कविताएँ:ब्रजेश कानूनगो - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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कविताएँ:ब्रजेश कानूनगो

अपनी माटी             (ISSN 2322-0724 Apni Maati)              वर्ष-2, अंक-18,                   अप्रैल-जून, 2015


चित्रांकन
संदीप कुमार मेघवाल

चिड़िया 

चिड़िया फिर चली आई है आँगन में
रोज का आना जारी है चिड़िया का
तब भी आती थी
जब मैं खुद चहकता था चिड़िया की तरह

पिता बहुत प्यार से बिखेर देते थे
अनाज के दानें गोबर लिपे आँगन में
और इंतज़ार करने लगते थे बेसब्री से चिड़िया के आने का
थोड़ी देर में चली ही आती थी चिड़िया
और चुगने लगती बिखरे हुए दानें
कुछ चोंच में समेटकर ले जाती अपने घोसले में भी

कई बार चला आता है चिड़िया के साथ उसका पूरा परिवार

उस दिन भी नहीं भूली थी आना
घर में आई थी जब एक और प्यारी चिड़िया
खुशियों का सितार लिए  
एक जैसी दिखती थीं दोनों चिड़ियों की आँखें

धीरे धीरे सुरीला संगीत सुनाते हुए
खेल खेल में झपट लिया उसने
चिड़िया को चुगाने का मेरा रोज का काम

चिड़ियों की दोस्ती धूप की तरह बिखरती तो
कुछ पिघलने लगता था हमारे भीतर

खुशी की बात तो यह कि
संगिनी की बिदाई के बाद भी
पेड़ से उतरकर आती रही चिड़िया हमारी खैर खबर लेने

अंतरंग इतने हो गए हैं उससे कि
खुश होते हैं तो वह
भी नजर आती है पुलकित
मन उदास हो तो लगता है
गुजर रही है चिड़िया भी किसी दुःख से आज

सुबह सुबह ही आती है चिड़िया
दिन चढ़ने पर फिर से सूना हो जाता है आँगन
शायद चली जाती हो पास के शहर
सितार बजाने वाली दोस्त से बतियाने
अगली सुबह चिड़िया में खोजते हैं हम
अपनी चिड़िया की ताजा कहानी
जानना चाहते हैं बजाए गए राग के बारे में

बिलकुल सच था हमारा अनुमान
कल जब फोन आया संगिनी का तो पता चला
एक चिड़िया रोज चली आती है भर दोपहर सितार सुनने
पानी-चुग्गा रखा जाने लगा है अब बालकनी में उसके घर

यह बताते हुए भीग रहा था उसका स्वर
कि अब परदेस में बजाना पडेगा सितार
समझ नहीं पा रहा
कि यह खुशखबरी है या
दुर्घटना की कोई सूचना
दूरियां बढ़ जाती हैं तो स्थानीय तरंगे
पहुँच नहीं पाती रिसीवर तक आसानी से

चिड़िया के बस में नहीं रहेगा अब खबर लाना

कैसे जा पाएगी अब चिड़िया
इतनी ताकत नहीं है डैनों में कि उड़ सकेगी इतनी लम्बी दूरी
मुश्किल है सात समुन्दर का फासला तय करना

नहीं...नहीं.. बिलकुल नहीं पहुँच पाएगी वहाँ
हमारी यह नाजुक देसी चिड़िया

तसल्ली की बात है कि
उम्मीद के कुछ परिंदे देशांतर से अभी भी
आते रहते हैं पर्यटन करने
भरोसा यह भी है कि
संगिनी बजाएगी सितार
और कर लेगी किसी विलायती चिड़िया से नई दोस्ती

कहीं की भी क्यों न हो
चिड़िया तो बस चिड़िया होती है
सबको डालते रहेंगे दाना बेनागा

करते रहेंगे चिड़िया के आने का इंतज़ार
जब आएगा कोई दिसावर पक्षी
पूछेंगे उससे कि
कैसा बजा रही है बिटिया वहाँ सितार

दृश्य 
1
एक कुतिया पूरी लय में
खुरचती रही पेड़ के पास की जमीन
जैसे चिड़िया घोसला बनाती है डाली पर पत्तियों के बीच
जैसे छोटा मौजा बुनती है गुनगुनाते हुए कोई नवेली

और एक सुबह
पेड़ के ऊपर नई चहचहाट के साथ साथ
नीचे भी आबाद हो जाती है छोटी-सी खोह
दुनिया थोड़ी और घनी
कुछ और बड़ी हो जाती है

जब हड्डियां तक बजने लगती है हमारी
घर से निकलना तो दूर की बात है
रजाई से बाहर निकलने में ही छूटता हैं पसीना
पिल्ले बन जाते हैं ऊन के गोले और
ऐसे गुँथ जाते हैं एक दूसरे में कि एकाकार हो जाते हैं
तैयार करते हैं खुद अपना कम्बल
घुसे रहते हैं उसमें सूरज के उगने तक

बच्चों को सर्दी से बचाने के जतन में
कुतिया का जबड़ा रूई का फोहा बन जाता है
निकालती है उन्हें खोह से
जैसे रजाई खींच कर जगाया जाता है सुबह-सुबह बच्चों को
धूप की सिगड़ी के पास गोटियाँ खेलने लगते हैं पिल्ले

अपने टुकड़ों का पेट भरने के लिए
टुकड़ों के इंतजाम में गई माँ जब लौटती है तो
ऐसे लपकते हैं पिल्ले
जैसे टाफियाँ लेकर दफ्तर से लौटे पिता को घेर लेते हैं बच्चे
माँ की छाती से चिपक संसार का सारा सुख
उनके भीतर उतर जाता है
संतोष से भर जाती है एक पृथ्वी.

