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आलेख:वर्तमान के आईने में बुन्देली लोक कला/ डॉ.अरुण कुमारी सिंह

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, अगस्त 03, 2014 | रविवार, अगस्त 03, 2014

            साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका           
'अपनी माटी'
          वर्ष-2 ,अंक-15 ,जुलाई-सितम्बर,2014                       
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चित्रांकन:उत्तमराव क्षीरसागर,बालाघाट 
किसी भी देश की संस्कृति वहाँ रहने वाले व्यक्तियों के धर्म, दर्शन, साहित्य, कला एवं सामाजिक विचारों के आधार पर जन्म लेती व विकसित होती है। भारत की संस्कृति ऐसे ही तत्वों का संगम है यही कारण है कि यहाँ की संस्कृति की धारा प्राचीन काल से आज तक प्रवाहित हो रही है। यहाँ का आध्यात्मवाद शरीर, मन और आत्मा की अतीत लोक कलाओं के माध्यम से आज भी परिदृश्य होती है यही कारण है कि इतने उतार-चढ़ाव के बाद भी लोक कलाएं आज भी अपने स्वरूप को सहेजे हुए हैं, ऐसी ही एक संस्कृति बुन्देली है जिसे मध्यप्रदेश अपने हृदय स्थल में समेटे हुए है। उत्तर में यमुना, दक्षिण में विन्ध्य प्लेटों की श्रेणियाँ, उत्तर पश्चिम में चम्बल, दक्षिण पूर्व में पन्ना और आजमगढ़ के बीच के क्षेत्रों को बुन्देलखण्ड कहा है।

बुन्देली शब्द स्वतः पांच सौ से एक हजार वर्षों के बीच अपनी प्रकृति का निर्माण कर पाया है जबकि इसको वहन करने वाले समाज और संस्कृति का इतिहास सभ्यता के उदयकाल से जुड़ा है। मूलतः भारतीय समाज की जीवन शैली लगभग एक जैसी है किन्तु इसके आंचलित और लोकत्व की झलक इसे नवीन विशिष्टता प्रदान करते हैं। कला एवं संस्कृति में अन्योन्यालिन संबंध होता है यह उपयोगितावादी एवं आलंकारिक दोनों ही है परन्तु दोनों रूपों में कलात्मक है। लोक कला मात्र कला के लिये है, जिसमें सौन्दर्य और सजावट के साथ सामाजिक पक्ष भी निहित है। इसमें संकेतवाद एवं यथार्थ, दोनों के ही तत्व मिलते हैं। भौगोलिक आधार पर लोक कला का निर्माण होता है तथा भौगोलिक तथ्यों ने लोक कला का सीमांकन भी किया है। परन्तु बुन्देल खण्ड की लोक कला धार्मिक एवं जीव सत्तात्मक है, जिसमें जो लोक की श्रद्धा एवं विश्वास की प्रकृति से जुड़ी है इसीलिये बुन्देली लोक कला में सूरज-चांद, पशु-पक्षी, पहाड़, पर्वत, नदियां, काम करते लोग, महिलायें, खेलते बच्चे एक साथ देखे जा सकते हैं। परन्तु आधुनिक संदर्भ में लोक संस्कृति और लोक कलायें अपने मूल स्वरूप से धुधलके में गोता खाती प्रतीत होती है। पश्चिमीकरण से प्रभावित लोगों ने इन लोक कलाओं को गंवारपन मान कर उन्हें स्वीकार नहीं कर रहे, परन्तु आधुनिक विचारधारा में इन कलाओं के स्वरूप को नवीनता प्रदान की जा रही है तथा इन लोककलाओं को नगरीय क्षेत्रों में आधुनिक स्वरूप में परिवर्तन के साथ स्वीकारा जा रहा है।

परम्परागत लोक कलाओं में प्रकृति के जीवन्त चित्रण के बुन्देली लोक कलाओं का आधार स्तम्भ माना जाता है। सरल सुबोध तथा अपनत्व से परिपूर्ण बुन्देली अपनी लोक कलाओं में समाज का यथार्थ चित्रण कर उस पृष्ठभूमि को जीवन्त करता है जिसको देखकर आँखों के सामने वह दृश्य चित्रित हो जाता है। यही स्थिति हमें लोक कलाओं के साथ लोक कथाओं, लोक काव्य तथा लोकगीतों में भी दिखाई देता है। आल्हा खण्ड, महोबा खण्ड, रामायण कथा, महाभारत कथा इसके उदाहरण हैं।

