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शोध: हिन्दी साहित्यः रासो परम्परा और पृथ्वीराज रासो की महत्ता/प्रो.उर्मिला पोरवाल

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शनिवार, अगस्त 06, 2016 | शनिवार, अगस्त 06, 2016

    चित्तौड़गढ़ से प्रकाशित ई-पत्रिका
  वर्ष-2,अंक-22(संयुक्तांक),अगस्त,2016
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                       हिन्दी साहित्यः रासो परम्परा और पृथ्वीराज रासो की महत्ता/प्रो.उर्मिला पोरवाल  
                          

चित्रांकन
हिन्दी साहित्य का आरंभ आठवीं शताब्दी से माना जाता है। यह वह समय था जब सम्राट् हर्ष की मृत्यु के बाद देश में अनेक छोटे छोटे शासनकेन्द्र स्थापित हो गए थे जो परस्पर संघर्षरत रहते थे। विदेशी मुसलमानों से भी इनकी टक्कर होती रहती थी। धार्मिक क्षेत्र अस्त-व्यस्त थे। इन दिनों उत्तर भारत के अनेक भागों में बौद्ध धर्म का प्रचार था। उस समय बौद्ध धर्म का विकास कई रूपों में हुआ जिनमें से एक वज्रयान कहलाया। हिन्दी का प्राचीनतम साहित्य इन्हीं वज्रयानी सिद्धों द्वारा तत्कलीन लोकभाषा (पुरानी हिन्दी) में लिखा गया। इसके बाद नाथपंथी साधुओं का समय आया। इन्होंने बौद्ध, शांकर, तंत्र, योग और शैव मतों के मिश्रण से अपना नया पंथ चलाया लोकप्रचलित पुरानी हिन्दी में लिखी इनकी अनेक धार्मिक रचनाएँ आज भी उपलब्ध हैं। इसके बाद जैनियों की परवर्ती बोलचाल के निकट की भाषा में लिखी रचनाएं मिलती है। इसी प्रकार ग्यारहवीं शताब्दी तक आते-आते पश्चिमी हिन्दी प्रदेश में अनेक छोटे छोटे राजपूत राज्य स्थापित हो गए थे। ये परस्पर अथवा विदेशी आक्रमणकारियों से प्रायः युद्धरत रहा करते थे। इन्हीं राजाओं के संरक्षण में रहने वाले चारणों और भाटों का राजप्रशस्तिमूलक काव्य वीरगाथा के नाम से अभिहित किया गया। इनमें आश्रयदाता राजाओं के शौर्य और पराक्रम का ओजस्वी वर्णन करने के साथ ही उनके प्रेमप्रसंगों का भी उल्लेख मिलता है। । इन रचनाओं में इतिहास और कल्पना का मिश्रण स्पष्ट दिखाई देता है। इन वीरगाथाओं को रासो भी कहा जाता है। रासो काव्य परम्परा हिन्दी साहित्य की एक विशिष्ट काव्यधारा रही है, जो वीरगाथा काल में उत्पन्न होकर मध्य युग तक चलती आई। कहना यों चाहिए कि आदि काल में जन्म लेने वाली इस विधा को मध्यकाल में विशेष पोषण मिला।

रासो शब्द के नाम से जो काव्य कृतियाँ उपलब्ध हैं, उनकी परम्परा का निर्धारण करने से पूर्व रास, रासक, रासउ, रासौ, रासो आदि शब्दों पर विचार करने पर यह पता चलता है,कि ये शब्द प्रायः एक ही प्रकार की रचनाओं के लिए प्रयुक्त हुए हैं या इनमें विषय शैली और शैली-शिल्प की भिन्नता है? कुछ विद्वान दोनों प्रकार की रचनाओं को एक ही वर्ग में रखकर उनकी परम्परा का अनुसंधान करते हैं किन्तु अनुसंधान की वैज्ञानिक प्रविधि से रासो-परम्परा का शोध करने वाले दूसरे विद्वान इन दोनों को सर्वथा पृथक शैली की रचना मानते हैं। इससे यह तो स्पष्ट है कि रासो शब्द का व्यवहार सभी रासो नामक ग्रंथों में समान रूप में नहीं पाया जाता, विभिन्न कृतियों में यह भिन्न-भिन्न रूपों में लिखा मिलता है। पाठक को यह भ्रम होता है कि ये रचनाएँ विभिन्न काव्यों-रूपों की हैं और रासो नाम से इन्हें प्रमादवश लिख दिया गया। वास्तव में लिखने में वर्तनी भेद से भी यह भ्रम उत्पन्न होने की संभावना है।

इन सभी के आधार पर अभी तक रासो शब्द कई रूपों में मिलता है-रासो, रसायन, रहस्य,रासौ, रासा, रायसा, रायसो। इन रूपों की व्युत्पत्ति भी विद्वानों ने अपनी-अपनी तार्किकता से करने का प्रयास किया है। पहली व्युत्पत्ति तो संस्कृत का आश्रय लेकर की जाती है। कुछ लोग रहस्य से रासो का उद्भव मानते हैं। दूसरे विद्वान रसायन को रासो का मूल ठहराते हैं। तीसरे विद्वान राजादेश या राजयश से रासो का संबंध स्थापित करते हैं, चौथे विद्वान रास या रासक से रासो का उदगम बताते हैं। किंतु इन व्युत्पत्तियों को केवल तर्क के रूप में ही देख सकते हैं क्योंकि संस्कृत व्याकरण या कोश से इन व्युत्पत्तियों का समर्थन नहीं होता। हिंदी शब्द सागर में रासो की व्युत्पति और अर्थ इस प्रकार लिखा है-संज्ञा पु.(स. रहस्य) किसी राजा का पद्यमय जीवन-चरित्र, विशेषतः यह जीवन-चरित्र जिसमें उसके युद्धों और वीरता का वर्णन हो, जैसे पृथ्वी राज रासो, खुमान रासो, हम्मीर रासो।

स्पष्ट है कि रासो शब्द विद्वानों के लिए विवाद का विषय रहा है। इस पर किसी भी विद्वान का निश्चयात्मक एवं उपयुक्त मत प्रतीत नहीं होता। विभिन्न विद्वानों ने अनेक प्रकार से इस शब्द की व्याख्या करने का प्रयास किया है। जो विद्वान ( श्री रामनारायण दूगड, डॉ.काशी प्रसाद जायसवाल और कविराज श्यामदास ) रहस्य शब्द से रासो की निष्पत्ति करते हैं, वे शिवरहस्य, देवी रहस्य आदि संस्कृत ग्रन्थों को प्रमाण रूप में प्रस्तुत करते हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने हिन्दी-साहित्य के इतिहास में रहस्य का खंडन करते हुए रसायन शब्दों को रासो को मूल में स्वीकार किया है। रसायन से उनका तात्पर्य रसपूर्ण काव्य से है, जैसे शब्दरसायन, भक्तिरसायन या काव्यरसायन आदि। रसायन से रासो तक पहुंचने और विकृ़त होने के विषय में आचार्य शुक्ल ने कुछ नहीं लिखा। राजदेश और राजयश आदि शब्द तो केवल इसलिए स्वीकृत हो गये कि इन शब्दों का संबंध प्रायः राजा-महाराजाओं के योगदान से संबंध नहीं रखता। साधुओं और निर्धन तपस्वियों का यशोगान भी इन रासो ग्रन्थों में है अतः राजादेश या राजयश शब्द रासो के मूल में नहीं है। अब रासा, रास या रासक शब्द रहते हैं। वस्तुतः रास शब्द चरित्र का द्योतक है। रासा शब्द युद्ध विवाद संघर्ष की कथा का। अतः रासो के मूल में ये शब्द ही रहे हैं। प्राचीन गुजराती भाषा में विलास और रास शीर्षक से अनेक चरित काव्य लिखे गये हैं। अतः रास, रासा या रासक ही इसकी व्युत्पत्ति में सहायक होते हैं। रास और रासो में जो भेद पाया जाता है, वह भी सार्वत्रिक नहीं है। फिर भी उसे स्पष्ट करना आवष्यक हैं।

