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शोध:साठोत्तरी महिला कथाकारों की कहानियो में स्त्री-विमर्ष/डॉ.अंजु

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, अक्तूबर 05, 2014 | रविवार, अक्तूबर 05, 2014

त्रैमासिक ई-पत्रिका 'अपनी माटी(ISSN 2322-0724 Apni Maati)वर्ष-2, अंक-16, अक्टूबर-दिसंबर, 2014
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छायाकार:ज़ैनुल आबेदीन
हिन्दी कहानी की यात्रा में स्त्री-विमर्ष अलग-अलग दौर की महिला कथाकारों द्वारा अलग-अलग दृष्टियों से देखा, जाँचा-परखा गया और फिर दधि से धृत के समान निकला-स्त्री का वास्तविक स्वरूप। स्त्री विमर्ष के अन्तर्गत स्त्री के पौराणिक दैवीय रूप को नकारकर उसे सहज मानवीय रूप में प्रतिष्ठित करने की मांग पुरूष सत्तात्मक समाज के तथाकथित दोगले बुद्धिजीवी वर्ग के समक्ष पुरजोर ढंग से की गई ताकि कुछ तो वो अपने परम्परागत, रूढ़िवादी, संकीर्ण सोच के दबे-छिपे जंग लगे आवरण से बाहर निकलकर उसके सहज मानवी स्वरूप को स्वीकार कर सके। सदियों से सामाजिक मर्यादा के नाम पर बने कठोर नियमों, धार्मिक छद्म के तले पिसती और सर्वाधिक कमजोर आर्थिक स्थिति की पीड़ा को झेलती स्त्री समाज में मात्र देवी स्वरूपा बनी पिसती रही, पर कभी इन बेड़ियों को तोड़ने को उद्यत न हुई। क्योंकि समाज के विद्वतजनों ने मौन को विद्वानों का आभूषण बता उसे मूक और निहत्था कर दिया। उसे अलंकृत किया इन शब्दों से-

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यते सर्वास्तस्याफलाः क्रियाः।।1

ऐसे मिथ्या प्रशस्ति गान के माध्यम से स्त्री पर पुरूष वर्ग ने अपना सहज आधिपत्य जमा लिया। इसके लिए आड़ ली धर्मशास्त्रों की-

बालया वा युवत्या वा वृद्धया वापि योषित। 
न स्वातंत्र्येण कर्तव्यं किञ्चितकार्यम् गृहेष्वापि।। 
बाल्ये पितुर्वषे तिष्ठतेः पाणिग्राहस्ये यौवने।
पुत्राणाम् भर्तरि प्रेते न भजेत्स्त्री स्वतंत्रताम्।।2

स्त्री अपने पूरे जीवन-काल में पिता, पति और पुत्र इन तीन ‘प‘ के बन्धनो में ही जकड़े रहने को बाध्य रही। प्राचीन काल से प्रारम्भ हुई स्त्री-षोषण की इस यात्रा में मध्यकाल तक आते-आते तुलसीदास जी की इन पंक्तियों ने कोढ़ में खाज का काम किया। 

ढोल, गंँवार, सूद्र, पसु, नारी। 
सकल ताड़न के अधिकारी।।3

तुलसीदास जी द्वारा प्रयुक्त ‘नारी‘ शब्द की व्याख्याकारों द्वारा मनमानी व्याख्या करने से स्त्री पर लगे बन्धनों को मजबूत करने के लिए पुरूष-वर्ग को एक और अमोघ हथियार उपलब्ध हो गया। अपने ऊपर हो रहे अन्याय-अत्याचार के प्रतिकार के उदाहरण स्त्री में बहुत कम देखने को मिलते है। मध्यकाल में सामन्ती शोषण के विरूद्ध उठकर स्त्री के अधिकारों, अस्मिता और निर्णय लेने के विवेक की मषाल जलाकर राज्य सत्ता को खुली चुनौती देती चेतनासम्पन्न, भक्त कवयित्री मीराँ की निम्न पंक्तियां उल्लेखनीय है-
राणाजी ! थे क्याँने राखो म्हाँसू बैर।

थे तो राणाजी  म्हाँनै इसड़ा लागो, ज्यूँ बिरछन में कैर।
महल-अटारी हम सब त्याग्या, त्याग्यो थाँरो सहर।।4

आधुनिककाल में प्राचीन गौरवपूर्ण, भारतीय इतिहास और संस्कृति के उन्नायक, गायक कवि जयषंकर ने यूंँ व्याख्यायित किया-

नारी! तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास-रजत-पग तल में
पीयूष स्त्रोत-सी बहा करो, जीवन के सुन्दर समतल में।।5 

मानव जीवन में स्त्री की महत्ता को प्रतिपादित करने वाले जयशंकर प्रसाद ने स्त्री-स्वातंत्र्य की वकालत इन शब्दो में की है-

तुम भूल गए पुरूषत्व मोह में कुछ सत्ता है नारी की। 
समरसता है सम्बन्ध बनी, अधिकार और अधिकारी की।।6 

