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आलेख:भाषा, बाज़ार और मीडिया/ सर्वेश पाण्डेय

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on सोमवार, जनवरी 11, 2016 | सोमवार, जनवरी 11, 2016

चित्तौड़गढ़ से प्रकाशित ई-पत्रिका
अपनी माटी
वर्ष-2, अंक-21 (जनवरी, 2016)
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आलेख :भाषा, बाज़ार और मीडिया/ सर्वेश पाण्डेय 

चित्रांकन-सुप्रिय शर्मा
’’एक जीवित भाषा एक धड़कती हुई महत्त्वपूर्ण चीज़ है जो हमेशा बदलती रहती है, हमेशा विकसित होती रहती है और उन लोगों की तस्वीर दिखाती है जो इसे बोलते या लिखते हैं।‘‘1                                                      -
पं. जवाहर लाल नेहरू

’’एक तरफ कुछ लोग की सामन्ती भाषा, सामन्ती भूषा, सामन्ती भोजन और सामंती भवन रहा है, तो दूसरी तरफ करोड़ों लोगों की लोकभाषा, लोकभूषा, लोकभोजन और लोकभवन रहे हैं।‘’2                                                                                                                -राममनोहर लोहिया

यों ’भाषा‘ का सवाल पूरी दुनिया के गंभीर राजनेताओं के लिए महत्त्वपूर्ण रहा है। लेनिन से लेकर मुस्तफा कमाल पाशा तक भाषा और साहित्य पर पैनी निगाह रखते हैं। भारत में महात्मा गाँधी, मदन मोहन मालवीय, पुरुषोत्तमदास टंडन, पं. नेहरू से लेकर राममनोहर लोहिया तक भाषा पर गंभीर विचार करने वाले राजनेता रहे हैं। इनमें से लोहिया को छोड़कर सारे राजनेता आज़ादी से पूर्व की परिस्थितियों में ‘भाषा समस्या’ पर विचार किया है।    

आज़ादी के दौरान हिंदी ’सुराज भाषा‘ के रूप में पूरब से लेकर पश्चिम तक, उत्तर से लेकर दक्षिण तक बिना किसी पूर्वग्रह के जनभाषा के रूप में प्रयुक्त होती थी। एक उम्मीद भी जगी कि आज़ादी के बाद हिंदी पूरे राष्ट्र की भाषा होगी। लेकिन उम्मीद तो बस उम्मीद ही रही हक़ीक़त न बन सकी। वैसे एक हक़ीक़त यह भी है कि भारत में जनभाषा कभी भी शासन और शिक्षा-माध्यम की भाषा नहीं बन पाई। वैदिक युग में देववाणी संस्कृत शासन एवं शिक्षा की माध्यम रही फिर मध्यकाल में अरबी-फारसी और उसके बाद अंग्रेजी जो अब तक बदस्तूर कायम है। आज भी संसद का काम-काज हिंदी अनुवाद पर टिका है।‘‘सरकारी तंत्र में हिंदी का विकास स्वतः न होकर अनुवाद की भाषा के रूप में हुआ है।’3 

भाषा के प्रति सजग दृष्टि रखने वाले एवं अंग्रेजी शिक्षा-दीक्षा प्राप्य हिंदी की वकालत करने वाले प्रथम प्रधानमंत्री पं. नेहरू का आज़ादी के बाद प्रथम भाषण उनकी हिंदी के प्रति व्यावहारिक सोच क्या थी, बताती है, जिसकी ओर इषारा करते हुए पवन कुमार वर्मा ने लिखा है-‘‘14 अगस्त  सन् 1947 की मध्य रात्रि को भारत जब अंग्रेजों की जंजीरो से आज़ाद हुुआ, उस वक़्त करोड़ों देशवासियों को नेहरू ने जब सम्बोधित किया तो वह अंग्रेजी में ही था। दुर्भाग्यवश कुछ ही लोग ऐसे थे जो उस वक़्त नेहरू के भाषण को समझ पा रहे थे। .......बड़ी अजीब परिस्थिति थी। भारत जिस वक़्त आज़ाद हुआ करोड़ों लोग अपने नेता की बात सुनना चाहते थे, लेकिन उनका नेता जनता की भाषा न बोलकर शासक की भाषा बोल रहा था। ....... नेहरू को अच्छी तरह पता था कि वे जो कुछ बोल रहे हैं उसे ज्यादातर देशवासी समझ नहीं पा रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद किसी को यह अजीब नहीं लगा।’4 जबकि हिंदी की सशक्त वकालत करते हुए महात्मा गांधी ने यहाँ तक कहा कि ’‘अगर मेरे हाथ में तानाशाही सत्ता हो तो मैं आज से ही विदेषी माध्यम के जरिए दी जाने वाली शिक्षा बंद कर दूँगा।’‘5 

