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कविताएँ:बिपिन कुमार पाण्डेय

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on मंगलवार, सितंबर 08, 2015 | मंगलवार, सितंबर 08, 2015

अपनी माटी(ISSN 2322-0724 Apni Maati) वर्ष-2, अंक-19,दलित-आदिवासी विशेषांक (सित.-नव. 2015)


कविताएँ:बिपिन कुमार पाण्डेय


नियति (1)
चित्रांकन-मुकेश बिजोले
जिसे आप सभ्यता का उदय कहते हो
वह हमारे शोषण की गाथा है
क्यूंकि
एक तरफ आप की गगनचुम्बी अट्टालिकाएं
जहाँ आपका जयघोष कर रही थी
वही उनकी नींव के नीचे जिन्दा दफ़न थे
हमारे कुछ अपने, और ढेरों सपने
आप दफनाते गए, हम दफनते गए
क्यूंकि कुछ किताबों को दिखाकर
आप हमे समय-समय पर बताते रहते थे
हमारे अपनों और सपनो का दफ़न हो जाना ही
हमारी नियति है

सभ्यता बचाओ (2)
अगर हमारे में से कोई पढ़ ले
थोड़ा आगे बढ़ ले
तो रूह काँप जाती है आप लोगों की
सभ्यता और संस्कृति का
 विनाश होने लगता है
 आप करने लगते हो दुष्प्रचार
अरे यह तो किसी ब्राह्मण या क्षत्रीय का जना है
वरना इन शूद्रों में इतना साहस और पराक्रम कहाँ होता है भला
देखो तो रंग भी गोरा है इसका
बिना हमारे वीर्य के इनमे इतनी रंगत नहीं आ सकती
फिर इनसे थककर देते हो आरक्षण को गालियाँ
और हर गली-कूंचे में कहते फिरते हो
देखो तो सालों ने हमारा हक़ ही मार लिया
बिना किसी मेधा के, बैशाखी के सहारे यहाँ तक पहुँच गये
नि:संदेह अब देश को रसातल जाने से कोई नहीं रोक सकता
और फिर देश को रसातल में जाने से बचाने के लिए
अपनी सभ्यता संस्कृति के आन-बान, शान के लिए
करते हो वो सब कुछ
जो कभी  मानवता की श्रेणी में नहीं आ सकता
और इतना सब करने के बाद
समवेत स्वर में जय सभ्यता, जय आर्य, जय सनातन के नारे लगाते हो

हे! राम (3)
हे! राम जरा बताओगे मुझे
अपने जीवन के उस पल को
जब अपने तीक्ष्ण शरों के दम पर
शम्बूक को मारा था

क्या आपके हाथ सच में नहीं काँपे थे
धर्म और मर्यादा की दुहाई देकर, निर्दोष को मारते वक्त
क्या एक पल को भी आपने नहीं सोचा
इतिहास आपको कैसे देखेगा इस दुर्घटना के बाद

हे ! राम जरा बताओगे मुझे
आपने मारा था पहले शम्बूक को
या शम्बूक ने खत्म किया था उस पुरातन व्यवस्था को
जिसमे खास लोगों को खास अधिकार नहीं थे
और लड़ पड़ा था अकेले ही, तबके एक अपराजेय योद्धा से
अपने को सबके बराबर लाने के लिए


एक थी फूलन (4)
एक थी फूलन
जिसने मानने से इन्कार कर दिया था
कि निचली जाति का होने के नाते,
 मसला जाना उसकी नियति है,
उसे इतिहास की उस धीवर कन्या जैसा होने से भी गुरेज था
जिसे दिन के उजाले में ही परासर ने बीच नदी दबोच लिया था
और काम पिपासा शान्त की थी,
और तब की उस धीवर कन्या ने उनके वीर्य को
प्रसाद समझ कर अपने कोख में धारण किया था
उसने चुना प्रतिरोध का रास्ता
जो शायद अबतक उसके जैसे किसी और ने नहीं चुना था 
और फिर उसने उन आताताईयों को मिटा डाला
जिन्होंने खुद को परासर और उसे धीवर कन्या समझ
दबोच लिया था ,यूँ ही किसी दिन
आत्मसम्मान के साथ उठ खड़ी हुई थी वह रणचंडी की तरह,

और लाखो अपने जैसे लोगों की प्रेरणा बन गयी थी

(बिपिन कुमार पाण्डेय,शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत,बाड़मेर,राजस्थान.संपर्क सूत्र:09799498911)
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