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आलेखमाला:जियो उस प्यार में जो मैंने तुझे दिया – डॉ. विनायक काले

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, मार्च 26, 2017 | रविवार, मार्च 26, 2017

त्रैमासिक ई-पत्रिका
वर्ष-3,अंक-24,मार्च,2017
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आलेखमाला:जियो उस प्यार में जो मैंने तुझे दिया – डॉ. विनायक काले

     
चित्रांकन:पूनम राणा,पुणे 
अज्ञेय ने साहित्य की हर विधा में लिखा है। जिस किसी विधा में उन्होंने लिखा, उसे समृद्ध करने की कोशिश की और वे सफल भी हुए। अज्ञेय के लेखन की विविधता के बारे में नामवर सिंह ने कहा है, ‘‘हिंदी साहित्य में अज्ञेय ऐसे रचनाकार हैं, जिन्होंने साहित्य की सभी विधाओं पर लिखा है, कोई विधा बची नहीं है। उपन्यास लिखा है, कविता लिखी है, नाटक लिखा, कहानी लिखी है, ललित निबंध लिखे हैं, डायरी लिखी है, यात्रा-वृत्तांत लिखा है। विशाल साहित्य लेखन है उनका। ऐसे साहित्यकार पर बातचीत करने और लिखने में सरलता और कठिनाई दोनों एक साथ सामने आती है।’’ (कविता अज्ञेय, सम्पा. ए. अरविंदाक्षन, पृ. 09, प्रकाशन संस्थान, 2012) 

अज्ञेय के लेखन की विधाओं में वैविध्य सहज ही दिखाई देता है। वह वैविध्य जीवन के हर अंश से संस्पर्शित होकर उनकी विधाओं में अनेक स्तरों पर उजागर हुआ है। अज्ञेय ने केवल साहित्य की हर विधा में लिखा नहीं बल्कि जीवन के हर पहलू पर भी लिखा है। उनकी कविता में ‘मौन’ भी मुखर है। उन्होंने अपनी कविता में मानव-मुक्ति की बात की है, वे मानव-मुक्ति और कविता की मुक्ति के लिए नए राहों का अन्वेषण भी करते हैं और ‘तार सप्तक’ के माध्यम से उन्होंने अनेक नए कवियों को प्रेरणा भी दी है। वे ‘आत्मान्वेषण के कवि’ हैं। वे स्वभावतः यायावर थे, उनकी यायावरी के चित्र हमें उनके साहित्य में अनायास ही दिखाई देते हैं। भाषा और शिल्प के स्तर पर उन्होंने नयेपन को अपनाया। वे आत्मा से, अनात्मा और प्रकृति से संवाद करने वाले कवि हैं। वे साहित्य में परंपरा, आधुनिकता, स्वाधीनता, समय, देश-काल, प्रकृति आदि को नए ढंग से परिभाषित करने के लिए जाने जाते हैं। उनकी कविताओं से गुज़रने के बाद लगता है कि उनको व्यक्तिवादी, अहंवादी, प्रयोगवादी कवि कहकर एक सीमा में बाँधना है और उनकी कविताओं के साथ अन्याय करना है। 

अज्ञेय की कविता की विषयवस्तु में काफ़ी विविधता दिखाई देती है। अज्ञेय की कविता में प्रेम अपने पूर्ण रूप में उपस्थित है। प्रेम के हर पहलू को अज्ञेय की कविता ने छुआ है। प्रेम मनुष्य के जीवन का प्रमुख हिस्सा है। प्रेम के अनेक रूप हैं। प्रेम को केवल स्त्री या पुरुष के प्रेम तक ही सीमित नहीं रखा जा सकता। प्रेम प्रकृति से भी हो सकता है। प्रेम की यह विविधता अज्ञेय की कविता में दिखाई देती है। शंभुनाथ ने कवि और प्रेम के संबंध को इस प्रकार व्यक्त किया है - ‘‘यदि कोई कवि होगा, उसके भीतर प्रेम होगा। प्रेम ही आदमी को कवि बनाता है। कवि की ज़रूरत इसलिए होती है कि जब हवाओं में घृणा भरी हो, वह प्रेम का संगीत बाँटता है। वह सुंदरता से प्रेम करना सिखाता है और बताता है, क्या सुंदर है, क्या नहीं। आधुनिकतावादी समय में प्रेम की भाषा ठीक वैसी नहीं हो सकती थी, जैसी क्लासिकल या रोमांटिक युग में थी। बदली जीवन स्थितियों में प्रेम का अनुभव अलग तरह का होगा, पर उसमें क्लासिक और रोमांटिक संस्कारों की गूँज न हो, यह संभव नहीं है। यदि प्रेम में अनुभव की सच्चाई के साथ एक कलात्मक गहराई मौजूद हो, इन संस्कारों की गूँज होगी ज़रूर। अज्ञेय, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल और शमशेर की कविताओं में प्रेम धड़ल्ले से उपस्थित होने वाली विषयवस्तु है।’’ (शंभुनाथ, शमशेर : कौतुक से अधिक, हिन्दी समय) 

