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कहानी:कर्फ़्यू / शहादत खान

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शनिवार, अगस्त 06, 2016 | शनिवार, अगस्त 06, 2016

    चित्तौड़गढ़ से प्रकाशित ई-पत्रिका
  वर्ष-2,अंक-22(संयुक्तांक),अगस्त,2016
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कहानी:कर्फ़्यू /शहादत खान



चित्रांकन
चुनाव की घोषणा के साथ ही लोगों का अंदाजा हो गया था कि चुनाव होंगे तो दंगें भी होंगे। क्योंकि आधुनिक भारत में चुनाव लड़े और जीते ही जा रहे है दंगों के बलबूते। लेकिन किसी को भी इस बात का अनुमान नहीं था कि वह इतना भयानक और इतने लंबे समय तक चलेगा।

छेड़छाड़ के एक मालूम से विवाद पैदा हुआ दंगा सरकार की अदूरदर्शितापूर्ण नीति और प्रशासन की शिथिलता के कारण पूरे तीन दिन तक बिना रुके चलता रहा था। इसकी लपटे इतनी भयानक और तीव्र थी कि देखते ही देखते इसने राज्य के दर्जनों जिलों और उनके हज़ारों गाँवों को अपनी चपेट में ले लिया था। गाँवों से लोग जान बचाने के लिए शहर की ओर आ रहे थें और शहर के लोग खुद अपने पड़ोसियों के हाथों मारे जा रहे थें। जब हालात बिल्कुल ही काबू से बाहर हो गए तो सरकार ने गाँव से आने वाले लोगों को शहर से बाहर ही रोकना शुरु कर दिया। क्योंकि उनका आना शहर के तनाव की अग्नि में जलते माहौल में घी का काम कर रहा था। शहर में कर्फ्यू की घोषणा कर दी गई। साथ ही टीवी केबल और अखबारों पर भी प्रतिबंध लगा दिया।

कर्फ्यू लगने की घोषणा होती ही शहर में एकदम खामोश छा गई थी। एक भयानक दहशत भरी खामोश। उसकी सड़कें जो हमेशा ट्रैफिक जाम से पटी रहती थी। अब सूखी नदी के समान सूनसान थी। उसका बाजार जो हमेशा खरीदारों भरा रहता था। अब खंडहर की तरह वीरान था। उसकी गलियां जो हमेशा जाने-पहचाने और अनजान लोग दौड़ने-फिरने, बच्चों के खेलने और रोने-चिल्लाने और कपड़े और सब्जी के फेरी वालों के चिल्लाने से गूंजती रहती वह अब खामोश थी। एकदम भयानक तरीके से खामोश।

खाली सड़कों और गलियों में हवा की साएं साएं की आवाज़ से अलावा कहीं कुछ नहीं था। कुछ भी नहीं।

फ़साद को हुए दस दिन बीत चुके है और शहर में लगे कर्फ्यू को भी। हाल और हालात को देखते हुए ऐसे बिल्कुल नहीं लगता था कि आने वाले दिनों में भी उसमें कुछ ढील दी जा सकेगी। चारो ओर एक भयानक दहशत भरी वीरानी पसरी थी। जिसने दिन-रात के अन्तर को खत्म कर दिया था। न काम और न आराम। सब एक समान। इस वीरानी को अब दो ही चीज़े तोड़ती थी। रात में पुलिस की गाड़ी के सायरन की आवाज़ और दिन में गलियों-मौहल्लों में गश्त करते फोर्स के जवानों के बूटो की टक-टक। अन्य तीसरा कोई नहीं।

ऐसे ही जानलेवा माहौल में मस्जिद के पीछे वाली बंद गली में एक छोटे लेकिन पक्के घर के छोटे से चबुतरे पर बैठे कुछ लोग बातें कर रहे हैं। उनमें से एक चबूतरे के छोटी सी दिवार पर टेक लगाकर बैठा था। दो लोग उसके दाई तरफ़ बैठे हैं। एक आदमी उसके बाई ओर सिर नीचा किए ज़मीन पर माचिस की तीली से आड़ी तिरछी रेखाएं खींच रहा है। उसी की बगल में एक ओर आदमी चबूतरे पर न बैठकर उसके कंधे पर हाथ रखे खड़ा है।

