आलेखमाला:त्रिलोचन: दृष्टि और सृष्टि - आरती

त्रैमासिक ई-पत्रिका
वर्ष-3,अंक-24,मार्च,2017
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 आलेखमाला:त्रिलोचन: दृष्टि और सृष्टि - आरती

चित्रांकन:पूनम राणा,पुणे 
त्रिलोचन को हिन्दी साहित्य की प्रगतिशील काव्यधारा का प्रमुख हस्ताक्षर माना जाता है। वर्ष 2017 त्रिलोचन का जन्म शताब्दी वर्ष है। उनका जन्म 20 अगस्त, 1917 ई. को कटघरापट्टी, चिरानीपट्टी, जिला सुल्तानपुर (उत्तर प्रदेश) के एक प्रतिष्ठित ठाकुर परिवार में हुआ। उनका मूलनाम वासुदेव था। लेकिन उनके संस्कृत के गुरू देवदत्त जी ने उन्हें 'त्रिलोचन' नाम दिया। इसी नाम को उन्होंने आगे बढ़ाया। त्रिलोचन प्रगतिवादी काव्यधारा के समर्थ कवि के रूप में प्रसिद्ध है। आरम्भ में वे छायावादी रहे लेकिन बाद में वे प्रगतिवादी हुए। उन पर मार्क्सवाद  विचारधारा का भी प्रभाव रहा है। त्रिलोचन का सम्पूर्ण साहित्य आँखों देखा हुआ है। उन्होंने जो देखा- समझा और अनुभव किया, उसी को बिना किसी लाग- लपेट के यथार्थ रूप में अभिव्यक्त किया। त्रिलोचन की रचना- यात्रा का प्रारम्भ चौथे दशक में हुआ और उस समय प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, रामचंद्र शुक्ल, डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी, शिवदानसिंह चौहान और रामविलास शर्मा जैसे दिग्गज साहित्यकार हिन्दी को समृद्ध कर रहे थे। त्रिलोचन भी उन्हीं में से एक थे लेकिन यह बात काफी बाद में समझी गयी। बहरहाल, त्रिलोचन ने हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं में लिखा है और हिंदी साहित्य के निर्माता के रूप में उनका योगदान अतुलनीय है। 

     त्रिलोचन ने साहित्य की कई विधाओं में लिखा है। जैसे कविता, कहानी, डायरी, पत्र, आलोचना आदि। उन्होंने कई विधाओं में लिखा अवश्य है किन्तु चर्चित हुए कविताओं के बल पर। त्रिलोचन मूलत: कवि ही कहे जाते है। त्रिलोचन की मृत्यु 9 दिसम्बर, 2007 को हुई। वह अपनी आखिरी सांस तक कवि ही बने रहना चाहते थे। उनको इस बात का दुख सता रहा था कि मेरे मरने पर मेरा शब्दों से सम्बन्ध विच्छेद हो जाएगा। कवि ने अपनी इस पीड़ा को अपने काव्य संग्रह "मेरा घर" (सन् 2002 में प्रकाशित) की कविता 'शब्दों से मेरा सम्बन्ध छुट जाएगा' में चित्रित किया है:-

                        "मुझे अपने मरने का
                         थोड़ा भी दुख नहीं
                        मेरे मर जाने पर
                         शब्दों से 
                         मेरा सम्बन्ध
                         छुट जाएगा।" (मेरा घर, पृष्ठ संख्या- 29)

त्रिलोचन का कवि व्यक्तित्व शब्दों के बिना अधूरा है। यही कारण है कि नागार्जुन ने उन्हें ‘किंवदंती पुरूष’ कहा है तो फणीश्वरनाथ रेणु ने त्रिलोचन को ‘शब्द योगी’ कह कर पुकारा। कांति कुमार जैन ने त्रिलोचन को ‘शब्दों का मरजीवा’ और ‘शब्द सहचर’ की संज्ञा दी है। 

