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आलेखमाला:सामाजिक व्यवस्था का सच और कोर्ट मार्शल – अनिरूद्ध कुमार यादव

Written By अपनी माटी,चित्तौड़गढ़ on बुधवार, नवंबर 16, 2016 | बुधवार, नवंबर 16, 2016

    चित्तौड़गढ़ से प्रकाशित ई-पत्रिका
  वर्ष-2,अंक-23,नवम्बर,2016
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       आलेखमाला:सामाजिक व्यवस्था का सच और कोर्ट मार्शल –अनिरूद्ध कुमार यादव               

             , क्योंकि भारत की सामाजिक संरचना में वर्णव्यवस्था, जो कालान्तर में जाति-व्यवस्था में पर्यावसित हो गई, की विशेष स्थिति पायी जाती है। इसके साथ ही समाज का स्तरीकरण विभिन्न मापदण्डों यथा - अमीर-गरीब, ऊँच-नीच, स्त्री-पुरुष आदि - पर करके समाज का विभेदीकरण कर दिया गया। अपनी विधि-मान्यताओं को वैधता प्रदान करने के लिए धार्मिकता की आड़ में इनका संस्थानीकरण भी किया गया। जिससे स्थिति और भी उलझ गई। क्योंकि धर्म की आड़ में कभी जाति के नाम पर तो कभी स्त्री के नाम पर शोषण होता रहा है। आज के समय में भी हम अपनी सोच और व्यवहार में इन संस्कारों से उबर नहीं पाए हैं। जिसकी झलक आए दिन देखने को मिलती रहती है। जिससे निचली जातियों एवं स्त्रियों का शारीरिक, मानसिक, सामाजिक एवं आर्थिक शोषण होता है। हालांकि समय-समय पर समाज के प्रतिबद्ध लोगों के द्वारा स्थिति को सुलझाने का प्रयास भी होता रहा है। कहना न होगाकि कोर्ट मार्शलभी एक ऐसा ही प्रयास है। जिसमें स्वदेश दीपक न सिर्फ जाति एवं लिंग के आधार पर शोषित एवं दमित व्यवस्था के सच को उघाड़ा है, बल्कि इसके समाधान के लिए विकल्प भी सुझाया है।
सामाजिक व्यवस्था सामाजिक संरचनाओं का जाल है। व्यक्ति और समाज के संबंधों के निर्धारण से सामाजिक संरचना का निर्माण होता है। विश्व के सभी देशों में अपनी एक सामाजिक संरचना होती है। इस संदर्भ में भारत एक जटिल सामाजिक संरचना का उदाहरण है

                ‘कोर्ट मार्शलस्वदेश दीपक का बहुचर्चित और बहुमंचित नाटक है। रामचंदर के कोर्ट मार्शल को लेखक ने बहुत ही खूबी के साथ सामाजिक व्यवस्था का कोर्ट मार्शल बना दिया है। जिसके कटघरे में जवान, मेरा मतलब सवाररामचंदर नहीं, बल्कि सनातनी भारतीय सामाजिक ढाँचा है, जो असमानता, शोषण, अत्याचार, सामाजिक और लैंगिक भेदभाव पर टिका है। यह नाटक सामाजिक त्रासदी का यथार्थ रूप में उद्घाटन करता है। जिसमें सामाजिक विसंगतियों, विडम्बनाओं और विद्रूपताओं को कैप्टन बिकाश राय के द्वारा परत दर परत उघाड़ा गया है। जिसे पाठक/दर्शक पढ़कर/देखकर दंग रह जाता है। वह स्वयं सामाजिक व्यवस्था के ताने-बाने पर प्रश्न चिह्न लगा देता है। इस नाटक की केन्द्रीय संवेदना जाति व्यवस्था में पिसता हुआ तथाकथित एक नीची जातिका सवार रामचंदर है। इसके अलावा इसमें सामंती मानसिकता को भी उद्घाटित किया गया है, चाहे आज के समय में हम कितने ही आधुनिक क्यों न हो गए हों। इससे निजात नहीं मिली है। इसके साथ ही इस नाटक में फौजी अनुशासन और न्यायिक प्रक्रिया के खोखलेपन को भी दिखाया गया है।

