शैक्षिक सरोकार:विद्यालयी जीवन का समाजशास्त्री अध्ययन (दूसरी किश्त) – सुनील बागवान - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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शैक्षिक सरोकार:विद्यालयी जीवन का समाजशास्त्री अध्ययन (दूसरी किश्त) – सुनील बागवान

त्रैमासिक ई-पत्रिका
वर्ष-3,अंक-24,मार्च,2017
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शैक्षिक सरोकार:विद्यालयी जीवन का समाजशास्त्री अध्ययन (दूसरी किश्त) – सुनील बागवान


चित्रांकन:पूनम राणा,पुणे 
दिवाली की शाम को मैं अपने घर के सामने खड़े-खड़े मोहल्ले में बच्चों की गतिविधियों को देख रहा था - सविता, भावना, बुलबुल घर के सामने रंगोली बना रही थीं, कभी घर के अंदर से उन्हे बुलाने की आवाज आती तो वे झट से दौड़कर अंदर चली जाती और तेजी से वापस आकार फिर से रंगोली बनाने लग जाती थी। अजय, राम और सोनू कभी बाजार से कुछ लेकर आते तो कभी वापस किसी और काम के लिए निकल पड़ते थे। बड़ी ही व्यस्त शाम थी दिवाली की। शाम को कुछ अंधेरा हुआ कि स्ट्रीट लाइट जल उठी और अपने-अपने घरों के सामने दीपक जलाने का सिलसिला शुरू हो गया। कुछ देर बाद दो मिनट के लिए जब बिजली चली गई तब महसूस हुआ कि इस तरफ के घरों के सामने दीपक जल रहे थे और उस तरफ के घरों के सामने दीपक नहीं जल रहे थे। बिजली के चले जाने से दिखाई देने वाले सारे दीपक की रोशनी का यह बंटवारा मुझे कुछ चुभ-सा गया था। कुछ देर में जब बिजली आई, मोहल्ले में रोशनी फैली तो यह विभाजन रेखा कुछ धुंधली हो गई। एक और मेरे जहन में यह विभाजन अब भी कौंध रहा था, और दूसरी और मैं  सोच रहा था कि पलभर बिजली के चले जाने को धन्यवाद दूँ या कोसूँ?

धीरे-धीरे तड़-तड़, भड़-भड़, सुर्र-फुस्स की आवाजे उठने लगी। घरों के सामने बच्चे और बड़े सभी फटाकेबाजी करने लगे थे। मेरे घर से बाईं ओर दो घर बाद एक तिराहा और तिराहे के उस पार तीसरा घर गफ्फार चाचा का है, उनके बेटे के बेटे ‘जब्बार’ का चार साल का बेटा “अशफाक़” फटाकों की जिद कर रहा था....उसे क्या मालूम कि दीवाली किसका त्योहार है? चार साल के अशफाक़ को फटाकों व फुलझड़ियों का आकर्षण दीवाली मनाने वाले घरों की और खींच रहा था...। वह घर के दरवाजे से आँगन तक आया, फिर आँगन के दहलीज़ से नीच उतर ही रहा था कि उसकी दादी उसे उसके अब्बू का खौफ दिखाकर अंदर बुलाने लगी, लेकिन फुलझड़ियों की चमक के आगे अब्बू का खौफ टिक ना सका।

यह नजारा मेरे घर के बाजू में रहने वाली राम-लक्ष्मण की माँ और हमारी मुँह बोली काकी भी देख रही थी। उन्होने अशफाक़ की और देख कर कहा - “वह तो अभी बच्चा है... बच्चे को क्या मालूम, वो ये सब देखेगा तो जिद करेगा ही।” उनका इशारा दीवाली पर जगमगाते दीपक, घरों पर लगी झालरों की झिलमिलाहट, और फुलझड़ियों की आकर्षक रोशनी और फटाकों की गूंज से था या जाति और धर्म की विभाजन रेखा से मैं नहीं जान सका। 

