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शोध:नरेश मेहता के उपन्यासों में समाजबोध/ नितिका गुप्ता

Written By Manik Chittorgarh on सोमवार, जनवरी 05, 2015 | सोमवार, जनवरी 05, 2015

त्रैमासिक ई-पत्रिका 'अपनी माटी(ISSN 2322-0724 Apni Maati)वर्ष-2, अंक-17, जनवरी-मार्च, 2015
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चित्रांकन: राजेश पाण्डेय, उदयपुर 
नरेश मेहता (जन्म 15 फरवरी 1922, मृत्यु 22 नवम्बर 2000) स्वातंत्र्योत्तर भारत के प्रमुख रचनाकारों में गिने जाते है। नरेश मेहता का वास्तविक नाम पूर्णशंकर मेहता था। उनकी काव्य प्रतिभा से प्रभावित होकर एक दिन नरसिंह गढ़ की राजमाता ने उन्हें ‘नरेश‘ नाम से सम्बोधित किया। बस तभी से वह नरेश मेहता नाम से पहचाने जाने लगे। उन्होंने साहित्य की हर विधा-काव्य, खण्डकाव्य, उपन्यास, कहानी, नाटक, एकांकी, निबंध, यात्रा-वृत्तांत आदि में रचना की हैं। उनकी अब तक लगभग 40 रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं।

नरेश मेहता ने लगभग तीन दशकों में कुल सात उपन्यासों की रचना की थीं। उनका प्रथम उपन्यास डूबते मस्तूल सन् 1954 में और अंतिम उपन्यास उत्तरकथा भाग दो सन् 1982 में प्रकाशित हुआ। ‘डूबते मस्तूल’ उपन्यास में रंजना नाम की एक आधुनिक स्त्री का चरित्र, उसी के शब्दों में प्रस्तुत किया गया है। इस उपन्यास की अवधि 16 घंटों की है। इन 16 घंटों में रंजना अपनी संपूर्ण जीवनगाथा को (फ्लैश-बैक पद्धति में) अपरिचित स्वामीनाथन को परिचित अकलंक का आवरण देकर सुनाती है। रंजना का चरित्र पाल-पतवार रहित नौका की तरह उद्देश्यहीन, रोचक और करुण, पर अविश्वसनीय है। उसे जीवनभर कोई भी स्थायी सहारा नही मिलता है। वह जिस भी व्यक्ति के करीब जाती है वहीं उससे दूर चला जाता है या वह खुद ही उससे दूर हो जाती है। जिस कारण वह जिन्दगीभर भटकावग्रस्त जीवन व्यतीत करती रहती है।

8 वर्ष के बाद नरेश मेहता का दूसरा उपन्यास ‘यह पथ बन्धु था’ सन् 1962 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास ने उन्हें एक उपन्यासकार के रूप में स्थापित किया। यह उपन्यास एक आदर्शवादी, ईमानदार, स्वाभिमानी युवक श्रीधर की पराजय, थकान और टूटन की कहानी है। साथ ही इस उपन्यास में भारतीय नारी की भी करुण गाथा कही गयी है। नरेश मेहता ने मध्यवर्गीय परिवार की सरस्वती, गुणवन्ती के साथ ही सामन्तवर्गीय परिवार की इन्दु का भी यथार्थ चित्रण प्रस्तुत किया है। इस उपन्यास मे नरेश मेहता ने शिल्प मे प्रौढ़ता प्राप्त कर ली है।

नरेश मेहता ने चार खंडों में एक बृहत् उपन्यास की योजना बनाई थी। जिसका प्रथम खंड ‘धूमकेतु: एक श्रुति’ सन् 1962 में और द्वितीय खंड ‘नदी यशस्वी है’ सन् 1967 में प्रकाशित हुआ। लेकिन किसी कारणवश इस उपन्यास का तृतीय और चतुर्थ खंड या तो लिखे ही नही गये या प्रकाशित नही हो सके। लेखक ने इस उपन्यास को संगीत के आधार पर विभाजित किया है। इसके प्रथम खंड को ’श्रुति-विस्तार’ की और द्वितीय खंड को ’श्रुति-आलाप’ की संज्ञा दी गयी हैं। इस उपन्यास में उदयन की आत्मकथा प्रस्तुत की गयी है। जहाँ धूमकेतु: एक श्रुति मे उसके शैशवावस्था का चित्रण है तो वहीं नदी यशस्वी है मे उसकी किशोरावस्था का चित्रण किया गया है।