स्त्री पर समय-समय पर लगायी गयी इन आचार-संहिताओं का परिणाम यह हुआ कि उसका सहज मानवी रूप खोकर रह गया। वो समाज में उपस्थिति दर्ज करवाती रही तो मात्र देवी या दासी के रूप में ही। आधुनिककाल में शिक्षा नीतियों में परिवर्तन, समाजसुधारकों द्वारा किये गये सुधार कार्यो और स्वयं स्त्री के हौंसलों ने उड़ान भरी और सदियों से शोषित, दमित नारी की मानवी रूप में जीने की आशाएं पल्लवित हुई। स्त्री-समाज में पुरूष की प्रतिस्पर्धी बनकर नहीं बल्कि उसकी पूरक और सहचरी बनकर जीना चाहती है। मात्र जीना ही नहीं चाहती बल्कि सम्पूर्ण विश्व, राष्ट्र समाज, परिवार की प्रत्येक इकाई के सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक, आर्थिक, वैज्ञानिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक आदि सभी क्षेत्रों के सर्वांगीण विकास में अपनी सषक्त भूमिका का निर्वाह भी करना चाहती है। ‘‘किन्तु स्त्री-मुक्ति आंदोलन और स्त्रीवादी चेतना के फलस्वरूप नारी जीवन में एक नयी ऊर्जा दिखायी पड़ी, एक नया उन्मेष आया। इसका प्रभाव दुनिया भर की लेखिकाओं पर पड़ा।‘‘7

हिन्दी कहानी यात्रा के प्रारम्भिक दौर से ही महिला कथाकारों ने अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करवाई है, जिसकी सषक्त उदाहरण है-बंगमहिला (राजेन्द्रबाला घोष)। इनकी कहानी ‘दुलाईवाली‘ हिन्दी की प्रारम्भिक महत्वपूर्ण सषक्त कहानियो में गिनी जाती है। जब हम स्त्री-विमर्ष की जड़े तलाशने  निकलते है तो इस विशाल वटवृक्ष की जड़े हमें ‘दुलाईवाली‘ कहानी में ही मिलती है। ‘‘बंगमहिला ने दुलाई के माध्यम से स्त्री की दारूण कथा को कहा है जिसमे मुख्य स्वर स्त्री के अकेलेपन को मुखरित करना रहा है जिसमें समाज की स्त्रियांँ उसके अकेलेपन को लेकर चिन्ता तो करती है पर साथ नहीं देती।‘‘8

भारत के स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व से लेकर साठोत्तरी दौर की महिला कथाकारों के बीच कुछ खुली कुछ दबी एक ऐसी पीढ़ी भी आई जिसने स्त्री-जीवन के संघर्षों को तत्कालीन प्रसंगों की कहानियों के माध्यम से प्रकाश में लाने का प्रयास करते हुए आने वाली पीढ़ी का मार्ग प्रशस्त किया। स्त्री-विमर्ष से जुड़े मुद्दों को तत्कालीन परिस्थितियों के अनुरूप अपनी कहानियों के माध्यम से नींव रखकर साठोत्तरी महिला कथाकारों को भवन-निर्माण की पूरी सामग्री उपलब्ध करवाई। इस दौर की प्रमुख हस्ताक्षर है-बंगमहिला (राजेन्द्रबाला घोष), उषादेवी मित्रा, सुभद्राकुमारी चौहान, होमवती देवी, सुमित्राकुमारी सिन्हा, चन्द्रकिरण, सौनरेक्सा, षिवरानी देवी ‘प्रेमचन्द‘, रजनी पनिकर आदि। इनकी कहानियों का मुख्य आधार रहा स्त्री-जीवन। इनकी कहानियो में नारी-पात्र प्रगति की ओर बढ़ते दिखते है। ये नारी-पात्र शोषण के विरूद्ध आवाज उठाने वाले थे। सुभद्राकुमारी चौहान की ‘गौरी‘, ‘प्रोफेसर मित्रा‘ और ‘मंगला‘ की नायिकाएँं अपने अधिकारों के प्रति सचेत है और स्वेच्छा से पतिवरण विषयक अधिकार पर विचार किया गया है। उषादेवी मित्रा की ‘पिऊ कहां‘ व ‘बहता फूल‘ में अन्तर्जातीय विवाह-समस्या को उठाया है। शिवरानी देवी ‘प्रेमचन्द‘ ने बंधनयुक्त जीवन को जेल के समान व्यर्थ मानते हुए स्त्री मुक्ति की कामना की है। कमला देवी चौधरी की नायिकाएंँ भी पीड़ित है परन्तु समय आने पर विरोध करने से नहीं हिचकिचाती। इनकी ‘हार‘ की नायिका पति की शराब पीने की आदत की उपेक्षा करती है। उसका हृदय पति पर न्यौछावर हो सकता है। वह पति के प्रेम की मदिरा उत्पन्न कर सकता है किन्तु पति के मुख से जो मदिरा की गंध आती है उस पर कुर्बान नहीं हो सकता।‘‘9

साठोत्तर तक आते-आते स्त्री की दशा और दिशा में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन आए जो हमे उस दौर की कहानियों में भी देखने को मिलते हैं। हिन्दी कहानी में स्त्री-विमर्ष की शुरूआत के साथ ही कहानी के कथ्य और शिल्प में युगान्तकारी परिवर्तन दृष्टिगोचर होते है। इन शुरूआती परिवर्तनों के साथ ही हिन्दी कहानी में स्त्री-विमर्ष का ‘कान्सेप्ट‘ कहानी के नवीन स्वरूप को हमारे समक्ष प्रस्तुत करता है। ‘‘हिन्दी कहानी में स्त्री-विमर्ष के हस्तक्षेप से कहानी का कथ्य, कथन की भंगिमा और भाषा का तेवर तीखा, आक्रामक और प्रश्नाकुलताओं से भरा हुआ है। पहली बार स्त्री के सामूहिक अनुभवों को ‘स्पेस‘ मिली और उसका संघर्ष बहुआयामी बना। एक तरह से यह विभाजित स्त्री की दुनिया को ध्वस्त कर उसे ‘मानवी‘ बनाने का संकल्प कहलाया है, जिसका सूत्र वर्ण, वर्ग, जाति और लिंग-भेद के उत्पीड़न का दंश झेल रही स्त्री से जुड़ा हुआ है।‘‘10