मुंशी देवी प्रसाद ने इस संबंध में कहा ‘रासो के मायने कथा से हैं, वह रुढि शब्द है। एक वचन रास और बहुवचन रासा हैं। मेवाड, ढूढाड और मारवाड में झगड़ने को भी रासा कहते हैं। जैसे यदि कई आदमी झगड़ रहे हों, या वाद विवाद कर रहे हों, तो तीसरा आकर पूछेगा कांई रासो है। लम्बी चौड़ी वार्ता को भी रासो और रसायण कहते हैं। बकवाद को भी रासा और रामायण ढूंढाण में बोलते हैं। कांई रामायण है? क्या बकवाद है? यह एक मुहावरा है। ऐसे ही रासो भी इस विषय में बोला जाता है, कांई रासो है? बुन्देलखण्ड में कुछ ऐसी उक्तियाँ भी पाई जाती है, जिनसे रासो शब्द के स्वरुप पर बहुत कुछ प्रकाश पड़ता है, जैसे होन लगे सास बहू के राछरे। यह राछरा शब्द रासो से ही सम्बन्धित है। सास बहू के बीच होने वाले वाक युद्ध को प्रकट करने वाला यह राछरा शब्द बड़ी स्वाभाविकता से रायसा या रासो के शाब्दिक महत्व को प्रगट करता है। वीर काव्य परम्परा में यह रासो शब्द युद्ध सम्बन्धी कविता के लिए ही प्रयुक्त हुआ है। इसका ही बुन्देलखण्डी संस्करण राछरौ है।

गार्सा-द तासी ने रासो शब्द राजसूय से निकला बतलाया है और डॉ. ग्रियर्सन रासो का रुप रासा अथवा रासो मानते हैं तथा उसकी निष्पत्ति राजादेश से हुई बतलाते हैं। इनके अनुसार-इस रासो शब्द की निष्पत्ति राजादेश से हुई है, क्योंकि आदेश का रुपान्तर आयसु है। महामहोपाध्याय डॉ गौरीशंकर हीराचन्द ओझा हिन्दी के रासा शब्द को संस्कृत के रास शब्द से अनुस्यूत कहते हैं। उनके मतानुसार-में रासा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के रास शब्द से है। रास शब्द का अर्थ विलास भी होता है (शब्द कल्पदुम चतुर्थ काण्ड) और विलास शब्द चरित, इतिहास आदि के अर्थ में प्रचलित है। डॉ. ओझा जी ने अपने उपर्युक्त मत में रासा का अर्थ विलास बतलाया है जबकि श्री डी. आर. मंकड रास शब्द की उत्पत्ति तो संस्कृत की रास धातु से बतलाते हैं, पर इसका अर्थ उन्होंने जोर से चिल्लाना लिया है, विलास के अर्थ में नहीं।

डॉ. दशरथ शर्मा एवं डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी का कथन है कि रास परम्परा की गीत नृत्य परक रचनायें ही आगे चलकर वीर रस के पद्यात्मक इति वृत्तों में परिणत हो गई। रासो प्रधानतः गानयुक्त नृत्य विशेष से क्रमशः विकसित होते-होते उपरुपक और किंफर उपरुपक से वीर रस के पद्यात्मक प्रबन्धों में परिणत हो गया। इस गेय नाट्यों का गीत भाग कालान्तर में क्रमशः स्वतन्त्र श्रव्य अथवा पाठ्य काव्य हो गया और इनके चरित नायकों के अनुसार इसमें युद्ध वर्णन का समावेश हुआ। पं. विन्ध्येश्वरी प्रसाद द्विवेदी रासो शब्द को राजयश शब्द से निसृत हुआ मानते हैं। साहित्याचार्य मथुरा प्रसाद दीक्षित रासो पद का जन्म राज से बतलाते हैं।

उपर्युक्त सभी मतों के निष्कर्ष स्वरुप यह एक ऐसा काव्य है जिसमें राजाओं का यश वर्णन किया जाता है और यश वर्णन में युद्ध वर्णन स्वतः समाहित होता है। इन अभिमतों के विश्लेषण का निष्कर्ष रासो शब्द रास का विकास है। आदिकाल के हिन्दी-साहित्य में वीर गाथायें ही प्रमुख रही हैं। रासो- वीरगीत (बीसलदेवरासो और आल्हा आदि) और प्रबंधकाव्य (पृथ्वीराजरासो, खुमानरासो आदि) - इन दो रूपों में लिखे गए।


गीत-नृत्य-परक रास परम्परा का अनुसंधान करने पर लगभग शताधिक रचनाएँ इस कोटि में रखी जा सकती हैं जिनमें बीसलदेव रास सर्वाधिक प्रसिद्ध है। किंतु यह रास सोलहवीं शती का है। इससे पहले भी सैकड़ों राजग्रंथों की रचना हो चुकी । उपदेश रसायन को विद्वान इस परम्परा का प्रथम रास ग्रन्थ ठहराते हैं। इसके रचयिता का नाम जिनदत्त सूरि है किंतु इसका रचनाकाल अनिर्णित है। जिनदत्त सूरि रचित अन्य ग्रन्थ के आधार पर इस रास को बारहवीं शती का स्वीकार किया जाता है। यह जैन धर्मोपदेश की रचना है, और चउपई छन्द में इसकी रचना की गई है। दूसरा प्रसिद्ध रास भरतेश्वरबाहु-बलीरास है। शलिभद्र सूरि इसके प्रणेता हैं और इसमें भगवान श्रषभदेव के दो पुत्रों के बीच हुए संघर्ष की कथा लिखी गई है। इसमें वीररस का अच्छा परिपाक लक्षित होता है। इतिहास ग्रन्थ में इस रास का प्रायः उल्लेख किया जाता है और इसका रचनाकाल संवत 1241 स्थिर किया गया है। इस परम्परा में बुद्धिरस, जम्बूस्वामीरास, कच्छूलिरास, नेमिजिणंद रास आदि प्रसिद्ध हैं। वस्तुतः रास-परम्परा का सही प्रतिनिधित्व करने वाली रचना बीसलदेव रासो ही है। यह सोलहवीं शती की रचना है। इसके रचयिता नरपति नाल्ह नाम से जाने जाते है। इस रचना का विषय राजा बीसलदेव की प्रयास कथा है। वियोग वर्णन होने से इस रास में श्रृंगार रस का ही प्राधान्य है। रानी राजमती के वियोग में बीसलदेव की मनःसिथति का कवि ने भाव-विभोर होकर वर्णन किया है। इसके रचयिता जैन नहीं थे , अतः यह कृ़ति रसायन ग्रन्थों से पृथक स्थान रखती है।

रासो ग्रंथों की साहित्यिक परम्परा में भी सैकड़ों ग्रन्थों लिखे गये और उनके छन्द-वैविध्य तथा विषय-वैविध्य से यह पहचाना जा सकता है। इस परम्परा के प्रमुख रासो का परिचय संक्षेप में देखे तो-पहला रासो ग्रन्थ जो आज उपलब्ध नहीं है अपभ्रंश ग्रन्थों में रचित मुंजरास है इसका संकेत हेमचन्द्र ने अपने प्राकृत व्याकरण में दो दोहे उद्धृत करके दिया है। यधपि इसके रचयिता का नाम और रचना काल अवधि अज्ञात है किंतु कई ग्रन्थों में इस रास के दोहे पाये जाते हैं अतः इसका अस्तित्व स्वीकार करना पड़ता है। इस रासो की कथा यधपि प्रेमकथा है किंतु इसका उददेश्य लोक-शिक्षण ही है। मुंज का मृगालवती से प्रेम और तैलप द्वारा मुंज का अपमान तथा वध नैतिक मूल्यों की स्थापना के लिए दिखाया गया है।