                भारतीय समाज की एक मूलभूत विशेषता जाति व्यवस्था है। हमारा समाज अनेक जातियों से मिलकर बना है। समाज की तथाकथित उच्च कही जाने वाली जातियों द्वारा जाति-व्यवस्था की स्थापना वैदिक काल में ही कर दी गई। जिसके अन्तर्गत पूरे समाज को मुख्यतः चार जातियों- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र में विभाजित किया गया। साथ ही इन जातियों की सामाजिक हैसियत (ऊँची-नीच) और सामाजिक कर्म भी निर्धारित कर दिया गया। जाति जन्म आधारित एक बंद व्यवस्था है। इसका तात्पर्य यह है कि आपका खान-पान, शादी-विवाह आदि अपनी जाति तक ही सीमित है, इसके बाहर नहीं। कुल मिलाकर जाति व्यवस्था के तीन आधार दिखलायी पड़ते हैं- (1) जन्म (2) श्रेणीकरण और (3) अन्तर्जातीय विवाह और खान-पान पर निषेध। जाति-व्यवस्था के कारण कोई भी व्यक्ति अपनी जाति को जिसमें वह जन्म लेता है, हरगिज नहीं बदल सकता, अलबत्ता उसमें अनेक गुण और कौशल क्यों न हों। इसने जातियों के समूह को जन्म दिया। इन जातीय समूहों का श्रेणीकरण कर दिया गया। जिस कारण समाज में श्रम और श्रमिक का जातीय विभाजन हुआ। अर्थात् प्रत्येक जाति के कार्य को निश्चित कर दिया गया। जिसके कारण समाज में अछूत, ऊँच-नीच, छुआछूत आदि अनेक बुराइयाँ अपनी जड़ गहरी करने लगीं। जिसके आधार पर ही शोषण, दमन एवं अत्याचार किए गए। यह व्यवस्था भविष्य में बनी रहे इसके लिए अन्तर्जातीय विवाह पर रोक तथा इसका धार्मिकीकरण कर दिया गया। जिसका परिणाम यह हुआ कि अब जाति-व्यवस्था मानव निर्मित न होकर देवता निर्मित हो गई और जिसका उल्लंघन देवता का उल्लंघन माना जाने लगा। जिसका दंड देवता देगा, ऐसा बताकर शोषण होता रहा। यह स्थिति आज भी बनी हुई है।

                ‘कोर्ट मार्शलमें सर्वप्रथम इसी सनातनी शोषण-व्यवस्था  जिसका शिकार रामचंदर है, का क्रूर चेहरा सामने लाया गया है। वह इस शोषण का शिकार इसलिए होता है कि उसका जन्म एक नीची जातिमें हुआ है, लेकिन उसमें कर्तव्यनिष्ठा, ईमानदारी, नैतिकता, मानवता आदि गुण हैं। लेखक के शब्दों में वह गऊआदमी है। उसमें यह क्षमता है कि एशिया का सबसे तेज धावक बन सकता है। फिर ऐसा क्यों हुआ कि उसने कैप्टन मोहन वर्मा और कैप्टन बी.डी. कपूर पर कातिलाना हमला किया। जिसमें कैप्टन वर्मा मारे गए और कैप्टन बी.डी. कपूर घायल हो गये। जिसके जुर्म में रामचंदर पर यह कोर्ट मार्शलहुआ। इसी सत्य के उद्घाटन के लिए लेखक ने बार-बार बचाव पक्ष के वकील कैप्टन बिकाश राय के द्वारा यह सवाल सामने रखा है- सोचिए जरूर कि रामचंदर ने गोली क्यों चलाई। क्यों किया खून। कई बार सच बिल्ली की तरह दुबककर किसी अँधेरे कोने में छिपकर बैठा रहता है। ध्यान से देखें, सोचें, तभी पता चल सकता है कि सत्य क्या है।”1

