काव्य-लहरी:इकबाल की कविताएँ - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

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काव्य-लहरी:इकबाल की कविताएँ

    चित्तौड़गढ़ से प्रकाशित ई-पत्रिका
  वर्ष-2,अंक-23,नवम्बर,2016
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ईश्वर से वार्तालाप

जब मैं सुबह जा रहा था सैर पर
तभी अचानक मुझसे टकरा जाता है ईश्वर
मैं पूँछता हूँ, हे ! प्रभु सुबह-सुबह
आप कहाँ भागे-भागे जा रहे हो
वह कहता है मुझे कोई ऐसा स्थान बताओ
जहाँ पर मुझे शांति और चैन मिल सकें
मैं कहता हूँ तुम तो सभी को शांति और चैन देते हो
वह कहता है आज कल जो हो रहा है मेरे साथ
क्या बताओ तुमे,
सुनो मेरी पीड़ा-
कोई मेरे ऊपर नारियल फोड़ देता है
कोई बकरा तो,कोई मुर्गा काट देता है,
कोई मेरे ऊपर बच्चों के बाल काट
चढ़ा देता है,
कोई मेरे नाम पर इंसानों को लड़वा देता है
कोई मेरे नाम पर बना मठ 
लोगों की आस्था से खेलता है
कोई मेरे नाम पर मंदिर के लिए लड़ता है
कोई मेरे नाम पर मस्जिद के लिए लड़ता है
क्यों नहीं समझतें यह पागल लोग
मुझे रहने के लिए ना मन्दिर की जरूरत है 
ना ही मस्जिद की।
मुझे रहने के लिए चाहे इन्सान के दिल में 
एक छोटा-सा कोना।
मुझे लिखना
मुझे लिखना
खेतों की पगड्डी के बारे में
जिसके दोनों ओर फसलें लहराती थी
या फिर उन फसलों की जगह उग आईं हैं
कंकरीट की बहू मंजिल ईमारतें।

मुझे लिखना
गोरे के बरगद के पुराने पेड़ के बारे में
जिसके नीचे पूरे गाँव की भैसें
धूप में आराम करती थी
या फिर उसे भी काट दिया गया है
भौतिकता की अंधी दौड़ ने।
मुझे लिखना
गाँव की छोटी-सी नदी के बारे में
जिसमें हम पूरी गर्मी नहाते हुए बिताते थे
या फिर वह भी तब्दील हो गई है
एक नाले में जिसमें अब मल बहता है
मुझे लिखना
गाँव के सरकारी स्कूल के बारे में
जिसमें हमारी जिन्दगी के दस साल बिते थे
या फिर वह भी सूना हो गया है शिक्षा के व्यापार में
मुझे लिखना जरूर मेरे दोस्त।


अपनी भाषा
तुम भी अपनी भाषा में 
बोलना सीख लो 
सभी अपनी-अपनी भाषा में
बोलते हैं
नहीं तो एक दिन 
तुम गुलाम बन जाओ गये
जिसकी शुरूआत
भाषा से होती है।
वह तुमे काट देगी
इंसान से, समाज से,
संस्कृति से,अस्मिता से
तुम समझ नहीं पाओ गये
पेड़-पौधों का हवा में झूमना
पक्षियों का चहकना
नदियों का कल-कल गाना
यह सब तो अपनी ही भाषा में 
सीखा जा सकता है।
इसलिए तुम भी अपनी 
भाषा सीख लो
मैं भी सीख रहा हूँ 
अपनी भाषा।

छोटू
ना जाने कितने ही छोटूओं का
दम तोड़ रहा है बचपन
ढाबों पर चाय के गिलास धोते-धोते
उनको नहीं पता स्कूल में क्या पढ़ाया जाता है
उन्हें तो आता है क-से -कप,
ख-से-खाना,ग-से-गिलास,
इससे आगे की पढ़ाई
उनकी समझ से बाहर है।
उन्होंने जब से होश सम्भाला है
खुद को पाया है ढाबों पर
उनका नाम रखने के लिए
नहीं की गई कोई मन्त्रणा
हमारे नाम की तरह
उन्हें नहीं बताना पड़ता
अपना नाम किसी को
क्योंकि सब जानते है कि
ढाबों पर रहने वाले बच्चों का
नाम छोटू ही होता है
इन छोटूओं के लिए बनाए
कानून केवल फाईलों में 
कैद होकर रह गए हैं।
कोई कानून आकर यह नहीं कहता
आज से तुम छोटू नहीं हो
चल बेटा स्कूल तेरा इंतजार कर रहा है


सूना आँगन
स्कूल की छुट्टी होते ही
जिस आँगन में बच्चे 
दिन भर ऊधम मचाते थे
जिस में वह दौड़ लगाते थे
खोद पील्या, कन्चें गोली पर
निशाना लगाते थे
कभी बन रेल
छुक-छुक करके 
रेलगाड़ी चलाते थे
मैं देख उनका कलियों -सा
खिला चेहरा 
अपनी दिन भर की 
थकान भूल जाता था
अब सूना है वह आँगन
क्योंकि बच्चे बड़े हो गये है
लेकिन ना जाने क्यों वह
सूना आँगन आज भी करता है
बच्चों का इंतजार।
    इकबाल
शोधार्थी-पीएच.डी.हिंदी,कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय,कुरुक्षेत्र,
संपर्क:
09992606227iqbal.moual@gmail.com

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