बुन्देली आल्हा खण्ड में ‘‘भरी दोपहरी सवरन गइये सोरठ गइये आधी रात’’, इसुरी के काव्य में प्रेम सौन्दर्य के अथाह सागर में डूबी कविता अनुभूति दुःख तथा इन्द्रियता को झकझोरती है, गंगाधर व्यास की खड़ी फागें बुन्देली लोक कला का गीतों के माध्यम से चित्रण है जो तात्कालिक परिस्थितियों से जोड़कर फाग का निर्माण करते हैं तो महेश कुमार मिश्रा, मधुवर, अवधेश, मड़वैसया की रचनाओं में नारी सौन्दर्य का चित्रण परिलक्षित होता है। गीतों के साथ नृत्य लोक संस्कृति की सौन्दर्यता को मूल जीवन की ओर से ले जाता है जिसकी ताल और लय में व्यक्ति अपने अस्तित्व को भी भूल जाये। ऐसी बुन्देली लोक कला अपने आप में महत्वपूर्ण, सौन्दर्य परक तथा यथार्थ के धरातल पर खड़ी रहती है परन्तु वास्तव में बुन्देली लोक कला के पक्ष को तीन रूपों में देखा जा सकता है - भित्ति अलंकरण, भूमि अलंकरण और शरीर अलंकरण।

भित्ती अलंकरण शिल्प कला एवं त्यौहार व उत्सवों पर दीवारों को सजाने की व्यवस्था है जिसमें श्रद्धा, विश्वास, पवित्रता के साथ ऋषियों की आश्रम संस्कृति रामायण काल में फूली-फली, वन संस्कृति महाभारत काल में गढ़ी गयी। लोक कलाओं का जितना विकास और उत्कर्ष इस काल में हुआ उतना आठ सौ वर्षों में कभी नहीं हुआ। रामायण काल में राजा राम के जन्म से लेकर रावण के साथ युद्ध के चित्र की आकर्षित श्रृंखला पायी जाती है जो गेरू और सिलेटी रंग से राम लक्ष्मण, गहरे घुंघराले बालों के साथ रावण तथा रावण से युद्ध करते विष्णु के अवतारों में सुन्दर व चटक रंग का प्रयोग कर रोचक कला का प्रदर्शन है। बुन्देली लोक कलाओं की धारा इन समस्त परिवर्तनों में निरंतर बहती रहती है। बुन्देली खण्ड के बीते वैभव की झलक हमें पाषाण कला से प्राप्त होती है। प्रागैतिहासिक बुन्देली लोक कला, बुन्देल खण्ड में रहने वाले आदिवासी समुदाय से जुड़ी है वैसे तो प्रागैतिहासिक काल से पूर्ण बुन्देल खण्डी आदिम लोक कला और संस्कृति को दर्शाने वाले वह शिला गृह भी है जिनका पता बीसवीं शताब्दी के छठे दशक में लगा। सागर पन्ना, होशंगाबाद, छत्तरपुर तथा रायसेन के भित्ती चित्र इस समय की लोक कलाओं के उदाहरण हें। जिसमें पशु, पक्षी पारस्परिक युद्ध, नृत्य, पूजन तथा घरेलू जीवन को चित्रित किया गया है। जीवन निर्वाह के साधन शिकार होने के कारण शिकार होते जानवर तथा शिकार करते समय के दृश्य चित्रित किये जाते थे। सागर जिले के बरौदा गांव के समीप के गुफा चित्र शिकारकर्त्ता योद्धा को ऊँची टोपी तथा लम्बा कोट पहने व्यक्ति दिखाया गया है। इसी काल में आदिवासियों द्वारा पूजी जाने वाली मूर्तियां लोक कला के रूप में महत्वपूर्ण नहीं है परन्तु मूर्तिकला के आदि रूप का ज्ञान देती है इस पर पक्के रंग की चित्रकारी आकर्षण पैदा करती है। 

मानव व घोड़ों के भद्दे चित्र, शिला भित्तियों पर देवरा के निकट गैरिक रंग से बने चित्र, मानव प्रकृति की आदिम अनुभूति के साक्षी हैं। इन चित्रों में पशुओं का भी प्रदर्शन किया जाता है। तीसरी से 13वीं शताब्दी तक इस क्षेत्र में स्थापत्य कला का सृजन हुआ, जो कलि तथा खजुराहों की कृतियों के रूप में आज भी जीवन्त है। यह बीस मन्दिरों के समूह में बाहर और भीतर दोनों तरफ की दीवारों को देवताओं, अप्सराओं, विद्याधरों, युगल मिथन, गज की सुंदर कलाकृतियों को इस तरह गढ़ा गया कि जड़ में चेतन अपने सम्पूर्ण वैभव के साथ जाग उठा है। मूर्तियों में लोग कला का सजीव रूप दिखाई देता है। दतिया और ओरछा, पन्ना एवं छतरपुर के मिट्टी के बर्तन, लकड़ी एवं पत्थर का कार्य, दरी, कालीन, कम्बल, चटाईयां, टोकरियां, चुलिया, पिटारा का कार्य भी वहां की लोक कला का व्यवहारिक एवं व्यवसायिक पहलू है।