महिला कथाकारों को लेखन में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने के लिये अपने समक्ष खड़ी अनेक बाधाओं को पार करना है क्योंकि तथाकथित संभ्रान्त आलोचक वर्ग महिला कथाकारों की साहित्यिक जगत में सजग, दबंग और सराहनीय उपस्थिति को आसानी से पचा नहीं पा रहा है। इस विषय पर चित्रा मुद्गल ने अपनी बेबाक राय देते हुए कहा है-‘‘सवर्ण मानसिकता से ग्रस्त हिन्दी साहित्यकार एवं मूर्धन्य आलोचक समकालीन सृजन परिदृश्य में महिला रचनाकारों की चुनौतीपूर्ण भागीदारी को ‘जनाना-लेखन‘ की संज्ञा देकर उसे अपने से कमतर साबित कर अपनी सदियों पुरानी उसी सामंती संकीर्ण मानसिकता की लगातार विद्वेषपूर्ण अभिव्यक्ति कर रहे हैं जिसकी उन्हें आदत पड़ चुकी है।‘‘11

विविध बाधाओं को पार कर अपनी पहचान तलाती, समाज में स्थान निर्धारण के लिये संघर्ष करती स्त्री पर साठोत्तरी महिला कथाकारों ने निर्पेक्ष हो लेखनी चलाई है। इस दौर की महिला कथाकारों ने परिवर्तित परिवे में पति-पत्नी के बीच सम्बन्धों में टूटन और अलगाव, प्रेम और सेक्स का नवीन भाव-बोध, विवाहेत्तर सम्बन्ध, अहम् के टकराव, पराश्रयता से मुक्ति, स्वावलम्बन, उपभोक्तावादी संस्कृति के जीवन में प्रवे में आए परिवर्तनों का सामाजिक, नैतिक, मनोवैज्ञानिक पक्ष की कसौटी पर तटस्थ होकर कहानियो में रेखांकित किया है। डॉ. रेणु वर्मा के शब्दों मे,‘‘यह दौर स्त्री-पुरूष सम्बन्धों के अन्तर्द्वन्द्वों को नये सिरे से पड़ताल करता हुआ रोमानियत से स्पर्षित व्यसन की भांति सिर पर चढ़कर बोलने वाला कथा-दौर रहा। इस दौर में महिला कथाकारों ने अहं के टकराव, पराश्रयता से मुक्ति, स्वावलम्बन, प्रेम, विवाहेत्तर प्रेम, तलाक, असमानता, यौन स्वेच्छा, व्यक्तिवादिता, मध्यवर्गीय शील अन्तर्विरोध, उपभोक्तावादी प्रवृत्तियों का रेखांकन अपने कथा-संसार में किया है तथा मनोवैज्ञानिकता प्रत्येक पक्ष की कसौटी बनी।‘‘12

भूमण्डलीकरण के दौर में स्त्री अपने निश्चित स्थान की मांग करती रही है जिसे महिला कथाकारों ने अपनी कहानियों के माध्यम से उभारा है। स्त्री परिस्थितियों के जटिल चक्र में फंसकर न तो पूर्णरूपेण प्रेमिका ही बन पाती है और न पत्नी ही। कहानियों में वर्तमान दौर में स्त्री-पुरूष के बदलते सम्बन्धों की प्रक्रिया को रेखांकित किया गया है।‘‘ बाह्य वस्तुओं के परिवर्तन के समक्ष हमारी संवेदना से उसके सम्बन्ध में भी परिवर्तन होते रहते हैं, रचनाधर्मी साहित्यकार परिवर्तन के इस अंतरंग से भी अपने को निरंतर जोड़ता चलता है।‘‘13 मन्नू भण्डारी की ‘यही सच है‘, ‘बाँंहो का घेरा‘, ‘बन्द दरवाजों का साथ‘, ‘ऊँचाई‘ आदि कहानियों में यह बात अक्षरक्षः सटीक बैठती है। इनकी ‘ऊँंचाई‘ कहानी में शिवानी आठ साल से शिशिर की पत्नी और दो बच्चों की मांँ है। लेकिन अचानक से अपने पूर्व प्रेमी अतुल से उसकी मुलाकात होती है तो वह अतुल के साथ शारीरिक सम्बन्ध स्थापित कर लेती है। उसके मन में इस घटना के लिए कोई ग्लानि या पश्चाताप नहीं होता-वह शिशिर से कहती है-‘‘मेरे जीवन में तुम्हारा जो स्थान है, उसे कोई नहीं ले सकता, लेना तो दूर, उस तक कोई पहुंँच भी नहीं सकता। किसी के कितनी ही निकट चली जाऊँ, चाहे शारीरिक सम्बन्ध भी स्थापित कर लूंँ पर मन की जिस ऊंँचाई पर तुम्हें बिठा रखा है, वहांँ कोई नहीं आ सकता; किसी से उसकी तुलना करने में भी तुम्हारा अपमान होता है।‘‘14