   त्रिलोचन का साहित्य यथार्थ की भूमि पर खड़ा है। यथार्थ सम्बन्धी विचारधारा का आरम्भ प्रगतिवाद से होता है। जहाँ पहली बार किसानों, मजदूरों, दलित और स्त्री आदि के यथार्थ को महत्व दिया गया। जिसके लिए देश की तत्कालीन परिस्थितियों के साथ ही कुछ ऐसे कारण थे जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। रूस की क्रांति ने समस्त विश्व के साथ भारत को भी प्रभावित किया, साथ ही वैज्ञानिक भौतिकवाद का भी प्रभाव पड़ा। एक ओर अंग्रेज का दमनचक्र तीव्र गति से घूम रहा था और दूसरी ओर यहाँ का पूंजीवाद दल श्रमिकों का शोषण कर रहा था। उच्चवर्ग का लगातार निम्नवर्ग पर अत्याचार करना जारी था। यहाँ के साहित्यकारों से यह स्थिति  छुपी न थी। इसलिए वे सामान्य जनता को शासकों, ठेकेदारों के अत्याचार से मुक्त करने के लिए चिन्तित थे। सन् 1925 में कुछ भारतीय युवकों ने साम्यवादी दल की स्थापना की और उसके मार्क्सवादी सिध्दांतों का प्रचार आरम्भ हो गया। हिंदी काव्य- साहित्य छायावाद और रहस्यवाद की भावनाओं को लेकर आगे बढ़ रहा था। इन दोनों काव्य- वादों का आरम्भ व्यक्तिवाद था। अत: काव्यधारा माक्सवादी विचारधारा के अनुकूल न थी। तत्कालीन देश की परिस्थितियों और मार्क्सवादी साम्यवाद के बढ़ते हुए प्रभाव से तत्कालीन कवि और साहित्यकार प्रभावित होने लगे और हिंदी साहित्य में नयी विचारधारा का आरम्भ हुआ जो यथार्थ पर आधारित थी। त्रिलोचन उन्हीं साहित्यकारों में से एक है जिन पर उपर्युक्त परिस्थितियों का प्रभाव पड़ा। जिसके कारण उनके साहित्य में समाज का यथार्थ परिलक्षित हुआ। 

      त्रिलोचन के सम्पूर्ण साहित्य के संक्षिप्त विवरण की प्रस्तुतीकरण में, हम सर्वप्रथम उनके काव्य को लेना चाहेंगे, क्योंकि वही उनके साहित्य की आधार- शीला है। त्रिलोचन प्रगतिवादी कवियों में प्रमुख स्थान रखते हैं। वह अपनी प्रगतिशील जीवन दृष्टि के लिये प्रसिद्ध रहे हैं। त्रिलोचन का पहला काव्य- संग्रह “धरती”(1945) में प्रकाशित हुआ। उसके बाद “गुलाब और बुलबुल”(1956), “दिगंत”(1957‌), “शब्द”(1980), “ताप के ताए हुए दिन”(1980), “उस जनपद का कवि हूँ”(1981), “अरधान”(1983), “अनकहनी भी कुछ कहनी है”(1985), “तुम्हें सौंपता हूँ”(1985), “फूल नाम है एक”(1985), “सबका अपना आकाश”(1987‌), “चैती”(1987), “अमोला”(1990), “मेरा घर”(2002) प्रकाशित हुए। ‘धरती’, ‘गुलाब और बुलबुल’, ‘दिंगत’, ‘ताप के ताए हुए दिन’ और ‘उस जनपद का कवि हूँ’ आदि उनकी प्रमुख काव्य- कृतियाँ है।