2
भरी बस में बह रहा है खून
बर्छियों की तरह चुभ रही है कुछ नजरें
बाहर देखते रहते हैं खिड़की के पास बैठे यात्री
एक मादा को घेरे घूम रहा है कुत्तों का झुंड  

3
सड़क बंद है
बड़ा जाम लगा है
रुक गया है पहियों का घूमना
आक्रोश इतना अधिक है कि
पैदल भी गुजरने की हिम्मत नहीं किसी में

एक पिल्ला पड़ा है
लहुलुहान बीच सड़क में

लाश के पास
गुस्से से भरी बैठी है दुखी माँ

स्वाद
खट्टे-कसैले की मौजूदगी के बावजूद
बहुत बड़ा हिस्सा मीठा ही था उन दिनों
सलीम और मैं दौड़ते चले जाते थे
घंटी बजते ही दत्त मंदिर की ओर
प्रवचन के बाद बंटने वाला
‘गोपाल काला’ दही से बनता था
दोस्ती का वह स्वाद बना हुआ है अब तक

कैसे भुलाया जा सकता है
खालिस दूध से बना शरबत
कमरू आपा के प्यार जैसा मधुर
इस्माइल चाचा की रेवड़ियाँ और रोट
माँ के बनाए लड्डुओं की तरह
घुलते जाते थे मुंह में

नहर बन गई गली में
मछलियों की तरह बहकर आते थे भुट्टे और ककड़ियाँ
किशोर, बुग्गा, भय्यू और सलीम सब मिल करते थे शिकार
गर्म पकौड़ों की तरह लगता था उनका स्वाद
बरसात में भीगते हुए

स्वाद तो सेव-परमल का भी कुछ कम नहीं होता था
जो होली की रात चंदे की रकम से खाते थे हम बच्चे
पिता की दूकान से चुराकर लाता था अब्दुल
प्याज और हरी मिर्च

चखा तो नहीं पर देखा जरूर है विष का असर
खँडहर की खुदाई करते हुए मंगल का अमंगल देखा है

कॉलेज के दिनों में साइनाइड चख लेने का
दावा किया था एक प्रोफ़ेसर ने तो हँसे थे सब लोग
जीवित बचे तो पागल कहा जाने लगा उन्हें  
झूठा नहीं था रसायन विज्ञानी
हो सकता है अधिक विषैले की उपस्थिति ने
बेअसर कर दिया हो जहर का असर
या भीतर के किसी विष निरोधक तत्व ने
किया हो जमकर मुकाबला  

विष का असर देखा जा सकता है अब भी आसानी से
रंग नहीं अब स्वाद से एकाकार होता है गिरगिट
फलों, सब्जियों और अनाज के स्वाद में ऐसे घुलता है
कि पहचानना मुश्किल है विष का स्वाद

मनुष्यता के आँगन में घुसे आ रहे हैं विषैले जंतु
घुल रहा है साइनाइड आबोहवा में धीरे-धीरे
नदियाँ, भाषाएँ दूषित होने लगी हैं

पागल प्रोफ़ेसर कहाँ हो तुम
बताओ यह किस खतरनाक रसायन का विस्तार है
चखो इसे ठीक से
घोषित करो इसका सही-सही स्वाद

विष के खिलाफ रणनीति बनाने में
स्वाद का विश्लेषण बहुत जरूरी हो गया है अब


तुम लिखो कवि

सुनो कवि ! उठो ! दिन निकल आया है
सुनहरी रश्मियों ने अन्धकार को जीतना शुरू कर दिया है
सूरज के बच्चे देखो कैसी क्रीडा कर रहे हैं
उमंग और प्रफुल्लता से भरे
जैसे देश-देशांतर में विजय के बाद
सम्राट के सैनिक उत्सव में डूब जाया करते थे

कहाँ लिए बैठे हो कविता में आतंरिक लय और ध्वनि का मुद्दा
प्रहसनों के दौर में किस बिम्ब विधान में उलझे हो तुम
यह सीधे-सीधे उद्घोष का समय है
विरुदावली, प्रशस्ति गान पर करो भरोसा
वंदन, अभिनन्दन और स्वागत की घड़ी में आल्हा छेड़ो कोई

चाहो तो छंदमुक्त के आग्रह से हो जाओ मुक्त
फिर से रचो दोहा, सोरठा और चौपाई
यह न हो तो सबसे सुन्दर है आरती की रचना सार्वकालिक
कुछ लोग तरन्नुम और तर्ज पर ही बजाते हैं ताली
उन्हें कोई मतलब नहीं इससे कि
रचते हुए थम गयी होगी तुम्हारे दिल की धड़कन
शब्दों को नया अर्थ देकर कैसे सुर में लाए होंगे अपना जीवन

झिझक छोडो, ठीक से समझो अपना धर्म
कपडे बदल लेने से नहीं बदलता किसी की आँखों का रंग
देखने का कोण रहता है जस का तस
वैसा ही बना रहता है खोपड़ी के भीतर का तंत्र

खतरनाक भी हो जाती है अधिक खुशी कभी-कभी
उल्लास के उबाल पर पानी का ठंडा छींटा होती है कविता
व्याकरण और विधान की चिंता मत करो अब ज्यादा
कलम उठाओ...और लिखना शुरू करो..और लिखते जाओ कविता....
 

ब्रजेश कानूनगो 
कविता संग्रह ‘इस गणराज्य में’(2014)से चर्चा में 
मनोरम,503 ए,गोयल रिजेंसी,
चमेली पार्क,कनाडिया रोड, 
इन्दौर-452018
मो-09893944294
ई-मेल:bskanungo@gmail.com

1 टिप्पणी:

  1. सरल भाषा में बिना किसी लाग लपेट के लिखी गई खूबसूरत कवितायेँ

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