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सम्पादकीय:सरकती जाए है रुख से नक़ाब

Written By Manik Chittorgarh on बुधवार, अप्रैल 22, 2015 | बुधवार, अप्रैल 22, 2015

अपनी माटी             (ISSN 2322-0724 Apni Maati)              वर्ष-2, अंक-18,                   अप्रैल-जून, 2015


वैसे तो नक़ाब का रुख से सरकना आशिकों के लिए दीदार-ए-यार का सबब बन  जाता है लेकिन इस दौर में जो नक़ाबें सरक रहीं हैं वे किसी माहताब के जलवागर होने की ख़ुशी लेकर नहीं आयीं हैं बल्कि नक़ाब के सरकते ही हैरान आशिकों के होश फ़ाख़्ता-फ़ाख़्ता हुए जा रहे हैं। हम तो कहते हैं ख़ाक पड़नी चाहिये इस दौर पर; जो मोहब्बत के ऐसे-ऐसे इम्तहान ले रहा है कि बिहार के पेशेवर नकलबाज़ तक बेहोश हुए जा रहे हैं। कहाँ वो दौर था कि आहिस्ता-आहिस्ता नक़ाब सरकती थी और चाहने वालों को लगता था कि मियां बस ज़रा और सरके तो नामुराद दिल शादो आबाद  हो जाये। बस बेकरारी बढ़ती जाती थी और उम्र तमाम हो जाती थी। नक़ाब के पीछे से  माहताब निकलने से पहले ही अल्लाह मियां के यहाँ से बुलावा आ जाता था और दिल उम्मीद से वाबस्ता होकर रुखसत हुआ करता था। पर अब कहाँ रहे वे दिन! 

अब तो नक़ाब इतनी तेज़ी से सरक रहीं  हैं और सामने आ रहे चेहरे इतने दागदार हैं कि लोगों का यकीन ही दम तोड़ रहा है।  मुझे तो लगता है आने वाला दौर नक़ाबों का होगा। तमाम लोगों की बस एक ही ख़्वाहिश होगी कि अब कोई नक़ाब न सरके अभी दिल बहुत कमज़ोर है।  माहताब  का हुस्न देखने का इंतज़ार करता मेरा मुल्क अब नाउम्मीद हो चला है। हुस्न का भरम मिटने लगा है और दाग़ों का स्याह रंग अब डराने लगा है।  अब बस एक यही रास्ता है कि नक़ाबों को  सरकने से रोका जाये। तब तक रोका जाये जब तक दाग़दार चेहरों के इलाज़ का  इल्म हासिल नहीं कर लेता३ये आशिक़ों का सिरमौर .... ये मेरा दिल ................   ये  मेरा हिन्दुस्तान ........

अशोक जमनानी           


अपनी माटी का यह त्रैमासिक अंक-18 कुछ देरी से आ पाया उसके लिए माफी चाहते हैं। अपनी माटी पत्रिका को अभी तक ई फॉर्म में ही प्रकाशन किया जा रहा था मगर आपकी तरफ से मिले सुझावों और हमारे सलाहकार समूह के मंथन के बाद हम इसे पीडीएफ फॉर्म में प्रकाशित कर रहे हैं ताकि इसे कुछ आराम और सुविधा के साथ पढ़ा जा सके। यह बहुत आशाजनक है कि देशभर में लगातार लघु पत्रिकाओं का हस्तक्षेप बढ़ रहा है और ऐसे में ई माध्यम में भी बहुत सारी पत्रिकाओं के अंक ऑनलाइन मिलने लगे हैं।जितना अधिक मात्रा में लिखा जा रहा है उतना ही अधिक मात्रा में पढ़ा भी जा रहा है। चयन को लेकर कुछ मुश्किलें ज़रूर बढ़ी है। इस तरह पत्रिकाओं का प्रकाशन कोई क्रान्ति करेगा जैसे यूटोपियन विचार तक न भी जाएं फिर भी यही कुछ है जो हमें आस बंधाता है। मुख्यधारा के मीडिया के रवैये के चलते हमें समानांतर विकल्प के विकास और उनके उपयोग पर ज्यादा जोर देने की ज़रूरत है।

इस मुश्किल वक़्त में हम सभी की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है जब हम देख रहे हैं कि अभिव्यक्ति के खतरे उठाने वालों को लगातार हतोत्साहित किया जा रहा है। हमने इस अंक में कोशिश कर कुछ मित्रों से निवेदन किया और आपके लिए कुछ सार्थक रचनाएं छाप पाएं हैं। अंक में युवा कवि नील कमल की कलकत्ता शहर पर केन्द्रित पच्चीस कविताओं की सीरिज एक बड़ा हासिल मानी जाए। स्मृति शेष में हमने तुलसीराम जी और नन्द बाबू को याद करने की कोशिश की है।रविकांत और ललित श्रीमाली का शुक्रिया कि वे हमारे लिए कुछ लिख सके। प्रख्यात कथाकार उदय प्रकाश की चर्चित कहानी जिस पर बाद  में इसी शीर्षक से फ़िल्म भी बनी को लेकर विजय शिंदे का आलेख हमें कहानी को नए सिरे से जानने के लिए आग्रह करता है। प्रगतिशील कवयित्री और सामाजिक चेतना की संकेतक मीरा और जानी मानी उपन्यासकार मैत्रेयी पुष्पा जी पर केन्द्रित दो आलेख भी अंक में जान फूंकते नज़र आयेंगे। हाल ही में ज्ञानपीठ के नवलेखन सम्मान से नवाजी गयी बाबुषा कोहली को आधार बनाकार एक आलेख विमलेश शर्मा का भी इसी अंक में शामिल किया है।जिसे भी कहा सभी ने अपनी माटी के लिए लिखा है। आभार तो बनता है। अंक में शामिल कविताओं में इस बार देवयानी भारद्वाज, ब्रजेश कानूनगा, वरुण शर्मा, डॉ.कर्मानंद आर्य जैसे प्रतिभावान साथियों को प्रकाशित कर गर्व अनुभात हो रहा है। कई दिनों से मन था कोटा राजस्थान वासी युवा रंगकर्मी राजेंद्र पांचाल से एक बातचीत की जाए और मित्र कवि ओम नागर ने इसे संभव कर दिखाया। छोटी ही सही मगर एक सार्थकता के साथ यह इंटरव्यू आपको राजेंद्र भाई के बारे में जानने में ज़रूर मदद करेगा।इस अंक में शोध आलेखों पर हमने फोकस नहीं किया मगर फिर भी दो ठीकठाक आलेख आप पढ़ सकेंगे। आशा है एक सौ पंद्रह पेज में समाहित यह सामग्री आपको पसंद आयेगी।

बीते चार महीनों में हमारे वर्तमान में परिदृश्य से कई बड़े नामचीन साथी और सक्रिय आन्दोलनकारी चल बसे उन्हें याद करे बगैर यह बात अधूरी ही रहेगी। प्रसिद्द कार्टूनिस्ट आर.के.लक्ष्मण और दलित विमर्श के जानकार प्रो.तुलसीराम जी, गांधीवादी विचारक नारायण भाई देसाई हमारे बीच नहीं रहे। वरिष्ठ पत्रकार विनोद मेहता के अवदान से सभी परिचित हैं ही। इप्टा जैसी आन्दोलनकारी संस्था के महासचिव जीतेन्द्र रघुवंशी का समय चले जाना सभी को कहल रहा है। सभी को अपनी माटी की तरफ से हार्दिक श्रृद्धांजलि। 


माणिक
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