        ‘धरती’ त्रिलोचन का प्रथम काव्य- संकलन है। लेकिन उनकी रचनाएँ यह आभास नहीं होने देती कि यह कवि की पहली रचना है। प्रस्तुत काव्य- संकलन की कुछ रचनाओं मे छायावादी का भी प्रभाव है। लेकिन ‘धरती’ काव्य- संग्रह में प्रगतिवादी काव्य की समस्त प्रवृत्तियाँ चित्रित हुई है। उन्होंने शोषित जीवन और ग्राम्य जीवन के यथार्थ को चित्रित किया है साथ ही शोषक वर्ग पर भी तीखा प्रहार करते नजर आते हैं। उनकी नव- निर्माण की भावना में आशा और विश्वास लक्षित है। निसंदेह यह उनकी प्रतिनिधि पुस्तक है। इसलिए नामवर जी ‘धरती’ को त्रिलोचन की सबसे अच्छी किताब कहते हैं तो निराधार नहीं कहते। यही कारण है कि त्रिलोचन “धरती का कवि” नाम से प्रसिद्ध है। उनका दूसरा काव्य- संकलन ‘गुलाब और बुलबुल’ ग़जलों और रुबाइयों का संग्रह है। त्रिलोचन का ‘दिगंत’ काव्य- संग्रह एक सानेट संग्रह है। सानेट एक पाश्चात्य विधा है जिसका आरम्भ इटली में सबसे पहले हुआ। हिंदी में इसे ‘चतुर्दशपदी’ कहते हैं। त्रिलोचन के लिए सानेट आत्माभिव्यक्ति का सर्वश्रेष्ट माध्यम है। उन्होंने ही हिंदी में सानेट जैसे पाश्चात्य छंद को लोक छंद का रूप दिया है। उनकी अन्य कृति- ‘शब्द’ जो एक सौ सत्रह सानेटों का संकलन है। ‘उस जनपद का कवि हूँ’ एक सौ छ्ह सानेटो का संकलन है। ‘अनकहनी भी कुछ कहनी है’ और ‘फूल नाम है एक’ दोनों सानेटो का संकलन है। ‘ताप के ताए हुए दिन’ काव्य- संग्रह में सानेट, गीत के अलावा चार लम्बी प्रबंध कविताएँ है। जिसमें ‘नगई महरा’ और चित्रा जांबोरकर’ विशेष रूप से चर्चित हुई हैं। ‘सबका अपना आकाश’ त्रिलोचन के गीतों का संकलन है तो वहीं ‘अमोला’ उनकी एकमात्र ऐसी रचना है जो उन्होंने अवधी में लिखी है। ‘तुम्हें सौंपता हूँ’, ‘चैती’, ‘अरधान’, ‘मेरा घर’ आदि रचनाओं में कविता के विविध रूप हैं। वैसे तो त्रिलोचन ने गीत, सानेट, ग़जल, रूबाइयाँ, मुक्त छंद, बरवै छंद जैसे कविता के अनेक माध्यम में लिखा है, लेकिन सानेट के कारण वह ज्यादा जाने गए इसलिए हिंदी में उन्हें केदारनाथ सिंह ने “सानेट का पर्याय” कहा है। हिंदी साहित्य में त्रिलोचन की प्रसिद्धि का एक कारण उनके द्वारा रचित सानेट है।  

     त्रिलोचन की कविताओं में जहाँ एक ओर प्रणय विषयक कविताएँ, प्रकृति सम्बन्धी कविताएँ, निजी प्रसंगों और व्यक्तिगत घटनाओं से सम्बन्धित कविताएँ शामिल है। तो वहीं दूसरी ओर कवि की सामाजिक चेतना को अभिव्यक्ति देने वाली कविताएँ भी है। त्रिलोचन जन के कवि है। वह किसानों, मजदूरों, निम्न मध्यवर्गीय लोगों के सुख-दुख, उनकी पीड़ा और संघर्ष को अपनी कविता का विषय बनाते है। उनकी कविताएँ सामाजिक यथार्थ को अभिव्यक्त करती है। त्रिलोचन किसान हैं इसलिए वह किसानी जीवन का बड़ा ही सूक्ष्म चित्रण करते हैं। अपनी कविता “हंसता है अकाल” में त्रिलोचन ने किसान की अत्यन्त दयनीय स्थिति का यथार्थ चित्रित किया है:-

                      “हंसता है अकाल, तारों के दाँत निकलें
           मन किसान का मेरा चैन नहीं पाता है                    
           ‌-   -  -  -  -  -  -  -  -  -  -
           ताक रहे आकाश, नहीं जलधर की छाया 
           कहीं दिखाई देती है, भय तन घर आया।” (अनकहनी भी कुछ कहनी है, पृ.सं.-75)

किसानी जीवन के सामूहिक श्रम और संघर्ष के यथार्थ को त्रिलोचन सहज और सरल ढंग से चित्रित करने में हस्तसिद्ध है। किसानी जीवन का आरम्भ कवि खेतों से करता है क्योंकि कवि जानता है कि एक किसान के लिये खेत बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं। प्रस्तुत कविता में कवि चित्रित करते हैं कि एक किसान विकट परिस्थितियों में भी खेतों में श्रम करता है और आज के किसानों  का भी यही हाल है :-

