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आलोचकीय:कविता का डिजिटल युग – राकेश बाजिया

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, मार्च 26, 2017 | रविवार, मार्च 26, 2017

त्रैमासिक ई-पत्रिका
वर्ष-3,अंक-24,मार्च,2017
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आलोचकीय:कविता का डिजिटल युग – राकेश बाजिया

         
चित्रांकन:पूनम राणा,पुणे 
हाल ही में एक वरिष्ठ हिंदी कवि ने नामचीन अंग्रेजी अखबार को दिए इंटरव्यू के दौरान भूमण्डलीकरण से उपजी स्थितियों के बरक्स 'स्मृतियों के ह्वास से बने कल्पना संकट' की और संकेत किया, जिससे हिंदी समाज को पुनः 'स्मृति' और 'कल्पना' के परस्पर सम्बन्धों पर संवाद के अवसर मिले। आज ज्ञान-विज्ञान की हर शाखा में भूमंडलीकरण की प्रक्रिया का अध्य्यन किया जा रहा है। वर्तमान में शायद ही कोई क्षेत्र हो, जो इससे प्रभावित न हुआ हो, अतएव इस प्रक्रिया को समझना भी अत्यंत आवश्यक है। दरअसल भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया ने 'ट्रिकल डाउन थ्योरी’ की तर्ज़ पर अंतिम व्यक्ति तक को प्रभावित किया है, जिसके अच्छे और बुरे दोनों पक्ष हैं। भारत के सन्दर्भ में १९९१ से उदारीकरण के जरिये इस प्रक्रिया के लक्षण देखे और अनुभव किये जाने लगें। लिहाज़ा पिछले पच्चीस वर्षों में आम जन-जीवन कई अर्थों में बदल चुका है। जबकि किसी भी साहित्य की रचना प्रक्रिया में उसके वर्तमान समाज और परिस्तिथियों की विशेष भूमिका होती है ; ऐसे में यदि उसी समाज में भूमंडलीकरण की पड़ताल के अंतर्गत चालीस से पचास आयु-वर्ग की ग्रामीण स्त्री से इस प्रक्रिया और उससे आये बदलाव पर साधारण भाषा में बात करें - जिसने कभी नयी वधु के रूप में रोज सवेरे चक्की पीसी हो - तो हम जान पाएंगे कि पहले जीवन कहीं अधिक कठिन था। उसके पीछे की पीढ़ी में तो बच्चों के जन्म के साथ ही उन पर मृत्यु का संकट तैरने लगता था, और तकनीक के अभाव में झाड़फूंक ही परंपरा से चली आ रही एकमात्र चिकित्सा पद्धति थी। ऐसे में भूमंडलीकरण के दूसरे पक्ष को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन भूमंडलीकरण की प्रक्रिया का संचालन पूंजीवादी ताकतों के हाथों में होने से अंततः इसके मनुष्यता विरोधी होने की पूरी सम्भावनाएं हैं, जबकि साहित्य मनुष्यता का प्रबल पक्षधर रहा है तभी पिछले पच्चीस वर्षों के साहित्य में हम पाएंगे की समूचा साहित्य भूमंडलीकरण की प्रक्रिया के समक्ष डटकर खड़ा रहा है। फिर भी भूमंडलीकरण की प्रक्रिया ने साहित्य को कई स्तरों तक प्रभावित किया है। यहाँ तक की इस प्रक्रिया से उपजे नए माध्यमों ने भाषाई संक्रमण कुछ इस कदर ईजाद किया कि हिंदी कविता भी उससे अछूती नहीं रही। ऐसे में कविता से यह अपेक्षा की जाए की वह ‘भूमंडलीकरण’ को बाहर खदेड़ आये यह कहाँ तक सम्भव है? एक सीमा तक तकनीकी ने प्रगति के नए आयाम गढ़े हैं। यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है। अतएव भूमंडलीकरण के औज़ारों का उपयोग कर कविता कहीं अधिक समृद्ध हो सकती है, क्योंकि नए माध्यमों ने साहित्य में संवाद की परंपरा फिर से पनपने के ढेरों अवसर उपलब्ध कराये हैं। ये माध्यम किसी चौराहे की भांति हैं, जहाँ कवि, लेखक, आलोचक, संपादक के साथ पाठक भी उपस्थित हैं। 'कविता के संकट' को समझने के प्रयास में यह जानना आवश्यक है कि आखिर शिष्ट कहे जाने वाले साहित्य ने कविता को कितना समृद्ध किया है? जबकि वर्तमान सन्दर्भों में साधारण पाठक की कविता से दूरी चिंता का विषय है। कड़वी सच्चाई तो यह है की मात्र साहित्यिक समुदाय के भीतर ही कविता का आत्मसंघर्ष चल रहा है। आज के हिंदी विभाग और अन्य साहित्यिक केंद्रों ने रीतिकाल के दरबारों का स्वरूप अख्तियार कर लिया है, जिनका साहित्यिक अवदान शोध आदि के क्षेत्र में वैसे ही है जैसे रीतिकालीन कविता का इतिहास ! जाहिर है अस्थाई नियुक्ति वालों को रीतिमुक्त धारा में गिना जाए मगर प्रश्न है की कविता जो कि मनुष्यता की आवाज़ कहलाती है व्यापक समाज से क्यों कट गयी? जबकि हर साल कविता की किताबों की पूरी जमात छपकर आती है, फिर क्या आज साधारण पाठक का मनुष्य और उसकी संस्कृति में रुचि घट गयी? जबकि छोटे से छोटे विरोध प्रदर्शन से लेकर बड़े से बड़े ख़ुशी के आयोजन में कविता की आवश्यकता पड़ती है।