सन् साठ के दौर में स्त्री के नौकरीपेशा होने से परम्परागत स्त्री-पुरूष सम्बन्धों में बदलाव आया है। कार्यस्थल पर सहकर्मियों के बीच विवाह-पूर्व और विवाहेत्तर प्रेम-सम्बन्धों का होना अत्यंत स्वाभाविक बन गया है। साठोत्तर कहानी के अन्तर्गत प्रेम के यथार्थ अंकन के सम्बन्ध में डॉ. साधना शाह का वक्तव्य सर्वथा तर्कसंगत है-‘‘समकालीन कहानी के उभरे पात्र सेक्स के स्तर पर एकदम खुले और स्वतंत्र हैं..... पवित्रता, अपवित्रता, नैतिकता-अनैतिकता की धारणा से मेल नहीं खाती।‘‘15 यहांँ स्त्री व्यक्ति-स्वातंत्र्य के साथ यौन-स्वातंत्र्य की मांग करती है और देह-शुचिता और शारीरिक पवित्रता जैसे प्रश्नों को पूरी तरह नकारती है। चित्रा मुद्गल की ‘लाक्षागृह‘ की सुन्नी चालीस वर्ष की प्रौढ़, अविवाहित कामकाजी स्त्री है। उसे अपने विभाग में कार्यरत सिन्हा से प्रेम हो जाता है लेकिन सिन्हा सिर्फ रूपयों के लिए उससे विवाह करना चाहता है। सुन्नी स्वाभिमानी है इसलिए सिर्फ कमाऊ पत्नी बनने से इंकार कर स्वयं के अस्तित्व की रक्षा करती है। मृदुला गर्ग की खरीददार में अधिकारी पद पर कार्यरत ऐसी स्त्री का अंकन हुआ है जो विवाह के बिना ही अपने मन चाहे पुरूष को खरीदकर शारीरिक भूख मिटा सकती है। प्रेम का एक नया कोण लेकर लेखिका ने प्रेम एवं सैक्स को बड़ी गहराई एवं सूक्ष्मता से रूपायित किया है।

सन् साठ के बाद परम्परागत विवाह-पद्धति और प्रेम-सम्बन्धी नये मूल्यों के विषय में डॉ. पुष्पपाल सिंह ने अपना मत व्यक्त करते हुए कहा है कि,‘‘परिवर्तित सामाजिक परिदृष्य में नारी और पुरूष का विवाह और प्रेम सम्बन्धी दृष्टिकोण आज पूरी तरह बदला हुआ है। आज विवाह का आधार प्रेम या भावात्मक संवेदना, युग-युग के सम्बन्ध की आस्था या विश्वास नहीं है अपितु उसे मात्र एक सामाजिक समझौता साथ रहने की आवश्यकता भर समझा गया है। कुछ कहानीकारों ने विवाह संस्था को ही निरर्थक घोषित किया है।‘‘16 प्रेम और विवाह सम्बन्धी परिवर्तित दृष्टिकोण को साठोत्तरी महिला कथाकारों ने कटु यथार्थ रूप में चित्रित किया है। महिला कथाकारों ने विवाह-संस्था के प्रति अनास्था व्यक्त करते हुए इसे एकदम व्यर्थ, मात्र औपचारिक, छलनापूर्ण सम्बन्ध के रूप में अनेक कहानियों में चित्रित किया है। मृदुला गर्ग की एक और विवाह की नायिका कोमल व्यवस्थित विवाह में विश्वास नहीं करती-‘‘मैं व्यवस्थित विवाह में विश्वास नहीं करती। वह विवाह नहीं जबरदस्ती किसी का पल्लू पकड़ लेना होता है। दो कारणों से ऐसा करने की आवश्यकता पड़ सकती है, आर्थिक अवलम्बन की खोज या शारीरिक भूख।‘‘17 मृदुला गर्ग की ही ‘तुक‘ कहानी की नायिका भी पति और विवाह संस्था दोनों को ही एक अतिय घृणास्पद स्थिति के रूप में देखती हैं-‘‘पति का होना उनके लिए एक स्थिति है जिसके भीतर से कुछेक सुखदायक स्थितियाँ पैदा होती है; जैसे बच्चों का होना, घर का होना, घर में ढेरो काम होना और अपनी तरह के जोड़ों के साथ सामाजिक ताल्लुकात होना। पति का होना उनके लिए एक तरह का व्यवसाय है, जिसके माध्यम से उन्हें पैसा और व्यस्तता दोनों मिलते है। 

आज के दौर में शिक्षित और आत्मनिर्भर स्त्री अपने अधिकारों को लेकर सचेत है। स्त्री पुरूष को तभी अच्छी लगती है, जब तक कि वो उसके संकेतों पर नाचती रहे और किसी भी निर्णय में अपना मत न रखे। मेहरून्निसा परवेज की ‘खामोशी की आवाज‘ की अनु के प्रति उसके पति रमे का व्यवहार उपेक्षापूर्ण होता है। रमे अनु की इच्छा-अनिच्छा की परवाह नहीं करता। उल्टा अनु पर अहसान करता है कि वही तो कमाकर उसका खर्च उठा रहा है। अंत में अनु परेशान होकर रमे के व्यवहार का प्रतिकार करती हुई कहती है,‘‘दो समय का खाना और कपड़ा देते हो तो इसका मतलब नहीं कि मैं तुम्हारी खरीदी लौंडी हूंँ। मुझे सब कुछ देकर भी तुम मुझे कुछ नहीं दे पाये, तुमने समझने की कोशिश ही नहीं की कि मुझे क्या चाहिए।‘‘19 यहाँं अनु उस स्त्री वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है जो चुपचाप, सिसकते हुए पति के समस्त अत्याचारों को सहन नहीं करती बल्कि समय आने पर अपना विरोध भी दर्ज करवाती है। ‘‘स्त्री विमर्ष का मुद्दा ज्वलन्त होने से, विचारों के मंथन से यह लाभ तो हुआ है, उपलब्धि भी हुई है कि औरतें खुद के हीन होने के अहसास से मुक्त हुई हैं। वैचारिक स्तर पर ही सही साथ-साथ बेहतर या उच्चता ग्रंथि से भी मुक्त हुई है।‘‘20