  तब आखि़र ऐसा क्या कारण है, जो हिंदी को सीमित रखना चाहता है? इन कारणों पर मंथन करते हुए राममनोहर लोहिया ने निष्कर्ष दिया कि शासन करने वालों के लिए भाषा भी एक हथियार होती है। हिंदुस्तान का नेतृत्व करने वाला वर्ग कभी नहीं चाहता कि जनता की भाषा में काम हो। वह शासन का रहस्य बनाए रखना चाहता है। ‘‘देहातों में लोगों पर भूत चढ़ता है तो ओझा को बुलाकर मन्तर से झड़वाते हैं। ओझा का मन्तर लोग समझने लगें तो ओझाई और भूत दोनों खत्म हो जाएँ। उसी तरह आज देश के वकील, डॉक्टर और मंत्री अंग्रेजी भाषा में अपनी ओझाई चला रहे हैं।’’6 दरअसल भाषा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण साधन है जिसके जरिए आत्मा को वश में किया जाता है और उसे बंदी बना लिया जाता है शारीरिक गुलामी के लिए गोलियों को साधन बनाया जाता है लेकिन मानसिक और आत्मिक गुलामी भाषा के जरिए थोपी जाती है। ’‘सिर्फ बन्दूक के जरिए नहीं बल्कि ज्यादा तो गिटपिट भाषा के जरिए लोगों को दबाए रखा जाता है। लोक भाषा के बिना लोकराज्य असंभव है।’’7

हिंदुस्तान जैसे विविधता वाले देश में भाषायी एकरूपता को लादे जाने का प्रयास हो रहा है। अंग्रेजी जो औपनिवेषिक भाषा थी, वह शिक्षा, संचार, व्यापार की भाषा होने के साथ-साथ ज्ञान की कसौटी भी बनती जा रही है। दलील यह भी दी जा रही है कि अंग्रेजी ही हमें ‘विकास’ की ओर अग्रसर कर सकती है जबकि हमारे अपने ही समय में कई मुल्क ऐसे हैं जो अपनी भाषा में ही ’विकास’ कर ’विकसित देश’ की श्रेणी में खड़े हैं।
औपनिवेषक भाषा किसी भी देश की संस्कृति को न तो वहन कर सकती है और न ही जनसामान्य तक सम्प्रेषित हो सकती है। वह तो केवल मानसिक गुलामी पैदा कर वर्चस्व की स्थापना करती है। अफ्रीकी साहित्यकार डेविड ड्योप ने औपनिवेषिक भाषाओं के इस इस्तेमाल के विरुद्ध अपना पक्ष मजबूती के साथ रखते हुए कहते हैं, ‘‘अपनी भाषा से वंचित और जनता से कटा हुआ अफ्रीकी लेखक विजेता राष्ट्र की किसी साहित्यिक धारा का बस प्रतिनिधि हो सकता है। उसकी कृतियाँ अपनी कल्पनाशीलता और शैली के जरिए स्वाँगीकरण नीति की उत्कृष्ट मिसाल होने के नाते निश्चय ही आलोचकों के एक समूह की वाहवाही लूटने में सफल हो जाएँगी। दरअसल यह वाहवाही भी मुख्य रूप से उपनिवेशवादी के ही थैले में जाएगी, जो जनता को गुलाम बनाए रखने मंें जब असफल होने लगता है तो वह उनका ऐसे विनम्र बुद्धिजीवियों में रूपांतरण कर देता है, जो पश्चिमी साहित्यिक तौर तरीके का अनुकरण करते हैं। यह और बातों के अलावा उन्हें दोगला ठहराने का और भी ज्यादा धूर्त तरीका है।’’8 यह विचार भारतीय संदर्भ में भी सटीक है। 

