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कहानी:इश्क़ वो आतिश है ग़ालिब/सुशांत सुप्रिय

Written By Manik Chittorgarh on सोमवार, जनवरी 05, 2015 | सोमवार, जनवरी 05, 2015

त्रैमासिक ई-पत्रिका 'अपनी माटी(ISSN 2322-0724 Apni Maati)वर्ष-2, अंक-17, जनवरी-मार्च, 2015
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                                                                                 सुमी
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चित्रांकन: राजेश पाण्डेय, उदयपुर 
करवट बदलते-से समय में वह एक उनींदी-सी शाम थी। एक मरते हुए दिन की उदास, सर्द शाम। काजल के धब्बे-सी फैलती हुई। छूट गई धड़कन-सी अनाम। ऐसा क्या था उस शाम में ? धीरे-धीरे सरकती हुई एक निस्तेज शाम थी वह जिसे बाक़ी शामों के बासी फूलों के साथ समय की नदी में प्रवाहित किया जा सकता था । उस शाम की चटाई को मोड़ कर मैंने रख दिया था एक किनारे।

         लेकिन ज़रूर कुछ अलग था उस शाम में। घुटने मोड़े वह शाम अपनी गोद में कोई ख़ास चीज़ समेटे थी। कौन जानता था तब कि उन यादों के रंग इतने चटखीले होंगे कि दस बरस बाद भी ... कौन जानता था कि एक सलोना-सा सुख जो अधूरा रह गया था उस शाम, कि एक छोटी-सी बेज़ुबान इच्छा जो ख़ामोश रह गई थी उस शाम, आज न जाने कहाँ से स्वर पा कर कोयल-सी कूकने लगेगी मेरे जीवन में। कौन जानता था कि समय के अँधियारे में अचानक उस शाम की फुलझड़ियाँ जल उठेंगी और रोशन कर देंगी तन-मन को। मुझे कहाँ पता था कि उस शाम के बग़ीचे में मौलश्री के शर्मीले , ख़ुशबूदार फूल झरते रहे थे। आज कैसे दिसम्बर की वह शाम जून की इस सुबह में समय के आँगन में मासूम गिलहरी-सी फुदक रही है।

          यादों के समुद्र के इस पार मैं हूँ। समय की साँप-सीढ़ी से बेख़बर। वह शाम आज यादों के समुद्र-तट पर स्वागत के सिंह-द्वार-सी खड़ी है। मैं हैरान हूँ वहाँ तुम्हें खड़ा पा कर -- लहरों के हहराते शोर के पास आश्वस्ति-सी एक सुखद उपस्थिति...

          काॅलेज में भैया के दोस्त थे तुम । हमारे यहाँ बेहद पढ़ाकू माने जाते थे तुम --
शिष्ट और सौम्य-से । न जाने क्यों तुम्हें देख कर मेरे मन में गुदगुदी-सी होने लगती थी... तुम जब मुस्करा कर मुझे " हलो सुमी " कहते तो मैं भीतर तक खिल जाती --

मेरे गालों की लाली से बेख़बर थे क्या तुम ? तुम्हारी हर अदा को कनखियों से देखती
मैं तुम्हारी ख़ामोश उपस्थिति से भी ख़ुश हो जाती।

         पहली बार यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी में मिले थे तुम मुझे -- लम्बी चोटी में सलवार-क़मीज़ पहने एक परेशान-सी लड़की कोई किताब ढूँढ़ती हुई। तुमने उस दिन लाइब्रेरी की हर शेल्फ़ छान मारी थी और आख़िर वह किताब मुझे ढूँढ़ कर दे ही दी थी। मैं तुम्हारी कौन थी ? ऐसा क्यों था कि जब तुम काफ़ी दिनों तक दिखाई नहीं देते या घर नहीं आते तो मैं गुमसुम रहने लगती थी ? चाय में चीनी की बजाए नमक डाल देती ? दाल या सब्ज़ी बिना नमक वाली बना देती ? रात में कमरे की बत्ती जलती छोड़ कर चश्मा पहने-पहने सो जाती ?