भारतीय समाज में पत्नी की भूमिका का निर्वाह करती स्त्री के व्यक्तित्व में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ है और उसके सम्बन्ध में परम्परागत, रूढ़ मान्यताओं पर प्रश्न चिह्न लगाया जाने लगा है। डॉ. शीला रजवार के अनुसार, ‘‘पहले नारी को भावना की कसौटी पर कसा जाता था किन्तु अब उसका मानदण्ड बौद्धिकता है। यह बौद्धिकता विद्रोह और निर्लिप्तता दो रूपों में प्रकट हुई है।‘‘21 आज की स्त्री पत्नी के रूप में अपने आत्म-सम्मान की रक्षा करते हुए परम्परागत रूप से मान्यताओं का विरोध करने लगी है। पत्नी की इस नई मनःस्थिति का चित्रण पूरी सत्यता के साथ महिला कथाकारों ने किया है। मृदुला गर्ग की ‘मेरा‘ कहानी में महेन्द्र और मीता के मध्य तनाव का कारण मीता के गर्भवती होने की संभावना है। महेन्द्र सोचता है,‘‘इतनी जल्दी बच्चा हो गया तो मेरे हाथ-पाँंव बंध जायेंगे। मैं कुछ नहीं कर सकूंगा।‘‘22 महेन्द्र सामन्तवादी मनोवृति के वशीभूत हो बच्चे को ईश्वरीय देन न मानकर अपनी उन्नति में बाधक मानते हुए क्रूरता से उस अजन्मी जान को नष्ट करना चाहता है। पत्नी मीता शिशु को जन्म देना चाहती है। मीता को समझा-बुझाकर वह अस्पताल भी ले जाता है। लेकिन मीता एबोर्शन करवाने से मना कर देती है। मीता पति के कठोरतापूर्ण, निर्मम आदे का पालन न करते हुए उससे विद्रोह कर अपने मातृत्व की पूर्ति कर लेती है। इस दृष्टि से यह कहानी स्त्री-विमर्ष से जुड़े एक नये आयाम को समाज के समक्ष उद्घाटित करती है और स्त्री के मातृत्व सम्बन्धी अधिकार पर सोचने के लिये बाध्य करती है।

नमिता सिंह की ‘या देवी सर्व भूतेषु‘ एक वैचारिक कहानी है। इस कहानी में देवयानी के माध्यम से लेखिका ने स्त्री-जीवन की सही पहचान कराने की सार्थक पहल की है। स्वः की रक्षा के लिए देवयानी पति से सम्बन्ध तोड़कर जीवन की नई राह चुनती है। अस्तित्व की रक्षा और आत्म-सम्मान के लिये पुराने संस्कारों को बेहिचक तोड़ती है। उसके चरित्र के मूल्यांकन से यह बात सहज ही स्पष्ट हो जाती है कि स्त्री को जीवन जीने के लिये किसी पुरूष की आवश्यकता नहीं है।

आर्थिक परिस्थितियों में सन् साठ के उपरांत विस्फोटक परिवर्तन आया है। आर्थिक आवश्यकताओं और बढ़ती महंगाई ने स्त्री का नौकरी करना परिवार के लिए आवश्यक-सा बना दिया है। कामकाजी स्त्री को अपनी मानसिकता और दृष्टिकोण में आए परिवर्तन से अनेक समस्याओं से रूबरू होना पड़ा। परिजनों के साथ अधिकारों की मांग किये जाने पर मतभेद बढ़ते है और सामाजिक व मनोवैज्ञानिक समस्याएँं उठ खड़ी होती है। साठोत्तरी महिला कथाकारों ने स्त्री के इस बदलते चरित्र और भूमिका का अंकन किया है। राजी सेठ की योग-दीक्षा की नायिका भी एक विव नारी है जिस पर घर की जिम्मेदारियों का बोझ ऐसे समय आ पड़ता है जब उसके स्वयं शादी कर खु होने के दिन थे। वह सन्न रह जाती है यह सुनकर जब उसकी मांँ उससे कहती है-‘‘अब दीपी-सुन्नी के लिए दो-दो चार-चार चीजें बनाने की फ़िकर.....।‘‘

वह सन्न रह गयी और वह ? और वह ? और वह स्वयं ? क्या मांँ को उसका कमाना इतना रास आ गया है।‘‘23 ममता कालिया की ‘दर्पण‘ की बानी कामकाजी होने पर भी विव है। बानी शादी से पहले मांँ के अधीन रहती है व शादी के बाद पति की इच्छापूर्ति हेतु अपनी इच्छाओं का दमन करती रहती है। बानी के जीवन की एक सामान्य इच्छा दर्पण खरीदने की पूरी नहीं हो पाती है और जब दर्पण मिलता है तो स्वयं को दर्पण में देखते ही उसे यह लगता है कि यह दर्पण उसके सुन्दरता के दर्प को कुचलने के काम आ सकता है।