दूसरी सुप्रसिद्ध रचना अद्दहमाण (अब्दुल रहमान) कृत स्नेहरासक (संदेशरासक) है। इस रास का रचनाकाल अनिर्णित है किंतु मुनिजिन विजय जी की शोध के अनुसार यह ग्रंथ शहाबुददीन मुहम्मद गोरी के भारत पर आक्रमण से पहले लिखा गया था। इसका विषय भी विप्रलंभ श्रृंगार ही है। विरहिणी नायिका अपने वियुक्त पति के पास पथिक द्वारा संदेश भेजने का उपक्रम करती है। छहों ऋतुओं में विरहजन्य कक्ष का इसमें बड़ी सुंदर शैली में वर्णन मिलता है। बाईस प्रकार के छंदो का कवि ने प्रयोग किया है और 223 छन्दों मे कथा लिखी है। संदेशरासक को हम हिन्दी का रासो नहीं मानते, किंतु रासो-परम्परा की कड़ी जोड़ने के लिए इसका स्थान स्वीकार करना होगा।

रासो की समृद्ध परम्परा में हम्मीर रासो, विजयपाल रासो, परमाल रासो, रतन रासो, कायम रासो, खुमाण रासो, करहिया को रायासो, कीलजुग रासो बहुत प्रसिद्ध हैं। पहले हम्मीर रासो का संकेत तो प्राकृत पैंगलम के आठ छंदों में प्रयुक्त हम्मीर नाम ही है। इनके प्रणेता का नाम आदि अज्ञात है। दूसरा हम्मीर रासो का रचयिता जोधराज नामक कवि है। इस कवि ने संस्कृत के जयचन्द्रसूरि विरति हम्मीर महाकाव्य का आधार ग्रहण कर अपना रासो लिखा है। तीसरा प्रसिद्ध हम्मीर रासो महेश कवि का है। यह 1861 संवत की रचना है। यह एक विशाल ग्रन्थ है जिसमें 900 छंद हैं। रासो की साहित्यिक परम्परा में परमाल रासो का काशीनागरी प्रचारिणी सभा से प्रकाशन हुआ है। इसे पृथ्वीराज रासो के महोबा खंड का ही रूपांतर माना जाता है। खुमाणरासो के रचयिता दलपति या दौलतविजय नामक कवि हैं जो अठारहवीं शताब्दी में उत्पन्न हुए थे। यह एक सरस एवं साहित्यिक कृति है।

दोनों प्रकार के रास और रासो-ग्रंथों के अनुशीलन से यह प्रतीत होता है कि रास और रासो ग्रन्थों में बहुत अधिक अंतर नहीं है। प्रेम और श्रृंगार परम्परा के रासो भी हैं और रास भी। युद्ध एवं संघर्ष भी दोनों प्रकार के रासो ग्रन्थों में मिलता है अतः विभाजक रेखा खींचना कठिन है। इतना अवश्य है कि गीत-नृत्य परक रचनाएँ आकार में लघु हैं और छंद वैविध्य वाली रचनाएँ आकार से दीर्घ हैं। रास वाली रचनाएँ धर्मोपदेश प्रधान हैं और उनके रचयिता जैनकवि हैं। दूसरी कोटि की रचनाएँ जैनेतर समाज में अधिक प्रचारित रहीं। रास शीर्षक प्रथम कोटि की रचनाओं में काव्यगुण अपेक्षावृ़त न्यूनमात्रा में है। रासो शीर्षक दूसरी कोटि की रचनाएँ साहित्यिक काव्यगुण की दृष्टि से अधिक समृद्ध हैं। हिन्दी साहित्य में रास या रासक का अर्थ लास्य से लिया गया है जो नृत्य का एक भेद है। अतः इसी अर्थ भेद के आधार पर गीत नृत्य परक रचनायें रास नाम से जानी जाती हैं रासो या रासउ में विभिन्न प्रकार के अडिल्ल, ढूसा, छप्पर, कुण्डलियां, पद्धटिका आदि छन्द प्रयुक्त होते हैं। इस कारण ऐसी रचनायें रासो के नाम से जानी जाती हैं।

रासो या रासक रचनाएँ 

सन्देश रासक - यह अपभ्रंश की रचना है। रचयिता अब्दुल रहमान हैं। यह रचना मूल स्थान या मुलतान के क्षेत्र से सम्बन्धित है। कुल छन्द संख्या २२३ है। यह रचना विप्रलम्भ श्रृंगार की है। इसमें विजय नगर की कोई वियोगिनी अपने पति को संदेश भेजने के लिए व्याकुल है तभी कोई पथिक आ जाता है और वह विरहिणी उसे अपने विरह जनित कष्टों को सुनाने लगती है। जब पथिक उससे पूछता है कि उसका पति किस ऋतु में गया है तो वह उत्तर में ग्रीष्म ऋतु से प्रारम्भ कर विभिन्न ऋतुओं के विरह जनित कष्टों का वर्णन करने लगती है। यह सब सुनकर जब पथिक चलने लगता है, तभी उसका प्रवासी पति आ जाता है। यह रचना सं ११०० वि. के पश्चात की है।
मुंज रास - यह अपभ्रंश की रचना है। इसमें लेखक का नाम कहीं नहीं दिया गया। रचना काल के विषय में कोई निश्चित मत नहीं मिलता। हेमचन्द्र की यह व्याकरण रचना सं. ११९० की है। मुंज का शासन काल १००० -१०५४ वि. माना जाता है। इसलिए यह रचना १०५४-११९० वि. के बीच कभी लिखी गई होगी। इसमें मुंज के जीवन की एक प्रणय कथा का चित्रण है। कर्नाटक के राजा तैलप के यहाँ बन्दी के रुप में मुंज का प्रेम तैलप की विधवा पुत्री मृणालवती से हो जाता है। मुंज उसको लेकर बन्दीगृह से भागने का प्रस्ताव करता है किन्त मृणालवती अपने प्रेमी को वहीं रखकर अपना प्रणय सम्बन्ध निभाना चाहती थी इसलिए उसने तैलप को भेद दे दिया जिसके परिणामस्वरुप क्रोधी तैलप ने मृणालवती के सामने ही उसके प्रेमी मुंज को हाथी से कुचलवाकर मार डाला। कथा सूत्र को देखते हुए रचना छोटी प्रतीत नहीं होती।

पृथ्वीराज रासो - यह कवि चन्द की रचना है। इसमें दिल्लीश्वर पृथ्वीराज के जीवन की घटनाओं का विशद वर्णन है। यह एक विशाल महाकाव्य है। यह तेरहवीं शदी की रचना है। डा. माताप्रसाद गुप्त इसे १४०० वि. के लगभग की रचना मानते हैं। पृथ्वीराज रासो की एतिहासिकता विवादग्रस्त है।
हम्मीर रासो - इस रचना की कोई मूल प्रति नहीं मिलती है। इसका रचयिता शाङ्र्गधर माना जाता है। प्राकृत पैगलम में इसके कुछ छन्द उदाहरण के रुप में दिए गये है। ग्रन्थ की भाषा हम्मीर के समय के कुछ बाद की लगती है। अतः भाषा के आधार पर इसे हम्मीर के कुछ बाद का माना जा सकता है।

बुद्ध रासो- इसका रचयिता जल्हण है जिसे पृथ्वीराज रासो का पूरक कवि भी माना गया है। कवि ने रचना में समय नहीं दिया है। इसे पृथ्वीराज रासो के बाद की रचना माना जाता है।

परमाल रासो - इस ग्रन्थ की मूल प्रति कहीं नहीं मिलती। इसके रचयिता के बारे में भी विवाद है। पर इसका रचयिता महोबा खण्ड को सं. १९७६ वि. में डॉ. श्यामसुन्दर दास ने परमाल रासो के नाम से संपादित किया था। डॉ. माता प्रसाद गुप्त के अनुसार यह रचना सोलहवीं शती विक्रमी की हो सकती है। इस रचना के सम्बन्ध में काफी मतभेद है। श्री रामचरण हयारण मित्र ने अपनी कृति बुन्देलखण्ड की संस्कृति और साहित्य में परमाल रासो को चन्द की स्वतन्त्र रचना माना है। किन्तु भाषा शैली एवं छन्द में -महोवा खण्ड से यह काफी भिन्न है। उन्होंने टीकमगढ़ राज्य के वयोवृद्ध दरवारी कवि श्री अम्बिकेश से इस रचना के कंठस्थ छन्द लेकर अपनी कृति में उदाहरण स्वरुप दिए हैं। रचना के एक छन्द में समय की सूचना दी गई है जिसके अनुसार इसे १११५ वि. की रचना बताया गया है जो पृथ्वीराज एवं चन्द के समय की तिथियों से मेल नहीं खाती। इस आधार पर इसे चन्द की रचना कैसे माना जा सकता है। यह इसे परमाल चन्देल के दरवारी कवि जगनिक की रचना माने तो जगनिक का रासो कही भी उपलब्ध नहीं होता है। स्वर्गीय महेन्द्रपाल सिंह ने अपेन एक लेख में लिखा है कि जगनिक का असली रासो अनुपलब्ध है। इसके कुछ हिस्से दतिया, समथर एवं चरखारी राज्यों में वर्तमान थे, जो अब नष्ट हो चुके हैं।