         जिस दिन पता चला कि तुम अब एम.बी.ए. की पढ़ाई करने आइ.आइ.एम., अहमदाबाद चले जाओगे , मैं बाथरूम में फिसल कर गिर गई थी । खाना बनाते समय मैंने अपना हाथ जला लिया था । उसी दिन मैंने यह कविता लिखी थी " क्या तुम जानते हो, प्रिय " --- " ओ प्रिय , / मैं तुम्हारी आँखों में बसे / दूर कहीं के गुमसुम खोएपन से / प्यार करती हूँ ,/ मैं घाव पर / पड़ी पपड़ी-सी / तुम्हारी उदास मुस्कान से / प्यार करती हूँ , / मैं हमारे बीच पड़ी / अनसिलवटी चुप्पी से भी / प्यार करती हूँ , / हाँ प्रिय / मैं उन पलों से भी / प्यार करती हूँ / जब एकाकीपन से ग्रस्त मैं / तुम्हारे चेहरे में / अपने लिए / आइना ढूँढ़ती रहती हूँ / और खुद को / बहुत पहले खो गई / किसी अबूझ लिपि के / चटखते अक्षर-सी / बिखरती महसूस करती हूँ ... "

        भैया को तुम्हारे प्रति मेरे आकर्षण का पता चल गया होगा तभी तो एक दिन उन्होंने मुझसे कहा था -- " सुमी, इंडिया में कास्ट एक बहुत बड़ा फ़ैक्टर होता है । हमें इसी समाज में रहना होता है । जात-पात के बंधनों को हम इग्नोर नहीं कर सकते ।"

        तुम और मैं -- हम अलग-अलग जातियों के थे।
        वह शाम कैसी थी । उस शाम जब मैं बुख़ार में पड़ी थी , तुम भैया से मिलने घर आए थे । अगले दिन तुम अहमदाबाद जा रहे थे। क्या यह दैवी इत्तिफ़ाक़ नहीं था कि उस शाम घर पर और कोई नहीं था ? सब लोग एक शादी में गए थे।

        मैंने दरवाज़ा खोला था और तुम जैसे अधिकार-पूर्वक भीतर आ गए थे। क्या मेरा चेहरा बुखार की वजह से तप रहा था ? वर्ना तुमने कैसे जान लिया कि मेरी तबीयत ठीक नहीं थी ?
         " अरे सुमी , तुम्हें तो तेज़ बुख़ार है।" मेरे माथे को छू कर तुमने कहा था।
         मेरे माथे पर तुम्हारे हाथों का स्पर्श पानी की ठंडी पट्टी-सा पड़ा था।
         " दवाई ले रही हो कोई ? " तुम्हारे स्वर में चिंता थी। ऐसा क्या था जो तुम्हें भी मेरी ओर खींचता था ? क्या तुम्हें इसका अहसास था ?

         तुम देर तक मेरे सामने के सोफ़े पर बैठे रहे थे । क्या इस बीच मेरा बुख़ार बढ़ गया था ? मेरी आँखें मुँद-सी क्यों गई थीं ? जब आँखें खुलीं थीं तो तुम मेरे बगल में बैठे चिंतित स्वर में पूछ रहे थे -- " सुमी, क्या तुम ठीक हो ? तुम्हारा बुख़ार बहुत तेज़ लग रहा है । लाओ, मैं तुम्हारे माथे पर ठंडे पानी की पट्टी कर दूँ । "

          यह सुन कर बीमारी में भी मैं कुछ सकुचा-सी गई थी।
          तुम बहुत देर तक मेरे बगल में बैठ कर मेरे माथे पर ठंडे पानी की पट्टियाँ बदलते रहे थे । मेरी आँखें मुँद गई थीं। अपने कोमल स्पर्श की हिलोरें मेरे भीतर छोड़ कर तुम बाक़ी लोगों के आने से पहले ही चले गए थे। मुझे एक पारदर्शी , झीने सुख में भिगोकर।

          बस, इतना ही तो हुआ था उस आख़िरी शाम ... जब तुम मुझ से मिले थे ...
          क़िस्मत भी कैसे-कैसे खेल खेलती है । क्या नाम था तुम्हारे और मेरे इस रिश्ते का ? कल तुम अहमदाबाद चले जाने वाले थे । हमारे बीच अलग-अलग जातियों की ऊँची दीवार थी ...

          लेकिन तुम्हारा यह लम्बा जीवन इतना सूना और उदास कैसे रह गया ? क्या तुम्हारी पतंग का कोई धागा मेरी उँगली में बँधा रह गया था ? एक बार कहा तो होता कि तुम भी मुझ से ...
          कल दस बरस बाद जब अहमदाबाद आई और काॅन्फ़्रेंस में अचानक तुम से मुलाक़ात हो गई तो मेरे मन के ताल में तुम्हारी उपस्थिति गुड़ुप्-सी पड़ी स्मृतियों की अनगिनत लहरें जगाती हुई। हिम्मत करके मैंने भरपूर निगाहों से तुम्हें एकटक देखा। तुम अब भी उतने ही आकर्षक लगे क्या मैं तुम्हारी आँखों में भी अपने लिए चाहत के रंग देख रही थी ?