प्रेम मनुष्य को मनुष्य बनाए रखता है और प्रेम मनुष्य को कवि भी बनाता है। प्रेम जहाँ मुक्ति की बात करता है, वहीं वह हमें मुक्त होना और मुक्त करना भी सिखाता है। प्रेम का स्वरूप आधुनिक मान्यताओं के अनुसार बदलता गया है। मनुष्य का प्रेम जीवन में विश्वास लाता है। इस विश्वास में ही सारा आलोक भरा है। आज साहित्य में उस तरह के आदर्श प्रेम की कल्पना नहीं की जाती है, जिस तरह की कल्पना क्लासिकल या रोमांटिक युग में की जाती थी। आज की कविता में व्यक्त प्रेम कल्पनालोक में विचरने की जगह अनुभव की धरती से जुड़ा हुआ दिखाई देता है। साथ ही प्रेम को व्यक्त करने वाली भाषा का भी रूप समय के अनुसार बदला है। प्रेम को व्यक्त करने वाले शब्द रोज़मर्रा की ज़िन्दगी से लिए गए हैं।

अज्ञेय के साहित्य में प्रेम अनेक तरह से व्यक्त हुआ है। उन्होंने प्रेम के केवल संयोगात्मक पक्ष को ही अपनी कविता में जगह नहीं दी बल्कि प्रेम भरे जीवन में आए तनाव और उदासी को भी अभिव्यक्त किया। उनकी कविता में स्त्री-प्रेम के अनेक रूप मिलते हैं, साथ ही मनुष्य और प्रकृति-प्रेम के चित्र भी मिलते हैं। उनकी कविताएँ अपने आपको खोजने की कोशिश है। वे अपनी प्रेम कविताओं के माध्यम से अपने अस्तित्व का अन्वेषण ही करते हैं। अज्ञेय के प्रेम के विषय में शंभुनाथ जी लिखते हैं - ‘‘अज्ञेय का प्रेम मानव मन को विस्तार और मुक्ति का अहसास देने वाला है। उनका प्रेम सीमा-हीन खुलेपन का अनुभव है। इसकी टकराहट, रूढ़ियाँ, संकीर्णताओं और वर्जनाओं से इसमें एक गंभीरता है। अज्ञेय को समाज से काफ़ी आघात और दर्द मिला था। वह अकेलापन कुछ ज़्यादा महसूस करते थे, ‘आज प्राण मेरे प्यासे हैं/आज थका हिम हारिल मेरा/आज अकेले ही उसको इस अंधियारी संध्या ने घेरा’ (1936)। एक अभिनव रोमांटिसिज़्म उनके अंतःस्थल में शुरू से था, जो वस्तुतः कभी नहीं चुका।’’ (शंभुनाथ, वैकल्पिक आधुनिकता के कवि, हिन्दी समय) अज्ञेय की कविता में प्रेम का बौद्धिक और उदात्त रूप दिखाई देता है। इनके प्रत्येक काव्य-संग्रह में प्रेम कविताएँ मिलती हैं और उनकी समय के साथ-साथ प्रेमानुभूति विकसित होती रही है। 

उनकी शुरुआत की कविताओं में स्त्री के प्रति प्रेम की प्रधानता दिखाई देती है। स्त्री के प्रति प्रेम अत्यंत उदात्त था, वे स्त्री को गरिमा प्रदान करते हैं। अज्ञेय के काव्य में स्त्री और पुरुष के सहज आकर्षण से उत्पन्न प्रेम या प्यार की गहन और सूक्ष्म अभिव्यक्ति मिलती है। उनकी प्रेम कविताओं के विषय में ओम निश्चल ने अपने लेख ‘प्रेम के संसार में अज्ञेय’ में लिखा है - ‘‘जहाँ तक प्रेम कविताओं का संबंध है, एक दृष्टि से देखें तो, नदियों, समुद्रों, पहाड़ों और शब्दों के बीच आवाजाही करते हुए अज्ञेय का प्रेम भी इसी एकांतिकता की उपज है। उनके प्रेम में आत्म का वैभव है, देने का दर्प है, अहम् का ज्ञापन है। उनके प्रेम में जितना अहम् है, उतनी ही उच्छलता उनकी कविता में तरंगित है। यह उनकी सीमा भले हो, पर वे प्रेम में भी अहम् को न खोने और विसर्जित करने वाले इंसान हैं। जैसे प्रेम में डुबकी लगाकर भी उनका आत्म भीगने से रह जाता हो। उनका ‘मैं’ उन्हें डूबने से उबार लेता हो, तभी तो वे कहते हैं, जियो उस प्यार में जो मैंने तुम्हें दिया है। प्यार में देने का अहम्। अज्ञेय इस अहम् को विसर्जित न कर सकें, गोकि उनके यहाँ एक से एक अपूर्व प्रेम कविताएँ हैं।’’ (ओम निश्चल, ‘प्रेम के संसार में अज्ञेय’, गद्य कोश)