                   “हे धूप कठिन सिर- ऊपर
           थम गयी हवा है जैसे
           दोनों दूबों के ऊपर
           रख पैर सींचते पानी
           उस मलिन हरी धरती पर
           मिलकर वे दोनों प्राणी
           दे रहे खेत में पानी।”   (धरती, पृ.सं.- 18)  

त्रिलोचन यथार्थ के कवि हैं। कल्पना की अपेक्षा कठोर वास्तविकता उन्हें अधिक प्रिय है। आज की बिगड़ी परिस्थितियाँ और सामाजिक विषमता के यथार्थ को व्यक्त करते हुए कवि कहते हैं:-

    “अच्छाई इन दिनों बुराई के घर पानी भरती हैं.....
     अच्छाई के बिगड़े दिन है, और बुराई राजपाट करती है.....” (दिगंत, पृ.सं.-36)

प्रगतिशील कविता की एक प्रमुख प्रवृत्ति यह है कि इसमें  पूँजीवाद, सामंतवाद और साम्राज्यवाद शोषक सत्ता का विरोध लगातार दिखाई देता है। प्रगतिशील कवियों ने सामन्तवाद के साथ-साथ पूंजीवादी शोषण के प्रति भी अपना गहरा आक्रोश व्यक्त किया है। त्रिलोचन “ईश्वर की मृत्यु” नामक कविता में बताते हैं कि ईश्वर का नाश हो चुका है और उसे पूंजीवादियों ने मार डाला है। कवि के शब्दों में:- 

    “मृत्यु हो चुकी है ईश्वर की, नया आदमी
     अब ईच्छानुसार करता काम। क्या रहा
     जो उसने न किया हो। कोई भी कमी
     नहीं रही है.................................” (ताप के ताए हुए दिन, पृ.सं.- 62)

त्रिलोचन की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि प्रेम सम्बन्धी कविताओं में भी कवि ने प्रगतिशील यथार्थ को नहीं छोड़ा है। वह किसी कीमत पर प्रगतिवादी विचारधारा से अलग नहीं हुए क्योंकि उनका काव्य आम जन के लिए है और उनकी कोशिश रही है कि कविता प्रकृति की हो या प्रेम की, उसमे आम जन धूमिल न हो:- 

    “प्रेम जागता जीवन यों तो दे जाता है,
     मगर पेट के आगे वही हार खाता है।”     (दिगंत, पृ.सं‌- 25)

मानव एक सामाजिक प्राणी है। उसका समाज के साथ अटूट सम्बन्ध है। यह सत्य है कि व्यक्ति के बिना समाज का निर्माण असंभव है और समाज के अस्तित्व के बिना व्यक्ति का जीवन मुश्किल है। कवि मानव को समाज से अलग खंडित रूप मे नहीं देखते है:- 

           “मैं उसी समग्रता को देखने का आदी हूँ,
     खंड में समग्र नहीं आता नहीं आ पाता।”  (ताप के ताए हुए दिन, पृ.सं.-62)

  त्रिलोचन समाज को परिवर्तित करने में मानवीय शाक्ति पर पूर्ण विश्वास करते हैं। मानव पर ही समाज का भविष्य निर्भर है क्योंकि वह ही समाज का वास्तविक स्रष्टा है और वही निर्माण कर्ता है।  

  त्रिलोचन की काव्य- भाषा अन्य कवियों की काव्य- भाषा से अलग है। त्रिलोचन जन के कवि है। उनका सम्पूर्ण काव्य आम जनता के लिए लिखा गया है। इसलिए उन्होंने सरल और सहज भाषा में अपनी बात कही है। उनकी भाषा की मौलिकता को प्रतीक और बिम्ब की आवश्यकता नहीं पड़ती है। त्रिलोचन अवधी और तत्सम प्रधान हिंदी का प्रयोग करते है। डा. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी त्रिलोचन की काव्य- भाषा पर लिखते हैं‌- “लोकभाषा का जैसा ललकपूर्ण प्रयोग त्रिलोचन में मिलता है वैसा शायद ही किसी दूसरे आधुनिक कवि में मिलें। कविता में स्थानीय रंग ढूँढ़नेवालों के लिए त्रिलोचन की कविता एक खजाना है।” (आधारशीला का त्रिलोचन विशेषांक, पृ.सं.- 85) लोकभाषा त्रिलोचन की काव्य की सबसे बड़ी विशेषता है।