अशफाक़ अपने घर से निकल कर सामने रहने वाले मंगेश भाऊ के घर के पास आकर खड़ा हुआ, फिर धीरे-धीरे वह चार घर की दूरी तय कर रवि के घर के पास आकर खड़ा हो गया था और दीवाली के इस माहौल में पड़ोसी बच्चों की गतिविधियों को वह भी निहारने लगा था। कुछ देर में अशफाक़ को दो मजबूत बाजूओं ने पीछे खीच लिया… उसे एक चपत पड़ी... अशफाक़ के ज़ोर से रोने की आवाज आई...कुछ देर बाद जब मैंने अपने घर से पुनः  अशफाक़ को देखने का प्रयास किया तो वहाँ कोई दिखाई नहीं दिया। जिस तरह मैं उस तरफ उसे नहीं देख पा रहा था, शायद वह भी इधर मुझे नहीं देख पा रहा होगा। 

        दीवाली पर रात के आठ-नौ बजे के वक़्त लगभग आठ से बारह वर्ष के 5-6 अजनबी बच्चे मुझे दाईं तरफ से आते हुये दिखाई दिये। वे चलते-चलते किसी के घर के पास कभी चकरी को घूमते हुए निहारते, कभी अनार के फूटने पर फैलने वाली रोशनी को देखने लगते हैं, कभी आसमान में जाकर फूटकर रंगीन रोशनी करने वाले फटाकों को निहारते हुए मुस्कुराने लगते, तो कभी चलते-चलते सड़क पर पड़े किसी फटाके की सुर्र... की आवाज सुनकर रुक जाते और उसके फूटने के बाद आगे वाले घर की ओर तेजी से बढ़ते हैं। वे बच्चे घर-घर जाकर दिवाली की मिठाई मांग रहें हैं “देदे ए माई, देदे ए भैया।” वे बच्चे अब मेरे पड़ोस के घर के सामने आकार खड़े ही हुए थे कि उनको पड़ोसी के बच्चे राम और लक्ष्मण समझाने लगे कि “ओय दूर हट जा, यो बम बहोत ज़ोर से फूटेगो।” राम-लक्ष्मण, मैं और वह बच्चे नजर जमाएँ उस फटाके को ध्यान पूर्वक देख रहें थे लेकिन फटाका फूटा नहीं। फटाके ने  सुर्र...फुस्स... की आवाज की, अपनी जगह बदली और शांत हो गया। यह नजारा देख कर हम सब हंसने लगे। हमारी हंसी में एक जैसी खनक थी, हम सब अब एक साथ एक कोने पर खड़े थे। उन अजनबी बच्चों से बात करने पर पता चला कि उनके पास भी कुछ फटाके हैं, उन्होने धड़ाम से लक्ष्मी बम फोड़ा। राम ने उन अजनबी बच्चों से कहा कि “अबकी बार देखना, मेरे पास यो सुतली बम है, लक्ष्मी बम भी इका सामने कंही नि लगेगो”। अबकी बार सचमुच एक जोरदार विस्फोट हुआ और फिर कुछ देर के लिए शांति छा गई।  