आरंभ की प्रेम कविताओं पर रवीन्द्रनाथ और छायावाद का प्रभाव दिखाई देता है। ‘भग्नदूत’, ‘चिंता’ और ‘इत्यलम’ में अज्ञेय की आरंभिक प्रेम कविताएँ हैं। आरंभिक कविताओं में छायावादी काव्य की विशेषताएँ मिलती हैं। कुछ रचनाओं में छायावादी-रहस्यवादी भावभूमि तो कुछ रचनाओं में भावुकता, किशोर-कल्पना, आदर्शवादिता आदि दिखाई देती है या इन सबका मिला-जुला रूप दिखाई देता है। ‘भग्नदूत’ काव्य संग्रह की कविता ‘असीम प्रणय की तृष्णा’ में छायावादी-रवीन्द्रवादी प्रेम-भावना दिखाई देती है। देखिए - ‘‘तुम ही तन में तुम ही मन में/व्याप्त हुए ज्यों दामिनी घन में -/क्या दूँ देव! तुम्हारी इस विपुला विभुता को मैं उपहार।/मैं, जो क्षुद्र, तुम्हें, जो प्रभुता के आगार।’’ (भग्नदूत, पृ. 24)

कविता में सहज प्रेमानुभूति की जगह रहस्यवादी कवियों की तरह ‘अलौकिक प्रियतम’ के प्रति प्रेम निवेदन दिखाई देता है। प्रेयसी अपने आपको तुच्छ समझ रही है और प्रियतम में ‘विभुता’ एवं ‘प्रभुता’ को देख पाती है। अज्ञेय के यहाँ केवल स्त्री को ही नहीं, पुरूष को भी तुच्छ रूप में चित्रित किया गया है, जो स्त्री के चरणों की धूल पाने के लिए आतुर है। इस तरह की कविताएं उनकी आरंभिक चरण में रची गईं।

कहना न होगा कि अज्ञेय आधुनिकतावादी थे। उन्होंने स्त्री-पुरुष के संबंध में मैत्री के संबंध को सबसे श्रेष्ठ माना है। इस संदर्भ में राजेन्द्र प्रसाद लिखते हैं - ‘‘सखा-सखी सम्बन्ध को आगे चलकर अज्ञेय ने जिस मैत्री के रिश्ते के रूप में विकसित किया, वह अत्याधुनिक है। वे स्त्री-पुरुष में पति-पत्नी के संबंध को असहज तथा मैत्री के रिश्ते को ही अधिक उपयुक्त मानने लगे हैं। मैत्री में कोई छोटा-बड़ा नहीं होता तथा दोनों के ही अधिकार बराबर होते हैं। आवश्यकता पड़ने पर दोनों एक-दूसरे को छोड़ भी सकते हैं। इस प्रेम में निरंतर ‘मुक्ति का बोध’ बना रहता है तथा ‘सीमाहीन खुलापन’ होता है।’’ (अज्ञेय : कवि और काव्य, पृ. 100) ‘हरी घास पर क्षण भर’ कविता में इस तरह के प्रेम के सीमाहीन खुलेपन की बात की है। ‘केवल बना रहे विस्तार-हमारा बोध/मुक्ति का,/सीमाहीन खुलेपन का ही।’’ (हरी घास पर क्षण भर, कविता कोश)

