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सिने-दुनिया:हिंदी सिनेमा में लिंग भेद – डॉ. पुष्पा सिंह

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, मार्च 26, 2017 | रविवार, मार्च 26, 2017

त्रैमासिक ई-पत्रिका
वर्ष-3,अंक-24,मार्च,2017
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सिने-दुनिया:हिंदी सिनेमा में लिंग भेद – डॉ. पुष्पा सिंह


चित्रांकन:पूनम राणा,पुणे 
सिनेमा की पहुँच समाज के बहुत बड़े वर्ग तक है। इसकी गुंज गाँव की पगडंडी से होती हुई गली-कुँचों, से लेकर खेत खलिहानों तक सुनाई पड़ती है। समाचार के रूप में रोजमर्रा की खबर देश के कोने-कोने में जनता तक पहुँचती है या नहीं, जनता इसे सुनती है या नहीं यह तो कहना सम्भव नहीं है लेकिन हाँ सिनेमा की खबर गली-कुँचों को भी बखुबी मालुम हो ही जाती है। इसलिए कह सकते हैं कि सिनेमा सामाजिक सुधार का एक सशक्त माध्यम है। क्योंकि मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक दायित्व निभाने का सवाल भी इसके साथ जुड़ जाता है। 

यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि सदियों से हमारा समाज पुरुषसत्तात्मक समाज रहा है तो  सिनेमा जगत इससे अछूता कैसे रह सकता है। हिन्दी सिनेमा या यूँ कहे पूरा भारतीय सिनेमा नायक प्रधान रहा है। वह हमेशा ऐसे नायक की तालाश में रहा है जो परिवार व नायिका की रक्षा करे। परन्तु समय के साथ ही सिनेमा के प्रतिमान बदले अवश्य हैं। लेकिन? ‘लेकिन’ जो कि अपने आप में एक प्रश्न है। ‘लेकिन’ इसलिए कि आज इस वैश्विक युग में‘लाईफ इन अ मेट्रो, ‘क्वीन’, ‘पार्च्ड’, ‘हमारी अधुरी कहानी’ और हाल ही में रिलिज्ड हुई ‘पिंक’जैसे कुछ सिनेमा नारी प्रधान होते हुए भी पुरूष प्रश्नों से भेदित है। इन फिल्मों में स्त्रियां उन्मुक्त नदी की तरह बहना तो चाहती हैं लेकिन बड़ी-बड़ी चट्टाने उनके बहाव को रोकने में अडिग खड़ी है। 

हाल ही में (२०१६) में रिलिज्ड हुई ‘पिंक’ फिल्म उन्मुक्त बहने वाली तीन लड़कियों की कहानी। उन्मुक्त बहना, जीवन को मस्ती से जीना ही इनके जीवन को कटघरे में खड़ा कर देता है। क्योंकि हमारे यहां तो लड़कियों को किसी लड़के के साथ जोर से हंसने या उसे स्पर्श करके बात करने तक की इजाजत नहीं है। ‘किसी भी लड़के के साथ बैठकर शराब नहीं पिनी चाहिए क्योंकि अगर वो ऐसा करती है लड़के को इंडिकेट है कि लड़की मेरे साथ बैठ कर शराब पी सकती तो वो उसके साथ सोने के लिए भी कतराएगी नहीं। शराब यहाँ पर एक खराब character  की निशानी माना जाता है, लड़कियों के लिए लड़कों के लिए नहीं। लड़कों के लिए ये सिर्फ एक health asset है।’ आज इस बदलते दौड़ में भी लड़कों की सोच में लड़कियों को लेकर वही पुरानी परिपाटी है। हम अपने आप को आधुनिक होने का कितना भी दावा कर ले, लेकिन मानसिकता वही घिसी-पिटी।

