कुछ कवितायेँ:नवनीत नीरव - अपनी माटी

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सोमवार, जनवरी 11, 2016

कुछ कवितायेँ:नवनीत नीरव

चित्तौड़गढ़ से प्रकाशित ई-पत्रिका
अपनी माटी
वर्ष-2, अंक-21 (जनवरी, 2016)
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चित्रांकन-सुप्रिय शर्मा
कुछ कवितायेँ:नवनीत नीरव

हत्यारा

पूरब से निकलता हुआ,
सूरज,
चुग जाता है,
भोर की एक-एक तारिकाएँ,
जब्त कर लेता है,
नक्षत्रों की उधार ली हुई चमक।

संवेदनशीलता एक दायरे तक,
बच पाती है नर्म-मुलायम,
उसके बाद चाहे,
कितना ही फिरा लो,
ठंडी-गर्म छुरियां,
बटर की दरो-दीवार पर।

रेगिस्तान में भटकते,
बंजारे को,
बड़ी बेरहमी से मार डालता है,
उसका अकेलापन,
किस कदर ख़तरनाक हो सकती है,
संवादहीनता।

अपने सपनों, उम्मीदों, अरमानों के,
अक्सर गले रेतता मैं,
बड़े इत्मिनान से,
फेरते हुए छुरे,
हर रात,
जब कुछ पल बेरहम हो जाते।

सूरज, मौसम, रेगिस्तान, रात
जब सब कुछ ठीक है,
अंदर एक बेचैनी
लगी रहती है,
तोड़-फोड़, नष्ट, कुरूप करने की,
एक लालसा,
पल-पल पलती है।



ज़िंदगी: एक किताब

किताब के पहले सफ़हे पर,
नाम काट कर किसी का,
उसने लिख दिया है मेरा नाम,
अब वो किताब अपनी है।

छोड़ आया जिसे मैं बिना वजह,
कल ख्वाब वो दोराहे पर मिली,
एक समंदर उफनता रहा रात भर,
सुबह एक बदली बरसी है।

दिल भी न जाने क्यों गढ़ता है,
बेवजह, बिना मतलब के मुहावरे,
प्यार चुक जाता है एक ही बार में,
शेष बस जिन्दगी गुजरी है।



कुछ अपनी...कुछ उसकी

अपनी मनमानी,
उसकी नादानी,
लरज जाती बेदम,
रिश्तों की तानी।

अपनी तुनकमिजाजी,
उसकी बेपरवाही,
तोड़ती सीमाएं,
लफ्ज़ों की आवाजाही।

अपनी चुप्पी,
उसकी ख़ामोशी,
डूबते साए,
अपनी-अपनी आजादी।

अपनी खिसियाहट,
उसकी मुस्कुराहट,
गुत्थम-गुत्था साँसें,
भींगते पाजी।


यथार्थवादी

लाल सूरज की सवारी देख,
मुर्गा देता है बांग,
वर्षा मेघों के पदचाप सुन,
सहसा दौड़ पड़ते हैं आश्रय की ओर,
गाय- बकरियों के झुण्ड,
जलजले के खौफ़ से,
भूतल छेद कर सुरंग में जा घुसता है नेवला।

काल विकट है उनके लिए,
जो लेते हैं सांस,
जिनमें धड़कते हैं दिल,
जो होते हैं भयकातर, आक्रांत
परिस्थितियां जो भी पैदा होतीं,
प्रतिकूल या अनुकूल,
हैं तयशुदा तरीके सबके लिए।

मनुष्य दूसरा सर्जक है,
वह तो तर्कवादी है,
मन गढ़ंत दृश्य की कल्पना करता है,
वह क्षणभंगुर है, टूटता है,
उसके अपने सच हैं
शायद इसलिए तयशुदा नियमों पर,
विश्वास नहीं उसे,
खुद को लतियाता, गरियाता है,
मुंह की खाता है।

खोज लिए हैं उसने प्रयोजन,
अपनी सुविधा की खातिर,
सबको अनदेखा कर,
जबकि मालूम है उसे,
समय हमेशा से भारी है,
एक हलकी सी चपत सब ढेर।

पर जैसे घोषित करना है उसे,
खुद को स्वयंभू, सर्वशक्तिमान,
इसलिए मुलम्मा चढ़ाये फिरता है खुद पर,
घोर यथार्थवादी होने का,
और कर लिया है उसने खुद को,
सबसे, खुद से, हकीकत से कोसों दूर।

नवनीत नीरव
सहायक प्रबंधक,भारती फाउंडेशन,जोधपुर,राजस्थान
ई-मेल: navnit.nirav@bhartifoundation.org,मो- 9571887733  

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