                अब प्रश्न उठता है कि सत्य क्या है? इस नाटक में सच के अनेक रूप हैं, जो एकमेव होकर सामाजिक सच बनते हैं। सत्य का एक रूप यह शोषणमूलक जाति व्यवस्था है, जिससे विवश होकर गऊजैसा रामचंदर एक हत्यारा बन जाता है। कैप्टन कपूर तथा कैप्टन वर्मा जो तथाकथित उच्च जातिमें जन्में फौजी अफसर हैं। बात-बात में नीची जातिके होने के कारण रामचंदर को अपमानित एवं शोषित करते हैं। जैसे- सर! आप तो जानते हैं रामचंदर छोटी जाति का है। कैप्टन कपूर उसे आये हरिजनकहकर पुकारते थे। उनके दोस्त कैप्टन वर्मा भी उसे ओये चूहड़े दे पुत्तरपुकारते थे।”2 

यह अपमान यहीं नहीं रूकता, रामचंदर जब बच्ची की टट्टी उठाने से इंकार कर देता है तो कैप्टन कपूर पूरे गुस्से में सब मेहमानों के सामने उसे बेइज्जत करते हुए कहा- जात का चूहड़ा और टट्टी उठाने में शर्म आती है! तुम्हारे पुरखे पुश्तों से हम लोगों की टट्टी की टोकरी सिर पर उठा रहे हैं।”3 

यह पूरा घटना क्रम सदियों से चले आ रहे जातीय शोषण के चरित्र को उघाड़ के रख देता है। जिसमें मानवीयता तार-तार हो जाती है। जिसमें रामचंदर घुट-घुट कर मर रहा है। हद तो तब हो जाती है जब कैप्टन मोहन वर्मा और कैप्टन बी.डी. कपूर दोनों रोज रामचंदर को गंदी-गंदी गालियाँ देते हैं- चिट्टे चूहड़े! हराम की सट्ट! तेरी माँ जरूर किसी कपूर या वर्मा के साथ सोई होगी!”4 

यह कथन उसी सामंती सोच को दर्शाता है, जो छोटी जातिकी औरतों को अपनी लौंडी समझते हैं। वे चाहे आधुनिक होने का कितना ही दंभ क्यों न भरे, उनकी सोच परम्परागत, दकियानूस और अमानवीयता को दर्शा ही देती है। आज के सुसंस्कृत लोगों की जाति-संबंधी सोच की वास्तविकता को उद्घाटित करता हुआ यह कथन डा. राममनोहर लोहिया ने बहुत पहले ही कह दिया है कि - जाति की सीमा के अंदर जीवन चलता है और सुसंस्कृत लोग जाति-प्रथा के विरुद्ध हौले-हौले बात करते हैं, जबकि कर्म में उसे नहीं मानना उन्हें सूझता ही नहीं।”5 जब कोई आदमी जान बूझकर ऐसा सलूक करें, बात-बात में अपमान करें और माँ-बाप को गंदी-गंदी गालियाँ दे तो क्या करेंगे आप? जाहिर है वही करेंगे जो रामचंदर ने किया। लेकिन उस विरोध-चेतना को समाज के ठेकेदार कैसे स्वीकार कर सकते हैं। इसलिए उसे जरूर होनी चाहिए फाँसी, क्योंकि अपने देश की रक्षा की शपथ लेने के बावजूद उसने कर दिया इंकार एक अफसर की बच्ची की गंदनी उठाने से। अपने देश की रक्षा की शपथ लेने के बावजूद उसने हराम की सट्ट जैसी साधारण गाली खाने से कर दिया इंकार। अपने देश की रक्षा की शपथ लेने के बावजूद उसने अपने कान, अपनी आँखे बंद करने से कर दिया इंकार। उसे दंड मिलना चाहिए। मृत्यु-दंड। बार-बार मृत्युदंड।”6