नरेश मेहता का ’दो एकांत’ उपन्यास सन् 1964 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में विवेक और वानीरा के माध्यम से शिक्षित मध्यवर्गीय दम्पति का चित्रण प्रस्तुत किया गया है। लेखक ने इन दोनों के माध्यम से प्रेम और प्रेम के तनाव की कथा कही है। विवेक और वानीरा एक-दूसरे के साथ होते हुए भी अपने मन की व्यथा एक-दूसरे को नही बता पाते। जिस कारण उनका रिश्ता धीरे-धीरे भस्म होता जाता है और उपन्यास के अंत मे वह दोनों दो एकांत बनकर रह जाते हैं।

नरेश मेहता का अगला उपन्यास ’प्रथम फाल्गुन’ सन् 1968 में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास का केन्द्रीय विषय प्रेम है। गोपा और महिम एक-दूसरे को पहली बार फाल्गुन मे ही मिलते है और अगले फाल्गुन मे ही हमेशा के लिए अलग हो जाते है। जहाँ गोपा का प्रेम धरती के गर्भ में छिपे जल की तरह है वहीं महिम अन्तरालाप के रूप में गोपा के प्रति तड़पता है। जब गोपा महिम के समक्ष अपने जारज संतान होने की बात स्वीकारती है तो महिम समाज-भीरु होने के कारण उससे अपने सारे नाते तोड़ लेता है। इस तरह एक प्रेम कहानी का दुखद अंत हो जाता है।

प्रथम फाल्गुन के 11 वर्षां बाद नरेश मेहता का अंतिम उपन्यास ’उत्तरकथा’ दो भागों (प्रथम भाग सन् 1979 और द्वितीय भाग सन् 1982) में प्रकाशित हुआ। यह उनका ’यह पथ बंधु था’ के बाद दूसरा महाकाव्यात्मक उपन्यास है। इसमे भारतीय मध्यवर्ग के जीवन को उकेरा गया है। इसके केन्द्र में ब्राहा्रण परिवार की तीन पीढ़ियों का चित्रण किया गया है। इसका प्रथम भाग 1900 से 1930 तक के और द्वितीय भाग 1930 से 1948 तक के काल समय में व्यक्ति और समाज के बिखराव को समेटे हुए हैं।

जैसा कि हम जानते है कि समाज और उपन्यास में बिंब-प्रतिबिंब का सम्बन्ध होता हैं। जहाँ समाज उपन्यास को प्रभावित करता है वहीं उपन्यास भी समाज पर अपना प्रभाव छोड़ता है। नरेश मेहता ने भी अपने समय के समाज, राष्ट्र और युग के जीवन सत्य को अपने उपन्यासों में प्रदर्शित किया हैं। जिसे हम नरेश मेहता का समाजबोध कहकर सम्बोधित कर सकते है।                 
                              
