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चार ग़ज़लें:डॉ. मोहसिन ख़ान

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, अक्तूबर 05, 2014 | रविवार, अक्तूबर 05, 2014

त्रैमासिक ई-पत्रिका 'अपनी माटी(ISSN 2322-0724 Apni Maati)वर्ष-2, अंक-16, अक्टूबर-दिसंबर, 2014
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ठहरा हुआ पानी था अब बहने लगा हूँ।
मैं जबसे तुम्हारे साथ चलने लगा हूँ।

छोड़कर सारी ज़िद मानली तुम्हारी बात,
मैं अब धीरे धीरे तुममें ढलने लगा हूँ।

मेरी परेशानी कोई अपनी तो है ही नहीं,
मैं दुनिया के हादसों पे ग़ौर करने लगा हूँ।

सोहबत का रंग तो चढ़ेगा ही ज़हन पे,
मैं साथ जो अब तुम्हारे रहने लगा हूँ।

ज़िन्दा हूँ पर क्यों मर गया मेरा ज़मीर,
मैं हर हालात को शायद सहने लगा हूँ।

रास्तों को पता है कौन मंज़िल पाएगा,
मैं क़दम क़दम पे अब संभलने लगा हूँ।

अपना वजूद खो रहा हूँ तुम्हारे ख़ातिर,
मैं शमा सा जलकर पिघलने लगा हूँ।

रहकर सबके साथ भी हो गया 'तन्हा'
मैं जबसे सच को सच कहने लगा हूँ।


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 ग़ज़ल- 2

आजकल दुनिया का कैसा कारोबार है।
आदमी से ज़्यादा काग़ज़ों पे ऐतबार है।

इस दौर ने गिराई हैं क़ीमतें इंसान की,
महँगे तो बस मोबाइल और कार है।

उम्मीद न थी दोस्ती में दग़ाबाज़ी की,
वो कम्पनी का ही ज़्यादा वफ़ादार है।

दफ़्तरों में ख़ुद को ज़िन्दा कर रहा हूँ,
एक काग़ज़ पे ही सारा दारोमदार है।

मेरा वजूद मैं नहीं कोई दूसरा हो गया,
अब उसके हाथों में मेरा क़िरदार है।

सारी दुनिया उस तरफ़ मैं इधर 'तन्हा',
बीच में खिची हुई काँच की दीवार है।

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 ग़ज़ल- 3

मैं शहर -दर- शहर भटकता रहा।
जैसे कोई पत्ता हवा से उड़ता रहा।

मुझको सफ़र तय करना है बहोत,
पाँव रुके भी तो ज़हन चलता रहा।

रोज़ ही सुबह शहर के चौराहे पर,
दो रोटी के लिए ख़ुद बिकता रहा।

खरोंच और ज़ख्म मिट गए बदन से,
बस फटे हुए कपड़े ही सिलता रहा।

जाने क्यों दूर होता गया तू मुझसे,
मैं जब भी तुझसे गले मिलता रहा।

'तन्हा' शिकस्त ही हौसला बन गई,
बुराई को अच्छाई से जीतता रहा।    
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 ग़ज़ल- 4

ऐ ख़ुदा तेरी दुनिया में इतनी मुसीबत क्यों है।
कहीं दौलत तो कहीं इतनी ग़ुरबत क्यों है।

हो गई रंजिशें तेरी इबादतगाहों की तामीर पे,
तेरे ही बन्दों में तेरी इतनी मुख़ालफ़त क्यों है।

हो जाए क़त्ल रोज़ ही सच का सरेआम यहाँ,
झूटऔर फ़रेब की फ़िर इतनी क़ीमत क्यों है।

तूने ही कहा है हर ज़र्रे में मिलूँगा ढूँढ ले मुझे,
फ़िर तुझे पाने के लिए इतनी इबादत क्यों है।

'तन्हा' आया हूँ तन्हा ही लौट जाना है यहाँ से,
आज दिल में जाग रही इतनी हसरत क्यों है।  


मोहसिन 'तन्हा'          
स्नातकोत्तर हिन्दी विभागाध्यक्ष 
एवं शोध निर्देशक 
जे. एस. एम्. महाविद्यालय,
अलीबाग- 402201 
ज़िला - रायगढ़ (महाराष्ट्र)

ई-मेल khanhind01@gmail.com

मो-09860657970

                     
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