चबूतरे से टेक लगाकर बैठे व्यक्ति का नाम रिहान है। वह एक लंबा तगड़ा नौजवान है। वह थोड़ा पढ़ा लिखा है और एक कारखाने में काम करता है। जमात में जाने के कारण उसके हल्के भूरे चेहरे पर लंबी काली दाढ़ी उग आई है। उसके सिर पर सफेद टोपी रखी है और उसने कुर्ता पायजामा पहन रखा है। उसके दाई तरफ़ बैठे पहले व्यक्ति का नाम अनीस हैं। वह एक पतला-दुबला सा अधेड़ उम्र का व्यक्ति है। वह अनपढ़ है और रिक्शा चलाता है। उसी के बगल में रहीस बैठा है। वह दसवीं तक पढ़ा है और अब राज-मिस्त्री का काम करता है। रिहान के बाएं तरफ बैठकर ज़मीन कुरेदने वाले लड़के का नाम उस्मान है। उसने समाजशास्त्र से एम.ए. किया हुआ है। लेकिन कहीं नौकरी न मिलने के कारण बेरोजगार फिरता है। उसकी बगल में खड़े व्यक्ति का नाम नाम सलीम है और वह एक मजदूर है।

रहीस कह रहा था- यार, ऐसे तो हम लोग भूखे मर जाएंगे।

इससे ज्यादा और क्या मरेंगे, सलीम ने कहा- घर में बच्चों के लायक भी खाना नहीं बचा है। अगर एक दो दिन में कर्फ्यू नहीं खुला तो फाके की नौबत आ जाएगी।

तुम एक-दो दिन की बात करते हो, रहीस ने कहा- यहां परसो रात से ही आटा खत्म है। टंकी में कई साल पुराना थोड़ा सा अनाज़ रखा था जो सड़ गया था। सोचा था कि उसे भैंस को डलवा देंगे। लेकिन अब मेरी बीबी उसे ही धोकर, चक्की में पीस के बच्चों को खिला रही। सोचता हूँ जब वह भी खत्म हो जाएगा, तब क्या खाएंगे?” 

तब की तब पर छोड़ दे, रिहान ने कहा- अल्लाह पर यकीन रख। वह जो भी करेगा, बेहतर करेगा।

रिहान की बातें सुनकर लगातार ज़मीन कुरेद रहा उस्मान मुस्कुरा दिया। उसकी मुस्कान में व्यंग्य था। जैसे पूछ रहा हो कि ये जो दंगा हुआ शायद ये भी तुम्हारे अल्लाह ने बेहतरी के लिए ही कराया होगा।

यार, तुम लोगों के घर में तो एक-एक, दो-दो दिन का खाना है भी, अनीस ने हताश और उदासी भरी आवाज़ में कहा- लेकिन मुझे देखों। बस आज के लिए आटा बचा हुआ हैं, ओर वह भी इतना की बस बच्चों का ही किसी तरह काम चल पाएगा। हम दोनों मियां-बीवी को फाका करना पड़ेगा।

मेरा हाल भी तुझसे ज़ुदा नहीं भाई, सलीम ने कहा- रात डलिया में बस तीन रोटियों का आटा था। मैंने बीवी से कहा कि एक रोटी वह खुद खा ले और दो बच्चों को खिला दे। लेकिन उस अल्लाह की बंदी ने भी अपनी रोटी सुबह में बच्चों को खिलाने के वास्ते रख दी थी। और हम दोनों कल से ही फाक़े पर है।

      फाके की बात सुनकर उस्मान को अपने छोटे भाई का चेहरा याद हो आया। उसके घर की हालात भी कोई इन लोगों से बेहतर नहीं थी। उनके घर भी पिछले दो दिनों से कुछ भी पका नहीं था। भूख व्याकुल उसका भाई कल कितना रो रहा था। रोते हुए जब उसने बार-बार अम्मी से रोटी के लिए इसरार किए तो अम्मी उस पर चिल्ला पड़ी थी और उन्होंने  उसके दो तमाचे लगा दिए थे। जब वह रोता-रोता भूखा ही सो गया था तो फिर अम्मी खुद सुबक सुबक कर रोने लगी थी। लेकिन उस्मान ने अपनी घर के हालात का इन लोगों के सामने कोई ज़िक्र न किया। वह चुपचाप उनकी बातें सुनता रहा। खुद कुछ नहीं बोला। उसे पता था कि अगर वह कुछ बोलेगा तो कोई उसकी बात पर यकीन नहीं करेगा। क्योंकि उसका घर दूसरे लोगों से थोड़ा समृद्ध है। लेकिन दंगों ने उनका भी तेल निकाल दिया था।  