         हाँ, मैं तुमसे प्रेम करती थी । पर कभी कह नहीं पाई । उस शाम भी नहीं जो पीले पन्नों वाली किसी पुरानी किताब में दबे किसी मोरपंख-सी आज बाहर निकल आई है । मैं किसी निर्जन तट पर पड़ी सीपी थी , तुम्हारी उस लहर की प्रतीक्षा में जो मुझे फिर से भिगो कर साथ बहा ले जाएगी अपने अनंत समुद्र की गोद में । और आख़िर कल शाम मैं उस समुद्र के आग़ोश में थी ...

                                         मनु
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           अतीत के समुद्र से यादों के मोती चुगने की हसरत अब भी जवाँ है हमारे दिलों में। एक ऐसा अतीत जिस में मैं था , तुम थी , और अब हम उन यादों के मोतियों से भविष्य के लिए एक सुंदर माला बनाना चाहते हैं। बीते समय को लौटा लाने की चाहत की डोर से बँधे हैं हम दोनों। स्मृतियों के वसंत में कोई कोयल फिर से कूक रही है अस्तित्व की अमराइयों में। वर्षों के पतझड़ के इस पार रंग-बिरंगे फूल फिर से खिलने लगे हैं। दु:स्वप्नों के अँधेरे को चीर कर सूर्य की सुनहरी किरणें हम तक फिर से पहुँचने लगी हैं।

          शायद तब हम स्वयं भी अपने-अपने दिलों की धड़कनों से पूरी तरह परिचित नहीं थे। तुम तब उन्नीस की थी और मैं इक्कीस का। मुझे हैरानी है कि दस बरस का लम्बा अंतराल भी स्मृति की स्लेट से उस शाम की छवि को पोंछ नहीं पाया। वह छवि हमारी यादों की डाल से अटकी किसी पतंग-सी रह-रह कर फड़फड़ाती रही। वह शाम ... कितनी ख़ामोश और मासूम-सी थी । तुम थी, मैं था और तनहाई थी। कुछ इच्छाओं के फड़फड़ाते पंख थे। कुछ उम्मीदों के इंद्रधनुषी सपने थे। कुछ अस्पष्ट-सी छवियाँ थीं। कुछ नि:शब्द-से स्वर थे। खिड़की के बाहर पूर्णिमा का गोल चाँद निकल आया था। चुप्पी का संगीत चारों ओर बज रहा था। तुम्हारे माथे पर ठंडे पानी की पट्टियाँ बदलते हुए मुझे तुम इतनी अपनी-अपनी-सी क्यों लगी थी ? तुम से मेरा कौन-सा अनाम नाता था ? लाइब्रेरी में जब तक मैंने वह किताब ढूँढ़ कर तुम्हें दे नहीं दी थी , तब तक मुझे चैन क्यों नहीं आया था ? तुम्हारी मुस्कान मुझमें जलतरंग-सी क्यों बजने लगती थी ? क्या तुम्हारे मन में भी मेरे लिए कुछ था ?
           उस शाम तुम मेरे कितनी क़रीब थी। तुमने काली जीन्स पर लाल स्वेट-शर्ट पहन रखा था । हालाँकि तेज़ बुख़ार की वजह से तुम्हारा फूल-सा चेहरा मुरझा गया था। मैं जिस पंखुड़ी को जानता था , वह कुम्हलायी हुई थी । खिड़की से चाँदनी का एक टुकड़ा आ कर तुम्हारी गोद में बैठ गया था । और मुझे हाल ही में लिखी हुई अपनी एक कविता याद आ गई थी : ' तुम जैसे ' -- " ओ प्रिये / तुम जैसे / एक उन्मत्त / युवा भँवर , / तुम जैसे / सप्तम स्वर में बजता / एक पियानो , / तुम जैसे / एक ऋचा /आकाश तक जाती हुई , / तुम जैसे / फ़ौलाद और चाशनी की एक डोरी / मुझ से बँधी हुई , / तुम में आबाद हैं / प्रेम की अनगिनत अनुगूँजें , / जो वसंत करता है / फूलों के साथ / वह करना चाहता हूँ / मैं तुम्हारे साथ / ओ प्रिये ...

