य का प्रयोगात्मक रूप मिलता है। हिन्दी गद्य की प्रारम्भिक अवस्था होने के कारण भाषा का कोई स्थिर रूप नहीं था। संस्कृत बहुल तथा बोलचाल की भाषा के साथ ही इन रचनाओं में हिन्दी-उर्दू मिश्रित खिचड़ी भाषा का भी खुलकर प्रयोग हुआ है। “प्रारम्भिक उपन्यासों में भाषा के तीन रूप मिलते हैं। भाषा का एक रूप पूर्ण संस्कृतनिष्ठहै। श्रीनिवासदास, अयोध्यासिंह उपाध्याय तथा भट्ट जी के उपन्यासों में संस्कृतनिष्ठभाषा का प्रयोग हुआ है। संस्कृतनिष्ठभाषा के भी दो रूप हैं। एक रूप वह है जिसमें हिन्दी के सरल शब्दों का प्रयोग हुआ है।  भाषा का यह व्यावहारिक रूप है। तिलस्मी, जासूसी तथा ऐय्यारी उपन्यासों में भाषा का यह व्यावहारिक रूप मिलता है। भाषा का दूसरा रूप वह है जिसमें संस्कृत शब्दों का सप्रयास प्रयोग किया गया है। भाषा का तीसरा रूप वह है जिसमें उर्दू का अधिक समावेश है। हिन्दी के प्रारम्भिक उपन्यासों में सामान्य जनता की रूचि को देखते हुए भाषा का प्रयोग किया गया है। किशोरी लाल गोस्वामी के उपन्यासों में भाषा के सभी रूप मिल जाते हैं।  “गोस्वामी किशोरी लाल बंगला, संस्कृत, अंग्रेजी, फारसी उर्दू और हिन्दी आदि सब भाषाओं के अपूर्व ज्ञाता थे। सम्पूर्ण साहित्य का उन्होंने मंथन किया था और अपनी लेखनी से उसे स्थान-2 पर अंकित किया है।”   साधारण बोलचाल की भाषा को अपनाने के बारे में ’परीक्षागुरु’ की भूमिका में लेखक कहते हैं-”इस पुस्तक में दिल्ली के एक कल्पित रईस का चित्र उतारा गया है और उसको जैसे का तैसा दिखाने के लिए संस्कृत अथवा फारसी, अरबी के कठिन शब्दों की बनाई भाषा के बदले दिल्ली के रहने वालों की साधारण बोलचाल पर ज्यादा दृष्टि रखी गयी है।   जनसाधारण की बोलचाल की भाषा का प्रयोग ’भाग्यवती’ में भी किया गया है।  

इस प्रकार कहा जा सकता है कि प्रेमचन्द-पूर्व उपन्यासों में भाषा का सरल, सुबोध रूप मिलता है जो हिन्दी-उर्दू के सम्मिश्रण और प्रचलित भाषा के प्रयोग के कारण जनसामान्य के लिए दुर्बोध नहीं था। शैली की दृष्टि से “प्रारम्भिक उपन्यासों में प्रमुख रूप में किस्सागोई-शैली का प्रयोग किया गया है। दूसरी प्रमुख शैली विवरणात्मक है जिसमें लेखक वातावरण का निर्माण कर कथा कहता है। तीसरी शैली आत्मकथात्मक है।”  

इन उपन्यासों में जहाँ तक वातावरण सृजन का प्रश्न है वह भी पर्याप्त उपेक्षित और अविकसित रहा है। वातावरण सृजन के नाम पर प्राकृतिक सौन्दर्य के वर्णनों की भरमार है। इस प्रकार का वातावरण अधिकतर सजावटी है जिससे कथा के विकास और पात्रों के चरित्र-चित्रण में कोई सहायता नहीं मिलती। इस सजावटी वातावरण चित्रण के अंतर्गत लेखक ने रमणीक उद्यानों, सूर्योदय एवं सूर्यास्त के प्राकृतिक सौन्दर्य का वर्णन किया है। वातावरण सृजन के माध्यम से किसी घटना विशेष की भयंकरता, गंभीरता अथवा रहस्यात्मकता दिखाने का प्रयास भी किया है। ’चन्द्रकान्ता सन्तति’ में पाठकों में कौतूहल जगाने के लिए रहस्यात्मक घटनाओं के वर्णन द्वारा रहस्यात्मक वातावरण का सृजन किया गया है। रहस्यपूर्ण सुरंगों, कमरों और मूर्तियों के वर्णन द्वारा भी रहस्यात्मकता के सृजन के अनेक प्रयास किए गए हैं।  