मैंने उन बच्चों से उनका नाम पूछा तो वे कुछ नहीं बोले, फिर पूछा कि तुम स्कूल जाते हो?  तो उन्होने गर्दन हिलाकर जवाब दिया कि वे स्कूल नहीं जाते हैं। मैंने निवेदन किया कि अपना नाम तो बता दो यार तो वे पहले तो एक-दूसरे को देख कर मुस्कुराने लगे, फिर नाम बताया और मिठाई लेकर आगे की और चल दिये। वे आगे पनु काका और मंगेश भाऊ के घर तक गए…गफ्फार चाचा के घर और आगे  मोहल्ले के और घर वे नहीं गए...वहाँ से  वापस लौटने लगे। दीपों का तेल खत्म हो चुका था, दीप बुझ चुके थे, शायद इन बुझे हुये दीयों ने इन अजनबी बच्चों को लोगों की जाति और मजहब के बारे में बताया होगा। नहीं तो भला स्कूल ना जाने वाले इन बच्चों को यह कैसे पता चलता कि दिवाली कौन मनाता है और कौन नहीं? कुछ तो इन बच्चों में भी खास था, तभी तो वे लोगों को पहचान लेते हैं और जानते हैं कि दिवाली मना रहे परिवारों के साथ किस तरह शामिल होना है, मिलजुल कर दीवाली मनाने का इनका अपना ही अंदाज था। उनके जाते-जाते जब पूछा कि आगे क्यों नहीं गए? एक बच्चे ने चहकते हुये जवाब दिया कि ईद पर तुम्हारे घर नहीं आएंगे। यह सुनकर मैं शर्म से धस गया, मेरे दिमाग ने काम करना बंद कर दिया। अब दीवाली की रात मुझे कचोटने लगी, बिस्तर पर गया, कई ख्याल आते-जाते रहे, कब नींद लग गई पता नहीं चला। 

सुबह हुई, मेरे दोस्त इमरान ने बताया कि कल शाम को उसका तीन साल का भतीजा “अदनाम” फुलझड़ी और तिकड़ी वाली बंदूक की जिद कर रहा था। जिद भी ऐसी की किसी कीमत पर समझौते के लिए तैयार नहीं था। घर के सब लोग उसे पहले तो कुछ ना कुछ प्रलोभन देने लगे। लेकिन जब तीन साल के “अदनाम” की मजबूत जिद के आगे कोई और प्रलोभन काम ना आया तो इमरान उसे तुरंत बाजार लेकर गया और वह सब खरीदकर दिया जो ‘अदनान’ चाहता था, तब जाकर वह अपने दादा “इब्राहिम खाँ बनारसी” के साथ शांति से खेलने लगा। जब अदनान अपने बाजुओं से ज़ोर लगाकर तिकड़ी वाली बंदूक के खटके को दबाने में कामयाब होता तो ज़ोर से फटाक की आवाज होती। यह आवाज सुनकर दादा-पोते दोनों मुस्कुरा उठते थे। 

      इमरान कि यह बातें सुनकर मैं सोचने लगा कि क्या जब्बार भाई के बेटे अशफाक़ और इमरान के भतीजे अदनाम के द्वारा की गई जिद की तीव्रताएं एक जैसी ही हैं? यदि दोनों की एक ही तीव्रता की जिद है तो फिर उनकी जिद का परिणाम अलग-अलग क्यों? और यदि दोनों की जिद की तीव्रता ही अलग-अलग हों, तो उनकी जिद की तीव्रता में यह अंतर क्यों है?

     तीन-चार साल के अशफाक़ के लिए फुलझड़ी की चमक सिर्फ चमक है, आसमान में जाकर फूटने वाले फटाकों की गूंज और रंगीन रोशनी उसको भी उतना ही आनंदित करती है जितना अजय, कविता, सविता, राम, लक्ष्मण, बुलबुल को आनंदित करती है। अशफाक़ को उसकी इच्छा के विपरीत घर में ले जाने पर उसका दहाड़ मारकर रोना इस और संकेत करता है कि उसे त्योहारों का किसी भी आधार पर बंटवारा मंजूर नहीं है।      अदनाम की फुलझड़ी और टिकड़ी वाली बंदूक के लिए मजबूत जिद सिर्फ इसलिए ही तो है क्योकि शायद वह किसी भी प्रकार के सांस्कृतिक विभाजन के खिलाफ है। अदनाम सांस्कृतिक विभाजन की खिलाफत में सफल इसलिए हो सका, क्योंकि वह अपनी इस खिलाफत में अपने चाचा-दादा की स्वीकृति प्राप्त कर सका था। जिसके कारण अदनाम को फुलझड़ियों के साथ खेलने में दो मजबूत हाथ उसका साथ दे रहे थे। 