राउजैतसी रासो - इस रचना में कवि का नाम नहीं दिया गया है और न रचना तिथि का ही संकेत है। इसमें बीकानेर के शासक राउ जैतसी तथा हुमायूं के भाई कामरांन में हुए एक युद्ध का वर्णन हैं जैतसी का शासन काल सं. १५०३-१५१८ के आसपास रहा है। अत-यह रचना इसके कुछ पश्चात की ही रही होगी। इसकी कुल छन्द संख्या ९० है। इसे नरोत्तम स्वामी ने राजस्थान भारतीय में प्रकाशित कराया है।

विजय पाल रासो - नल्ह सिह भाट कृत इस रचना के केवल ४२ छन्द उपलब्ध है। विजयपाल, विजयगढ़ करौली के यादव राजा थे। इसके आश्रित कवि के रुप में नल्ह सिह का नाम आता है। रचना की भाषा से यह १७ वीं शताब्दी से पूर्व की नहीं हो सकती है।
राम रासो - इसके रचयिता माधव चारण है। सं. १६७५ वि. रचना काल है। इस ग्रन्थ में रामचरित्र का वर्णन है तथा १६०० छन्द हैं।

राणा रासो - दयाल दास द्वारा विरचित इस ग्रन्थ में शीशौदिया वंश के राजाओं के युद्धें एवं जीवन की घटनाओं का विस्तार पूर्वक वर्णन १३७५-१३८१ के मध्य का हो सकता है। इसमें रतलाम के राजा रतनसिंह का वृत्त वर्णित किया गया है।

कायम रासो - यह रासो न्यामत खाँ जान द्वारा रचा गया है। इसका रचना काल सं. १६९१ है किन्तु इसमें १७१० वि. की घअना वाला कुछ    अंश प्रक्षिप्त है क्योंकि यदि कवि इस समय तक जीवित था तो उसने पूर्व तिथि सूचक क्यों बदला। यह वैसा का वैसा ही लिखा है इसमें राजस्थान के कायमखानी वंश का इतिहास वर्णित है।

 छत्रसाल रासो- रचयिता डूंगरसी कवि। इसका रचना काल सं. १७१० माना गया है। छंद संख्या लगभग ५०० है। इसमें बूंदी के राव शत्रुसाल का वृत्त वर्णित किया गया है।
आंकण रासो - यह एक प्रकार का हास्य रासो है। इसमें खटमल के जीवन चरित्र का वर्णन किया गया है। इसका रचयिता कीर्तिसुन्दर है। रचना सं. १७५७ वि. की है। इसकी कुल छन्द संख ३९ है।
सागत सिंह रासो- यह गिरधर चारण द्वारा लिखा गया है। इसमें शक्तिसिंह एवं उनके वंशजों का वृत्त वर्णन किया गया है। श्री अगरचन्द्र श्री अगरचन्द नाहटा इसका रचना काल सं. १७५५ के पश्चात का मानते हैं। इसकी छन्द संख्या ९४३ है।

हम्मीर रासो- इसके रचयिता महेश कवि है। यह रचना जोधराज कृत्त हम्मीर रासो के पहले की है। छन्द संख्या लगभग ३०० है इसमें रणथंभौर के राणा हम्मीर का चरित्र वर्णन है।
खम्माण रासो - इसकी रचना कवि दलपति विजय ने की है। इसे खुमाण के समकालीन अर्थात सं. ७९० सं. ८९० वि. माना गया है किन्तु इसकी प्रतियों में राणा संग्राम सिंह द्वितीय के समय १७६०-१७९० के पूर्व की नहीं होनी चाहिए। डॉ. उदयनारायण तिवारी ने श्री अगरचन्द नाहटा के एक लेख के अनुसार इसे सं. १७३०-१७६० के मध्य लिखा बताया गया है। जबकि श्री रामचन्द्र शुक्ल इसे सं. ९६९-सं. ८९९ के बीच की रचना मानते हैं। उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर इसे सं. १७३०-७९० के मध्य लिखा माना जा सकता है।

रासा भगवन्तसिंह - सदानन्द द्वारा विरचित है। इसमें भगवन्तसिंह खीची के १७९७ वि. के एक युद्ध का वर्णन है। डॉ. माताप्रसाद गुप्त के अनुसार यह रचना सं. १७९७ के पश्चात की है। इसमें कुल १०० छन्द है।
करहिया की रायसौ - यह सं. १९३४ की रचना है। इसके रचयिता कवि गुलाब हैं, जिनके वंशज माथुर चतुर्वेदी चतुर्भुज वैद्य आंतरी जिला ग्वालियर में निवास करते थे। श्री चतुर्भुज जी के वंशज श्री रघुनन्दन चतुर्वेदी आज भी आन्तरी ग्वालिया में ही निवास करते हैं, जिनके पास इस ग्ररन्थ की एक प्रति वर्तमान है। इसमें करहिया के पमारों एवं भरतपुराधीश जवाहरसिंह के बीच हुए एक युद्ध का वर्णन है।

रासो भइया बहादुरसिंह - इस ग्रन्थ की रचना तिथि अनिश्चित है, परन्तु इसमें वर्णित घटना सं. १८५३ के एक युत्र की है, इसी के आधार पर विद्वानों ने इसका रचना काल सं. १८५३ के आसपास बतलाया है। इसके रचयिता शिवनाथ है।

रायचसा - यह भी शिवनाथ की रचना है। इसमें भी रचना काल नहीं दिया है। उपर्युक्त रासा भइया बहादुर सिंह के आधार पर ही इसे भी सं. १८५३ के आसपास का ही माना जा सकता है, इसमें धारा के जसवंतसिंह और रीवां के अजीतसिंह के मध्य हुए एक युद्ध का वर्णन है।
कलियंग रासो - इसमें कलियुगका वर्णन है। यह अलि रासिक गोविन्द की रचना हैं। इसकी रचना तिथि सं. १८३५ तथा छन्द संख्या ७० है।

दलपतिराव रायसा - इसके रचयिता कवि जोगींदास भाण्डेरी हैं। इसमें महाराज दलपतिराव के जीवन काल के विभिन्न युद्धों की घटनाओं का वर्णन किया गया है। कवि ने दलपति राव के अन्तिम युद्ध जाजऊ सं. १७६४ वि. में उसकी वीरगति के पश्चात् रायसा लिखने का संकेत दिया है। इसलिये यह रचना सं. १४६४ की ही मानी जानी चाहिए। रासो के अध्ययन से ऐसा लगता है कि कवि महाराजा दलपतिराव का समकालीन था। इस ग्रन्थ में दलपतिराव के पिता शुभकर्ण का भी वृत्त वर्णित है। अतः यह दो रायसों का सम्मिलित संस्करण है। इसकी कुल छन्द संख्या ३१३ हैं। इसका सम्पादन श्री हरिमोहन लाल श्रीवास्तव ने किया है, तथा ष्कन्हैयालाल मुन्शी, हिन्दी विद्यापीठ, आगरा नसे भारतीय साहित्य के मुन्शी अभिनन्दन अंक में इसे प्रकाशित किया गया है।