त्यौहारों तथा संस्कारों में लोक कलाओं के माध्यम से मन की भावनाओं और पवित्रता का प्रदर्शन भी बुन्देली लोक कला मंे भित्ती अलंकार के रूप में देखा जाता रहा है, जो जीवन मूल्यों को पीढ़ी दर पीढ़ी संशोधित रूप में हस्तांतरित कर रहे हैं। स्त्री के रूप में कुशल धारिणी स्त्री को लोक कलाओं में विशेष्ज्ञ महत्व है, विवाह के समक्ष दो हथेलियों की युगल छाप भित्ती अलंकरण के साथ पारस्परिक एकता सहयोग तथा पंचतत्वों के प्रतीक के रूप में आज भी पाये जाते हैं। कुन, घुसू, पूनों को दीवार पर गोबर एवं मिट्टी से चार पुतरिया हल्दी से बनायी जाती है जिनकी पूजा होती है। ‘नाग पंचमी‘ को घर के मुख्य द्वार पर गोबर से पांच नागों की आकृतियां बनाकर पूजा की जाती है। ‘हरछठ’ पर पुत्र की दीर्घायु के लिये भित्ती पर लोक कलाओं के प्रतीक बनाये जाते हैं। ‘अघोई आठे’ को भित्ती पर आठ पात्र तथा आठ मानव आकृतियों का निर्माण किया जाता है। वर्तमान समय में दीवालों की सजावट के लिये जिन कलात्मक डिजाइनों का उपयोग किया जाता है वह लोक कलाओं में भित्ती अलंकरण का ही स्वरूप है। नृत्य करती स्त्रियां, बेल फूल पत्ते, चित्र, प्रकृति घरों की दीवारों पिल्लरों तथा होटलों की सजावट के लिये प्लास्टर ऑफ परिस से बनाये जाते हैं, महलों की भव्यता देने के लिये पत्थर के शेरों तथा मानव आकृतियां मुख्य द्वार के आस-पास रखी जाती हैं। बाह्य पिल्लरों (स्तम्भ) की सजावट उसी बुन्देली लोक कलाओं का आधुनिक रूप है जिसका उपयोग सौंदर्य की दृष्टि से किया जाता है।

भूमि अलंकरण -लोक कलायें सामाजिक जीवन को सुसंस्कृत तथा सम्पन्नता प्रदान करती हैं। भित्तियों के अलंकरण के साथ भूमि अलंकरण लोक का महत्वपूर्ण आधार है। लोक की संस्कृति ग्रामीण व आदिवासी संस्कृति का रूप है। अतः कच्ची जमीन को सुंदर ढंग से रखना भूमि अलंकरण है। सामान्यतः त्यौहारों के समय जमीन को गोबर और मिट्टी से पोता जाता है तथा किनारों पर सफेद छुई मिट्टी से ‘ढिग’ बनायी जाती है, परन्तु विशेष धार्मिक अवसरों पर भूमि अलंकरण संस्कृति, पवित्रता, विश्वास और श्रृद्धा से जुड़ा माना जाता है। बुन्देली लोक संस्कृति में इसकी विशेष महत्वता थी। ‘कार्तिक शुक्ल पक्ष’ की परमा को गोवर्धन पूजा के समय गोवर्धन पर्वत जिसमें गोबर से प्रतिमा, गाय ग्वाला, खेत तथा ग्वालिन का चित्रण बुन्देली संस्कृति की कलाकृति को प्रदर्शित करते हैं। तथा चारों ओर मिट्टी के पात्रों में पकवान भर कर प्रक्रिया की जाती है। भूमि अलंकरण में स्वास्तिक यक्राकार सातिया, स्वास्तिक कलश, कमल, शंख, दीपक, सूर्य, चन्द्र, चांवल के आटे या गेरू से बनाये जाते हैं और उन पर जौ के दानों से सजावट की जाती है। गृह प्रवेश में नवग्रह की शान्ति के लिये पूजा स्थल की सजावट आज भी लोक कला का दृष्टव्य है ‘‘विष्णु जी व लक्ष्मी जी के पैर, महालक्ष्मी का हाथी’’।