       बिना तथ्यों की पड़ताल किये वस्तु स्थितियों से अनभिज्ञ 'कविता की नई चुनोतियाँ' (‘जनसत्ता’ रविवारी, विमर्श, ११ दिसम्बर, २०१६) ढूंढते लेखक साहित्य से ग्रामीण परिवेश के हाशिये पर गया तो बता देते हैं पर इसके वास्तविक कारणों को समझने के किताबी प्रयास में यह पता नहीं लगा पाते की 'वास्तविक साहित्य समाज के बीच से होकर आता है' ऐसे में आज कितने कवि गांवों में रहकर कविता लिख रहे हैं? क्या 'ग्रामीण जीवन के यथार्थ' की खोज में केवल गांव की यात्राएँ वास्तविक ग्रामीण परिवेश से परिचय करा सकती हैं?

      साहित्य ने गाँव को सदैव एक खूबसूरत कल्पना के तौर पर उकेरा है और गाँव का एक ऐसा मिथक गढ़ा है जहाँ सब बेहतर है। पर सवाल यह है की आज हमारे गाँवों की वास्तविक स्थिति क्या है? जाहिर है तकनीकी से गाँव भी अछूते नहीं हैं वहां भी शहरों की तर्ज़ पर इंटरनेट का आगमन हो चुका है। फर्क सिर्फ इतना है कि शहरों में तकनीक पिछली पीढ़ी की नज़रों से छनकर अगली पीढ़ी के हाथों में पहुंची है वहीं गाँवों में अगली पीढ़ी सीधे इसका लक्ष्य बनी है। 

        दरअसल साहित्य ने गाँव का जो मिथक रचा है आज के गाँव उससे हर दृष्टि में भिन्न हैं। अब गाँवों में परंपरा का सुदृढ़ पक्ष धुंधला हो चला है, जिससे रिश्ते तक प्रदूषित होने की कगार पर हैं। भूमंडलीकरण के परिणामस्वरूप संयुक्त परिवारों के विघटन से उपजी इन स्थितियों को पिछली पीढ़ी के हिंदी कवि अरसे पहले प्रमुखता से उठा चुके हैं। यह महज संयोग ही है की हिंदी कविता इन सब स्थितियों को गाँवों में ही छोड़कर शहरों का रुख कर चुकी है।  