गौरतलब है कि अंग्रेजी का विरोध अंग्रेजी भाषा और साहित्य से नहीं अपितु उसके वर्चस्व से है। जब अंग्रेजी आतंक पैदा करने वाली भाषा की भूमिका निभाती है तो उसका विरोध लाज़िम है। गांव में, कचहरी में, विश्वविद्यालय में, प्रशासन में कई लोग अंग्रेजी बोलकर दबदबा पैदा करते हैं। लोहिया का विरोध भी अंग्रेजी के इस दबदबे से है, अंग्रेजी भाषा से नहीं ’‘जब हम ’अंग्रेजी हटाओ’ कहते हैं तो हम बिलकुल नहीं चाहते कि उसे इंगलिस्तान या अमरीका से हटाया जाए और न ही हिन्दुस्तानी कॉलेजों से, बशर्ते कि यह ऐच्छिक विषय हो। पुस्तकालयों से उसे हटाने का सवाल तो उठता ही नहीं।’’9 राममनोहर लोहिया यह भी देख रहे थे कि आजाद भारत में किस प्रकार हिंदी के विरुद्ध दक्षिण भारत आक्रामक रुख़ अपनाए हुए है, जो आज भी है, जो सत्ता काबिज करने का ‘टुल्स’ भी बन गया है। यह विडम्बना ही है कि पाँच सौ से अधिक रियासतों का विलय कर बने भारतीय संघ में पहले पहल भाषायी आधार पर ही प्रदेष (आन्ध्र प्रदेश) का गठन हुआ। ऐसे में लोहिया ने भारतीय भाषाओं के वर्णमालाओं की समानता को रेखांकित करते हुए इस बात पर बल दिया कि अधिकांश भाषाओं की ध्वनि और लिपि एक-सी है, फिर आपस में विरोध किसलिए। ‘‘भारतीय वर्णमालाओं की ध्वनि में समानता का यह चमत्कार बहुत हद तक उसकी आकृति में भी प्रतिबिम्बित है। किन्तु काल और दूरी ने उसके साथ कुछ खेल खेलें हैं।...... उदाहरण के लिए कन्नड़ अक्षर नागरी से बेहद अलग प्रतीत होते हैं पर जिस कागज पर वह लिखे गए हैं, उसे सिर्फ 90 अंश समकोण पर घुमा भर दीजिए। इससे काल और दूरी का खेल कुछ-कुछ समझ में आने लगेगा। .... कन्नड़ के अक्षर को ऐसे घुमाइए कि उसका बायाँ हिस्सा ऊपर आ जाए, और ऊपरी हिस्सा दाएँ आ जाए तो उसके कई नागरी अक्षर बन जायेंगे। .... सभी भारतीय वर्णमालाओं की ध्वनि 99 प्रतिशत और आकृति 80 प्रतिशत के ऊपर समान है। बांग्ला, उड़िया, असमी और मैथिली सभी एक भाषा की प्रकारान्तर हैं, जो शायद कभी पूर्वी प्राकृत या मागधी रही हैं।... भारत की विभिन्न वर्णमालाओं की जानकारी और ज्ञान के अभाव के कारण ही सुधारकों के एक वर्ग ने समय-समय पर रोमन लिपि की सिफारिश की है। ..... मेरी समझ में नहीं आता कि बांग्ला और गुजराती अपनी लिपि अलग क्यों रखना चाहते हैं? अलग-अलग लिपियों के इस्तेमाल करने वालों के संकुचित और निजी स्वार्थ के साथ ही ये लिपियाँ राष्ट्रहित के विपरीत भी पड़ती हैं।‘‘10 

  इस प्रकार देखते हैं कि हमारे यहाँ भाषाओं की समृद्धशाली परंपरा मौजूद हैं लेकिन इससे अनभिज्ञ कुछ ऐसे तथाकथित बुद्धिजीवी हैं जिनके लिए अंग्रेजी, ग्रीक और लैटिन सबसे समृद्ध भाषा है जिसमें जटिल एवं संशलिष्ट भावाभिव्यक्ति के साथ-साथ समाज, राष्ट्र, संस्कृति के सवालों को अच्छे तरीके से अभिव्यक्त किया जा सकता है। ऐसे लोग अपनी हर बहस में अंग्रेजी, ग्रीक, यूनान की सूक्तियों एवं कथाओं को ’कोट’ करते हुए अपनी विद्वता दर्शाते हैं। ’’अपने देश के बारे में अनजान कुछ लोग केवल प्राचीन ग्रीक कथाएँ तथा अन्य देशों की कहानियाँ ही बयान कर सकते हैं।‘‘11 जबकि सचाई तो यह है कि कोई भी भारतीय भाषा हरेक भारतीय के लिए अंग्रेजी या अन्य विदेशी भाषा की तुलना में अपनी है और इसलिए कई गुना सरल है। मगर इस तथ्य को छिपा कर, कपटपूर्वक अंग्रेजी को एक स्थायी उच्चाधिकारी स्थिति में रखकर, लोगों को ’चुनने‘ के लिए कहा जाता है। 

  ’’वर्तमान समय की सभ्यता का यह भी एक अंग है जो देश जितना ही सभ्य होगा, वहाँ उतना ही समाचारपत्रों का प्रचार देखने को मिलता है। जो पत्र अपने सब अंगों में परिपूर्ण है वे सभ्य जनों के समाज का एक उत्तम व्यास होते हैं। परदुख से दुखी, सुख से सुखी होना भी यही जानते हैं। निष्कपट बात, चोखी बात बोलना इन्हीं का काम है। दूसरों के लाभ के लिए अपनी हानि सहना उन्हीं से ही हो सकता है।‘12