शत्रु जीत रायसा - बुन्देली भाषा के इस दूसरे रायसे के रचयिता किशुनेश भाट है। इसकी छन्द संख्या ४२६ है। इस रचना के छन्द ४२५ वें के अनुसार इसका रचना काल सं. १८५८ वि. ठहरता है। दतिया नरेश शत्रु जीत का समय सं. १८१९ सं. १९४८ वि. तदनुसार सनद्य १७६२ से १८०१ तक रहा है। यह रचना महाराजा शत्रुजीत सिंह के जीवन की एक अन्तिम घटना से सम्बन्धित है। इसमें ग्वालियर के वसन्धिया महाराजा दौलतराय के फ्रान्सीसी सेनापति पीरु और शत्रुजीत सिंह के मध्य सेवढ़ा के निकट हुए एक युद्ध का सविस्तार वर्णन है। इसका संपादन श्री हरि मोहनलाल श्रीवास्तव ने किया, तथा इसे भारतीय साहित्य में कन्हैयालालमुन्शी हिदी विद्यापीठ आगरा द्वारा प्रकाशित किया गया है।

गढ़ पथैना रासो- रचयिता कवि चतुरानन। इसमें १८३३ वि. के एक युद्ध का वर्णन किया गया है। छन्द संख्या ३१९ है। इसमें वर्णित युद्ध आधुनिक भरतपुर नगर से ३२ मील पूर्व पथैना ग्राम में वहां के वीरों और सहादत अली के मध्य लड़ा गया था। भरतपुर के राजा सुजारनसिंह के अंगरक्षक शार्दूलसिंह के पूत्रों के अदम्य उत्साह एवं वीरता का वर्णन किया गया है। बाबू वृन्दावनदास अभिनन्दन ग्रन्थ में सन् १९७५ में हिन्दी साहित्य सम्मेलन इलाहाबाद द्वारा इसका विवरण प्रकाशित किया गया।

पारीछत रायसा - इसके रचयिता श्रीधर कवि है। रायसो में दतिया के वयोवृद्ध नरेश पारीछत की सेना एवं टीकामगढ़ के राजा विक्रमाजीतसिंह के बाघाट स्थित दीवान गन्धर्वसिंह के मध्य हुए युद्ध का वर्णन है। युद्ध की तिथि सं. १८७३ दी गई है। अतएव यह रचना सं. १८७३ के पश्चात् की ही रही होगी। इसका सम्पादन श्री हरिमोहन लाल श्रीवासतव के द्वारा किया गया तथा भारतीय साहित्य सनद्य १९५९ में कन्हैयालाल मुन्शी, हिन्दी विद्यापीठ आगरा द्वारा इसे प्रकाशित किया गया।

बाघाट रासो - इसके रचयिता प्रधान आनन्दसिंह कुड़रा है। इसमें ओरछा एवं दतिया राज्यों के सीमा सम्बन्धी तनाव के कारण हुए एक छोटे से युद्ध का वर्णन किया गया है। इस रचना में पद्य के साथ बुन्देली गद्य की भी सुन्दर बानगी मिलती है। बाघाट रासो में बुन्देली बोली का प्रचलित रुप पाया जाता है। कवि द्वारा दिया गया समय बैसाख सुदि १५ संवत् १८७३ विक्रमी अमल संवत १८७२ दिया गया है। इसे श्री हरिमोहनलाल श्रीवास्तव द्वारा सम्पादित किया गया तथा यह भारतीय साहित्य में मुद्रित है। इसे बाघाइट कौ राइसो के नाम से विंध्य शिक्षा नाम की पत्रिका में भी प्रकाशित किया गया है।

झाँसी की रायसी - इसके रचनाकार प्रधान कल्याणिंसह कुड़रा है। इसकी छन्द संख्या लगभग २०० है। उपलब्ध पुस्तक में छन्द गणना के लिए छन्दों पर क्रमांक नहीं डाले गये हैं। इसमें झांसी की रानी लक्ष्मीबाई तथा टेहरी ओरछा वाली रानी लिड़ई सरकार के दीवान नत्थे खां के साथ हुए युद्ध का विस्तृत वर्णन किया गया है। झांसी की रानी तथा अंग्रेजों के मध्य हुए झांसी कालपी, कौंच तथा ग्वालियर के युद्धों का भी वर्णन संक्षिप्त रुप में इसमें पाया जाता है। इसका रचना काल सं. १९२६ तदनुसार १९६९ ई. है। अर्थात सन् १९५७ के जन-आन्दोलन के कुल १२ वर्ष की समयावधि के पश्चात् की रचना है। इसे श्री हरिमोहन लाल श्रीवास्तव दतिया ने वीरांगना लक्ष्मीबाई रासो और कहानी नाम से सम्पादित कर सहयोगी प्रकाशन मन्दिर लि. दतिया से प्रकाशित कराया है।

लक्ष्मीबाई रासो - इसके रचयिता पं. मदन मोहन द्विवेदी मदनेश है। कवि की जन्मभूमि झांसी है। इस रचना का संपादन डॉ. भगवानदास माहौर ने किया है। यह रचना प्रयाग साहित्य सम्मेलन की साहित्य-महोपाध्याय की उपाधि के लिए भी सवीकृत हो चुकी है। इस कृति का रचनाकाल डॉ. भगवानदास माहौर ने सं. १९६१ के पूर्व का माना है। इसके एक भाग की समाप्ति पुष्पिका में रचना तिथि सं. १९६१ दी गई है। रचना खण्डित उपलब्ध हुई है, जिसे ज्यों का त्यों प्रकाशित किया गया है। विचित्रता यह है कि इसमें कल्याणसिंह कुड़रा कृत झांसी कौ रायसो के कुछ छन्द ज्यों के त्यों कवि ने रख दिये हैं। कुल उपलब्ध छन्द संख्या ३४९ हैं। आठवें भाग में समाप्ति पुष्पिका नहीं दी गई है, जिससे स्पष्ट है कि रचना अभी पूर्ण नहीं है। इसका शेष हिस्सा उपलब्ध नहीं हो सका है। कल्याण सिंह कुड़रा कृत रासो और इस रासो की कथा लगभग एक सी ही है, पर मदनेश कृत रासो में रानी लक्ष्मीवाई के ऐतिहासिक एवं सामाजिक जीवन का विशद चित्रण मिलता है।

छछूंदर रायसा - बुन्देली बोली में लिखी गई यह एक छोटी रचना है। छछूंदर रायसे की प्रेरणा का स्रोत एक लोकोक्ति को माना जा सकता है- भई गति सांप छछूंदर केरी। इस रचना में हास्य के नाम पर जातीय द्वेषभाव की झलक देखने को मिलती है। दतिया राजकीय पुस्तकालय में मिली खण्डित प्रति से न तो सही छन्द संख्या ज्ञात हो सकी और न कवि के सम्बन्ध में ही कुछ जानकारी उपलब्ध हो सकीफ रचना की भाषा मंजी हुई बुन्देली है। अवश्य ही ऐसी रचनाएं दरबारी कवियों द्वारा अपने आश्रयदाता को प्रसन्न करने अथवा कायर क्षत्रियत्व पर व्यंग्य के लिये लिखी गई होगी।
घूस रासा - यह भी बुन्देली की एक छोटी सी रचना है। इसमें हास्य के साथ व्यंग्य का भी पुट है। रचनाकार को काव्य शिल्प की दृष्टि से अभूतपूर्व सफलता प्राप्त हुई है। छन्दों के बंध, भाषा व शैली पर कवि का पूर्ण अधिकार है। उपलब्ध छन्द संख्या कुल ३१ है। प्रतिपूर्ण लगती है। यह भी दतिया राज्य पुस्तकालय की हस्तलिखित प्रतियों में प्राप्त हुई है। रचना के एक छन्द द्वारा कवि का नाम पृथ्वीराज दिया गया है, परवर्ती रचना है। रचना काल अज्ञात है।

पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता

पृथ्वीराज रासो हिन्दी महाकाव्य परम्परा का आदि ग्रन्थ माना जाता है। इस रासो का रचयिता चन्दबरदाई नामक कवि माना जाता है। चन्दबरदाई या चन्दबरदाई नामक कवि पृथ्वीराज का समकालीन था, यह सर्वसम्मत मत नहीं है किंतु अधिकांश समीक्षक इस मत से सहमति रखते हैं कि चन्दबरदाई नामक कोई व्यक्ति ऐसा अवश्य हुआ है जिसने पृथ्वीराज रासो नामक महाकाव्य का कुछ अंश अवश्य लिखा था। बाद में अनेक भाटों और चारणों ने उसी के अनुसरण पर प्रायः उसी शैली में पृथ्वीराज का यशोगान किया और इस ग्रन्थ में अपनी रचनाओं को समाविष्ट कर दिया। फलतः वर्तमान काल में उपलब्ध विशालकाय पृथ्वीराज रासो नामक ग्रन्थ एक कवि की रचना न रहकर अनेक कवियों के सामूहिक प्रयास से निर्मित कृ़ति बन गई है इसलिए इसका रचनाकाल भी विस्तृत होता गया और बारहवी शती से सत्राहवीं शती तक इसमें परिवर्धन-परिवर्तत होता रहा। पृथ्वीराज रासो के वस्तु-विषय, चरित्र-पात्र, भाव-रस छन्द-शैली आदि पर विचार करने से पूर्व इस ग्रंथ की प्रामाणिकता पर विचार करना आवश्यक हैं। प्रामाणिकता की बात इसलिए आवश्यक है कि जो विद्वान इस ग्रंथ को सोलहवीं-सत्राहवीं शती की रचना ठहरा कर अप्रामाणिक या जाली ग्रन्थ कहते हैं, यदि उनका मत स्वीकार हो तो इस ग्रन्थ को रासो परम्परा का सर्वश्रेष्ठ वीरकाव्य मानकर पढ़ना-पढ़ाना ही व्यर्थ होगा। जाली ग्रंथ होने कारण ये विद्वान इस ग्रन्थ की घटनाओं, पात्रों तथा वर्णनों को इतिहास सम्मत भी नहीं मानते।

इस ग्रंथ में उनहत्तर समय (सर्ग) हैं। पृथ्वीराज रासो के रचयिता का नाम चन्दबरदाई (वरददई या वरदायी) है। चन्दबरदाई का जन्मकाल, जन्मस्थान जाति, कुल, वंश, माता-पिता आदि का प्रामाणिक रूप से कोई इतिवृत्त नही मिलता। रासो में जो वर्णन है उनके आधार पर भी जन्म तिथि का निर्णय संभव नहीं है। बलभद्र विलास नामक ग्रंथ में संवत 1132 माघ शुक्ला त्रायोदशी शुक्रवार को दिन कमला देवी के पुत्र जन्म का उल्लेख है, यह पुत्र पृथ्वीराज है। यदि इस तिथि को पृथ्वीराज की जन्म तिथि स्वीकार कर लिया जाय तो चन्द कवि की भी यही जन्मतिथि माननी होगी क्योंकि रासो के वर्णन के आधार पर दोनों का जन्म एक ही दिन हुआ था। ऐसा उल्लेख कई स्थलों पर मिलता है। पृथ्वीराज रासो के प्रथम समय छन्द सं. 694 के अनुसार 11591 त्र 1206 विक्रमी संवत ठहरता है। इस संवत को नागरी प्रचारिणी सभा काशी के संस्करण में भी स्वीकार किया गया है।
                                एकादस से पन्द्रह, विक्रम साक अनन्द।
                                तिहि रिपु जयपुर हरन कौं भय पृथिराज नरिन्द।।

पृथ्वीराज रासो के विषय में अनेक मतवाद प्रचलित हैं। यदि उन सब पर विचार किया जाय तो रासो की प्रामाणिकता ही संदिग्ध हो जाती है। अतः इस विवाद में न पड़कर जो बहुमत से स्वीवृ़त है उसे ही स्वीकार करना उचित हैं। इतिहासकारों ने पृथ्वीराज का जन्म 1120 वि. सं. और मृत्यु 1249 में माना है। यदि चंद और पृथ्वीराज एक ही दिन उत्पन्न हुए तो यही तिथि चन्द कवि की जन्म तिथि माननी चाहिए। पृथ्वीराज रासो के प्रथम समय में लिखा है-

                      जीह जोति कवि चन्द, रूप संजोगि भोगि भ्रम।
                       इक्क दीह उत्पन्न, इक्क दीहे समाय क्रम।।
                    ज्यौ भयौ जनम कवि छन्द कौ, भयौ जनम सामंत तब।
                    इक थान मरन जनमह सुइक, चाहि किकि ससि लंगिग रब।।

भारतीय विधा भवन, बंबई से प्रकाशित आचार्य जिनविजय मुनि द्वारा सम्पादित पुरातन प्रबंध संग्रह में चंद रचित चार छन्द उद्धृत हैं। इनसे प्रतीत होता है कि चैदहवीं शती से पूर्व चंद नाम का कोई कवि जीवित था। परन्तु वह कब पैदा हुआ, कहाँ पैदा हुआ, उसने क्या लिखा, कितना लिखा, यह सब जानने का कोई साधन या प्रमाण नहीं मिलता। केवल चंद कवि का नाम उन पुरातन छन्दों में अवश्य मिलता है।

इस समय पृथ्वीराज रासो, नामक जो ग्रन्थ प्राप्त होता है वह कौन से कवि चंद की रचना है यह कहना कठिन है। हाँ, पृथ्वीराज रासो की भाषा, वर्णनशैली, विषय सामग्री के आधार पर यही अनुमान लगाया जा सकता है कि चंद नामक कवि राजस्थान निवासी होना चाहिए। यह राजस्थान से बाहर का नहीं हो सकता। चन्द कवि की रचना में लगातार क्षेपक अंश मिलते रहे अतः उसका स्वरूप परिवर्तित होता रहा। 
      
चन्दबरदाई के पिता और माता का नाम कल्पित रूप में वेदन और कमला बताया जाता है। वास्तविक रूप से इन नामों के लिए कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। रासो के आधार पर राव वेन को चंद का पिता सिध्द करने का प्रयास भी अटकल ही है, प्रामाणिक नहीं। कुछ विद्वान मल्क नामक व्यक्ति को चंद कवि का पिता बताते हैं रासो काव्य में चंद ने अपने बाल्यकाल का वर्णन करते हुए लिखा है कि मैं और पृथ्वीराज एक साथ पैदा हुए। साथ-साथ रहे और बचपन व्यतीत किया।
                            हमहि राज इक वास, संग सदि।
                           नेह बंध बंधियै, करिय अति प्रीति राज रिदि।
                      सामन्त सकल अति प्रेमतर, बालनेह उर धुर कियौ।
                      बलिभद्र नेह संसार सुख, किस सुनेह छंडै जियौ।।

कवि चंद के दस पुत्र होने का संकेत भी रासो में मिलता है। उसने अपने पुत्र जल्हन को अपने छंदों के सागर रासो को तिरने के लिए गुणों की साज बताया है। जल्हन या जल्ह का नाम झल्ल भी बताया जाता है। इस जल्हन ने उपने पिता चंदबरदाई का रासों काव्य पूरा किया था-
                   आदि अंत लगि वृत्त मन वृनिन गुनी गन राज।
                   पुस्तक जल्हन हस्त दे, चलि गज्जन नृप काज।।

चंद कवि ने अपनी जाति  भटट लिखी है और रासो में अनेक स्थलों पर अपनी जाति का उल्लेख किया है।
                पहुंचाय चंद भटट सुवर, कीरति कलिजुग विस्तरिय।

चंद कवि की जीविका राज घराने से चलती थी। उन्हें अनेक जागीरें प्राप्त होती थीं। पृथ्वीराज ने नागौर में चंद को विस्तृत संपत्ति प्रदान की थीं। घोड़े, हाथी, रथ-आदि का वर्णन मिलता है जो चंद कवि को मिले थे। चंद कवि ने ऐश्वर्यशाली सामन्त का जीवन जिया था। देवी के वरदान से इन्हें सब प्रकार के सुख सम्पत्ति सुलभ थे। ज्वाला देवी के ये कृपापात्र थे। चन्द ने काव्य रचना का वरदान भी देवी से पाया था। पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता पर विचार करने वाले विद्वानों का यह विचार तो सर्वसम्मत है कि रासो में क्षेपक या परवर्ती प्रक्षिप्तांश अत्यधिक है किंतु चन्दबरदाई इसका मूल लेखक अवश्य है। उसका लिखा अंश कितना है इसका निर्णय अभी तक कोई विद्वान नही कर सका है।