       लेकिन हाल के वर्षों में हिंदी कविता अपने सिमटे हुए दायरों से बाहर निकलती हुई प्रतीत होती है। और हर बार खाद-पानी जुटाने अपनी परंपरा में लौटती है। हाल ही की, राष्ट्रवाद की बहसों में 'रहना नहीं देश बिराना है' कहने वाले कबीर डिजिटल माध्यमों में अंधराष्ट्रवाद का प्रतिरोध करते हुए खूब याद किये गए। इन माध्यमों के जरिये आज कविता अपने पाठक खुद ढूंढ रही है। हिंदी कविता डिजिटल माध्यमों (ई-पत्रिकाएं, ब्लॉग) के जरिये प्रकाशित हो रही है। ऐसे अनेक उदहारण हैं जहाँ कविता पाठकों के बीच से जाँच होकर आती है, तत्पश्चात किसी संग्रह की शक्ल लेती दिखाई पड़ती है। कविता के 'डिजिटल युग' में उसका स्वरूप भले ही बदला हो पर परम्परा का बोध लिए कविता आज भी मनुष्यता की आवाज़ बनी हुई है, तभी साधारण पाठक उससे जुड़ रहे हैं। हमारे यहाँ भक्त कवियों के बाद किस युग की कविता ने 'लोक' में अपना व्यापक फलक ढूँढा है?  
       भोजन में दाल की महत्ता है, जीवन में कविता की, जिस तरह कुछ लोग उसी दाल को अपने तड़के की प्रतिभा से बेहद स्वादिष्ट बना देते हैं, कि खाने वाला उंगलियाँ चाटता रह जाए ; ठीक वैसे ही आज डिजिटल माध्यमों (सोशल मीडिया) के जरिये 'हर कोई' कविता लिखने का प्रयास भले ही कर रहा है, पर जिनके यहाँ कविता में परंपरा का उत्तम तड़का है, वही पाठक को सुधि पाठक बनने की दिशा में अग्रसर कर पाते हैं। 
        साहित्य में प्रतिरोध के अपने पैमाने होते हैं। कविता युग सापेक्ष अपने परिवेश से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकती। फिर भी यथास्थितिवाद के पोषक कविता का दामन छोड़ना नहीं चाहते और सिद्धान्त पर कसकर कविता करते या पढ़ते हुए यह भूल जाते हैं कि सिद्धान्त कविता के भीतर से निकलेगा, ऐसे में इनसे पूछना चाहिए कि जब भूमंडलीकरण की प्रक्रिया ने कविता को प्रतिरोध की व्यापक जमीन उपलब्ध करवाई है ; लिहाज़ा कविता में प्रतिरोध के स्वर उपजने की सम्भावना तो है, लेकिन हिंदी कविता को छायावादी युग में जिस 'छंद के बन्ध' से मुक्ति मिल चुकी थी उसकी आज पुनः आवश्यकता कैसे आन पड़ी?  

        शुक्ल जी ने कहा है ''कविता सबसे पहले आकर्षित करती है तत्पश्चात ही वह अपना प्रभाव छोड़ पाती है।''1 आज डिजिटल माध्यमों के जरिये कविता को अपने पाठकों तक पहुँचने के तमाम अवसर उपलब्ध हैं। कहीं इन माध्यमों के जरिये कविता पोस्टर की शक्ल में तो कहीं 'शमशेर' की पेंटिंग ब्रश और 'अज्ञेय' का कैमरा लेकर अपने अनूठे अंदाज़ में पाठकों से रूबरू हो रही है। साथ ही इन माध्यमों में वरिष्ठ कवि, लेखकों की मौजूदगी डिजिटल माध्यमों की साहित्यिक सार्थकता के प्रमाण हैं। आखिर साहित्य पाठकों के बीच पहुंचे बिना समाज की दिशा कैसे तय कर पायेगा? 

       जिस तरह 'साहित्य' से 'गंभीर साहित्य' के बनने की एक मुकम्मल प्रक्रिया है, ठीक उसी तरह 'पाठक' से 'सुधि पाठक' के तैयार होने की भी। ऐसे में बिना पाठक के पास पहुंचे नए युग में अनेकों माध्यमों के चलते गंभीर कविता केवल अकादमिक वाचन और संग्रहों में बंद पड़े शब्दों का ढेर मात्र नहीं रह जायेगी? अतएव कविता को अपना व्यापक फलक ढूंढने की छूट मिलनी चाहिए भले ही उसका मूल्यांकन परंपरागत साहित्यिक पाने-पेचकसों से होता रहे। 

       बिना किसी कविता संग्रह के आज 'अम्बर' और 'शायक' सरीखे डिजिटल कवियों की कविता साहित्य के पाठकों से इतर युवाओं की खासी पसंद हैं। 'अम्बर' जहाँ लोक के शब्दों को भाषा के साथ कुछ यूँ घोटता है, की परंपरा की राग लिए कविता पाठक के समक्ष सजीव रूप में घटने लगती है। 'शमाक़ज़लबाश का निज़ामुद्दीन औलिया को ख़त’ के मार्फ़त अम्बर रंजना पांडेय की कविता का एक नमूना देखिए :