बालकृष्ण भट्ट के निबंध ‘समाचार-पत्र की आवश्यकता’ प़त्रकारिता के उदात्त आशयों को बताता है। दरअसल भट्ट के समय जो कि स्वतंत्रता आंदोलन का समय था पत्रकारिता एक ‘मिशन’ था ‘प्रोफेशन’ नहीं। उस समय भी विज्ञापन निकलते थे जिसमें लिखा रहता था- ’संपादक चाहिए, वेतन है जेल और इनाम है फाँसी’ । तब भी कभी संपादकों की कमी नहीं हुुई और संपादक भी ऐसे कि यह तय करना कठिन है कि वे पत्रकार हैं या साहित्यकार। भारतेन्दु हरिश्चन्द महावीर प्रसाद द्विवेदी, गणेशशंकर विद्यार्थी, जयशंकर प्रसाद, मुंशी प्रेमचंन्द, माखनलाल चतुर्वेदी, बालमुकुंद गुप्त, अंबिका प्रसाद वाजपेयी, रामबृक्ष बेनीपुरी, आचार्य शिववूजन सहाय, अज्ञेय, धर्मवीर भारती के बीच यह पता करना मुश्किल है कि इनका योगदान साहित्य में अधिक है या पत्रकारिता में। अन्य भारतीय भाषाओं में भी लगभग यही स्थिति रही है। स्वाधीनता संग्राम की सबसे विषिष्ट उपलब्धि थी कि लोकमान्य तिलक, विपिनचन्द्र पाल, लाला लाजपत राय या महात्मा गाँधी सहित लगभग सभी राजनेता सक्रिय संपादक थे और सभी संपादक स्वाधीनता संग्राम के सेनानी। विश्व-साहित्य पर नज़र डालें तो प्रतिष्ठित और नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्नेस्ट मिलर हेमिंग्वे, जार्ज आरवेल, ग्रेबियल गार्सिया मार्क्वेज सहित अनेक नाम हैं, जो श्रेष्ठ साहित्यकार और चिंतक होने के साथ सक्रिय पत्रकार भी थे।

हिंदी पत्रकारिता के इतिहास को देखें तो वह कभी हिंदी गद्य के विकास और हिंदी के शब्द भंडार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है साथ ही कविता, कहानी, निबंध, उपन्यास को जन सामान्य तक पहुँचाने का स्तुत्य प्रयास भी किया। लेकिन आज की हिंदी पत्रकारिता हिंदी भाषा के अधोपतन की इबारत लिखने में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही है। किसी भी दिन का हिंदी अखबार उठा कर देखें तो, कई बार ऐसा लगता है कि मानो देवनागरी लिपि में अंग्रेजी का अखबार पढ़ रहे हों। शीर्षकों में, स्तम्भों में, पंचलाइनों इत्यादि में अंग्रेजी शब्दों की अनावश्यक, अनर्गल, अवांछनीय भरमार दिखाई पड़ती है, मिसाल के तौर पर एक अखबार की करतन नीचे प्रस्तुत है- 

बात ऐसी भी नहीं है कि आजादी के तुरंत बाद पत्रकारिता अपने ‘मिशन’ से दूर चला गया अपितु 70-80 के दषक तक अपने उसी जुझारू तेवर के साथ चलता रहा। मामला चाहे जवाहरलाल नेहरू या इंदिरा गाँधी जैसे ताकतवर प्रधानमंत्री का हो या फिर रक्षा मंत्रालय में जीप घोटाले का या फिर चीन के साथ युद्ध में भारत की पराजय का, बंगाल का अकाल हो या फिर पूर्वोत्तर समेत अशांत हिमालयी राज्यों में विदेशी घुसपैठ का हर मोर्चे पर मीडिया ने सरकार को चैन से बैठने नहीं दिया। उसने प्रतिपक्ष की भूमिका बखूबी निभाई। आपातकाल की घोषणा के विरोध में तो देश के कई अखबारों ने कई दिनों तक संपादकीय ही नहीं लिखे, सम्पादकीय का नियत स्थान काले बार्डर के साथ खाली छोड़ दिया जाता था यह जबरदस्त प्रतिरोध था शासन तंत्र के खिलाफ। इसी दौर में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आन्दोलन, राष्ट्रभाषा आंदोलन और हरित क्रांति जैसे अनेक राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों को आगे बढ़ाने में तत्कालीन मीडिया ने सार्थक भूमिका का निर्वाह किया।

