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कहानी:दोगरी/आशा कुमारी

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, अक्तूबर 05, 2014 | रविवार, अक्तूबर 05, 2014

त्रैमासिक ई-पत्रिका 'अपनी माटी(ISSN 2322-0724 Apni Maati)वर्ष-2, अंक-16, अक्टूबर-दिसंबर, 2014
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छायाकार:ज़ैनुल आबेदीन
इंदिरा एक मेहनती औरत थीं | बचपन से ही घर का सारा कामकाज सँभालने में निपुण थीं | इंदिरा के पिता की बहुत सारी भेड़ बकरियां थीं जिनसे इंदिरा को बहुत प्यार था | इंदिरा जहाँ कहीं भी जाती छोटे-छोटे मेमने उसके पीछे-पीछे दौड़ते | वे जानते थे कि वह  उन्हें प्यार करेगी और उनकी गर्दन में हाथ फेरेगी तथा खाने को भी कुछ न कुछ जरूर देगी | घर के अन्य सदस्यों की अपेक्षा इंदिरा को पशु-पक्षियों से ज्यादा लगाव था | इंदिरा के परिवार में उसके पिता, अम्मा तथा दो बहनें और दो भाई थे | इंदिरा अपने भाई बहनों में सबसे बड़ी थी | इंदिरा के पिता के पास भेड़-बकरियों के अलावा दो गाय तथा एक जोड़ी बैल भी थे | उसके पिता दिन भर पशुओं के साथ बण (जंगल) में रहते थे | खुद से भी ज्यादा उन्हें पशुओं की चिंता रहती थी कि कहीं वे भूखे न रह जायें इसलिए वह उन्हें देर शाम तक जंगल में चराते रहते | जैसे ही शाम होने लगती इंदिरा अपने पिता जी की मदद के लिए आधे रास्ते में  पहुँच जाती थी | इंदिरा के पिता नैनसुख के पास सौ से भी अधिक भेड़-बकरियां थी और जब भी वे उन्हें जंगल ले जाते या जब घर वापिस लाते तो उनकी गिनती किया करते थे | इस काम में भी इंदिरा उनकी बहुत मदद करती थी | नैनसुख के घर पहुँचते ही उसकी पत्नी गरमा गje दूध और रोटियां परोस देती थी | पूरे दिन की थकान के बावजूद भी आराम करने की बजाय वह घर के अन्य कामों में लग जाता था | सर्दियों की लम्बी रातों में नैनसुख, उसकी पत्नी सरनू तथा बेटी इंदिरा ऊन कातने का काम करते थे | प्रात: चिड़ियों के चहकने के साथ ही साथ इंदिरा और उसके परिवारवाले भी उठ जाते थे और फिर वही दिनचर्या शुरू हो जाती |

      अब इंदिरा जवान होने लगी थी | इंदिरा के समय में लडकियों की शादी तेरह, चौदह की उम्र में ही करवा दी जाती थी | उस समय ऐसी परम्परा थी की जो लड़का जिस लड़की से शादी करना चाहता वह घरवालों की सलाह लिए बिना ही दोस्तों की सहायता से लड़की को भगा कर ले जाते थे | इंदिरा के साथ भी ऐसा ही हुआ | अब इंदिरा चौदह बर्ष की हो गई थी | इंदिरा के घर से दो मील की दुरी पर एक छोटा सा गाँव था, जहाँ सोहन नाम का एक लड़का रहता था | मेले त्यौहार में अक्सर उनकी मुलाकात हो जाया करती थी | धीरे-धीरे सोहन ने इंदिरा और उसकी सहेली रूमा से बातचीत करना शुरू कर दिया | सोहन के मन में इंदिरा के प्रति प्रेम के भाव उमड़ने लगे | सोहन बहुत ही नटखट किस्म का लड़का था और बहुत शरारती भी, अपने घरवालों की एक न मानता था | एक दिन सोहन ने रूमा से कहा मैं इंदिरा से  शादी करना चाहता हूँ तुम उससे इस बारे में बात करो | रूमा ने भी उसकी बातों में हाँ में हाँ मिलाई और कहा ठीक है मैं बात करके देखती हूँ |