           मैं तुम्हें प्यार से छूना चाहता था । लेकिन जब मैंने बुख़ार जाँचने के लिए तुम्हारा माथा छुआ तो चौंक गया उस तपिश से । तुम्हारे माथे पर ठंडे पानी की पट्टियाँ बदलते हुए मैंने क्यों ऐसा चाहा कि तुम्हें अपने सीने में भींच लूँ । तुम्हारे चेहरे पर एक उदास मुस्कान थी । तुमने अपनी अक्षत कुँवारी आँखों से मुझे देखाऔर आँखें मूँद ली थीं । तुम्हें अब आराम आ रहा है, यह विचार मुझे क्यों ख़ुशी दे रहा था ? क्या तुम मेरी उत्तेजना को , तुम्हारे स्पर्श की वजह से सुलगती हुई मेरी देह की आँच को भाँप सकी थी ? वह क्या चीज़ थी जिसने तुम्हें मुझ पर इतना भरोसा करने दिया था ?

         क्या तुम्हें पता है कि जब तुमने आँखें मूँदी हुई थीं , मेरे अधीर अधर तुम्हारे होठ चूमने के लिए तुम पर झुक आए थे ? वह कौन-सा अहसास था जिसने मुझे बीच में ही रोक लिया था ? क्या वह हमारे बीच मौजूद जातियों की दीवार थी ? या वह प्यार को खो देने का भय था ? या अपने प्रति तुम्हारे विश्वास को नहीं तोड़ने की अदम्य इच्छा थी ? तुम्हें मुँदी आँखों वाले प्रदेश में अकेला छोड़ कर मैं चुपचाप वहाँ से चला आया था ... तुम्हारी चितकबरी याद हृदय में समेटे । अपना उदास अकेलापन अपने कंधों पर लिए ।

         मैं उस शाम के गाल पर ढुलक गई आँसू की बूँद था । मैं सप्तम स्वर से पहले ही टूट गई वीणा की तार का अधूरा संगीत था । हम रेल की उन दो समानांतर पटरियों-से थे जो कभी नहीं मिल पाए थे । हमारी अधूरी कथा घनी झाड़ियों में खो गई उस गेंद-सी थी जो दोबारा नहीं मिली थी ।मेरी रात का कोई दिन नहीं था । तुम्हारी शबरी के कोई राम नहीं थे । दोनों की आँखों में केवल जलते हुए आँसू थे । वह शाम एक अनसुलझी उलझन-सी हमारे बीच हमेशा मौजूद रही ।
        हालाँकि रेत-से फिसल जाते हैं जीवन के सभी पल हमारी मुट्ठी में से , लेकिन वह शाम ज़रूर अटकी रही होगी हमारे अवचेतन में किसी दरख़्त से । तभी तो कल जब दस बरस बाद तुमसे अचानक दोबारा मुलाक़ात हुई तो भूरी पड़ गई स्मृतियों की टहनी फिर से हरी हो गई । तुम्हें देखते ही मेरी धमनियों में फिर से उत्तेजना क्यों भरने लगी थी ? क्या यह कोई दैवी इशारा था कि जो लिखा है , वह हो कर रहेगा । तभी तो बरसों से रुकी हुई एक कहानी फिर से चल निकली थी पूरी होने के लिए ...

                                       सुमी
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क्या यही नियति है ? दस बरस बाद मेरा अहमदाबाद आना। काॅन्फ़्रेंस में तुमसे अचानक मुलाक़ात हो जानी। समय की राख के ढेर में दबी चाहत की चिंगारियों का फिर से शोला बन जाना। हमारी ख़ामोशी में इच्छाओं के कितने निशाचर पंछी पंख फड़फड़ाने लगे थे। हमारी आँखों में से कितनी अभिलाषाएँ झाँक रही थीं।      उस शाम की तरह ही कल एक और ऐतिहासिक शाम थी। काॅन्फ़्रेंस के बाद तुम मुझे अपने घर ले गए।

         " बाक़ी लोग कहाँ हैं ? तुम्हारी पत्नी ? बच्चे ? " ड्राइंग-रूम में बैठते हुए मैंने पूछा ।
         " सुमी , मैंने शादी नहीं की । "
         " क्यों ? "
          तुम चुप थे किंतु तुम्हारी बोलती आँखें सब कुछ बयाँ कर रही थीं ।
         " और तुम ? तुम्हारे पति क्या करते हैं ? कितने बच्चे हैं ? "
         " मनु, मैंने भी शादी नहीं की ..."