लेकिन पिछले कुछ दशकों से खासकर नयी वैश्विक उदार आर्थिक नीति के लागू होने के बाद के दौर में प़त्रकारिकता भी प्रभावित हुई। पत्रकारिकता ने अपने ‘मिशन’ पक्ष को गौण और ‘मनी’ पक्ष को प्रमुख बनाया। अखबारों, टी.वी. चैनलों की अपने-अपने व्यावसायिक घरानों पर निर्भरता बढ़ने लगी। वस्तुतः नब्बे के दशक के बाद बाज़ार का विकराल रूप देखने को मिला। ऐसी बात नहीं है कि इससे पहले हमारे यहाँ बाज़ार नही था, अवश्य था, बल्कि हर समाज में एक छोटा सा बाज़ार हुआ करता था लेकिन अब बाज़ार में ही समाज है। पहले का बाज़ार एक रचनात्मक मानस भी निर्मित करता था। हिंदी खड़ी बोली के विकास में तो बाज़ार एवं सैनिक छावनियों का भी योगदान रहा है लेकिन अब का बाज़ार सिर्फ उपभोक्ता मानस की निर्मिति कर रहा है। हमें पता ही नहीं चलता कि हम बाज़ार में है या घर में। अब बाज़ार की केन्द्रीय स्थिति यह हो गई है जिसके एक कंधे पर राजनीति है तो दूसरे कंधे पर धर्म। यह महज संयोग नहीं है कि राजीव गाँधी ने जिस समय मंदिर का ताला खोला, उसी समय बाज़ार का भी ताला खोला। ताला खुलते ही वह अपने आकाओं के हुक्म की तामील करता हुआ खुद ही आका बन बैठा। बाज़ार का एक ही ध्येय वाक्य है ‘मेरा क्या फायदा’। इसी कारण वह हर-चीज़ को खरीद-बिक्री की चीज़ बना देता है जिसमें प्रकृति, संस्कृति, मनुष्य सब शामिल है। ‘फायदा’ के लिए बाज़ार ने विज्ञापन को जुड़वा भाई के रूप में आगे बढ़ाया जो टी.वी., रेडियो, अखबार, पत्रिका में अपना कब्जा धीरे-धीरे बढ़ाता जा रहा है और एक नितान्त उपभोक्तावादी समाज का निर्माण करता जा रहा है। स्थिति यह हो गई है कि विज्ञापन के बिना संचार के माध्यम अपने को विकलांग महसूस करने लगे हैं। वैसे भी उपभोक्ता समाज में ‘मानव’ भी अब शक्ति नहीं स्त्रोत बन गया है, दोहन के लिए। वह सृष्टि नहीं उत्पाद है, विपणन के लिए। अब वह नियंता नहीं एक गूँगी इकाई है, नियति है, हाँके जाने के लिए। ऐसे समाज में एकमात्र उपलब्धि है ’बिकाऊ‘ होना।

इसी तथाकथित बदलाव का नतीजा है कि आज की युवा पीढ़ी के कुछ पत्रकार मीडिया को ऐसे पेशे के रूप में लेते हैं जिसका उद्देश्य केवल और केवल पैसा कमाना रह गया है, चाहे इसके लिए कितने ही समझौते क्यों न करने पड़े। इन समझौतों से पत्रकारिता के मिशनरी होने की परिभाषा तार-तार हो जाती है। मीडिया का स्वरूप आज पूरी तरह बदल गया है चाहे प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रानिक मीडिया। अखबारों में आज विचारों के लिए अर्थात् संपादकीय पेज के लिए जगह कम होती जा रही है। जहाँ संपादकीय पेज बेशक मौजूद हैं, वहाँ अब गंभीर बहसों के बजाए छोटे- मोटे कॉलम उसका स्थान लेते चले जा रहे हैं या युद्ध, मनोरंजन सामग्री उसे स्थानापन्न करती जा रही हैं। पहले जहाँ अखबार विचारों की पूँजी देते थे अब पूँजी का विचार देनें में जुट गए हैं। संपादक का महत्त्व एक विचारशील प्रस्तोता के रूप में देश और समाज को दिशा दिखा सकने वाले व्यक्ति के रूप में कम होता चला जा रहा है। साथ ही अखबारोें में अब कहानियों, उपन्यासों और कविताओं के लिए जगह खत्म होती जा रही है और उसकी जगह टी.वी., फिल्म की चटपटी समाग्री के लिए जगह बढ़ती जा रही है। सेहत, खानपान, स्त्री-विमर्श, युवा जगत के नाम पर अखबार में लगभग एक जैसी सामग्री सप्ताह-दर-सप्ताह परोसे चले जा रहे हैं। अखबारों में उछल-कूद दिखाते युवा-युवतियों की, लगभग अश्लील प्रस्तुतियों वाले फिल्मी नायक- नायिकाओं की और पेज थ्री सरीखी सामग्री परोसती फोटो की भरमार होने लगी है। इलेक्ट्रानिक मीडिया भी पीेछे नहीं है। हर न्यूज चैनल ने बकायदे विज्ञापन का समय तय कर रखा है। चैनल का पूरा का पूरा ध्यान टी.आर.पी. पर है। न्यूज चैनल में तो एक मिनट में सौ-सौ खबरें प्रस्तुत करने का फटाफट खेल खेला जा रहा है। जहाँ एक ओर अखबार में अब विचारों के लिए स्थान सिकुड़ता जा रहा है, वहीं टी.वी., न्यूज चैनल में फटाफट विचारशीलता के अजीबोगरीब ख़तरे सामने आने लगे। ऐसी परिस्थति में मीडिया एक जागरूक और जिम्मेदार नागरिक तैयार करे या न करें लेकिन एक उपभोक्ता नागरिक ज़रूर तैयार कर रहा है।