समाजबोध दो शब्दों से मिलकर बना हैं-समाज और बोध। आदियुग में समाज नाम की कोई व्यवस्था नही थीं। मनुष्य खानाबदोश जीवन व्यतीत करता था। वह भोजन की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर भटकता रहता था। लेकिन समय के साथ मनुष्य ने अपनी घुमक्कड़ प्रवृत्ति को त्याग कर एक स्थान पर रहना प्रांरभ किया। तभी से समाज नामक संस्था का जन्म माना जाता है। जो आज वर्तमान मे भी अपना अस्तित्व बनाए हुए है। समाज को अंग्रेजी में ’’ैवबपमजल और ब्वउउनदपजल’’ कहते हैं। मैकाइवर एंव पेज के अनुसार ’’समाज परिपाटियों, कार्यविधियों, सत्ता, पारस्परिक सहयोग, अनेकों समूहों एंव श्रेणियों, मानवीय व्यवहार के नियंत्रणों तथा स्वतंत्रताओं की एक व्यवस्था है।’’1 वहीं राधाकमल मुकर्जी के अनुसार ’’समाज संरचनाओं व प्रकार्यों का वह योग है जिसके माध्यम से मनुष्य अपने पर्यावरण के तीन आयामों या स्तरों-परिस्थितिगत, मनो-सामाजिक तथा लक्ष्यपूर्ण-नैतिक के साथ अपना अनुकूलन करता एंव अपनी जीविका, प्रस्थिति तथा मूल्य-पूर्ति सम्बन्धी अपनी आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।’’2 इस प्रकार समाज से अभिप्राय एक स्थान पर समान उद्देश्य के लिए निवास करने वाले मनुष्यों के सामूहिक रूप से है। समाज मे ही प्रत्येक मनुष्य जन्म लेता है, जीवनयापन करता है और मृत्यु को प्राप्त होता है।

वहीं समाजबोध मे बोध शब्द संस्कृत के बुध धातु से बना है। बोध को अंग्रेजी में ’’च्मतबमचजपवदए ैमदेमए ज्ञदवूसमकहम  और न्दकमतेजंदकपदह’’ कहते हैं। बृहत् हिन्दी कोश के अनुसार ’’बोध का अर्थ जानकारी, जताना, सांत्वना और तसल्ली हैं।’’3 वहीं हिन्दी विश्व कोश के अनुसार ’’बोध का अर्थ संतोष, धीरज, धैर्य, ज्ञान हैं।’’4 इस प्रकार बोध से अभिप्राय किसी वस्तु के अस्तित्व या स्वरूप के ज्ञान से है। शब्दों के द्वारा जब किसी बात का ज्ञान प्राप्त होता है तो उसे भी बोध कहा जाता है। 

अतः समाजबोध में समाज और बोध दोनों की ही कुछ विशेषताएँ सम्मलित होती हैं। राधाकमल मुकर्जी के अनुसार ’’समाज का वास्तविक बोध तभी हो सकता है जब एक समग्रता के रूप में समाज की आदतों, मूल्यों तथा प्रतीकों का अध्ययन किया जाए।’’5 वहीं मैक्स वेबर के अनुसार ’’समाजशास्त्र सामाजिक क्रिया का निर्वचनात्मक (अर्थपूर्ण) बोध करने का प्रयत्न करता है, जिससे कि इसकी गतिविधि तथा परिणामों की कारण सहित व्याख्या प्रस्तुत की जा सके।’’6 अतः समाज की अवधारणा का ज्ञान ही समाजबोध है।नरेश मेहता के उपन्यासों द्वारा उनके समाजबोध को समझा जा सकता है। नरेश मेहता मे अत्यंत सामाजिक चेतना है जो उनके उपन्यासों में विस्तार से चित्रित हुई है। वह अपने उपन्यासों में समाज के विभिन्न तत्वों को यथार्थ रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनके उपन्यासों में पारिवारिक, सामाजिक, राजनीतिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक गतिविधियों के साथ ही नारी जीवन और उनकी समस्याओं का सहज ही चित्रण प्रस्तुत हुआ हैं। उन्होंने अपने विचारों को काल्पनिक पात्रों द्वारा अभिव्यक्ति प्रदान की हैं।