   त्रिलोचन की कहानियों का एकमात्र संग्रह “देशकाल”(1986) है। जिसमें उनकी बीस कहानियाँ है। त्रिलोचन मूलत: कवि है इसलिए उनकी कहानियों में उनका कवि रूप ही चित्रित हुआ है। उनकी कविताओं का विषय ही उनकी कहानियों का विषय है। त्रिलोचन ने एक जगह लिखा भी है कि “ग्रामीण जीवन मुझे आरम्भ से ही प्रभावित करता रहा है। कविता मैं बचपन से ही लिख रहा हूँ। कभी- कभी कोई चरित कविता में पूरी तरह नहीं समा पाता। जब बात कविता में पूरी तरह नहीं कही जा सकती तब वह धीरे- धीरे कहानी का रूप ग्रहण करने लगती है।” उनकी ‘देशकाल’, ‘जिउधन’, ‘नदी के किनारे’, ‘अपनी इज्जत आप करो’, ‘सोलह आने’, ‘बंडा सियार’, ‘महाप्रयाण’ आदि कहानियों में ग्राम्य जीवन का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत हुआ है।    

    त्रिलोचन ने डायरी विधा में भी लिखा है। दैनिक जीवन के सुख- दुख और संघर्षों का जीवंत प्रमाण है उनकी डायरी “रोजनामचा”। जो सन् 1993 में प्रकाशित हुई। त्रिलोचन ने डायरी लिखी लेकिन उन्होंने ब‌ड़ी संख्या में पत्र भी लिखे हैं। त्रिलोचन की आलोचनात्मक रचनाओं में उनकी ही कविता पुस्तकों की संक्षिप्त भूमिकाएँ एवं कुछ आलोचनात्मक निबंध है। उनकी आलोचना- दृष्टि उनकी डायरी, पत्रों और सानेटों में प्रकट होती है जब वह कबीर, तुलसी, निराला, केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन पर लिखते हैं। त्रिलोचन का आलोचनात्मक गद्य गंभीर साहित्य विमर्श है।

    त्रिलोचन को अपने काव्य संग्रह ‘ताप के ताए हुए दिन’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार सन् 1981 में मिला। इसके बाद ‘दिगंत’ (सन् 1983) और ‘गुलाब और बुलबुल’ (सन् 1984) को उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा सम्मान  पुरस्कार मिला। मध्यप्रदेश शासन का मैथिलीशरण गुप्त सम्मान (सन् 1990), हिंदी अकादमी, नई दिल्ली का शलाका सम्मान (सन् 1992), भवानी प्रसाद मिश्र राष्ट्रीय पुरस्कार (सन् 1983), सुलभ साहित्य अकादमी पुरस्कार (सन् 1999) और भारतीय भाषा परिषद्, कोलकाता (सन् 2003) आदि पुरस्कार भी मिले।  त्रिलोचन समकालीन हिंदी कविता के ख्याति प्राप्त कवियों में से एक है। समकालीन कविता में त्रिलोचन की एक खास पहचान है। कविताओं में कवि का गहरा आत्मविश्वास और सामाजिक लक्ष्य के प्रति ईमानदारी प्रकट होती है जो उनके लिए उनका जीवन दर्शन है। यही जीवन दर्शन उनके सम्पूर्ण साहित्य में अभिव्यक्त हुआ है। वह एक जनवादी कवि है। समाज के सदा उपेक्षित और शोषित- पीड़ित जनवर्ग के जीवन का यथार्थ चित्रण उनकी कविताओं में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। उनका साहित्य आज भी प्रासंगिक है क्योंकि उनका साहित्य आज भी समाज के शोषित वर्गों को अभिव्यक्त कर रहा है। त्रिलोचन की कविता एक ठेठ भारतीय जन की कविता है। त्रिलोचन हिंदी के उन थोड़े से कवियों में से एक है जिनके साहित्य में सादगी होने पर भी वह हिंदी साहित्य से आलोकित हो रहा है। त्रिलोचन एक प्रगतिशील जनवादी साहित्यकार है। जिनका साहित्य अपने समय का जीवंत दस्तावेज है।


 आरती
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
सम्पर्क;9716668064

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