      उसकी बात का जवाब देते हुए अनीस ने कहा- मुझे पहले से ही पता था कि ये दिन आने वाले हैं”, उसकी ये बात सुनकर उत्सुकतावश सबकी नज़रे उसकी ओर उठ गई, मेरे रिक्शा में बैठ कर जब सवारी चुनाव के बारे में बातें करती तो मैंने सोच लिया था कि अगर चुनाव होंगे तो दंगा भी होगा। और जब दंगा होगा तो कर्फ्यू भी लगेगा। इसलिए मैंने पहले ही दस किलो आटा, तीन किलो चावल, एक किलो चीनी, आधा एक किलों दाल और कुछ और घरेलू सामान खरीद लिया था। लेकिन मुझे यह नहीं पता था कि यह कर्फ्यू इतना लंबा चलेगा। मैंने तो सोचा था कि दो-तीन दिन में सब निपट जाएगा। और ज़िंदगी फिर से अपने पुराने ढर्रे पर आ जाएगी। लेकिन यहां तो दस दिन गुज़रने के बाद भी सुकून और शांति की कोई रोशनी नज़र नहीं आती।

      इस कर्फ्यू  ने तो हमारा फ्यूल ही खत्म कर दिया है, रहीस ने कहा- मेरी तो अल्लाह से बस ये ही दुआ है कि जल्द से जल्द हालात ठीक हो जाए और हमें इस नरक से निज़ात मिले।
अपनी बात खत्म करके रहीस ने रिहान की ओर देखा। वह आँखें बंद किए चुपचाप बैठा था। उसे ऐसे आँखें बंद के खामोश बैठा देखकर रहीस ने पूछा- क्या सोच रहे हो रिहान भाई?”

उसी स्थिति में बैठे हुए आँखे खोलकर रिहान ने रहीस को देखा और जवाब दिया- सोच रहा हूँ जब हमारा यह हाल है तो गाँव में रहने वालों का क्या हाल होगा? भूखे ही सही लेकिन हम ज़िंदा तो है। पुलिस के आने और कर्फ्यू लगने से दंगा भी कुछ हद तक काबू में हो गया। लेकिन गाँवों का क्या? वहां तो अब भी मार-काट मचा हुआ है। घरों को जलाया जा रहा हैं। जानवरों को लूटा जा रहा है। उन पर क्या बीत रही होगी? ज़रा सोचो तो इतने ख़रतनाक और दहशत भरे माहौल में वह कैसे रह रहे होंगे?” इतना कहते-कहते रिहान की आँखें भर आई। उसने अपने कुर्ते के पल्लू से आँखें साफ़ कर और फिर कहा- अल्लाह हमारे मुसलमान भाईयों पर रहम करे।

      अपने मायूस और हताश चेहरों के साथ रिहान के गम में शरीक होते हुए सब ने एक साथ कहा-आमीन। और फिर सब चुप हो गए। अब वहां चुप्पी थी। निराशा, हताशा, कमज़ोरी और अकेलेपन दुखने वाली चुप्पी।

काफी देर तक जब कोई नहीं बोला और सब ज़मीन पर अपनी नज़रे गड़ाए बैठे और खड़े रहे तब सलीम ने उस खामोशी को तोड़ते हुए कहा- मेरे ख्याल से तो ये चुनाव ही नहीं होने चाहिए थे। ये सब इन चुनावों का ही किया धरा है। न चुनाव होते न दंगे भड़कते। और न हमारा यह हाल होता। अरे, अगर तुम्हें हमारी वोट नहीं चाहिए तो ऐसे ही मना कर दो? हम तो वैसे ही नहीं जाएंगे। हमें कौन सा शौंक लगा ही वोट डालने का। पर इस तरह हमें बर्बाद करने और कत्ल करने की क्या ज़रुरत है?”