परिवारों के द्वारा ही समाज का निर्माण होता हैं। परिवार मे रहकर ही मनुष्य संस्कारी बनता है। नरेश मेहता ने अपने उपन्यासों में संयुक्त और एकल परिवारों का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत किया है। वह जहाँ यह पथ बंधु था, धूमकेतु: एक श्रुति, नदी यशस्वी है, उत्तरकथा उपन्यासों में संयुक्त परिवारों का चित्रण करते हैं, वहीं प्रथम फाल्गुन और दो एकांत उपन्यासों में एकल परिवार को चित्रित करते हैं। नरेश मेहता ने आधुनिक युग के प्रभाव मे हो रहे संयुक्त परिवारों के विघटन को भी अपने उपन्यासों में प्रस्तुत किया है। यह पथ बंधु था उपन्यास के केन्द्र में ठाकुर परिवार है। श्रीनाथ ठाकुर के तीन बेटे हैं-श्रीमोहन, श्रीधर और श्रीवल्लभ। लेकिन श्रीनाथ ठाकुर का यह भरापूरा परिवार विघटित हो जाता है। उनका मंझला बेटा श्रीधर कुछ नया करने के लिए अकेला घर से चला जाता है, वहीं उनका बड़ा बेटा श्रीमोहन और छोटा बेटा श्रीवल्लभ घर का बंटवारा करके अलग रहने लगते हैं।

नरेश मेहता ने अपने उपन्यासों में मानवीय सम्बन्धों की जटिलता, उदात्तता और त्रासदी को विश्वसनीय और मार्मिक रूप में प्रस्तुत किया हैं। वह पति-पत्नी सम्बन्ध, भाई-बहन सम्बन्ध, सास-बहू सम्बन्ध, माता-पिता के संतान से सम्बन्ध, प्रेमी-प्रेमिका सम्बन्ध आदि के द्वारा अपनी पारिवारिक समझ को प्रस्तुत करते है। जहाँ वह दो एकांत उपन्यास में विवेक और वानीरा के द्वारा पति-पत्नी के सम्बन्ध मे आई कटूता को उकेरते है वहीं वह उत्तरकथा उपन्यास में दुर्गा और त्र्यम्बक के द्वारा पति-पत्नी के विश्वसनीय रिश्ते को प्रस्तुत करते है। माँ और संतान का सम्बन्ध संसार का सबसे अनमोल रिश्ता माना जाता है। नरेश मेहता ने भी माँ और संतान के इस करुण सम्बन्ध को अपने उपन्यासों में बार-बार चित्रित किया है। यह पथ बंधु था उपन्यास में पेमेन बाबू की पत्नी बेटे की मृत्यु के कारण पागल हो जाती है वहीं उत्तरकथा उपन्यास की दुर्गा अपने बेटे चन्द्रशेखर (मन्या) की दिल्ली के दंगे में हुई मृत्यु की खबर सुनकर अपने प्राण त्याग देती है। धूमकेतु: एक श्रुति उपन्यास में उदयन की चेतना को माँ का अभाव सर्वाधिक ग्रस्त किए हुए है। उदयन जो बिन माँ का बेटा है वह अपनी विधवा वल्लभा बुआ मे माँ की छवि देखता है। वल्लभा और उदयन के सम्बन्धों में माँ और बेटे की अतृप्त आकंाक्षाएं व्यक्त हुई हैं।

भारत त्योहारों का देश हैं। यहाँ पर विभिन्न प्रकार के त्योहार मनाए जाते हैं। नरेश मेहता ने भी अपने उपन्यासों में अनेक त्योहारों का वर्णन किया हैं, जैसे-दशहरा, होली, दीवाली, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, दुर्गाष्टमी, गणेशोत्सव, मुहर्रम आदि। धूमकेतु: एक श्रुति उपन्यास में उदयन अपने घर मे नवरात्रि की दुर्गाष्टमी का चित्रण करते हुए कहता हैं कि “दुर्गाष्टमी है। नवरात्रि। कुलदेवी का पूजन हो रहा है। हमारे घर में सवेरे चार बजे उठ कर पुरुषों ने खाना बनाया। हमारे यहंा देवी के भोग के लिए तवा या कड़ाही नहीं चढ़ती इसलिए बाटियंा, घुघरी आदि बनती हैं। बड़े सवेरे मुझे नहला कर बा और पिता के पास बैठा दिया गया है। मां और दीदी पूजन की ऊपरी व्यवस्था कर रही होती हैं। सूर्योदय के पूर्व ही पूजन तथा प्रसाद सब-कुछ समाप्त हो जाता है। दीवार पर पांच या सात घी की रेखाएं बना कर उन्हें सिंदूर लगा दिया जाता है। उसके बाद बा पूजन करते हुए जाने क्या-क्या बोलते हुए हवन करते जाते हैं। दीपक से आरती की जाती है। उसके बाद सब खाना खा लेते हैं।”7 वहीं यह पथ बंधु था उपन्यास में नरेश मेहता होली का चित्रण करते हुए कहते हैं कि “शायद इन्दु ने खुब रंग का प्रबन्ध कर रखा था। नीचे मैदान मे बड़े-बड़े हौज रंग से भरवा रखे थे। कस्बे के लोग आते जा रहे थे और रंग खेलते जा रहे थे। बाबा साहब और इन्दु भी खुब रंग खेल रहे थे।”8