शौर्य की कसौटी पर पृथ्वीराज रासो की परीक्षा
पृथ्वीराज रासो को आधुनिक युग में वीरगाथाओं का प्रतिनिधित्व करने वाला सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य माना जाता है। यह कहा जाता है कि चन्दबरदाई ने इस काव्य का प्रणयन पृथ्वीराज चैहान के शौर्य, पराक्रम और वीरता के गान के निमित्त ही किया था। इसलिए रासो में मुख्यत- तीन प्रसंगों का बाहुल्य है। युद्ध, विवाह और मृगया। युद्धों का वर्णन शत्रु से भिड़ने तथा साहसपूर्वक लड़ने से है। इन युद्धों की पृष्ठभूमि में कई स्थलों पर प्रेम का श्रृंगार भी पाया जाता है। कभी-कभी युद्ध का कारण किसी राजकुमारी के प्रति आकर्षण है तो कहीं किसी के अपहरण का उद्देश्य ही युद्ध का कारण है। इस प्रकार के युद्धवर्णन में वीर रस का पूरा परिपाक पाया जाता है, विवाह के संदर्भ भी युद्ध से कई स्थलों पर जुड़े हैं, वहा शृंगार और वीर दोनों रसों को कवि ने आधार बनाया है। विवाह में रति स्थायी होने से श्रृंगार  रस को ही प्राधान्य माना जायेगा। मृगया वर्णन में नायक के पौरुष का वर्णन साहस और वर्चस्व के साथ किया गया है। मृगया के वर्णन वीर रस तथा औत्सुकता के कारण अदभुत रस की सृष्टि करते हैं। पाठक के भीतर उत्सुकता उत्पन्न कर मृगया संदर्भ को अदभुत और कहीं-कहीं भयानक रस से संशिलष्ट प्रस्तुत करना कवि कौशल है।

काव्य में नवरस की स्थापना के संबंध में रासोकार प्रारम्भ से ही बहुत जागरूक और सावधान रहे हैैं। राजनीति के साथ नवरस को अपने काव्य में समाविष्ट करने की घोषणा उन्होंने भूमिका में ही कर दी है। इसके बाद रासों की विषयवस्तु का स्वयं निर्देश करते हुए उन्होंने नवरसों का नाम-निर्देशापूर्वक का अपने काव्य में स्थान माना है। रसों का नामोल्लेखपूर्वक कथन शास्त्रीय दृष्टि से दोष है किंतु रासोकार इस दोष के प्रति सजग नहीं है और एकाधिक स्थानों पर उन्होंन रसों का नामोल्लेखपूर्वक संकेत किया है। कुछ ऐसे प्रसंग हैं जिनमें रस सृष्टि स्वयं लक्षित हो जाती है। रासोकार की मान्यता है कि युद्ध में पराक्रम दिखाकर यशोपार्जन करना क्षत्रिय का मुख्य धर्म है। स्वामी-कार्य के लिए प्राणोत्सर्ग करना बलिदान के सदृश है। वे क्षत्रिय धन्य हैं, जो स्वामी कार्य में मति रखकर, निरंतर कष्ट सहते हुए अपने स्वामी को नहीं छोड़ते। स्वामी के लिए अपना शीश कटा देने वाला क्षत्रिय सायुज्य मुक्ति का अधिकारी होता है।

श्रृंगार रस के प्रसंग भी रासो में न्यून मात्रा में नहीं है। यदि इन सब प्रकरणों को एकत्र कर रस योजना पर विचार किया जाये तो श्रृंगार रस को भी रासो का प्रधान रस कह सकते हैं, ठीक है कि वीररस की तुलना में इतना उत्कर्ष कम है फिर हास्य, रौद्र, वीभत्स, भयानक, अदभुत आदि रसों का भी रासों में वर्णन मिलता है। रासो में वस्तु व्यंजना की स्थिति को बड़े विस्तार से अनिवार्य अनुबंध के रूप में स्वीकार किया गया है। वर्णनों की इयत्ता न होने पर काव्यशस्त्रियों ने आठ-दस प्रकार के वर्णनों को आवश्यक ठहराया है। इसमें नगर वर्णन, ऋतुवर्णन, प्राकतिक पदार्थों का सौन्दर्यवर्णन, युद्ध वर्णन, उत्सव वर्णन, विवाह वर्णन, नायक नायिकाओं का रूप, गुण, शील वर्णन, नखशिख वर्णन, मृगया वर्णन, विभिन्न शास्त्रों का वर्णन आदिप्रमुख हैं।

रासोकार का प्रिय विषय युद्धवर्णन है। युद्ध वर्णन में कवि केवल युद्ध-क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रहता। वरन वह युद्ध की तैयारी से लेकर युद्ध की समाप्ति तक की सभी स्थितियों से गुजरता हुआ विविध प्रकार के वर्णन प्रस्तुत करता है। युद्ध की तैयारी में मानसिक उत्तेजना, साहस दर्पोक्ति आदि के बाद वह बाह्रा तैयारी, शास्त्रों की सुसज्जा रणभेरी, शास्त्रों की झंकार आदि में रस लेता है। तदन्तर व्यूह रचना, हाथी-घोड़ों की भीषण गर्जना आदि से पाठक को विसिमत करना चाहता है युद्ध-वर्णन में कबंध-युद्ध रासोकार के प्रिय है। कबंद्ध-युद्ध सैनिक के भीतर छिपी उत्तेजना और बलिदान भावना का ही परिचायक है। इसमें वीररस के साथ, भयानक, रौद्र, बीभत्स और अदभुत का भी पूरा-पूरा विद्यमान रहता है।

नगर वर्णन में रासोकार ने मुख्यतः चार-पाँच नगरों को ही लिया है। अजमेर, कन्नौज, पहनपुरी और गजनी का वर्णन रासो में विशेष रूप से मिलता है। इन वर्णनों में नगर के वैभव, सौन्दर्य, सुरक्षा, परकोटा आदि को विस्तार से लिया गया है। दिल्ली को कवि ने असाधारण नगरी बताकर इसमें मोहने की शक्ति को स्वीकारा है।

विवाह वर्णन में पवती संयोगिता, इचिछनी प्रिया और शशिव्रता आदि वर्णित है। इन वर्णनों में संस्कार की परम्परा तथा विध्ाि, कर्मकांड विविधि प्रकार की साज-सज्जा आदि वर्णित है। सामन्ती युग के वैभव का इस वर्णन से आकलन किया जा सकता है। विवाह के समय होने वाली ज्यौनार (भोज) में भी कवि का मन रमा है और ज्यौनार में बने भोज्य पदार्थों की तालिका भी इसमें मिलती है। आखेट, नखशिख, बारहमासा आदि का वर्णन के संकेत रासा-व्यंजना के अन्तर्गत किया जा चुका है।

रासो एक विकसनशील महाकाव्य है जिसका आदर्श महाभारत है, अतः कुछ ऐसे वर्णन भी इसमें मिलते हैं जो अप्रासांगिक हैं किन्तु ज्ञान का कोष बनाने की स्पृहा से वे इनमें समविष्ट कर दिये गये हैं। जैसे-योगियों की साधना, राजनीतिशास्त्र शकुनशास्त्र, अध्यात्म विधा, धर्मशास्त्र आदि। वस्तुतः इन आप्रासंगिक विविध वर्णनों को रखने के पीछे कवि की महत्त्वाकांक्षा ही एकमात्र कारण है जो उस व्यासमुनि का अनुकरण करने को प्रेरित करती रही है।