उपभोक्ता नागरिक आत्मनिर्णय के अपने प्राकृतिक अधिकार को भूल-सा जाता है। ‘‘उपभोक्ता की यह विशेषता है कि वह अपनी मौलिक आकांक्षाओं से अपरिचित है, क्योंकि वह खुद अपने से अपरिचित है। यह नहीं कि उसकी इच्छाएँ नहीं हैं -किन्तु वह स्वयं इन इच्छाओं का निर्माता नहीं है।........जिसे हम अपना मन या इच्छा कहते हैं, वह हमसे न जुड़ी होकर चीजों के साथ जुड़ी हैं, वह चीज टुथपेस्ट हो या पेण्टिंग्स या टेलीविजन का प्रोग्राम, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता।‘’13

मीडिया के ‘मनी-पावर’ बनने की होड़ ने उससे उसकी प्रांजल भाषा भी छीन ली है जबकि उसके पास भाषा की समृद्ध परंपरा रही है। किसी पाश्चात्य विचारक का मशहूर कथन है कि ’’हमारे लेखन में पूर्वजों का लेखन इस तरह शामिल होना चाहिए जैसे हमारे मांस में हमारे द्वारा खाए गए जानवरों का मांस।’’ लेकिन आज की मीडिया का झुकाव हमारे पूर्वजों के वैचारिक पूँजी की तरफ न होकर हमारे देश के ऐसे अंग्रेजी लेखकों की तरफ ज्यादा है जो खुद ’कॉरपोरेट संस्कृति‘ के मूल्यों की ओर अधिक आकर्षित रहते हैं। फलतः मीडिया की हिंदी भाषा ‘हिंग्लिश’ बन गयी है, जिससे ऐसा प्रतीत होने लगा है कि हमारे भाषा की भी एक सीमा है। दरअसल किसी भाषा की सीमा उस समाज की सीमा को दर्शाती है। जबकि अंग्रेजी के अखबार और न्यूज चैनल अंग्रेजी में हिंदी या दूसरी भाषाओं की मिलावट नहीं करते। अंग्रेजी मीडिया की अंग्रेजी सड़क छाप अंग्रेजी नहीं है। उनके यहाँ अंग्रेजी में कठिन, पारिभाषिक, जटिल शब्दों का प्रयोग होता है और खूब होता है पर अंग्रेजीभाषी समाज में यह कभी बहस नहीं चलती कि अंग्रेजी मीडिया की अंग्रेजी कठिन है, उसे सरल बनाना चाहिए।