नरेश मेहता अपने उपन्यासों में विभिन्न रीति-रिवाजों, जैसे-वैवाहिक संस्कार, हल्दी लगना, बच्चे का जनेऊ संस्कार, मृत्यु के बाद जाति-भोज, श्राद्ध पूजा आदि का यथार्थपूर्ण चित्रण प्रस्तुत करते हैं। वह साथ ही समाज मे फैले विभिन्न अंधविश्वासों, जैसे-जादू-टोना, झाड़फूंक आदि का भी चित्रण प्रस्तुत करते हैं। नदी यशस्वी है उपन्यास में नरेश मेहता पढ़े-लिखे समाज मे फैले अंधविश्वास को उदयन के बीमार पड़ने पर चित्रित करते है। सुनंदा की मां उदयन का बुखार सही करने के लिए डॉक्टर की दवा के साथ ही ओझाओं से झाड़फूंक भी करवाती है-“देह मट्टी-सी सुगली पड़ती। ओझाओं ने आकर झाड़फूंक की। डाक्टर कामत मिक्श्चर पिलाते रहे।”9

नरेश मेहता अपनी सुक्ष्म दृष्टि का प्रयोग करते हुए अपने उपन्यासों में विभिन्न लोकरीतियों और जनश्रुतियों का भी चित्रण करते हैं। जिससे उनके उपन्यासों में सामाजिकता उभरकर आती है। नदी यशस्वी है उपन्यास में वह जनश्रुति अनुसार पीपल के वृक्ष को सार्वजनिक स्थलों जैसे-मंदिर आदि मे होना शुभ बताते है जबकि निजी आवास पर होना अशुभ बताते है। इसी प्रकार नरेश मेहता अपने उपन्यासों में समयानुसार लोकरीतियों का भी ध्यान रखते हैं, जैसे-बहू का ससुर के आगे घुंघट ना उठाना, दरवाजे पर दस्तक देकर सास-ससुर को खाना खाने के लिए बुलाना, पति द्वारा घर के बड़ों के आगे पत्नी का नाम ना लेना आदि। उत्तरकथा भाग दो मे त्र्यम्बक शुक्ल अपनी बुआ से कहता हैं कि “पानी की जरूरत होती तो ये ही ले आती। आप भी कमाल करती हैं बुआमाँ! ’ये ही’ से निश्चय ही उनका तात्पर्य दुर्गा से था। नाम इसलिए नहीं लिया कि उन दिनों बड़ों के सामने कोई अपनी पत्नी का नाम नहीं लिया करता था।”10