“मेरे हाथों में मिसरी की डलियाँ
छोटी तेरे लिए बड़ी अमीर खुसरो के लिए
खिड़कियाँ थी दोतरफ़- किवाड़ मेरे लिए एक न था
काले बुर्क़े में मेरे बस नयन दिखते होंगे, काले बुर्क़े में
तुझे बस दिखती होंगी मेरी उँगलियाँ, काले बुर्क़े में
खुदा न करे, तुझे कभी मेरे पाँव दिखे हो- धूलभरे,
नाख़ून हिना से गाढ़े लाल
थोड़ी दूर जो अमीर मीनाई की ग़ज़ल गाता था,
बीच बीच कमबख़्त ग़ालिब के शेर पढ़ता जाता था”2

     वहीँ शायक आलोक अपनी शैली से चमत्कृत कर पाठक को कविता के भीतर ले जाकर छोड़ देता है :
“प्रेम चिड़िया के पैर में लगा कंकड़ था
पीड़ा बची रही तब तक बचा रहा प्रेम”

“लड़की 
कपड़ों की बनी गुड़िया थी 
प्रेम था कागज़ की बनी नाव
लड़का पानी था.”3
     निर्जीव ‘पगडण्डी' में भी जान डाल कर न सिर्फ चलाने बल्कि दौड़ाने की कलात्मक अभिव्यक्ति के जरिये शायक आलोक की कविता 'सिद्धान्त पर कस कर की गयी रचना' की सार्थकता का पक्ष लिए मजबूती से खड़ी रहती है :
        “इन दिनों
         पिता झांकते हैं
         मेरी कविताओं के बंद कपाट के भीतर
         सकपकाए बिना किसी आहट
         अन्दर चले आते हैं
         खूंटी की तरह टंगे किसी अ अक्षरी शब्द पर
         टांग देते हैं अपना पसीना सना कुरता
         और मेरी गोरथारी में सर रख सो जाते हैं
         इन दिनों
         मैं चौंक कर उठता हूँ
        चुपचाप पिता के जूते अपने पैरों में डाल
        कविता से बाहर निकल जाता हूँ.”4

      जाहिर है अपनी गज़ब की 'सम्प्रेषणीयता' के चलते ही दौड़-भाग के युग में कविता युवा पाठकों को ठहरकर सोचने का अवसर देती है।

       हमारे यहाँ साहित्य का अपार हिस्सा मौखिक और श्रुति परंपरा के रूप में मौजूद है आधुनिक डिजिटल माध्यम उसी परंपरा को सहेजने और विकसित करने की अगली कड़ी साबित हो सकते हैं, क्योंकि किताबों से इतर डिजिटल माध्यमों (सोशल मीडिया) में एक बहुत बड़ा पाठक वर्ग मौजूद है, जिसके साथ संवाद की अपेक्षा भले ही कम हो किन्तु पुराने हिंदी पत्र-पत्रिकाओं की तर्ज़ पर इस वर्ग को साहित्य संस्कारों की और ले जाने की आशा जरूर की जा सकती है। साथ ही इन माध्यमों के जरिये साहित्य के प्रायोजित होने का खतरा भी बराबर बना रहता है। किसी समय बाज़ार ने साहित्य के पाठकों का उसके लेखकों से संवाद छीन लिया था मगर उसी बाज़ार के माध्यम से आज कई रास्ते खुले हैं जो लेखक और पाठकों के मध्य खोये हुए संवाद की पुनर्स्थापना के लिए बेहतर विकल्प हो सकते हैं। अंततः भूमंडलीकरण से उपजी विभिन्न स्थितियों को बदला नहीं जा सकता, लेकिन इसी तकनीक के प्रयोग की दिशा तो बदली जा सकती है।


संदर्भ :-
  1. बालकृष्ण भट्ट, सच्ची कविता  
  2. रामचन्द्र शुक्ल, कविता क्या है 
  3. नामवर सिंह, कविता के नए प्रतिमान,  राजकमल प्रकाशन, चौथा संस्करण : १९९०        
  4. नामवर सिंह, छायावाद, राजकमल प्रकाशन, पांचवा संस्करण : १९९०
  5. मंगलेश डबराल, इंटरव्यू, 'इंडियन एक्सप्रेस', ४ दिसंबर, २०१६ 
  6. ‘जनसत्ता’ रविवारी, ११ दिसम्बर, २०१६, विमर्श - कविता की नयी चुनोतियाँ 
  7. मैनेजरपांडेय, हिंदी कविता का अतीत और वर्तमान, वाणी प्रकाशन, पहला संस्करण 
  8. शायक आलोक की कवितायें 
  9. अम्बर रंजना पांडेय की कवितायें

राकेश बाजिया
शोधार्थी (हिंदी विभाग)
  अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद 
संपर्क सं. – 09462737693,rbjack6@gmail.com
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