ये क्या कोई पहली बार हो रहा है?” रहीस ने हल्के तेश के साथ कहा- आज़ादी के बाद से ही देश में दंगे होने शुरु हो गए थें। भले ही वे कम भड़काऊ और छोटे-मोटे स्तर पर होते थे। लेकिन होते रहे थे। और इंदिरा गाँधी की मौत के बाद से तो देश मानो दंगों की बाढ़ ही आ गई। एक के बाद एक। हर चुनाव में दंगे। जैसे दंगों के लिए ही चुनाव कराए जाते हों। न जाने कितने लोग मरे होंगे अब तक?”, कुछ रुककर उसने फिर कहा- चुनाव, मताधिकार सब बकवास की बात है। मेरे हिसाब से तो इन सबको होना ही नहीं चाहिए था।

      रहीस के आखिरी वाक्य को सुनकर माचिस की तीली से ज़मीन कुरेदता उस्मान का हाथ एकाएक रुक गया। उसने अपनी गर्दन उठाई और रहीस की ओर देखते हुए कहा- गलत! एकदम गलत कह रहे हो तुम? आज दुनिया के लगभग हर देश में चुनाव होते हैं। क्या वह सब बकवास है? अगर चुनाव नहीं होंगे तो देश में तानाशाही आ जाएंगी। आज़ादी और गुलामी का फर्क खत्म हो जाएंगा। जनता के हितों की अनदेखी कर लोग मनमानी करने लगेंगे। एक तरह से देश में अराजकता का माहौल हो जाएगा। उस्मान ने कहना जारी रखा- अरब लोग जो आज एक-दूसरे को मरने-मारने पर अमादा  है किसलिए? चुनाव के लिए ही तो। ये चुनाव ही है जो सरकार चुनने या बदलने में आम जन की भागीदारी को सुनिश्चित करती है। लोगो को मताधिकार इसीलिए दिया गया ताकि वह इसके द्वारा अपनी पसंद का, अपने ही बीच से अपना प्रतिनिधि चुन सके।

      अराजकता का माहौल तो तुम ऐसे कह रहे हो जैसे अब बड़ी शांति है, रहीस ने व्यंग्य करते हुए कहा- चुनाव में प्रतिनिधि चुने जाते हैं। और फिर वही प्रतिनिधि आएगा और अपनी जीत को दोबारा सुनिश्चित करने के लिए दंगे करा देगा। पड़ोसी को पड़ोसी का दुश्मन बना देगा। अगर तुम उसके धर्म के नहीं हो तो तुम्हारा कत्ल करवा देंगे। घर जला देंगे। तुम्हारी माँ-बहनों की इज़्जत लूट लेंगे। अरबो को अभी चुनावों की हकीकत पता ही कहां है। वो कहते है न दूर के ढोल सुहावने लगते हैं। जब उन्हें पता चलेगा  कि उनकी पसंद के, उन्हीं के बीच के उनके प्रतिनिधि खुद को जीताने के लिए धर्म के नाम पर मौत का कैसे तांडव कराते है तो वह खुद ही चुनाव से तौबा कर लेंगे।

      देखो, माचिस की तीली को एक तरफ़ फेंक पालथी मारकर बैठते हुए उस्मान ने कहा- ज़रूरी नहीं कि हर व्यक्ति या राष्ट्र-राज्य लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का इस्तेमाल रचनात्मक कार्यों के लिए करे। कुछ लोग या राष्ट्र-राज्य उनका प्रयोग विनाशकारी कार्यों के लिए भी करते हैं। और यह बात हमारे देश की वर्तमान हालात पर बिल्कुल ठीक बैठती है। पर ये बात सब पर लागू नहीं होती।

      जो इंसान खुद दुखी हो उसे दूसरों की खुशियों की क्या परवाह? चुनावों से चाहे किसी को कितनी फायदा हुआ हो लेकिन हमें तो इनसे कभी कुछ हासिल नहीं हुआ सिवाएं तबाही और बर्बादी के।

      हाँ, तुम्हारी बात एकदम दुरुस्त है। तुम कह सकते हो कि भारत में लोकतंत्र का उत्सव तो आया, मगर हमारे लिए मौत का पैगाम लाया, उस्मान ने दार्शनिक अंदाज़ में अपनी खत्म की। इसके बाद फिर कोई कुछ नहीं बोला। सब अपनी वर्तमान हालात से परेशान ध्यानमग्न हो गए।

      दिन का चौथा पहर बीत चुका है। सूरज अपनी रफ्तार से पश्चिम की ओर दौड़ा जा रहा है। शाम ढलने को है। सलीम एक मैले से गमच्छे रूपी कपड़े को झाड़कर अपने कंधे पर रखता है और घर का रुख करता है। तभी उस शांत फिज़ा में किसी के रोने की आवाज़ सुनकर उसके बढ़ते कदम रुक जाते है। इस बात से बेपरवाह कि कोई बात को सुन रहा या नहीं, उसने मानो खुद से ही कहा- कोई रो रहा है?”