      बहुत समय बाद रूमा ने इंदिरा से इस बारे में बात की तो इंदिरा ने कहा नहीं मुझे अभी शादी नहीं करनी है | जब रूमा ने सोहन से ये बात कही तो सोहन गुस्से से तिलमिला उठा और बोला अच्छा तो ये बात है | मैं उसे देख लूँगा वो कब तक नहीं मानेगी | सोहन ने हर रोज उसका पीछा करना शुरू किया और उसे तंग करने लगा | इसी तरह एक दिन सोहन अपने दोस्तों की मदद से इंदिरा को जबरदस्ती भगा कर ले गया और विवाह कर लिया | जब वह उसे अपने घर ले गया तो इंदिरा को देखकर सोहन के घर वालों की ख़ुशी का ठिकाना न रहा | जब इंदिरा के पिता को पता चला तो वह दंग रह गये मानो जैसे बिजली कौंध पड़ी हो | नैनसुख तुरंत इंदिरा को वापिस अपने घर लाने के लिए चला गया परन्तु सोहन के घर वाले इस के लिए हरगिज तैयार नहीं थे | उनके घर में तो जैसे साक्षात लक्ष्मी ही आ गई हो क्योंकि वे इंदिरा के बारे में पहले से ही जानते थे | इंदिरा घर परिवार की जिम्मेदारियों को भली-भांति समझती तथा उन्हें निभाना भी जानती थी | इंदिरा घर के कामों में ही नहीं बल्कि खेत-खलिहान के कामों में भी होशियार थी | इंदिरा ने सोहन के घर को स्वर्ग बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी | वह दिन-रात मेहनत करती रहती | ये कौन जानता था की जिस घर को बनाने में वह इतना कठोर परिश्रम कर रही है उसी घर की दहलीज पर उसे पैर रखने तक की भी इजाजत नहीं होगी | उस घर की दीवारों की चिनाई के लिए अपनी पीठ पर एक एक पत्थर उठाकर लाते हुए न जाने उसने कितने सपने बुने होंगे | इंदिरा से बेहतर इन सपनों की उडान को कोई अभागा ही समझ सकता है |

     इनके विवाह को हुए दो वर्ष हो गये तथा इनकी एक बेटी पैदा हुई | इसी बीच सोहन को शराब की लत लग पड़ी | अब हर रोज सोहन नशे की हालत में घर आता तो कभी दोस्तों के साथ रहता | कुछ सालों तक उनकी जिन्दगी यूँ ही चलती रही | फिर उनकी दूसरी बेटी पैदा हुई | सोहन को बेटा चाहिये था लेकिन दुर्भाग्य से इंदिरा को इस बार भी बेटी ही हुई | सोहन इनसे शायद खुश नहीं था | बड़ी बेटी बिन्नी तथा छोटी बेटी का नाम प्रिया था | सोहन अपनी दोनों बेटियों से प्यार तो करता था लेकिन उसे बेटे की कमी जरूर महसूस होती थी |

     अब उन्होंने बगीचे में नया घर बनाना शुरू किया | जो कि उनके पहले वाले घर से पांच मील की दूरी पर था | अब इंदिरा नये घर को बनाने में सोहन की बहुत मदद करने लगी | वह नहीं जानती थी कि वह जिस सोहन की जिन्दगी संवारने जा रही है वही सोहन उसके साथ जानवरों से भी बत्तर सलूक करके उसे एक दिन अपने घर से ही नहीं बल्कि अपनी जिन्दगी से भी दूर कर देगा | आखिर वही हुआ जो इंदिरा ने कभी सपनों में भी नहीं सोचा था | घर बन गया और उन्होंने वहीँ रहना शुरू किया | घर बिल्कुल एकांत जगह में था आस पास कोई भी घर न था | बेटियां भी धीरे धीरे बड़ी होती गई और सोहन को बेटे की चिंता सताने लगी | अब सोहन ने शराब पीना भी छोड़ दिया था लेकिन अब वह किसी दूसरी औरत से विवाह करने की सोचने लगा | वंश को आगे बढाने के लिए बेटे का होना जरूरी होता है इसी रूढ़िवादी विचारधारा ने सोहन को दूसरी शादी करने को विवश किया | इंदिरा से हर बात पर लड़ना झगड़ना सोहन की आदत बन चुकी थी | सोहन हर बार इंदिरा से कहता तू घर छोड़ कर चली क्यों नहीं जाती और इंदिरा पलट कर जबाव देती मेरी दो बेटियां हैं मैं इन्हें छोड़कर कभी नहीं जाउंगी | वह कहती यही बेटियां मेरे लिए बेटों के समान है | इंदिरा के पिता ने भी कई बार उसे वापिस मायके आने के लिए कहा लेकिन वह अपनी बेटियों को नहीं छोड़ना चाहती थी | इसी बात को लेकर सोहन और नैनसुख के बीच कई बार झड़प हो चुकी थी यहाँ तक की सोहन ने अपने ससुर तक को नहीं बक्शा और तमाचा जड़ दिया | अपनी लाडली बेटी इंदिरा की खातिर एक पिता को इतना अपमानित होना पड़ेगा उसने कभी ना सोचा था |

