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शैक्षिक सरोकार:मूल्यांकन की शिक्षा – मुजतबा मन्नान

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, मार्च 26, 2017 | रविवार, मार्च 26, 2017

त्रैमासिक ई-पत्रिका
वर्ष-3,अंक-24,मार्च,2017
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शैक्षिक सरोकार:मूल्यांकन की शिक्षा – मुजतबा मन्नान

चित्रांकन:पूनम राणा,पुणे 
पिछले दो वर्षों से देश में फ़ेल-पास करने वाली व्यवस्था को लेकर गहन चर्चा हो रही है कि विद्यालयों में फिर इसको लागू किया जाए या शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत मौजूदा प्रणाली को जारी रखा जाए, जिसके अंतर्गत बच्चे को अगली कक्षा में स्वत: प्रमोट कर दिया जाता है। नई शिक्षा नीति को लेकर पूर्व कैबिनेट सचिव टी. एस. आर. सुब्रमण्यम की अध्यक्षता में गठित समिति ने ‘फ़ेल न करने की नीति’ (नो-डिटेन्शन पॉलिसी) को लेकर अपनी रिपोर्ट में मानव संसाधन विकास मंत्रालय को कुछ सुझाव दिए हैं जैसे कक्षा पाँच तक बच्चे को फ़ेल न किया जाए। टेस्ट, तिमाही परीक्षा व सतत-व्यापक मूल्यांकन के माध्यम से बच्चों की कमजोरियों को पहचान कर अतिरिक्त कक्षा लगाकर बच्चों को पढ़ाया जाए आदि।

       दरअसल शिक्षा के अधिकार अधिनियम की धारा-16 के अनुसार, आरंभिक शिक्षा (कक्षा 1 से कक्षा 8) पूर्ण होने तक किसी भी बच्चे को फ़ेल नहीं किया जाएगा बल्कि बच्चे को अगली कक्षा में स्वत: प्रमोट कर दिया जाता है। जिसके विकल्प के रूप में मूल्यांकन पद्धति में बदलाव करते हुए सतत-व्यापक मूल्यांकन (सीसीई) आया। लेकिन समिति की रिपोर्ट के मुताबिक ज़्यादातर शिक्षक बच्चे को फ़ेल न करने की नीति से खुश नहीं हैं। उनका मानना है कि बच्चे को अगली कक्षा में तभी प्रोमोट करना चाहिए जब यह लगे कि बच्चे ने ज़रूरी चीजों को सीख लिया है और इसका आधार विद्यालय में बच्चे की उपस्थिति, टेस्ट व परीक्षा परिणाम होना चाहिए। शिक्षकों के अनुसार, इस प्रावधान की वजह से बच्चों के अंदर डर खत्म हो रहा है और बच्चे पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। बच्चा पिछली कक्षा के बारे में ठीक से जाने बिना ही अगली कक्षा में चला जाता है, जिसकी वजह से बच्चों को अगली कक्षाओं की विषयवस्तु को समझने में मुश्किल आती है और इन सभी कारणों की वजहों से शिक्षा की गुणवत्ता में कमी आ रही है इत्यादि।

लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि पिछले कई दशकों से फ़ेल-पास करने की व्यवस्था चली आ रही है और अब तक हम शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार नहीं कर पाएँ हैं तो अब फ़ेल-पास करने से शिक्षा की गुणवत्ता में कैसे सुधार आ सकता है? यदि परीक्षा से ही शिक्षा की गुणवत्ता सुधरती तो आज हम इस स्थिति में नहीं पहुँचते। दूसरा, कोई भी विस्तृत अध्ययन यह नहीं बताता है कि कक्षा पाँच या कक्षा आठ में पास हुए और इन्हीं कक्षाओं में फ़ेल किए गए बच्चों के सीखने में क्या अंतर है?