     दीवाली मनाने वाले परिवारों में अपने-अपने घरों के रंग रोगन की गुणवत्ता, फटाकों के प्रकार और मात्रा, घरों को सजाने में प्रयोग की गई झालर और रोशनी आदि के माध्यम से रोब झाड़ने की होड़ देखी जा सकती है। इस होड़ की विडम्बना देखिये कि रात आठ-नौ बजे घूमते-फिरते हुए “बिंदास” दीवाली मना रहे अजनबी बच्चों को अपने घर की दहलीज ना लांघ पाने वाले बच्चे “राम व लक्ष्मण” बता रहे हैं कि उन्हें पीछे हट जाना चाहिए क्योकि कोई फटाका बहुत ज़ोर से फूटने वाला है। यह इसलिए क्योकि राम-लक्ष्मण के पास फटाके हैं, उनके पीछे भी दो मजबूत हाथ हैं जो घर की दहलीज से उन्हें बाहर जाने नहीं देते हैं, “घर की यह दहलीज” एक ऐसी परिधि है जिसकी वजह से एक जाति व धर्मगत पहचान को मजबूती मिलती है, दीवाली को प्रचलित ढंग से मनाने के लिए आवश्यक संसाधनों तक पहुँच है और यह सब उन्हें अपने घर के आँगन में किसी फटाके की बत्ती में आग लगाकर विस्फोट करने वाले एक नियंत्रक का अहसास भी देता है। ये सब अहसास उन्हें यह अहसास कराता है कि वे दीवाली के दिन घर-घर जाकर मांगने और टकटकी लगाकर दूसरे के द्वारा फटाकों की बत्ती में लगाई गई आग के बाद फटने वाले फटाकों को देखकर आनंदित होने वाले बच्चों से ज्यादा रुतबेदार इंसान हैं। 

        इसके बावजूद राम-लक्ष्मण चाहते हैं कि किसी को भी इन फटाकों से किसी प्रकार की कोई क्षति ना हो? उनका घर के सामने खड़े अजनबी बच्चों को सीख देते हुये कहना कि “ओय दूर हट जा, यो बम बहोत ज़ोर से फूटेगो” यह बात उस रुतबे को दर्शाना है या सचमुच की परवाह? लेकिन “ओय दूर हट जा, यो बम बहोत ज़ोर से फूटेगो” उनका यह कहना ही जैसे उन अजनबी बच्चों को दीवाली के त्योहार में शामिल कर लेता है और सहज ही लगने लगता है कि बच्चे साथ मिलकर ही इस त्यौहार को मनाना चाहते हैं। दूसरी ओर यह समाज है कि छोटे-छोटे बच्चों के ऊपर बड़े-बड़े त्योहारों के अवसर पर भी अजीब बंधनों को लाद देता है। बच्चों की छोटी-सी आयु से ही उनकी जिज्ञासाओं, अभिलाषाओं को कुचल कर हम वयस्कों का समाज उन्हें एक खास ढांचे में ढालना चाहता है। इस प्रकार से यदि हमारे समाज में बहुत ही पवित्र माने जाने वाले उत्सवों, तीज-त्यौहारों को मनाने के प्रचलित तौर-तरीके भी यदि जाति, संप्रदाय और धर्मगत दीवारों को मजबूत करते हैं, उन्हे बनाए रखते हैं। ऐसे में यह सोचा जाना चाहिए कि समाज में और-और वैकल्पिक प्रक्रियाओं के माध्यम से इन बने-बनाए बंधनों को थोपने वाले संस्कृतिकरण के बजाए मिलजुल कर रहने, आपसी सहयोग, समूह भावना जैसे लोकतान्त्रिक मूल्यों के विकास में सहायक सामाजिक प्रक्रियाओं को बढ़ावा किस प्रकार दिया जाए? इस दिशा में आजाद भारत देश के संविधान के लागू होने के बाद औपचारिक शिक्षा के केंद्र कहे जाने वाले विद्यालयों से यही अपेक्षा भी की जाती रही है। लेकिन अब तक के लंबे इंतजार के बाद प्राप्त परिणाम यह दर्शाते हैं कि इसके लिए कुछ और रचनात्मक विकल्पों की आवश्यकता है, हमें कुछ और भी रचनात्मक विकल्प खोजकर बच्चों को उपलब्ध कराये जाने चाहिए जो बच्चों के स्वतंत्र मानवीय चिंतन और गरिमा के हिमायती हों। 