                समाज में ऊँच-नीचका भेदभाव है। वह सामाजिक, प्रशासनिक, न्यायिक सभी क्षेत्रों तक व्याप्त है। पूर्वाग्रह हमारी अंधी न्याय व्यवस्थामें इस तरह फैला हुआ है कि वह सच देखना ही नहीं चाहती, बल्कि अपने न्यायिक ड्रामेके लिए समय देखती है। न्यायिक ड्रामाइसलिए क्योंकि लोगों को भ्रमित किया जा सके, कि उन्हें न्याय मिलेगा। जबकि सच्चाई यही है कि न्याय धन-बल और सामाजिक हैसियत के अनुसार ही दिया जाता रहा है। फिर इसका परिणाम कुछ भी क्यों न हो? अपने व्यंग्यात्मक लहजे में इसका उद्घाटन करते हुए कैप्टन बिकाश राय कहता है- राइट सर! समय तो सचमुच बहुत कीमती होता है (रामचंदर की तरफ देखता है) किसी के जीवन से भी कीमती। इस कोर्ट की चिंता सही है। बिल्कुल सही। समय नष्ट नहीं होना चाहिए, चाहे कोई फाँसी ही क्यों न चढ़ जाए।”7 कोर्ट अपने निर्णय तथ्यों एवं सबूतों के आधार पर ही देती है, सच पर नहीं। न्याय व्यवस्था की इन्हीं परम्पराओं पर अफसोस जाहिर करते हुए प्रीडाईजिंग अफसर कर्नल सूरत सिंह रामचंदर से कहता है कि मैं कल सुबह तुम्हें सजाए-मौत दे रहा हूँ। क्योंकि इसके सिवाय मेरे पास देने के लिए कुछ नहीं है।”8  जबकि दूसरी तरफ कैप्टन बी.डी. कपूर जो रामचंदर को इस स्थिति तक पहुँचाने का मुख्य दोषी है, उसके खिलाफ कानूनी रूप से कोई सबूत नहीं है, ये कैसी विडंबना है? इसीलिए अंत में लाचार प्रीडाईजिंग अफसर पोएटिक जस्टिसपर खुशी जाहिर करता है और इसके साथ ही मैं जानता हूँ, नियम और कानून केवल छोटे और कमजोर लोगों के लिए होते हैं। कहाँ मानते हैं रूल्ज को बड़े और ताकतवर लोग।”9 हमारे समाज में एक वर्ग द्वारा नैतिकता, कर्तव्यनिष्ठा, ईमानदारी, नियम-कानून आदि का एक आवरण ओढ़ लिया गया है, उसको स्वदेश दीपक धीरे से खींच लेते हैं और आदमी का नंगापनसामने आ जाता है। दरअसल चाहे आप किसी भी दिशा में देखें, जाति एक ऐसा दैत्य है, जो आपके मार्ग में खड़ा है। आप जब तक इस दैत्य को नहीं मारेंगे”10, तब तक मान-सम्मान, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की बात करना बेमानी है।