इस सिनेमा में अमिताभ बच्चन द्वारा कहे गए संवाद ‘the women of questionable character’ में रामायण के धोबी की याद आती है जिसने सीता को प्रश्न के कटघरे में खड़ा किया था। लेकिन राम प्रश्न के बौछार से बच गए थे क्योंकि राम(पुरुष) पर ये एप्पलाई (लागु) नहीं होता। जब दीपक सहगल (अमिताभ बच्चन) मिनल से यह प्रश्न करते हैं ‘are you virgin’ उस वक्त अजीब सी झनझनाहट होती है। कैसा बेतुका प्रश्न है? यह प्रश्न राजवीर सेक्यों नहीं पुछी जाती है। फिर त्रैतायुग में दिमाग भटकता है। चौदह वर्ष के वनवास के बाद सीता की अग्नि परीक्षा की जाती क्योंकि वे अपने पति राम से एकवर्ष दूर लंकामे हैं। एकवर्ष के उपरान्त जब वे राम को मिलती हैं तो उनकी पवित्रता की परख की जाती है। लेकिन ऐसा कुछ राम के साथ नहीं होता जबकि वे भी दूर थे।

दूसरी बात जब वकील दीपक सहगल (अमिताभ बच्चन) राजवीर से यह पुछते हैं कि आपकी बहन पार्टी में जाती है, तब राजवीर कहता है- जाती हैं लेकिन family के साथ अकेले नहीं। दीपक सहगल- ‘शराब पीती हैं।‘ इसप्रश्न  को सुनते ही वहबौखला जाता है और कहता है हमारे जैसे रईश घरों की लड़कियां शराब नहीं पीती। उसके तुरत बाद अमिताभ बच्चन  आदालत में एक फोटो पेश करते हैं जिसमें उसकी बहन एक पार्टी में शराब पीती हुई दिखाई देती है।

रईश घरों की लड़कियां यदि शराब पीए तो वह फैशन है। रोयल क्लाश के लिए सब जायज है। लेकिन आम लड़कियों के लिए यह सब उसके बदचलन होने का प्रमाण। यह तो सिनेमा की बात है लेकिन लड़की चाहे रईश घराने की हो या आम घराने की, लड़की लड़की है। उसका character certificate उसका पोशाक, रहन-सहन, हंसने-बोलने के आधार पर समाज निर्धारित करता है। पुरुष इन सब से बरी है। मेरी बौखलाहट उस वक्त और बढ जाती है जब मिनल अपनी सफाई में no शब्द  हकलाते हुए बोलती है। जबकि गुनाहगार रनवीर उन लड़कियों को पेशेवर सिद्ध करने पर तुला हुआ है। आखिर मिनल की आवाज यहां क्यों दबा दी गई है ? जिसकी सफाई में अमिताभ बच्चन कहते हैं ‘ना केवल एक शब्द नहीं, अपने आप में एक बाक़या है, इसे किसी तर्क, स्पष्टिकरण, एक्सप्लेनेशन, व्याख्या की जरूरत नहीं है, ना का मतलब ना ही होता है।’ जहां तक मेरा विचार है यह संवाद यदि मिनल बोलती तो निश्चय ही नारी का सशक्तरूप उभर कर दर्शक के सामने आता। 

‘लाईफ इन अ मेट्रो’ में शिल्पा शेट्ठी यह जानते हुए भी कि इसके पति का दूसरी औरत के साथ संबंध है फिर भी मूक त्याग की देवी बनी रहती है। वह कहती है- ‘शादी और कुछ सिखाए न सिखाए लेकिन एक्टिंग करना सिखा देती है, हमने अपनी जिन्दगियों को एक दूसरे के बैंक लोकर में बंद करके रख दिया है और चाभियां मैरिज सर्टिफिकेट में लपेट कर भूल गए हैं।” .….‘सारे सेक्रिफाइसेज हमने ही तो किए हैं। अपनी कैरियर, अपनी जिन्दगी का, तुमने क्या किया ?’ इतना होने के बावजूद भी वह अपने प्यार तक पहुँच कर भी वापस क्यों लौट आती है ? क्या उसे अपने प्यार पर भरोसा नहीं है या अपने औरत होने की किमत चुका रही है।