                                    मनु
                                                                      -------
          ... तो इतने सालों तक वही दर्द हम दोनों को सालता रहा था। हम चुप थे। और अचानक दस बरस पहले की वह शाम समय की केंचुली उतार कर हमारे बीच दोबारा आ बैठी। चमकती हुई। मेरा दिल तेज़ी से धड़क रहा था। मेरी नसों में रक्त का प्रवाह बढ़ गया था। और फिर बरसों से जमे हुए शब्द पिघल कर बहने लगे। तुम्हारी हथेली अपनी हथेलियों में थाम कर मैंने कहा -- " सुमी, यह शाम साक्षी है कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ। जब से तुम्हें देखा था , तभी से तुमसे प्यार करता था ।"
          धीमी लेकिन मज़बूत आवाज़ में तुमने कहा -- " मनु, वह शाम साक्षी थी कि मैं भी आप से प्यार करती हूँ । बहुत पहले से । उस शाम जब मेरे होठ चूमने के लिए आप मुझ पर झुक आए थे , उससे भी पहले से। "

          " तुम उस शाम जगी हुई थी ? " मैंने थोड़ा झेंपते हुए पूछा।
          " जगी तो आज हूँ मैं बरसों की गहरी नींद के बाद। " तुम फुसफुसाई थी।

          फिर तुम एक इंद्रधनुषी हँसी हँसी थी । तुम्हारी आँखों में एक चमक थी । उस चमक में एक आमंत्रण था । वह आमंत्रण मुझमें इच्छाएँ जगा रहा था । जैसे कामना के चटख रंगों से भरी अतीत की वह शाम फिर से जवाँ हो गई थी ... मुझे क्या पता था कि यह रतजगा , यह दीवानगी इतनी मीठी होगी ...
         ...जब मुझे होश आया तो सभी बाँध टूट चुके थे । मांसल सुख मेरी मुट्ठी में था। बरसों से सूखी हमारी देह की मिट्टी तृप्त हो रही थी। हमारे होठ परस्पर चुंबन में जुड़े थे। हमारी देह गाढ़े आलिंगन में बँधी थी । तुम्हारे भीतर से केवड़े और खसखस जैसी ख़ुशबुएँ फूट रही थीं। मैं तुम्हारे कान की लवों को बेतहाशा चूम रहा था। तुम्हारे हाथ मेरे छाती के बालों को नया अर्थ दे रहे थे। तुम्हारी सुगंधित साँसों के शोर ने इस शाम में बेइंतहा मस्ती घोल दी थी। तुम्हारी देह अब भी खजुराहो की नर्तकियों-सी कँटीली थी। अँगीठी के तेज़ आँच-सी तपती मेरी देह के सभी रंध्र खुल रहे थे। एक सुखद ख़ुमार मुझ पर छाता जा रहा था। मेरी प्रेयसी मेरी बाँहों में थी। मेरी मरमेड मेरी निगाहों में थी। मेरी जीभ तुम्हारी गहरी नाभि के भँवर में खो जाने को बेताब थी। मेरी उँगलियों के पोर-पोर तुम्हारी देह के उतार-चढ़ावों को ब्रेल लिपि-सा पढ़ने को आतुर थे। मैं गेंहुआ शंखों-से तुम्हारे उत्सुक उरोजों और तुम्हारे जामुनी कुचाग्रों में खुद को खोता जा रहा था। तुम्हारी कमर का भूरा तिल मुझे मदहोश कर रहा था। अधमुँदी आँखों से अब मैं प्रेम के अश्व की सवारी कर कर रहा था । कामुकता की पराकाष्ठा में तुम बुदबुदा रही थी -- " होल्ड मी टाइट , मनु टेक मी , किल् मी...। "  हम दोनों एक ऐसी प्यास की गिरफ़्त में थे जो पीने के बाद भी निरंतर बढ़ती जा रही थी। एक-दूसरे की आग़ोश में हमारी देह एक लय में आगे-पीछे तैर रही थी , उड़ रही थी , झूम रही थी।
           " मनु , यू आर जस्ट ग्रेट ...।" मेरे कानों में तुम्हारी कामुक आवाज़ गूँज रही थी। मेरी धमनियों में रक्त के उफ़ान का हहराता शोर था। फिर आह्लाद का ऊष्म ,मीठा फ़व्वारा फूट पड़ा और हम दोनों उस नैसर्गिक सुख में बह गए ...

                                           सुमी
                                                                                     --------

           आप सभी पाठकों को यह बताते हुए हमें हार्दिक प्रसन्नता हो रही है कि मैंने और मनु ने अपने-अपने परिवारों व रिश्तेदारों के विरोध के बावजूद परिणय-सूत्र में बँध जाने का फ़ैसला किया है। कोर्ट-मैरेज होगी। आप सभी सुधी पाठकों का स्नेह और शुभकामनाएँ अपेक्षित हैं। 

      सुशांत सुप्रिय
         A-5001,गौड़ ग्रीन सिटी ,
         वैभव खंड ,इंदिरापुरम् ,
         ग़ाज़ियाबाद - 201010( उ. प्र.)
मो: 8512070086
ई-मेल: sushant1968@gmail.com
पूरा परिचय यहाँ 
                    
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