विद्यालय में परीक्षा के अनुभव भी यही बताते हैं कि फ़ेल होने से बच्चे के आत्म-स्वाभिमान को चोट पहुँचती है जिसकी वजह से बच्चा हमेशा के लिए अवसाद का शिकार भी हो सकता है। परीक्षा बच्चे के लिए फोबिया बन जाती है जिसकी वजह से बच्चों का बीमार होना, घर से भाग जाना और आत्महत्या जैसी घटनाएँ देखने को मिलती हैं। कुछ बच्चे अन्य विषयों में अच्छे से सीख पाते हैं लेकिन एक विषय में फ़ेल होने की वजह से उनके अन्य विषयों के सीखने पर भी असर पड़ता है। फ़ेल होने की वजह से बच्चे ड्रॉप आउट हो जाते है और फिर वह चोरी, भीख मांगना व बाल आपराध जैसी गतिविधियों में शामिल हो जाते हैं जबकि विद्यालय में रहने की वजह से बच्चे इन चीजों से बचने के साथ बाल-विवाह जैसे अपराधों से भी बच सकते हैं इत्यादि।

आमतौर पर बच्चे को ‘फ़ेल न करने की नीति’ का मतलब यह निकाला जाता है कि बच्चे का मूल्यांकन ही नहीं किया जा रहा है। दरअसल शिक्षा के अधिकार अधिनियम में मूल्यांकन संबंधी दो अलग-अलग तरह के प्रावधान हैं जिन्हें साथ में रखकर समझने की ज़रूरत है। पहला, धारा-16 विद्यार्थी को किसी भी कक्षा में रोकने (फ़ेल करने) पर प्रतिबंध लगाती है, जिसके विकल्प के रूप में धारा-29 सतत-व्यापक मूल्यांकन को अनिवार्य बनाती है यानी विद्यालय में बच्चे का सतत मूल्यांकन होना चाहिए न कि किसी खास दिन परीक्षा लेकर उसका मूल्यांकन किया जाए। धारा-4 के अनुसार आयु-उपयुक्त दाखिला इससे जुड़ा तीसरा मुद्दा है।

दरअसल इन प्रावधानों के पीछे दशकों से चल रहा मंथन और देश-विदेश के अनुभव हैं कि बच्चे फ़ेल-पास होने से नहीं सीखते हैं और न ही बच्चों के न सीखने के लिए उनको जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। विश्वभर के अनुभव बताते हैं कि गरीब व वंचित समुदायों के बच्चों का विद्यालय छोड़ने के पीछे फ़ेल-पास वाली व्यवस्था सबसे बड़े कारणों में एक रही है। इस प्रावधान के बंद करने के पीछे अभिभावकों व शिक्षकों की तरफ से जो सबसे बड़ा तर्क दिए जाता है कि फ़ेल न करने की वजह से बच्चों के अंदर डर खत्म हो रहा है और बच्चे पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। तो प्रश्न उठता है कि क्या परीक्षा और फ़ेल हो जाने का डर वास्तव में बच्चों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बन सकता है? तथा विषय के प्रति बच्चे के अंदर रुचि पैदा कर सकता है? दरअसल बच्चे की पढ़ाई के प्रति रुचि और प्रेरणा विषयवस्तु की रोचकता तथा शिक्षण विधि पर निर्भर होनी चाहिए, न कि किसी प्रकार के दण्ड के डर पर। इस बात पर भी ध्यान देना बहुत ज़रूरी है कि जो हम बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं अगर वह बच्चे के लिए रोचक न हो या हम सही तरीके से बच्चे को सिखा न पाएँ तो इसमें दोष किसका हैं? क्या यह विद्यार्थी का दोष हैं? या उस शिक्षण विधा का? उस शिक्षक का? या उस शैक्षणिक व्यवस्था का? इनमें से हम फ़ेल किसको माने?