फिल्म ‘हमारी अधुरी कहानी’ की नायिका विद्याबालन भी अपने पति के आतंक से आतंकित है। उसको इमरान हाशमी से प्यार हो जाता। लेकिन उस निश्चल प्यार में डूबने की हिम्मत उसमें नहीं है। डूबना चाहती है, डूबती भी है और फिर निकल भागती है। इमरान हाशमी के साथ उसके संबंध को जानने के बाद उसका नालायक, कुसंस्कारी पति उसे संस्कारों की दूहाई देता है“जिन संस्कारों को तुम्हारा बाप जिन्दगी भर सिखाता रहा। उन संस्कारों ने ऐसी औरत को कैसे जन्म दे दिया। xxxx (वसुधा के मंगलसूत्र को दिखाते हुए) ये याद है कि इसे भी पुराने खिलौने की तरह भूला दिया है।’ फिल्म का वह भाग अवश्यसुखद लगता है जब वसुधा अपने नालायक पति का त्याग कर देती है। वह कहती है ‘ हाँ भूला दिया है। क्यों लाए हो इसे अपने साथ ? मुझे बांधने ? कैसे बांधोगे ?रीति-रीवाजों से, संस्कारों से या अपने झूठे बलिदान के नाटक से ?

पार्च्ड फिल्म को देखते वक्त प्रियंवद की ये पंक्तियां याद आती हैं- ‘ पुरुष के स्पर्श सेऔरत या तो नदी होती है या पोखर……. औरत जब नदी होती है तब कोई भी पुरुष उस पर एक पाल वाली नाव की तरह तैर सकता है……..किसी भी दिशा में कितनी ही देर…….पर जब पोखर होती है तब उसके अन्दर केकरे की तरह भी नहीं उतर सकता औरत कब नदी होगी और कब पोखर यह वह स्वयं नहीं जानती……पर उसे कुछ-न-कुछ होना पड़ता है……पुरुष के स्पर्श से नदी होना औरत के लिए सुख है……पोखर होना भयानक यातना।‘इस फिल्म में तीन स्त्रियां हैं जिनकी जिन्दगी पोखर बन चुकी है पर ये नदी बनने की यात्रा साहस के साथ करती हैं। हमारे समाज में किसी औरत का बाँझ होना, गर्भ धारण ना करना, उसके लिए एक भयानक अभिशाप है। क्या यह दोष मात्र औरत का ही है ? सच्चाई जानते हुए भी क्यों पुरुष अपनी कमी को औरत के सिर मढ देता है ? इस फिल्म को देखते वक्त मेरे मुंख से चीख निकल गई, जब अपने पति से बाँझ होने का ताना सहती, मार खाती लाजो के पति को पता चलता है कि वो किसी और पुरुष के संयोग से मां बनने वाली है तो वह उसको बुरी तरह मारता है। शायद उसका पुरुष इगो खुद को अक्षम मानने से इन्कार कर रहा है। लाजो ने यह सिद्ध कर दिया कि उसकी कोख बंजर नहीं है तेरी मर्दानगी में वह ताकत नहीं है जो मुझे मां होने का सुख दे सके। यह फिल्म पितृसत्ता की मानसिकता से बनी गालियों से लेकर उनके नियमों को धाता बताकर अपने मर्जी का जीवन जीने चल पड़ती तीन नदियों की यात्रा है। जिसमें वो एक दूसरे की राह में आने वाले सारे कंकड़-पत्थर हटाकर एक दूसरे को बहने में मदद करती है और उन्मुक्त होकर खुद भी बहती है। 