नरेश मेहता अपने उपन्यासों के द्वारा समाज मे नारी की स्थिति का भी मर्मंभेदी चित्रण प्रस्तुत करते हैं। वह अपने उपन्यासों में नारी के हर रूप-बेटी, बहन, पत्नी, बहू, माँ, सास, प्रेमिका आदि को प्रस्तुत करते हैं। वह नारी को आदर्श या पतिता के रूप में चित्रित ना करके मानवीय रूप मे चित्रित करते है। यह पथ बंधु था उपन्यास की सरस्वती अपने जेठ और जेठानी से अनेक प्रकार से अपमानित और पीड़ित होती है। मालिनी वेश्या जीवन की त्रासदी झेल रही है। वह उससे मुक्ति पाना चाहती है। तो दूसरी और रतना देश की स्वाधीनता के लिए फांसी पर चढ़ जाती है। वहीं उत्तरकथा उपन्यास की दुर्गा आम भारतीय बहू की नियति प्रस्तुत करती है। गोपाल राय कहते हैं कि “भावनाप्रवण और दुखी स्त्रियों के चित्रण में नरेश मेहता शरच्चन्द्रीय भावुकता के शिकार तो हैं, पर वे उस भारतीय नारी का अत्यंत मार्मिक चित्रण करने में सफल हुए हैं जो करुणा, त्याग, सहिष्णुता, स्नेह और आत्मबलिदान की सजीव मूर्ति होती है।”11

नरेश मेहता ने विधवा नारी के दुःख को भी अपने उपन्यासों में चित्रित किया है। धूमकेतु: एक श्रुति उपन्यास में उदयन की बुआ दादी (माँ) बाल विधवा है, वह श्रृंगार नही करती है, उसके बाल नही है, सफेद साड़ी पहनती है और वह किसी शुभ कार्य में भाग नही लेती है। वहीं रत्नशंकर की विधवा पत्नी को जायदात मे हिस्सा यह कहकर नही दिया जाता कि यह शास्त्रगत नही है। नरेश मेहता ने सूर्यशंकर द्वारा यह प्रश्न भी उठाया है कि पुरुष को तीन-तीन विवाह करने का हक है तो स्त्री दूसरा विवाह क्यों नही कर सकती? लेकिन उनका यही पात्र सूर्यशंकर अपनी पत्नी को कुरूप होने के कारण त्याग देता है। यह नारी जीवन की कितनी बड़ी विडबंना है कि उसके गुणों को ना देखकर उसकी खुबसूरती को देखा जाता है।

नरेश मेहता अनमेल विवाह की समस्या को भी चित्रित करते है। यह पथ बंधु था उपन्यास की इन्दु का विवाह एक बुढ़े जमींदार से कर दिया जाता है। विवाह के कुछ समय बाद ही वह विधवा हो जाती है और उसे अपना पूरा जीवन तीर्थाटन करते हुए व्यतीत करना पड़ता है। वहीं अगर नारी माँ नही बन पाती तो उसे सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़ता है। धूमकेतु: एक श्रुति उपन्यास की मनुमाँ माँ ना बन पाने के कारण समाज द्वारा डाक्कन कहकर पुकारी जाती है। उत्तरकथा भाग एक उपन्यास मे वसुन्धरा के माँ ना बन पाने का कारण उसका बाँझ होना माना जाता है। जबकि वह दुर्गा को बताती है कि ’कमी उसमे नही है उसके पति मे है’। यह नारी जीवन की कितनी बड़ी त्रासदी है।

नरेश मेहता अपने उपन्यासों में आयदिन दहेज की बलि चढ़ने वाली स्त्रियों का भी हृदयस्पर्शी चित्रण प्रस्तुत करते हैं। डूबते मस्तुल की रंजना, यह पथ बंधु था की गुणवन्ती, उत्तरकथा के त्र्यम्बक की पहली पत्नी और दुर्गा दहेज के लिए प्रताड़ित की जाती हैं। गुणवन्ती को दहेज के लिए इतना मारा-पिटा जाता है कि वह लंगड़ी हो जाती है। वहीं त्र्यम्बक की पहली पत्नी को दहेज मे पानी चढ़े जेवर लाने के कारण कुएं मे धक्का देकर मार दिया जाता है। अतः नरेश मेहता ने अपने उपन्यासों में नारी जीवन की विभिन्न समस्याओं जैसे-अनमेल विवाह, बहुविवाह, दहेज प्रथा, वेश्यावृत्ति, यौन-उत्पीड़िन, जारज संतान आदि का दारूण चित्र प्रस्तुत किया हैं।