     एक माँ की ममता को समझना इन बच्चियों के लिए आसान न था | इस ममता की पहचान उन्हें इतनी देर बाद हुई जब उनकी अम्मा उनसे दूर हो गई | अब सोहन ने दूसरा विवाह कर लिया | वह अपनी नई दुल्हन को लेकर दूर के एक शहर में रहने लगा | दोनों बहुत खुश थे लेकिन इंदिरा की उसे अब कोई परवाह न रही | उसके दिल पर क्या बीत रही होगी इसकी किसी को क्या फिक्र | बिन्नी और प्रिया इतनी भोली थी कि अपनी अम्मा के साथ रहने की बजाय अपने दादा, दादी के साथ पहले वाले घर पर रहती थी | अम्मा दूर दोगरी में रहती थी यहाँ की चढाई चढ़ने से बचने के लिए दोनों बच्चियां दादी के साथ रहती थी | इंदिरा अक्सर अकेली रहती कई बार बड़ी बेटी बिन्नी अम्मा के पास चली जाया करती थी | जिस दिन दोनों बेटियां अम्मा के पास रहने जाती उस दिन अम्मा की ख़ुशी का ठिकाना न रहता | अम्मा जब अकेली होती तो पशुओं के साथ अपना दिल बहलाती | इंदिरा ने गाय तथा कुछ मुर्गे भी पाल रखे थे | गाय होने से इंदिरा के घर में दूध-घी की कभी कमी न होती थी | इंदिरा अपनी बेटियों को दूर से ही देख कर समझ जाती थी कि उसकी बेटियों को भूख लगी है अभी वे दोनों घर से काफी दूर ही होती थी तभी उनकी अम्मा खाना तैयार कर लेती | उनके घर पहुँचते ही उन्हें हाथ मुँह धोने को कहती और खुद खाना परोस कर रखती | इंदिरा इन दोनों को बिना दूध-घी के रोटी न खिलाती थी | इंदिरा अपनी दोनों बेटियों को खूब प्यार करती और एकटक निहारती रहती | अम्मा जानती थी कि इतनी दूर पैदल चलना दोनों के लिए बहुत मुश्किल था | बरसात के दिनों में तो रास्ते भी बहुत खराब रहते थे कई बार तो अधिक बारिश होने के कारण पहाड़ियों से पत्थर भी गिरते थे | जिससे इंदिरा को बहुत चिंता लगी रहती | कई बार तो इंदिरा खुद उन्हें पूरे रास्ते हाथ पकड़ कर स्कूल छोड़ने तथा लेने जाती | प्रिया इन तंग रास्तों में अपनी अम्मा का हाथ बिल्कुल भी नहीं छोड़ती थी |

     शहर में कुछ दिन रहने के बाद सोहन अपनी दूसरी पत्नी को लेकर वापिस घर आ गया | उनके आने पर इंदिरा ने कोई आपति जाहिर न की | अब वे सभी एक साथ दोगरी में रहने लगे | सोहन अब भी इंदिरा को तंग करता था उसे घर छोड़ कर चले जाने को कहता | इंदिरा रोते रोते कहती मैं नहीं जाउंगी मैंने इस घर को बनाने में बहुत मेहनत की है | मेरी दो बेटियां है मैं उनके सहारे जीना चाहती हूँ मैं नहीं जाउंगी | सोहन फिर उसे मारने की धमकी देता कहता मैं तेरी टांग या बाजू तोड़ दूंगा | वह फिर भी शांत रहती |