मुझे लगता है मेहरदीन का बेटा मर गया?” अनीस, जो मेहरदीन का पड़ोसी था ने कहा- वह पिछले कई दिनों से बीमार था।

      क्या हुआ था उसे?” रिहान ने जानने के लिए पूछा।

      ये तो मुझे पता नहीं, लेकिन परसो जब मेरी बीवी उनके यहां नमक मांगने गई थी तब वह बता रही थी कि मेहरदीन का बेटा बहुत बीमार है। उनके पास इतने भी पैसे नहीं है कि वह उसे डाक्टर को दिखा सके।

      पैसे होते तो क्या होता? डॉक्टर को भी तो तभी दिखाएंगे जब अस्पताल खुला होगा, रहीस ने कहा-चलो चलकर देखते है।

चबूतरे पर से वे सब एक साथ उठे और मेहरदीन के घर की ओर चल दिए जो मस्जिद वाली गली से अगली गली में था। रिहान ने चलते हुए बुदबुदाया- इन्ना-लिल्लाही वा इन्ना अलैही राजिऊन।

      मेहरदीन के घर जाकर उन्होंने देखा कि मेहरदीन अपने घर के आँगन में सिर पकड़े बैठा रो रहा है और उसकी बीवी अपने मृत बेटे की चारपाई के पास बैठी सिसकियाँ भर रही है। रिहान मेहरदीन के पास बैठ गया और उसे दिलासा देने लगा। जब उसकी बीवी की सिसकियों की आवाज़ ऊभरने लगी तो उसने आहिस्ता से कहा- ज्यादा शोर न करो। वरना पुलिस आ जाएंगी।

      रिहान के पास जाते हुए रहीस ने पूछा- अब इसके कफ़न दफ़न का कैसे होगा?”

      मग़रिब के बाद दफ़नाना ठीक रहेगा, उस्मान कहा- क्योंकि उस वक्त अंधेरा हो चुका होगा। अगर अभी गए तो पुलिस को पता चल जाएंगा, और वह हमें दंगे फैलाने के इल्जाम में पकड़ लेगी।
      ठीक है, रिहान ने कहा।

      कब्रिस्तान मौहल्ले से काफी दूर मैन रोड़ के दूसरी तरफ़ था। उससे आगे खेत थे जिनमें अब प्लॉट कट चुके थे और कुछ घर भी बन चुके थे। खेतों के आगे घना जंगल था। मग़रिब नमाज़ के बाद काफ़ी अंधेरा घिर आया था। एक पुरानी चादर से मृतक को कफ़न दिया गया। सलीम और अनीस से कब्र खोदने के लिए फावड़ा और खुर्पी उठाई। मृतक के बाप, रिहान, उस्मान और रहीस ने मैय्यत को कंधा दिया और वे सब लोग कब्रिस्तान की ओर बढ़ चले।

      उन लोगों ने सही-सलामत मौहल्ले की गलियां पार की और मैन रोड़ जब पहुँचे। उसे पार कर जब वह कब्रिस्तान के अंदर पहुँचे तो कहीं बहुत दूर से पुलिस के गाड़ी के सायरन के आवाज़ आने लगी। भय के मारे उन सबके चेहरे पीले पड़ गए। जैसे-जैसे सायरन की आवाज़ करीब आती जाती उनके दिल मुँह को आते जाते। पैरों तले से ज़मीन खिसकती महसूस होती। अभी वे यह सोच ही रहे थे सायरन की आवाज़ किस दिशा से आ रही और किस ओर जा रही है। तभी एक साथ ढ़ेर सारी आवाज़ों का शोर उठा- मारों इन सालों मुल्लों को।

      इतना सुनते ही लाश को वहीं छोड़ वे पागलों की तरह अपने घरों की ओर दौड़ पड़े।

पुलिस की गाड़ी गुज़रने के बाद उस दिन भी कर्फ्यू के कारण रात अपने फितरत के अनुसार पूरी तरह खामोश थी। कहीं कुछ नहीं था। सिवाएं खामोशी के। हाँ, रह-रहकर पूरी रात कब्रिस्तान की ओर से कुत्तों और भूखे भेड़ियों के गुर्राने की आवाज़े आती रही थी।

शहादत खान
फिलहाल:-रेख़्ता फाउंडेशन। ईमेल -786shahadatkhan@gmail.com  सपर्क 7065710789। 
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