                नितिका गुप्ता                
       पीएच. डी. हिन्दी शोधार्थी
     अम्बेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली
        मोबाइल - 9210002287
  ईमेल -nitika.gup85@gmail.com
नरेश मेहता अपने उपन्यासों में समयानुसार राजनीतिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का भी चित्रण प्रस्तुत करते हैं। वह असहयोग आंदोलन, विदेशी वस्त्रों के खिलाफ आंदोलन, स्वतंत्रता आंदोलन, प्रभात फेरी, साम्प्रदायिक दंगे-फसाद आदि का चित्रण प्रस्तुत करते हैं। साथ ही वह बडे़-बड़े राजनीतिज्ञों और प्रकाशकों की भी पोल खोलते हैं। वह समयानुसार विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे-टाइम्स ऑफ इंडिया, माधुरी, चाँद, सरस्वती आदि और विभिन्न लेखकों-कवियों व साहित्यिक संस्थाओं का जिक्र करके अपने उपन्यासों को सजीवता प्रदान करते है।अंत मे हम कह सकते है कि नरेश मेहता ने अपने उपन्यासों में समाज के वास्तविक रूप को चित्रित किया है। वह समाज के अच्छे और बुरे दोनों पहलुओं को चित्रित करते है। वह कहीं पर भी पाठकों के समक्ष समाज-सुधारक के रूप मे नही आते है। बस वह अपने नजरिये से समाज को चित्रित करके पाठकों को सोचने के लिए मजबूर कर देते हैं। अतः समाज के संदर्भ मे नरेश मेहता की इसी दृष्टि को हम उनका समाजबोध कह सकते है।

संदर्भ-सूची:-

1. हिन्दी विश्वकोश भाग-27, सम्पादक-एम. कुमार, माधुरी सक्सेना, कमल दाधीच, प्रदीप माथुर, अर्जुन पब्लिशिंग हाऊस दरियागंज दिल्ली, प्रथम संस्करण 2011, पृष्ठ-9846
2. सामाजिक विचारधारा (कॉम्ट से मुकर्जी तक), सम्पादक-रवीन्द्र नाथ मुकर्जी, विवेक प्रकाशन दिल्ली, संस्करण 2012, पृष्ठ-528
3. बृहत् हिन्दी कोश, सम्पादक-कालिका प्रसाद, राजवल्लभ सहाय, मुकुन्दीलाल श्रीवास्तव, ज्ञानमंडल लिमिटेड वाराणसी, सप्तम् संस्करण, पुर्नमुद्रण जुलाई 2013, पृष्ठ-825
4. हिन्दी विश्वकोश भाग-20, सम्पादक-एम. कुमार, माधुरी सक्सेना, कमल दाधीच, प्रदीप माथुर, अर्जुन पब्लिशिंग हाऊस दरियागंज दिल्ली, प्रथम संस्करण 2011, पृष्ठ-7220
5. सामाजिक विचारधारा (कॉम्ट से मुकर्जी तक), सम्पादक-रवीन्द्र नाथ मुकर्जी, विवेक प्रकाशन दिल्ली, संस्करण 2012, पृष्ठ-527
6. वही, पृष्ठ-268
7. मेहता नरेश, धूमकेतु: एक श्रुति, नेशनल पब्लिशिंग हाउस नई दिल्ली, दूसरा संस्करण 2004, पृष्ठ-29
8. मेहता नरेश, यह पथ बंधु था, लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद, पहला पेपरबैक्स संस्करण 2011, पृष्ठ-86
9. मेहता नरेश, नदी यशस्वी है, मयूर पेपरबैक्स नौएडा, संस्करण 1998, पृष्ठ-98
10. मेहता नरेश, उत्तरकथा भाग दो, लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद, चतुर्थ संस्करण 2011, पृष्ठ-133
11. राय गोपाल, नरेश मेहता के उपन्यास, वागर्थ पत्रिका, भारतीय भाषा परिषद कोलकाता,  नवम्बर 2001, पृष्ठ-19            
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