     अब सोहन की दूसरी पत्नी के बेटा पैदा हुआ और सोहन बहुत खुश था | बिन्नी और प्रिया भी अपने भाई के होने से बहुत खुश थी | जितनी ख़ुशी सोहन को थी उतनी ही ख़ुशी इंदिरा को भी थी क्योंकि उसकी बेटियों को भाई का सहारा जो मिल गया था लेकिन वो अपनी ख़ुशी को किसी से बाँट नही सकती थी | इस समय इंदिरा ने अपनी सौतन की खूब सेवा टहल की लेकिन इंदिरा की किस्मत में ऐसा कहाँ की भलाई के बदले कोई उससे भलाई करे | अब तो सोहन इंदिरा से और भी ज्यादा लड़ने झगड़ने लगा था और उसे ताने मारता | अब बिन्नी और प्रिया इस भयानक दृश्य को देखकर डर के मारे घर के किसी एक कोने में दुबक जाती थी | बड़ी बेटी बिन्नी अब काफी समझदार होने लगी थी और वह अपनी अम्मा को बचाने की कोशिश भी करती लेकिन प्रिया डर के मारे दूसरे कमरे में चली जाती थी |

     इस घटना का दोनों बच्चियों पर बहुत बुरा असर पड़ा | पिता के इस निर्दयी व्यवहार को देखकर दोनों बच्चियों के जहन में डर बैठ गया | डर इतना कि सोहन के आगे उनके मुँह से कोई बात तक न निकलती थी | प्रिया के जहन में वो डर इतना बड गया कि वह दूसरे लोगों से भी बात करते हुए डरने लगी | अब सोहन ने इन दोनों बेटियों से माँ की ममता छीन ली और उनकी माँ से उसकी जिन्दगी | किसी से कोई वादविवाद किए बिना ही प्रिया और बिन्नी सब कुछ सहते हुए जीती रही | उन्हें माँ की ममता तक से वंचित कर दिया गया | उनके बचपन के खेलने कूदने वाले दिनों को छिन लिया गया इन बातों से प्रिया खुद को कोसती रहती | व्यक्तिगत रूप से प्रिया बहुत टूट चुकी थी | इन परिस्थितियों में उसे किसी के सहारे की जरूरत थी | मगर उसकी मानसिक उलझनों एवं शारीरिक पीड़ाओं को समझने वाला कोई भी न था | बस प्रिया के पास इस समय सिर्फ एक चीज थी वह थी- ईश्वर पर दृढ़ विश्वास(आस्था) | जिसने उसकी जिन्दगी की नाव को पार लगाया | वह एक ऐसी पतवार थी जिसके सहारे उसने हर ख़ुशी और चंगाई हासिल की | इस उम्र के बच्चे अपनी माँ के साथ उसके करीब तो होते है लेकिन मुझे इससे क्यों वंचित रखा गया | इस सवाल ने प्रिया की जवानी के दिनों में जहर घोलना शुरू कर दिया था | इस समय इसे माँ के प्यार की कमी महसूस होती रहती थी | बचपन में तो शायद ही ऐसा कभी हुआ होगा |

   बड़ी बेटी बिन्नी शायद उन बातों को भुला अब ससुराल में अपने पति व बच्चों के साथ खुश हैं | प्रिया आज भी इसी उलझन में जूझ रही है | दूसरी ओर अम्मा जिन्दगी के पड़ावों से गुजर रही हैं | तमाम चुनौतियों का सामना कर अपनी बेटियों के लिए दुआ करती रहती हैं | जिन सपनों को लेकर इंदिरा ने सोहन के साथ अपनी जिन्दगी की शुरुआत की थी आज उन सपनों को साकार करने की बजाय सोहन ने उन्हें तबाह कर दिया | वह नहीं जानता कि वह जिन्दगी  की सबसे बड़ी भूल कर बैठा है

आशा कुमारी
हिंदी विभाग,हिमाचल प्रदेश
केन्द्रीय विश्वविद्यालय धर्मशाला
(टैब शाहपुर) ज़िला काँगड़ा-176206
ई.मेल aashu.bhandari04@gmail.com
मो. 09805193104        
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