चित्रा मुद्गल की ‘प्रमोशन‘ कहानी में ललिता की पदोन्नति को उसका पति सुभाष कड़ी मेहनत का परिणाम नहीं मानता तो ललिता पुरूष की संकीर्ण मनोवृति के विषय में सोचती है कि,‘‘पुरूष की पदोन्नति हो तो वह उसकी लगन और मेहनत का परिणाम है स्त्री अगर अपनी लगन और परिश्रम से उन्नति करे तो वह उसकी अपनी प्रतिभा नहीं किसी डॉ. कोठारी की अनुकंपा है और ....... बीच में शरीर आये बिना यह संभव नहीं ?‘‘24 यहाँ चित्रा मुद्गल ने पुरूष की संकीर्ण, दोगली मानसिकता का पर्दाफा किया है। पुरूष किसी भी अवसर को स्त्री को प्रताड़ित किए बिना अपने हाथ से नहीं जाने देता है।

ममता कालिया की सुप्रसिद्ध कहानी ‘जांच अभी जारी है‘ में सरकारी दफ्तर में फैले भ्रष्टाचार और उच्च पदाधिकारियों द्वारा किये जाने वाले नारी-षोषण की कलई खोली है। इस कहानी में बताया गया है कि सरकारी दफ्तरों में स्त्री-कर्मचारी का मूल्यांकन उसकी कार्यदक्षता व योग्यता के आधार पर न होकर एक उपयोग की वस्तु के रूप में होता है। कहानी की नायिका अपर्णा पर झूठा टी.ए. बिल पेष करने का आरोप लगाया जाता है। उसकी इस विपत्ति में शोषण की षिकार अन्य महिला सहकर्मी उसका साथ नहीं देती। जांँच कमिशन के सदस्य अपर्णा की इज्जत लूटते है। ममता कालिया ने नौकरीपेशा स्त्री का शोषण करते तथाकथित शिक्षित, बुद्धिजीवी वर्ग को बेनकाब किया है। 

मृदृला गर्ग की ‘दुनिया का क़ायदा‘ कहानी के दो भागों में दुनिया के कायदे के नाम पर पुरूष वर्ग को समाज में मिली खुली छूट और अपने स्वार्थपूर्ति हेतु पत्नी को सीढ़ी बनाकर उन्नति प्राप्त करने की पुरूष की नीच मनोवृति का अंकन किया है। इस कहानी के प्रथम भाग में पत्नी के मरते ही पति को दुनिया के कायदे के नाम पर दूसरे विवाह की अनुमति मिल जाती है। ‘‘इसमें अचरज काहे का है, लक्ष्मी बुआ बोली ‘‘यह तो दुनिया का क़ायदा है। औरत आदमी बगैर रह सकती है, आदमी औरत के बगैर नहीं रह सकता।‘‘25 इस कहानी के दूसरे भाग में पति दुनिया के क़ायदे की दुहाई दे अपना काम पूरा करवाने के लिए पत्नी को दुश्चरित्र मेहता के साथ नाचने को मजबूर करता है-‘‘सुनील से कहा था तो अपेक्षित उत्तर मिला था, ‘‘सभ्य समाज का यही क़ायदा है। ख़रीद-फ़रोख्त, नौकरीपपेशा, सब खाने की मेज के इर्द-गिर्द शराब का गिलास हाथ में लेकर तय होते हैं। मेहता से मेरा एक काम अटका पड़ा है।‘‘26

नमिता सिंह की ‘परिचय‘ कहानी कथाकार की पैनी लेखकीय दृष्टि तथा सामाजिक सरोकारों से जुड़ाव का जीवंत सबूत है। इस कहानी में पुलिस इंस्पेक्टर, उद्योगपति, प्रोफेसर्स, डॉक्टर आदि के भ्रष्ट आचरण और नारी उत्पीड़न की सूक्ष्मता से पड़ताल की गई है। इस अन्याय के विरूद्ध आवाज उठाती संघर्षशील और क्रांतिचेता चारूलता का यह कथन द्रष्टव्य  है-‘‘हेल टू दिस जमाना, डॉ. लाल! यूनिवर्सिटी इस तरह लड़कियों के साथ भेदभाव नहीं कर सकती।‘‘ और फिर विश्वनाथ की ओर मुखातिब होकर बोली, ‘‘सर, वाइस चांसलर को अपना यह आदेष वापिस लेना पड़ेगा। यह सरासर अपमान है लड़कियों का।‘‘27

इस कड़ी को आगे बढ़ाते हुए चित्रा मुद्गल की कहानियों की एक प्रमुख विशेषता यह है कि इनकी दलित स्त्रियांँ जागरूक और चेतनासम्पन्न है। वे बड़े से बड़े अन्याय, अत्याचार और शोषण का बेझिझक, पुरजोर विरोध ही नहीं करती बल्कि आवश्यकता पड़ने पर कानून का सहारा भी लेती है। इनकी ‘सौदा‘ की मंगला अपने पति चंदू द्वारा गरीब, ग्रामीण लड़कियों को शहर लाकर वेश्यावृत्ति के लिए दलालों के हाथों बेच देने की बात पता चलने पर उसके खिलाफ कार्यवाही करने को तत्पर हो जाती है और उसके लिये अपनी सुखी गृहस्थी को आग लगाने से भी नहीं हिचकती,‘‘घर! कैसा घर ! गेंदा की बलि के बिनाह पर जीवनदान प्राप्त करता घर! चंदू के कुकृत्यों की चिनाई से मजबूत होती उस घर की दीवारें! ......छिः छिः ..... उस घर में वह सांस ले सकेगी ? स्त्री होकर स्त्री के दुर्भाग्य में साझीदार हो सकेगी ? चंदू पति है तो क्या अपराधी नहीं है?‘‘28 यह स्त्री-विमर्ष का एक नया आयाम है जहां स्त्री स्त्री की शोषक बनकर नहीं बल्कि उद्धारक बनकर उभरी है। ऐसे ही ‘जब तक बिमलाएंँ है‘ की बिमला अपनी मासूम बेटी के बलात्कारी के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवाती है। पति उसे समाज का भय दिखाता है तो भी वह अपने निर्णय पर अडिग रहती है। पति द्वारा उसे छोड़कर चले जाने पर भी वो अपने पांँव पीछे नहीं खिंचती-‘‘उसने बेलिहाज़ विरोध किया। हल्दी-चूना से ऐसे गहरे घाव नहीं भरते। टाँंके डलवाने न ले जाती तो क्या मासूम छोरी का जीवन बरबाद करती? कोरट-कचहरी के डर से बच्ची के संग जबरई करने वाले को छुट्टा घूमने को छोड़ देती! न सूली चढ़वाया राक्षस को तो वह अपनी माई की जायी नहीं। उसे नहीं लड़ना तो न लड़े। वह अकेली काफी है।‘‘29 