मीडिया की दोहरी भूमिका होती है, जहाँ वह शब्दों का सही-सही प्रयोग करके यानी शब्दों को संस्कारित करते हुए अपने समाज की, अपने दर्शकों- पाठकों की, भाषा और अभिव्यक्ति क्षमता का निर्माण करे- जिसमें सामान्य लोक व्यवहार की हल्की- फुल्की भाषा के साथ-साथ गंभीर, परिष्कृत भाषा भी होती है- वहीं दूसरी ओर सार्थक संस्कृतिकर्मियों (लेखक, पत्रकार फिल्मकार, नाटककार, चित्रकार इत्यादि) को जनता के सामने लाए। लेकिन आज की मीडिया शब्दों के संस्कारित करने की जगह बाजारु, कुत्सित, सनसनीखेज, चटपटे शब्दों एवं अति सरलीकृत मुहावरों का प्रयोग करती है जिसमें सर्वसाधारण के अनुभव व्यक्त हो ही नहीं पाते हैं और जो व्यक्त होते भी हैं, वह कुछ लोगों के औसत अनुभव होते हैं। आप चाहे जो न्यूज देखें-चैनल, चेहरा और आवाज के अलावा कुछ भी नहीं बदलता- शब्द वही, वाक्य-विन्यास वही, भाषा वही। तो दूसरी तरफ उसका वास्ता ऐसे सार्थक संस्कृतिकर्मियों से दूर होता जा रहा है जो सामाजिक संघर्ष एवं प्रतिपक्ष की दशा-दिशा निर्धारित करने वाले होते हैं और ऐसे ’हीरो‘ के करीब होता जा रहा है जिनकी पहुँच ’ऑडिएंस‘ तक सीमित रहती है। हिंदी के प्रसिद्ध कथाकार-चिंतक निर्मल वर्मा ’ऑडिएंस‘ की ख़ासियत बताते हैं ’’ये लोग अपनी मौलिक, निजी, विवेकसम्पन्न रुचियों द्वारा किसी कलाकृति का आस्वादन नहीं करते सिर्फ जो मिल जाता है, उसका उपभोग करते हैं।‘‘14 वस्तुतः आज की मीडिया ने उन सवालों से जूझना छोड़ दिया है जो मनुष्य की गरिमा को गिराने-मिटाने के प्रयासों में उठते हैं। मीडिया के इसी चरित्र को देखते हुए नवम्बर 2011 में भारतीय प्रेस काउंसिल के तत्कालीन अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू ने मीडिया पर तीखी टिप्पणी की, ‘’मीडिया में अधिकांश लोग बहुत ही निम्न स्तर का बौद्धिक कौशल रखते हैं, साथ ही उन्हें अर्थशास्त्र, राजनीति, दर्शन या साहित्य के बारे में बिल्कुल भी ज्ञान नहीं है। इस पर और गंभीर आरोप लगाते हुए काटजू ने यहां तक कह दिया कि भारतीय मीडिया लोगों के हित के लिए काम नहीं करता।‘‘15 काटजू के इस बयान पर मीडिया आत्ममंथन करने के बजाए उन्हीं की निंदा करने लगा, जबकि सोशल मीडिया काटजू के इस बयान से सहमत थी।

  ’’..... पर अंधकार आलोक का त्यौहार भी तो होता है। दीपक की लौ के हृदय में पैठ सके ऐसा कोई बाण अँधेरे के तूणीर में नहीं होता। यदि हमारी आत्मा में विश्वास की निष्कंप लौ है, तो मार्ग उज्ज्वल रहेगा ही।‘‘16 

  इस प्रकार की परिस्थिति मंे रोैशनी की एक किरण ’सोशल मीडिया‘ में नज़र आती है। वस्तुतः सोशल मीडिया परंपरागत मीडिया के एकाधिकार को चुनौती दे रहा है। आधुनिकता और प्रतिस्पर्धा के इस दौर में जहाँ पहले से खबरों के इतने सारे माध्यम मौजूद थे, वहाँ ’सोशल मीडिया‘ ने सबको पछाड़ते हुए अपनी ’अद्वितीय पहचान‘ बना ली है। यह लोगों की पहली पसंद बन गई है। इसका सीधा मतलब है ’जनता की आवाज‘। यहाँ न कोई चैनल है, न कोई अखबार सिर्फ आप खुद अपनी आवाज हैं जिसकी पहुँच सब तक है। इंटरनेट की दुनिया में लोगों के पास असंख्य सोशल मीडिया प्लेटफार्म है, जहाँ लोग एक दूसरे से आसानी से संपर्क बना सकते हैं। अपने सोच-विचार को आसानी से आपस में बिना किसी संकोच के, साझा कर सकते हैं- बनारस में अस्सी घाट के पप्पू के दुकान की तरह - जहाँ आपके विचारों को काउंटर करने वाले लोग भी मिल जायेंगे और आपसे सहमत लोग भी। सोशल मीडिया का प्रभाव इतना हो गया है कि परंपरागत मीडिया भी इसे अपने यहाँ स्थान देने लगा है। राजनेता, लेखक, पत्रकार, अभिनेता इत्यादि ने अपने-अपने एकाउंट खोले हुए हैं ताकि वे जनता से सीधे-सीधे सम्पर्क बना सकें और उनकी प्रतिक्रिया भी जान सकंे। सोषल मीडिया ने पत्रकार की भूमिका बदल दी है और अब प्रत्येक नागरिक पत्रकार है। सोशल मीडिया पर स्टेटस लिखना अभिव्यक्ति की आजादी के बड़े सवाल से जुड़ा है। सोशल मीडिया के इस लोकतांत्रिक स्वरूप पर सत्ता प्रतिष्ठानों द्वारा शिकंजा कसने का प्रयास किया गया। मामला तब तूल पकड़ा जब महाराष्ट्र में बाल ठाकरे की अंतिम यात्रा के दौरान राज्य में घोषित ’बंद‘ को एक लड़की द्वारा फेसबुक पर गैर-जरूरी बताए जाने पर उसे गिरफ्तार कर लिया गया। पष्चिम बंगाल, पुड्डुचेरि में भी ऐसे मामले आए। सोशल मीडिया पर की गई इस प्रकार की टिप्पणियों को आधार बनाकर, जो कि सत्तासीन लोगों को नागवार गुजरती हैं आइटी कानून की धारा 66-ए तहत गिरफ्तारी की श्रेणी में खडी कर दी गई हैं । इस धारा को लेकर दिल्ली की छात्रा श्रेया सिंघल ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की। याचिका में श्रेया ने 66-ए को कठघरे में लाते हुए इसे अभिव्यक्ति की आजादी, न्याय के समक्ष समता और जीवन के अधिकारों से जोड़ा। फलतः सोशल मीडिया पर खुले दिमाग-खाली नहीं-से विभिन्न मुद्दों पर दो टूक बात रखी जा रही हैं। लेकिन सोशल मीडिया पर सब कुछ अच्छा ही नहीं है। यहाँ भी कुछ ऐसे खाली दिमाग वाले अराजक-उपद्रवी तत्त्व हैं जो अपने नापसंद लोगों के खिलाफ अमर्यादित भाषा का प्रयोग करते हैं, लेकिन उजला पक्ष यह भी है कि ऐसे लोगों की संख्या बहुतायत है जो अपने विरोधियों को भी सम्मान देते हैं। इस संदर्भ में फ्रेंच विद्वान वाल्तेयर का मशहूर कथन याद आता है कि ’मैं आपके कथन के एक शब्द से भी सहमत नहीं हूँ लेकिन मैं अपने जीवन की अंतिम सांस तक आपके यह सब कहने के अधिकार की रक्षा करूँगा।‘ 