इस प्रकार कहा जा सकता है कि ”प्रेमचन्द के पूर्ववर्ती उपन्यासों में एक निश्चित दृष्टिकोण के अभाव के कारण शिल्प की कोई सुनिश्चित रूपरेखा सामने नहीं आ पाई।”   वस्तुतः “प्रारम्भिक उपन्यास हिन्दी उपन्यास साहित्य के विकासक्रम की पहली कड़ी है। युगीन परिस्थितियों के संदर्भ में तथा रचनात्मक उद्देश्य की पृष्ठभूमि में यदि इन उपन्यासों का मूल्यांकन किया जाए तो इनका अपना महत्त्व स्पष्ट दिखाई देता है।” 


सन्दर्भ-ग्रन्थ सूची 
उपन्यास

1 ठेठ हिन्दी का ठाठ - अयोध्या सिंह उपाध्याय ’हरिऔध’
2 परीक्षागुरु - श्री विद्यानिवास मिश्र
3 भाग्यवती - पं0 श्रद्धाराम फिल्लौरी 
’बृहत् हिन्दी कोश’ - सं0 कालिका प्रसाद - ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी षष्ठम सं0 जनवरी 1989. 
1) आधुनिक हिन्दी उपन्यास: उद्भव और विकास - डॉ॰ बेचन
सन्मार्ग प्रकाशन, दिल्ली 7, प्रथम संस्करण 1971.
2) किशोरी लाल गोस्वामी के उपन्यासों का वस्तुगत और रूपगत विवेचन-कृष्णा नाग। प्रकाशक - लक्ष्मीनारायण अग्रवाल, अस्पताल मार्ग, आगरा। 1966
3) प्रेमचन्द-पूर्व के हिन्दी उपन्यास - ज्ञानचंद जैन ।
आर्य प्रकाशन मण्डल, गांधी नगर, दिल्ली-31, प्रथम संस्करण 1998
4) बृहत् साहित्यिक निबन्ध - डॉ॰ यश गुलाटी । 
सूर्य भारती प्रकाशन, नई सड़क-दिल्ली 6, संस्करण - 2007
5) हिन्दी उपन्यास उद्भव और विकास-डॉ॰ सुरेश सिन्हा
अशोक प्रकाशन, नई सड़क-दिल्ली 6, प्रथम संस्करण 1965
6) हिन्दी उपन्यास एक अन्तर्यात्रा - डॉ॰ राम दरश मिश्र 
राजकमल प्रकाशन दिल्ली, प्रथम संस्करण 1968
7) हिन्दी उपन्यास का प्रारम्भिक विकास - डॉ॰ कु0 शैलबाला 
सत्य सदन, सरावगी, बाराबंकी, प्रथम संस्करण 1973
8) हिन्दी उपन्यास के सौ वर्ष - सं॰ डॉ॰ रामदरश मिश्र 
गिरनार प्रकाशन, पिलाजी गंज महेसाना (उ0 गुजरात) प्रथम संस्करण 1984
9) हिन्दी उपन्यास की शिल्पविधि का विकास - डॉ॰ ओम शुक्ल 
अनुसंधान प्रकाशन, आचार्यनगर, कानपुर , जुलाई 1964
10) हिन्दी उपन्यास परम्परा और प्रयोग - डॉ॰ सुभद्रा  
अलंकार प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण 1974
11) हिन्दी उपन्यास शिल्प और प्रयोग - डॉ॰ त्रिभुवन सिंह 
हिन्दी प्रचारक संस्थान, वाराणसी। प्रथम संस्करण फरवरी 1973
12) हिन्दी साहित्य का इतिहास - आ0 रामचंद्र शुक्ल
13) हिन्दी साहित्य का इतिहास - सम्पादक - डॉ॰ नगेन्द्र।

डॉ॰ राजेश कुमारी कौशिक
एम.ए.,एम.फिल (हिन्दी) दिल्ली विश्वविद्यालय। 
पी-एच.डी. (हिन्दी) दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली। 
पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र। 
प्रकाशित कृति: स्मार्त्त धर्म,  तुलसी का काव्य और संत कवि दादू: सामाजिक चेतना, दर्शन एवं नीति । 
कार्यानुभव: दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली के कई महाविद्यालयों में अध्यापन का अनुभव।
संप्रति: मोतीलाल नेहरू महाविद्यालय (सांध्य) हिन्दी विभाग में वरिष्ठ प्राध्यापिका के पद पर कार्यरत। 
अनेक पत्र-पत्रिकाओं में एकाधिक लेख एवं कविताएँ प्रकाशित हो चुकी हैं।
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