                ‘कोर्ट मार्शलमें सामंती मानसिकता के स्त्री नजरिये को भी बखूबी व्यक्त किया गया है। पुरुष जो स्त्री को अपनी सम्पत्ति, इज्जत यहाँ तक कि वस्तु समझता है। वह उसे बराबरी का दर्जा भला कैसे दे सकता है। यदि दे दी तो उसके पुरुषवादी अहं को ठेस न पहुँचेगी। यह भारतीय समाज की विडंबना ही है कि पुरुष जो अपने जीवन में जिस शक्ति, सम्पत्ति और विद्या की सर्वाधिक कामना रखते हुए इनकी प्राप्ति के लिए दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसी देवियों (स्त्रियों) की पूजा करता है, उसी शक्ति, सम्पत्ति और विद्या से सबसे दूर किसी को रखा गया है तो वह स्वयं स्त्रियाँ ही हैं। अब तक पुरुष स्त्रियों को दो ही दृष्टि से देखता रहा है- या तो देवी या फिर दासी। उसे मनुष्य रूप में कभी देखा ही नहीं गया। इसलिए या तो उसकी पूजा हुई या फिर शोषण और दमन। पुरुष हमेशा से स्त्री पर अपना अधिकार जताता रहा है। पुरुष हमेशा से स्त्रियों को भोग्या ही समझता आया है। वह चाहे पत्नी ही क्यों न हो? स्त्री परिवार चलाने और बच्चा पैदा करने वाली मशीन तथा पुरुष के अधिकारों तले अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए अभिशप्त है। ऐसे ही विचारों एवं सोच के आधार पर स्त्रियों का शारीरिक, सामाजिक एवं आर्थिक शोषण होता रहा। इस नाटक में इन विचारों का प्रतिनिधि पात्र कैप्टन बी.डी. कपूर हैं। जिसको उनकी पत्नी और उनके मध्य हुए संवाद से नाटककार ने बहुत सूक्ष्मता एवं मनोवैज्ञानिक तरीरे से चित्रित किया है। कैप्टन कपूर से उनकी पत्नी ने कहा- मुझे मत छुओ। यू आर ड्रंक। यू आर स्टिकिंग। डोंट टच मी।तो इस पर कैप्टन कपूर का सामंती चरित्र दिखता है। वह पत्नी का गाऊन फाड़ डालता है और कहता है- आई हैव लाइसेंस टु स्लीप विद यू। चुपचाप आ जाओ बिस्तर पर। जानती नहीं मैं कौन होता हूँ? कपूर!’11 वह जब फिर प्रतिरोध करती है, तो कैप्टन कपूर ऐश ट्रे से मार कर उसे बेहोश कर देता है। आखिरकार एक पुरुष यह कैसे स्वीकार कर सकता है कि उसकी पत्नी उसे छूने एवं बिस्तर में आने से मना कर दे। बात यहीं खत्म नहीं होती बल्कि नाटककार ने उस स्थिति को भी दर्शाया है जिसमें स्त्री के शोषण और अत्याचार को छूपाने के लिए उसे साजिश के तहत कोई अन्य नाम दे दिया जाता है। इस विडंबनापूर्ण स्थिति पर व्यंग्य कसता हुआ बिकाश राय कहता है- पैर पत्नी का फिसलता है हमेशा, पति का कभी नहीं। घर की आग भी बड़ी सयानी होती है। हमेशा बहू को लगती है।”12 इस नाटक में यह भी नोटिस लिया जाना चाहिए कि इसमें प्रखर स्त्री प्रतिरोध का स्वर भी सुनाई पड़ता है। वह अपने शोषण और अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलंद करती है और अपने अलग वजूद और अधिकार के लिए संघर्ष भी करती है। कैप्टन कपूर की पत्नी तलाक के लिए अर्जी देती है और कैप्टन कपूर पर केश चलता है एनीमल बिहेवियरका। लेखक लिखता है- कैप्टन कपूर की पत्नी तो एक योद्धा औरत है। उसने और अत्याचार सहने से इन्कार कर दिया। तलाक माँगा है पति से।”13 यह है स्वदेश दीपक का स्त्री दृष्टिकोण। जो उनके नाटक सबसे उदास कवितामें और भी ज्यादा मुखर होकर व्यक्त होता है।