अनेक शोध व शिक्षण अनुभव बताते हैं कि बच्चे तब ज्यादा सीखते हैं जब उनमें उस विषयवस्तु के प्रति कोई आकर्षण बने और उसे सीखने के प्रति उनमें तीव्र इच्छा व उत्साह जागृत हो। जैसे रोटी बनाना, साइकिल चलाना या फिर नए मोबाइल फोन का इस्तेमाल करना आदि। क्या बच्चे के अंदर इस तरह का उत्साह फ़ेल होने के डर से उत्पन्न हो सकता हैं? शैक्षणिक व्यवस्था में मूल्यांकन की अहम भूमिका होती है। विद्यालय में मूल्यांकन का उद्देश्य बच्चों की छटनी करना नहीं होता है बल्कि मूल्यांकन इसलिए ज़रूरी है ताकि हमें पता चल सके कि हमारा प्रयास सही दिशा में अग्रसर है या नहीं? मूल्यांकन हमें यह समझने में मदद करता है कि बच्चे ने कितना सीखा हैं और किन चीजों पर अधिक ध्यान देने की ज़रूरत है।

फ़ेल-पास करने वाली अंकीय प्रणाली की सतत-व्यापक मूल्यांकन प्रणाली से तुलना करें तो, अंकीय प्रणाली में बच्चे का ध्यान ज्यादा अंक लाने पर रहता हैं तथा इस प्रणाली से हम बच्चे के व्यवहार व मूल्यों को नहीं जांच सकते हैं। जबकि सतत-व्यापक मूल्यांकन प्रणाली में बच्चे के सीखने पर अधिक ज़ोर रहता है तथा इस प्रणाली के माध्यम से बच्चे के व्यवहार और मूल्यों का भी पता चलता है।

विद्यार्थी को कक्षा में न रोके रखना, सतत-व्यापक मूल्यांकन और आयु-उपयुक्त कक्षा में दाखिला, ये तीनों सैद्धांतिक तौर पर मजबूत और व्यवहारिक तौर पर सही सिद्ध हो चुके सिद्धांत हैं। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए ये विचार तयशुदा कक्षा/ग्रेड तथा पास-फेल परीक्षाओं के मुक़ाबले कहीं बेहतर विकल्प हैं। लेकिन आमतौर पर भारत में किसी चीज़ को अच्छे से समझे बिना और संस्थागत ढांचों तथा उससे संबंधित लोगों को समर्थ बनाएँ बिना ही उसे लागू कर दिया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप वह योजना सफल नहीं हो पाती है।

दरअसल चर्चा का विषय फ़ेल-पास की व्यवस्था को लागू करना या मौजूदा प्रणाली को जारी रखना नहीं होना चाहिए बल्कि हमें इन मुद्दों पर बातचीत करनी चाहिए कि शिक्षा से जुड़ी सभी योजनाओं के केंद्र में शिक्षक होता है तो क्या हमने उसकी क्षमताओं को ध्यान में रखते हुए योजना बनाई?, शिक्षक इस प्रणाली से होने वाले फ़ायदों को क्यों समझ नहीं पाएँ हैं?, क्या योजना के क्रियान्वयन के लिए शिक्षकों को पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराये गए? और योजना के अनुसार उनका प्रशिक्षण हुआ? आदि। जैसा कि समिति ने कहा है कि कक्षा पाँच में बच्चे को फ़ेल करने के उपाय को अंतिम विकल्प के रूप में देखा जाए और हमें जल्दबाज़ी में निष्कर्ष पर नहीं पहुँचना चाहिए, क्योंकि कोई भी प्रणाली क्रियान्वयन के लिए समय लेती है।

संदर्भ

  1. Some Inputs for Draft National Education Policy,Page, 90-93
  2. नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम,2009, धारा- 4, 16 और 29
  3. सी.एन.सुब्रहमण्यम, फेल न किया तो क्या किया?, शैक्षणिक संदर्भ,फरवरी-2016,अंक-102, 
  4. RohitDhankar,To detain or not to detain: Barking-up the wrong tree- 
  5. Link-https://rohitdhankar.com/2015/09/03/to-detain-or-not-to-detain-barking-up-the-wrong-tree

मुजतबा मन्नान
अजीम प्रेमजी फाउंडेशनटोंक,राजस्थान,मो- 7073777713,ई-मेल:mujtbaindia@gmail.com
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