संदर्भ ग्रंथ सूची
1. रामचंद्र गुहा द्वारा उद्धृत, भारत: गाँधी के बाद, अनुवादक-सुशांत झा, पेंगुइन बुक्स इंडिया, 2012, पृ. 226
2. भारतमाता धरतीमाता, राममनोहर लोहिया, संपा. ओंकार शरद, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2007, पृ. 167.
3. संसद में अब कहाँ रहा हिंदी का वह ठाठ, विमल कुमार, दैनिक भास्कर (हिंदी दिवस विषय), 14/9/11, दिल्ली संस्करण, पृ.6. 
4. भारतीयता की ओर, पवन कुमार वर्मा, पेंगुइन बुक्स इंडिया, 2010, पृ. 71
5. मेरे सपनों का भारत, महात्मा गाँधी, सर्व सेवा संघ प्रकाशन, वाराणसी, 2010,       पृ. 71
6. धरतीमाता भारतमाता, राममनोहर लोहिया, संपा. ओंकार शरद, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2007, पृ. 169
7. राममनोहर लोहिया, संपा. ओंकार शरद, लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2008, पृ. 144
8. भाषा, संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता, न्गुगी वा थ्योंगो, अनुवादक-संपादक- आनंद स्वरूप वर्मा, सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, 1994, पृ. 36
9. लोहिया के विचार, संपा. ओंकार शरद, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2008, पृ. 135
10. भारतमाता धरतीमाता, राममनोहर लोहिया, संपा. ओंकार शरद, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2007, पृ. 137-139.
11. माओ त्से तुंग का कथन, न्गुगी वा थ्योंगो द्वारा उद्धृत, अनुवादक-संपादक, आनंद स्वरूप वर्मा, सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, 1994, पृ. 45.
12. निबंधों की दुनिया: बालकृष्ण भट्ट, संपा. दिविक रमेश, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2012, पृ. 70
13. शब्द और स्मृति, निर्मल वर्मा, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, 2011, पृ. 46-47
14. वही,
15. तहलका पत्रिका (पत्रकारिता विशेषांक), पाक्षिक, संपा. रमेश रामचंद्रन, अंक 15, 1-15 अगस्त, 2015, पृ. 7
16. निबंधों की दुनिया: महादेवी वर्मा, संपा-कुसुम बाँठिया, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2012, पृ. 57


सर्वेश पाण्डेय शोध-छात्र हिंदी विभाग  डॉ. हरीसिंह गौर वि.वि. सागर (म.प्र.)
मोबाईल: 09452483702 ई-मेल pandeysarvesh150@gmail.com
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