                ‘कोर्ट मार्शलमें फौजी जीवन में व्याप्त भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार, झूठी शानो-शौकत की भी पोल खोली गई है। फौज में अनुशासन के नाम पर जो अत्याचार और शोषण होता है, उसको भी बेपर्दा किया गया है। फौजी नियम कानून में बड़े-छोटे, अमीर-गरीब और जाति के स्तर पर जो भेदभाव व्याप्त है, उसको भी दर्शाया गया है। कैप्टन कपूर कहता है - अब खानदानी लोग फौज में भरती नहीं होते। नीची जाति के लोगों को भरती किया जाएगा तो यही होगा। बात-बात पर शिकायत और शैमिंग। इसीलिए इंडियन आर्मी का डिसिप्लेन...।”14 फौज में एक अर्दली को किस तरह सेवादार में बदल दिया जाता है तथाकथित उच्च जाति का कैप्टन कपूर किस तरह सरकारी अनाज को छुपाकर बाजार में बेचता है। या फिर अफसरों की मिली-भगत हो किल- अफसर हमेशा अफसर का साथ देगा और अमीर हमेशा अमीर का।आदि के माध्यम से इस नाटक में सेना का असली चेहरा पाठक के सामने आता है। जिसमें अनुशासन के नाम पर तो कभी स्वायत्तता और अलग न्यायिक व्यवस्था के नाम पर तरह-तरह के शोषण, अत्याचार एवं अन्याय किए जाते हैं। जिसके विरोध में समय-समय पर असंगठित ही सही, किंतु स्वर उठते रहे हैं किंतु इनकी सुनवाई कहीं नहीं होती। जिसका परिणाम यह होता है कि - जब छोटे-छोटे विरोध लगातार दबा दिए जाएँ, अनसुने-अनदेखे कर दिए जाएँ तो हमेशा एक भयंकर विस्फोट होता है। प्राणघातक विस्फोट।”15 ‘कहना न होगाकि यह विस्फोट ही इस नाटक की शोषण से मुक्ति की आकांक्षा और अनिवार्यता को दर्शाता है। जो हर उस व्यवस्था को जड़ से खत्म कर देना चाहता है, जो जाति, ऊँच-नीच, लिंग-भेदभाव पर आधारित एवं अमानवीय है। जिससे समाज में मानवता एवं न्याय की स्थापना हो सके। कोर्ट मार्शलके न्याय एवं मानवता की स्थापना एवं शोषण के विरुद्ध विरोध का तीव्र स्वर कैप्टन बिकाश राय, कैप्टन कपूर की पत्नी एवं प्रीडाइनिंग अफसर के माध्यम से व्यक्त हुआ है।      
                यह नाटक बहुत कम पृष्ठों में अपने भीतर विस्तृत फलक को समेटे हुए है। वह चाहें जाति-व्यवस्था का सच हो, स्त्री-जीवन की त्रासदी का सच हो, नक्सलबाड़ी आन्दोलन का सच हो या फिर सामंती मानसिकता का सच हो। इस नाटक में इसी सच को उद्घाटित करने का प्रयास किया गया है। यही कारण है कि बिकाश राय कहता है कि सर! मैं वह चीज बचाने की कोशिश कर रहा हूँ, जो रामचंदर के प्राणों से भी कीमती है। सूरत सिंह- क्या? बिकाश राय-सत्य। वह सत्य जो आदमी की जान से भी अधिक मूल्यवान होता है।”16 और जिस दिन सच समझ में आ गया लोगों को, उस दिन नहीं रहेंगे वह इनके गन्दे हाथों का बदसूरत खिलौना। रोशनी का सैलाब आएगा। सैलाब! सब कुछ जो गंदा है, घिनौना है, बहा ले जाएगा यह सैलाब।”17 यही कारण है कि इस नाटक में सत्य पर सर्वाधिक जोर दिया गया है। जो हमारी सामाजिक व्यवस्था का क्रूर सच है।



सन्दर्भ सूची -

1.            ‘कोर्ट मार्शल’ - स्वदेश दीपक, पृष्ठ- 41-42, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण- 2015
2.            वही, पृष्ठ- 76-77
3.            वही, पृष्ठ- 78
4.            वही, पृष्ठ- 89
5.            डा.राममनोहर लोहिया 'जाति का विनाश: क्यों और कैसे'
             पुस्तक - जाति का जंजला - संपा. - डा. रणजीत, लोकभारती प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 2013
6.            ‘कोर्ट मार्शल’ - स्वदेश दीपक, पृष्ठ- 92-93
7.            वही, पृष्ठ- 33
8.            वही, पृष्ठ- 96
9.            वही, पृष्ठ- 76
10.       बाबा साहेब डा. अम्बेडकर: सम्पूर्ण वाङ्मय खण्ड-1, पृष्ठ- 66, डा. अम्बेडकर प्रतिष्ठान, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित, चतुर्थ संस्करण- 2011
11.          कोर्ट मार्शल - स्वदेश दीपक, पृष्ठ- 64
12.          वही, पृष्ठ- 65-66
13.          वही, पृष्ठ- 66
14.          वही, पृष्ठ- 82
15.          वही, पृष्ठ- 92
16.          वही, पृष्ठ- 43

17.          जलता हुआ रथ - स्वदेश दीपक, पृष्ठ- 43, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली


      अनिरूद्ध कुमार यादव, शोधार्थी हिंदी विभाग ,दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली 
      ईमेल आईडी -anirudhdv1@gmai.com मो.08368162042
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