कृष्णा अग्निहोत्री की ‘रमकलिया‘ कहानी में दलित, वंचित वर्ग की स्त्रियों में आई चेतना का चित्रण किया है। इस कहानी में ये दलित स्त्रियाँं मालिकों से डरती नही है बल्कि उनसे अपनी माँंग मनवाकर अपनी बिरादरी की उम्मीदवार रमकलिया को जितवाती है, ‘‘कामवालियों ने दूसरे मुहल्ले के कामवालियों से सांठ-गांठ बैठा मालिकों  को नोटिस दे दिया, ‘‘यदि हजूर, हमारी रामकलिया को आपने वोट न दिया तो हम काम पर नही आयेंगे।‘‘ शोहदे गांव पहुंच गये। ‘‘वोटिंग हुई। रमकलिया ने अपनी प्रतिद्वन्द्वी को हजार वोट से परास्त कर दिया।‘‘30

मेहरून्निसा परवेज ने ‘जगार‘ कहानी के अंत में जमींदार चौधरी के द्वारा दलितों की नव-ब्याहताओं के शारीरिक शोषण की विद्रूपता को बेपर्दा करने के साथ ही ऐसे शोषित, पीड़ित समाज में गोमती के माध्यम से दलित नारी में शिक्षार्जन से आई नवचेतना से बलात्कारियों से प्रतिषोध लेने के लिये प्रतिबद्ध दिखाया है। इन्हीं की ‘ओढ़ना‘, ‘खेलावड़ी‘, कहानियों में बाँंछड़ा जाति की विवश लड़कियो की पीड़ा को उकेरा है, जो सुहागिनों का पवित्र ओढ़ना ओढ़ लेना चाहती है लेकिन परिवारवाले उन्हें देह-व्यापार के दलदल में धकेल देते हैं। इस प्रकार महिला कथाकारों ने जाति, वर्ग, धर्मादि की संकुचित सोच से ऊपर उठकर शहरी, ग्रामीण, दलित, आदिवासी प्रत्येक वर्ग की स्त्री के शोषण और चेतना दोनों ही बिन्दुओं को अपनी प्रखर लेखकीय सजगता के साथ कई कोणों से चित्रित किया है। स्त्री-विमर्ष का का सूक्ष्म से सूक्ष्म बिन्दु भी इनकी लेखकीय पैनी दृष्टि से छूट नहीं पाया है। 

नासिरा शर्मा ने अपनी कई कहानियों में मुस्लिम समाज के खोखले कानून, रूढ़, रीति-रिवाजों, मजहब और पर्दे की चार दीवारी में कैद, पीड़ित, और शोषित नारी के दर्द को बेपर्दा करते हुए उसकी संघर्षशीता को बयां किया है। इस दृष्टि से ‘खुदा की वापसी‘,‘ताबूत‘,‘बन्द दरवाजा‘,‘बावली‘, ‘पत्थर गली‘, ‘दहलीज‘, ‘नमकदान‘ और ‘दूसरा कबूतर‘ कहानियां उल्लेखनीय है। दूसरा कबूतर में शहाब जो कि सऊदी अरब में किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत है, पहले से शादीशुदा और बच्चों का पिता होने पर भी फ़रेब से सानिया से निकाह कर लेता है। वहाँ जब दोनों पत्नियों का आमना-सामना होता है तो वे शहाब को सबक सिखाने का संकल्प लेती है -‘‘तलाक देकर शहाब की आधी-आधी जायदाद हम बाँटकर अपनी बेइज्जती का सबक उसे सिखा सकते हैं। दौलत है उसी पर तो सारी इतराहट है। फिर बचेगी सिर्फ तनख्वाह और जमा होगी बूँद-बूँंदकर जमा पूंँजी..... भूल जाएंगे मियां तीसरा इश्क़ और शादी।‘‘31

साठोत्तरी महिला कथाकारों का स्त्री-विमर्ष व्यापक परिदृश्य से जुड़ा है। इन्होंने आतंकवाद जैसे ज्वलंत मुद्दे के मध्य भी स्त्री की मानवी भूमिका की जड़े तलाशने का सार्थक प्रयास किया है। चन्द्रकान्ता ने कभी धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर को सहेजा है। इन्होने ‘काली बर्फ‘ कहानी में आतंकवाद की लपटों में जलते इन्होने कश्मीर की वादी में रहने वाली सेवाभावी नर्स परमी के माध्यम से मानवीय रिश्तों को जिलाए रखने की जिजीविषा और हैवानियत के आगे न झुकने का सन्देश दिया है। मां के लाख कहने पर भी परमी कष्मीर छोड़ने को राजी नहीं होती। ‘‘परमी ने मां के डर को नाक पर बैठी मक्खी-सा हटा दिया -‘‘कहीं नहीं जाएंगे हम, तू डरा मत कर। सभी हमारे अपने है यहां। शमा अजहर के रहते हम बेघर कैसे हो सकते हैं ? फिर हमने किसी का कुछ बिगाड़ा तो नहीं है....।‘‘32 धर्मांध कट्टरपंथी लोगों द्वारा बलात्कार किए जाने पर भी परमी वादी मैं सब कुछ सामान्य होने की आषा मन में जगाए रखती है। 