काव्यशास्त्रीय कसौटी
पृथ्वीराज रासो सर्गबद्ध महाकाव्य है। इसमें 69 समय (सर्ग) हैं। इसका नायक पृथ्वीराज चौहान धीरोदत्त क्षत्रिय कुल में उत्पन्न कुलीन नृपति है। काव्य की कथावस्तु लोकविश्रुत महापुरुष से संबंध रखती है। रचना का प्रारम्भ मंगलाचरण तथा पूर्व कवियों के पुण्यस्मरण द्वारा किया गया है। सज्जनों की स्तुति है। महान कार्य के निमित्त पृथ्वीराज (नायक) प्रयत्नशील रहता है। महाकाव्य का नामकरण नायक के नाम पर ही किया गया है। संध्या प्रभात, विषय हैं। वीर और शृंगार इस काव्य वे़ं प्रधान रस हैं। इसके अतिरिक्त अन्य विषयों का भी कवि ने समावेश किया है। रासो में महत्ता और गांभीर्य की मीमांसा भी आवश्यक है। यह ठीक है कि रघुवंश नैषधीयचरित, शिशुपालवध, कुमारसंभव आदि काव्यों की भांति पृथ्वीराज रासो में अर्थगौरव और विचारगांभीर्य नहीं है किंतु कवि ने गम्भीर विषयों का समावेश करने की चेष्टा अवश्य की है। युगजीवन के विशेषतः सामन्ती जीवन के विविध चित्र इस काव्य में पाये जाते हैं। राजनीति, धर्मशास्त्रा, नीतिशास्त्र युद्ध संघर्ष आदि के साथ अध्यात्म तथा योग विधा का भी वर्णन कवि ने इसमें किया है। उसका लक्ष्य काव्य में गांभीर्य लाना ही है, यद्यपि इस लक्ष्य में उसे पूर्ण सफलता नहीं मिली है। महत्त्व की दृष्टि से यह महाकाव्य अत्यन्त उपायोगी हैं। संक्षेप में महाकाव्य की परम्परा धारण के अनुसार पथ्वीराज रासो का महाकाव्य की कोटि में समावेश किया जा सकता है।

निष्कर्षतः रासो काव्य परम्परा में सर्वप्रथम ग्रन्थ पृथ्वीराज रासो माना जाता है। संस्कृत, जैन और बौद्ध साहित्य में रास, रासक नाम की अनेक रचनायें लिखी गईं। गुर्जर एवं राजस्थानी साहित्य में तो इसकी एक लम्बी परम्परा पाई जाती है। लेकिन छंद वैविध्य के साथ काव्यात्मकता जिन ग्रंथों में स्थान पा सकी, उनका प्रतिनिधित्व करने वाली श्रेष्ठ रचना पृथ्वीराज रासो है। इस ग्रंथ में छंद वैविध्य के साथ विषय-वैविध्य, शैली-वैविध्य और भाव-वैविध्य भी पाया जाता है। पृथ्वीराज रासो की जो प्रतियाँ आज उपलब्ध हैं उनमें बहुत अंतर है किंतु जो भाग सभी प्रतियों में समान रूप से मिलता है, उसी को प्राचीन मानकर इसका रूप निर्धारण किया जा सका। उसी आधार पर आधुनिक विद्वानों में बहुत पृथ्वीराज रासो को चन्दकवि कृत मानने के पक्ष में हैं। पृथ्वीराज रासो हिन्दी का प्राचीनतम महाकाव्य है। इस काव्य को मुख्यतः वीररस प्रधान महाकाव्य ठहराया जाता है। यह ठीक है कि वह विगत सात-आठ सौ वर्षों से कालाधारा में अडिग चटटान की तरह खड़ा है और सामन्ती युग के पूरे परिवेश को हमारे सामने उजागर करता है। किंतु पृथ्वीराज रासो न तो किसी एक कवि की समस्त रचना है और न एक काल की। साथ ही इसकी भाषा में एक भी एकरूपता नहीं है। 

अतः इसके गुण-दोष का विवेचन करते समय इन सब बातों पर ध्यान रखना आवश्यक है। रासो का महात्वांकन करते समय हमें चार बिन्दुओं पर ध्यान देना चाहिए। साहित्यिक, ऐतिहासिक भाषा वैज्ञानिक सांस्कृतिक दृष्टियों से यदि हम इसका मूल्यांकन करें तो हम देखेंगे कि हिंदी साहित्य के आदिकाल में शौरसेनी अपभ्रंश से उदभूत ब्रजभाषा और राजस्थानी की यह सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक कृ़ति है। इसके चारों रूपांतरों को सामने रखकर यदि इसे चन्दबरदाई की रचना माना जाय तो निश्चय ही साहित्यिक स्तर पर इसका महत्त्व है। ऐतिहासिक दृष्टि से यह शुद्ध इतिहास का ग्रंथ नहीं है किंतु इसके घटना-संकुल वर्णनों में राजस्थान के राजवंशों तथा अनेक पराक्रमी पुरुषों की सामग्री एकत्र कर अपने इतिहास का प्रणयन किया है। भाषा वैज्ञानिक दृषिट से तो इसकी उपदेयता हिन्दी-साहित्यक ग्रंथों में सर्वाधिक है। हिंदी भाषा के प्राचीन रूपों को खोजने, व्याकरण का रूप स्थिर करने तथा भाषा विकास की क्रमिक सरणियों को स्थापित करने में इस ग्रंथ का उपयोग हार्नले, टेसीटरी, वूलर, ग्रियर्सन आदि विदेशी विद्वानों ने तथा सुनील कुमार चाटार्ज्या , डा. उदय नारायण तिवारी, माताप्रसाद गुप्त, श्यामसुंदर दास आदि भारतीय विद्वानों ने भरपूर मात्रा में किया है। यह इस ग्रंथ के महत्व पृथ्वीराज को पूर्णतः स्थापित करते हैं। संस्कृ़तिक दृष्टि से यह ग्रन्थ हृासोन्मुख समान्ती संस्कृ़ति का परिचय देने वाला कोशग्रंथ है। समान्ती संस्कृ़ति का जैसा विशद व्यापक वर्णन इस महाकाव्य में उपलब्ध होता है वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। अतः इस ग्रंथ को महत्त्व की दृष्टि से अनेक रूपों में देखा जाता है।

संदर्भ ग्रंथ
पृथ्वीराज रासो : कुछ खंड, बंगाल एशियाटिक सोसाइटी, कलकत्ता।
पृथ्वीराजरासो : सं. मोहनलाल वि. पंड्या, नागरीप्रचारिणी सभा, काशी।
संक्षिप्त पृथ्वीराजरासो: सं. हजारीप्रसाद द्विवेदी तथा नामवर सिंह, साहित्य भवन लि., प्रयाग।
पृथ्वीराजरासो : सं. कविराय मोहन, साहित्य संस्थान, संस्थान, राजस्थान विश्व विद्यापीठ, उदयपुर।
विपिनबिहारी त्रिवेदी : चंद बरदायी और उनका काव्य, हिंदुस्तानी एकेडेमी एकेडेमी प्रयाग।
रासो समीक्षा : सदाशिव दीक्षित, मोतीलाल बनारसीदास, नैपाली खपड़ा, वाराणसी।
पृथ्वीराज-विजय : सं. गौरीशंकर हीराचंद ओझा, अजमेर।
पुरातन प्रबध संग्रह : सं. मुनि जिनविजय, भारतीय विद्याभवन, बंबई ।
हम्मीर महाकाव्य (जयचंद्र सूरिकृत), सं. नीलकठ जनार्दन कीर्तने : एजुकेशन सोसाइटी प्रेस, बंबई।
सुर्जन चरित महाकाव्य (चंद्रशेखर कृत) सं. डॉ॰ चंद्रधर शर्मा, हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी।
पृथ्वीराज रासउ : सं. माता प्रसाद गुप्त : साहित्य सदन, चिरगाँव, झाँसी।
                                                     
 प्रो.उर्मिला पोरवाल(सेठिया)
हिंदी विभाग प्रभारी शेषाद्रि पुरम महाविद्यालय,बैंगलोर
सम्पर्क:- 7829275695, ईमेल:- urmiporwal@gmail.com
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