     मैं छत्तीसगढ़ से मध्यप्रदेश अपने घर पर अपने कार्यालय द्वारा घोषित “दीवाली की छुट्टी” पर गया था… वहाँ दीवाली मनाने वाले रवि, कविता, सविता, भावना, अजय, मोना, बुलबुल आदि सभी के स्कूलों ने भी दीवाली का अवकाश घोषित किया था... पड़ोस में रहने वाले नरेंद्र, सोनू, भारत, राहुल, शुभम भी अपने कॉलेज में लगने वाली दीवाली की छुट्टियों में ही आए थे... लेकिन स्कूल, कालेज, कार्यालय, बैंक आदि संस्थानों की सरकार के द्वारा दीवाली का अवकाश घोषित कर देने से भला सब लोग दिवाली नहीं मना पाते हैं, यह बात सरकार को कौन बताए?

हमारे धर्म निरपेक्ष देश की सरकारें ईद, दीवाली, क्रिसमस और तमाम धार्मिक त्योहारों पर अवकाश रखकर अपनी धर्म निरपेक्ष राष्ट्र निर्माण की संवैधानिक ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेती हैं। एक अनुभव में पाया था कि ईद और रथ यात्रा एक ही दिन आ जाने से स्कूलों का अवकाश रखा गया था। अवकाश के बाद जब कक्षा तीन के बच्चे वापस स्कूल आए तो सोहन, राजू और गंगा ने शिक्षिका को बताया कि उन्होने अवकाश पर क्या-क्या किया। उनकी इन सब बातों में सभी बातें रथ यात्रा से ही जुड़ी थी। उसी कक्षा की एक अन्य छात्रा ‘आरजू’ ने जब उनसे पूछा कि ईद पर क्या किया? तो वे एक स्वर में बोल उठे थे कि ईद तो मुसलमानों का त्यौहार है। आरजू ने जब बताया कि उसके घर भी ईद मनाई गयी, उसके पापा ने सिवई बनाई, उसकी माँ शांति, भाई आर्यन और पापा मुंशीलाल ने एक दूसरे को ईद की बधाई दी, वे एक दूसरे से गले मिले....। यह सुन कर शिक्षिका और कक्षा में बैठे बच्चे अचरज भरी नजरों से उसे देख रहें थे। क्योकि वे जानते थे कि आरजू जो कह रही है वह संभव लेकिन असामान्य व असाधारण बात है। ऐसे में यह सोचा जाना चाहिए कि बच्चों को इन त्योहारों पर मिले यह अवकाश उनकी धर्म निरपेक्ष समझ के विकास में कितने सहायक हैं और यह अवकाश उनकी त्यौहारों की समझ को किस प्रकार से प्रभावित करते हैं?

सुनील बागवान
संदर्भ व्यक्ति हिंदी अजीम प्रेमजी फाउंडेशन धमतरी छत्तीसगढ़,संपर्क-8305439019, sunil.edn@gmail.com9407763564

3 टिप्‍पणियां:

  1. Bhai aapne bhut hi achi bat likhi he mene ise pura pada he ye bat kash apki tarha smaj ka har wayqti samjh jaye to pure bharat desh se ye aangrejo wali niti chali jaye

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  2. Bhai aapne bhut hi achi bat likhi he mene ise pura pada he ye bat kash apki tarha smaj ka har wayqti samjh jaye to pure bharat desh se ye aangrejo wali niti chali jaye

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