निष्कर्षतः साठोत्तरी महिला कथाकारों की कहानियों में स्त्री विमर्ष से जुड़े प्रश्नों को तलाशने की यात्रा में अनेक प्रश्नों को जन्म देती है। समाज के परम्परागत दोयम दर्जे के नागरिक के आवरण से निकल अपनी अस्मिता और अस्तित्व तलाशती स्त्री घर और बाहर शोषण के दो पहियों के बीच पीसती स्त्री? स्त्री मुक्ति चाहती है तो किससे और क्यों ? क्या पुरूष मानसिकता के बदलाव से समाज में स्त्री सशक्त हो जायेगी या अभी और संघर्ष कर कई कदम उठाने होंगे अपने वजूद को कायम करने के लिए? ऐसे अनेकों प्रश्न उठते है। दो चेहरे ओढ़कर जीवन जीने वाले समाज में घर और कार्यस्थल के बीच संतुलन बैठाती स्त्री की पीड़ा। अनेकानेक जटिल प्रश्न अपने कड़े तेवर और तल्ख सच्चाईयों के साथ स्त्री-विमर्ष पर साठोत्तरी महिला कथाकारों द्वारा लिखी जा रही कहानियों में कई कोणों के साथ उभरे है। 

डॉ. अंजु
व्याख्याता (हिन्दी),
स.ध.राजकीय महाविद्यालय,
ब्यावर (राजस्थान)
ई-मेल:dranjukalyanwat@gmail.com

संदर्भ-ग्रन्थ
1 मनु-मनु स्मृति 3/56, 
2 उपरिवत् 5/147-148
3 तुलसीदास - सुन्दरकाण्ड-रामचरित मानस, 58-59, पृ0 494
4 डॉ. शुम्भुसिंह मनोहर (लेखक-सम्पादक) मीरांँ पदावली, पृ0 119
5 जयशंकर प्रसाद-लज्जा - कामायनी, पृ0 34
6 जयशंकर प्रसाद- इड़ा - कामायनी, पृ0 53
7 डॉ. बच्चन सिंह-हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास, पृ. 493
8 रेणु वर्मा-साहित्यिक निबन्ध, पृ0 409
9 कमला देवी चौधरी-हार-यात्रा, पृ0 157-158
10 डॉ. मंजु चतुर्वेदी-इक्कीसवीं सदी की कहानियों में स्त्री-विमर्ष-मधुमती मार्च अप्रैल 2012, पृ0 11 
11 चित्रा मुद्गल-संवाद और हस्तक्षेप, जुलाई 1996
12 रेणु वर्मा-साहित्यिक निबन्ध, पृ0 410
13 सुरेन्द्र चौधरी-हिन्दी कहानी: प्रक्रिया और पाठ, पृ0 3
14 मन्नू भण्डारी-ऊँचाई-एक प्लेट सैलाब, पृ. 134
15 डॉ. साधना शाह-नई कहानी में आधुनिकता बोध, पृ. 88
16 डॉ. पुष्पपाल सिंह-समकालीन कहानी: युगबोध का संदर्भ, पृ. 150
17 मृदुला गर्ग-एक और विवाह-संगति-विसंगति संपूर्ण कहानियांँ 1, पृ. 28
18 मृदुला गर्ग-तुक-संगति-विसंगति संपूर्ण कहानियांँ 1, पृ. 325
19 मेहरून्निसा परवेज-खामोषी की आवाज-टहनियों पर धूप, पृ. 10
20 डॉ. उषा झा-हिन्दी कहानी और स्त्री-विमर्ष, पृ. 162
21 डॉ. शीला रजवार-स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कथा साहित्य में नारी के बदलते संदर्भ, पृ. 124 
22 मृदुला गर्ग-मेरा-संगति-विसंगति संपूर्ण कहानियांँ 1, पृ. 214
23 राजी सेठ-योग दीक्षा-तीसरी हथेली, पृ0 80
24 चित्रा मुद्गल-प्रमोशन-जगदंबा बाबू गांँव आ रहे है, पृ. 72-73
25 मृदुला गर्ग- दुनिया का कायदा-संगति-विसंगति संपूर्ण कहानियांँ 1, पृ. 71
26 उपरिवत्, पृ. 74
27 नमिता सिंह-परिचय-नीलगाय की आंँखे, पृ. 103
28 चित्रा मुद्गल-सौदा- जगदंबा बाबू गाँंव आ रहे है, - पृ. 28
29 चित्रा मुद्गल-जब तक बिमलाएँ है, लपटें, पृ. 100
30 कृष्णा अग्निहोत्री-रमकलिया-मेरी प्रिय कहानियांँ, पृ. 15-16
31 नासिरा शर्मा, दूसरा कबूतर-खुदा की वापसी, पृ. 130-131
32 चन्द्रकान्ता- काली बर्फ- काली बर्फ से उद्धृत, पृ.127
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