२०१४ में रिलिज्ड विकास बहल के निर्देशन में बनी ‘क्वीन’ सिनेमा भारतीय वर्जनाओं को तोड़ने में अवश्य सफल हुई है। अपने मंगेतर द्वारा शादी से इन्कार किए जाने पर उसे अघात जरुर लगा है लेकिन इस अघात से वह स्वयं लड़ती है और निजात भी पाती है। अभी रिलिज्ड हुई ‘डियर जिन्दगी’ की नायिका आलिया भट्ट की तरह उसे किसी साइक्लोजिस्ट की अवश्यकती नहीं पड़ती। ‘क्वीन’ फिल्म में रानी अकेले ही अपने हनीमुन के लिए पेरिस चली जाती है। वह अपने आप को स्थापित करने के लिए संघर्ष करती है और सफल भी होती है। अंत में दिखाया गया है कि उसका मंगेतर पुनः उससे शादी की ख्वाईश लेकर आता है। वह उसे ‘थैंक्यू’ कहते हुए इंकार कर देती। ‘थैंक्यू’ कहकर उसे यह जता देती है कि  तुम्हारी ‘ना’ के बदौलत ही मैं इस मुकाम पर खड़ी हूँ यदि तुम ‘हाँ’ कहते तो आज मैं तुम्हारी पाँव की जुती से ज्यादा कुछ नहीं होती।

अंत में डियर जिन्दगी से कुछ बातें। पुरी फिल्म एक जबरदस्त काउन्सिलिंग। अपने प्रेमी से आघत खाई कायरा की काउन्सिलिंग। अब तक तो प्रायः हिन्दी सिनेमा में पुरी कायनात दो प्रेमियों को मिलाने में ही लगी रही है। लेकिन फिल्म‘क्वीन’ के बाद यह फिल्म हमें खुद से प्रेम करना सिखाता है। फिल्म के बहुतेरे संवाद मन को स्पर्श करता हुआ, जीवन की वास्तविकता से रुबरु कराते हैं। ‘अगर जिन्दगी में किसी को लव यू कहा जा सकता है तो वह सबसे पहले खुद जिन्दगी से ही कहा जाना चाहिए। क्योंकि जब हम खुद की जिन्दगी से प्यार करेंगे तब सब से प्यार करना सीख पाएंगे।’ इस कहानी में जिन्दगी की खोज है जिसे हमें खुद संवारना है। थेरेपिस्ट कायरा से कहता है “मैं तुम्हें सिर्फ देखना बता सकता हूँ, देखना तुम्हें ही होगा। xxxx जब आप कुर्सी खरीदने जाते हैं तो पहले ही कुर्सी खरीद कर नहीं लाते न……आप अपनी पसंद और कम्फर्ट की कुर्सी चुनने तक बाजार में भटकते हैं, तो प्रेम के लिए क्यों नहीं।’ 

अन्ततः यह कह सकते हैं कि ‘क्वीन’, ‘डियर जिन्दगी’ जैसी बोल्ड नारी चेतना से जुड़ी कहानी समाज में व्याप्त  लिंग भेद जैसे टकराहट को दूर करने में अवश्य सफल होगा। ब्रिटिश कवि व उपन्यासकार विलियम गोल्डिंग के कथन के साथ अपनी कलम को विराम दुंगी- “पुरुष के समान समझने वाली औरतें मुझे मूर्ख लगती हैं, वे पुरुषों से कहीं बेहतर हैं। स्त्रियों को हम जो कुछ भी देते हैं उससे कहीं ज्यादा वो हमें वापस करती हैं।“ अतः स्त्री और पुरुष के एक-दूसरे के प्रति सम्मान ही हमार् जिन्दगी को ‘डियर जिन्दगी’ में तब्दिल कर सकती है।

डॉ. पुष्पा सिंह
एसिस्टेन्ट प्रोफेसर,हिन्दी विभाग, मार्घेरिटा महाविद्यालय

मार्घेरिटा, असम
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