भूमि अलंकरण की परम्परागत शैली में रांगोली अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती है। त्यौहार, उत्सव तथा संस्कारों के समय द्वार की देहरी, आंगन के केन्द्र में निश्चित स्थान पर पारम्परिक रंग में पिसा हुआ गीला चावल, सिन्दूर, रोली, हल्दी, सूखा आटा तथा प्राकृतिक रंगों से सुन्दर आकृतियां बनायी जाती थी। कभी-कभी इसके लिये फूल एवं लकड़ी के कुरादे का भी प्रयोग किया जाता है।

लोक कला का यह भूमि अलंकरण वर्तमान समय में भी परिवर्तित स्वरूप के साथ प्रचलित है आज परम्परागत रंगों का स्थान कृत्रिम तथा रेत को रंग कर आंगन दरवाजों में सजावट की जाती है, तथा पूजा स्थलों में सुन्दरता व पवित्रता के लिये आज भी आटे या हल्दी से रंगोली या स्वास्तिक बनाये जाते हैं स्वास्तिक के लिये रंगीन चांवल के आटे का प्रयोग आज भी किया जाता है।लोक कलाओं के यह प्रतीक केवल रेखांकन एवं चित्रांकन ही नहीं बल्कि कलाओं के माध्यम से हमारे संस्कारों, जीवन मूल्यों का स्वतः ही पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तान्तरण होता है परन्तु समय व परिस्थितियों के अनुसार इसके स्वरूप में परिवर्तन होता रहा है।भित्ती अलंकरण एवं भूमि अलंकरण का मिला जुला रूप ‘सुआटा’ के रूप में बुन्देली लोक संस्कृति में पाया जाता है। ‘सुआटा पूजा’ चिकनी मिट्टी से दीवार पर बनाया जाता है तथा कोड़ियों से सजाया जाता है। भित्ती के पास एक सीढ़ीनुमा चबूतरा बनाकर ‘गौरैया पूजा’ की जाती थी यह पूजा कन्याओं की रक्षा का प्रती थी।

वेश-भूषा अलंकरण -खुद को सजाना मानव की प्रकृति है तथा लोक की संस्कृति भी है। बुन्देली लोक संस्कृति में आदिवासी संस्कृति का समावेश देखने को मिलता है। आदिवासी तथा निम्नवर्ग की महिलायें गहनों के अभाव में अपने सौंदर्य वृद्धि के लिये शरीर पर गुदने गुदवाती थी जिसमें पति का नाम, स्वयं का नाम, इष्टदेव का नाम, फूल पत्तियां टोटम आदि अनेक आकृतियों बनायी जाती थी। वर्तमान में गुदने को टेटू तथा कलाओं को पूरे शरीर पर पेंटिंग करना गुदना का ही परिवर्तित रूप माना जा सकता है।

वेश-भूषा में स्त्रियों के अगिया चोली फतुली जैसे वस्त्र उर्द्धभाग में धारण करती है। आधुनिक समय में लाचा लहंगा चुनरी इसी का नया रूप है। परम्परागत बुंदेली आभूषण आज के समय में फैशन का प्रतीक हो रहा है जैसे पैरों में पहने तोड़ल, लच्छे अब किशोर वय लड़कियों के लिये एक पैर में पहनना आधुनिक कहा जाता है। गले में पहनी जाने वाली मोहर आज आधुनिक रूप में महिलाओं की पसंद बन रही है।

लोक कलाओं में जनजीवन की सृजनता सुरक्षित है जितना प्राचीन इतिहास लोक का है इतना ही लोक कलाओं का। आधुनिकता के कारण लोक कुछ कलाओं को भूल रहे हैं। जैसे रामलाल की रामायण, बरसाने की लड्डू होली, फाग की महफिले, सैरा, डोम, हरा जवारा कीर्तन, चाचरा नृत्य, राई पंडा नृत्य, ढुलढुल घोड़ी नृत्य। विलुप्त होती इन कलाओं तथा वाद्ययंत्रों को संग्राहल में सुरक्षित किये जा रहे हैं तथा बुन्देली उत्सव, बुन्देली लोक मंच, कार्तिक मेला (कार्तिक लोकोत्सव) के द्वारा उस विलुप्त होती कला को सुरक्षित करने का प्रयास किया जा रहा है। बुन्देली लोक शौर्य आल्हा का संरक्षण के साथ विश्व धरोहर बनाने के लिये भी पहली की जा रही है।

डॉ. (कु.) अरूण कुमारी सिंह
प्राध्यापक, समाजशास्त्र,
शा.ओ.एफ.के. महाविद्यालय, जबलपुर (म.प्र.)
2130, राईट टाउन, जबलपुर (म.प्र.)- 482002,
मोब- 9425384286
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