प्यार और बारिश का अटूट रिश्ता है। यह मौसम प्रेमियों के लिए एक उपहार लेकर आता है। इस मौसम में सभी प्राणी प्रेम में मग्न होते हैं, इसीलिए यह मौसम प्रेमियों को सबसे अधिक प्रिय है। यह मौसम वियोग की पीड़ा को और तीव्र बना देता है। कालिदास से लेकर अज्ञेय तक अपने काव्य में इस ऋतु का चित्रण प्रेम को व्यक्त करने और वियोग की पीड़ा को दर्शाने के लिए किया है। कालिदास का यक्ष अपनी विरह के कारण विक्षिप्त होकर अपनी अवस्था को आकाश में घुमड़ते मेघों से अपना संदेश कहता है। अज्ञेय की एक कविता का शीर्षक कालिदास के ‘मेघदूतम्’ के वाक्यांश ‘आषाढ़स्य प्रथम दिवसे’ से लिया गया है, जिससे कालिदास के ‘मेघदूतम्’ की परम्परा की स्मृति ताज़ा होती है। यहाँ कविता का ‘मैं’ यक्ष की तरह बादलों को अपना प्रणय-संदेश नहीं कहता, बल्कि आकाश में घन को देखकर उसे यह आशा बँधती है कि उसकी प्रेयसी चार दिनों के बाद आ जायेगी। और वह ‘मैं’ जो रेत का सूखा फैलाव-सा है, उसकी कनी-कनी सींच जायेगी। आगे वह प्रेयसी की याद में खोया बादल के रूपक में ही उसके आने का ढंग, उसका सौंदर्य देखता है - ‘आषाढ़स्य प्रथम दिवसे’/घन अकास में दीखा।/चार दिनों के बाद वह आएगी/मुझ पर छा जाएगी, सूखी रेतीली धमनी में फिर रस-धारा लहराएगी/वह आएगी-मैं सूखी फैलाव रेत (वह आएगी-)/मेरी कन-कनी सिंच जाएगी (वह आएगी-)/ठंड पड़ेगी जी को, आसरा मिलेगा ही को/नये अयाने बादल में मैं इकटक देख रहा हूँ पी को-/वह आएगी!/वह आएगी-/पहले बारे बादल-सी छरहरी, अयानी, लाज-लजी, अनजानी,/फिर मानो पहचान, जान यह सब कुछ उस का ही है।’’ (आषाढ़स्य प्रथम दिवसे, हिन्दी समय)

कुछ स्थलों पर प्रेमी बार-बार जाना पसंद करते हैं। जैसे - सागर का किनारा, नदी का एकांत तट, वन आदि। अज्ञेय की कविता में नदी का बार-बार ज़िक्र आया है। नदी का एकांत तट किसी के प्रेम में डूबने के लिए अच्छी जगह है। शाम का झुटपुटा, नदी के किनारे बिछी हुई बालू और ऊपर खिली हुई चांदनी रोमांस के लिए इससे बेहतर जगह और भला क्या हो सकती है? अज्ञेय की कविता में भारतीय परम्परा में व्यक्त प्रेम के रूप दिखाई देते हैं। राधा-कृष्ण का नदी के तट पर मिलन के चित्र भारतीय साहित्य में मिलेंगे। अज्ञेय की एक कविता का शीर्षक भी इसी परम्परा से प्रेरित है - ‘अकेली मत जैयो राधे जमुना के तीर’। इस कविता में कवि ने प्रेम से तन्मय क्षणों में मान-मनुहार की बातों, स्वाभाविक हरकतों और आपसी बातचीत का बड़ा ही खूबसूरत चित्र खींचा है - ‘‘केवल बातें? हम आ जाते अभी लौटकर छिन में-/मान कुछ, मनुहार कुछ, कुछ व्यंग्य वाणी में।/दामिनी की कोर-सी चमकी अंगुलियाँ शान्त पानी में।/नदि किनारे रेती पर कोई आता है दिन में?/कवि बने हो? युक्तियाँ है सभी थोथी-निरा शब्दों का विलास है।’’ (अज्ञेय ग्रंथावली, हिन्दी समय)

अज्ञेय की कविता में स्त्री-सौंदर्य के चित्र भी दिखाई देते हैं। अज्ञेय ने अपनी कविताओं में स्त्री की रूप-सौन्दर्य, देह-वल्ली, रूप-सज्जा आदि पर नये सिरे से विचार किया है। अपनी कविता ‘नख-शिख’ में स्त्री-देह के सौंदर्य का वर्णन अत्यंत नए उपमानों के प्रयोग द्वारा किया - ‘‘तुम्हारी देह/मुझ को कनक-चम्पे की कली है/दूर ही से स्मरण में भी गन्ध देती है।/(रूप स्पर्शातीत वह जिस की लुनाई/क्ुहासे-सी चेतना को मोह ले)/तुम्हारे नैन/पहले भोर की दो ओस-बूँदें हैं/अछूती, ज्योतिमय, भीतर द्रवित।/(मानो विधाता के हृदय में/जग गयी हो भाप करुणा की अपरिमित।)’’ (बावरा अहेरी, हिन्दी समय)

अज्ञेय की कविता में प्रेम के विविध रूप मिलते हैं। वासनायुक्त प्रेम भी उनकी कविता में व्यक्त हुआ है। ‘तार सप्तक’ की भूमिका में उन्होंने लिखा है - ‘‘आज मानव का मन यौन-परिकल्पनाओं से लदा हुआ है और वे कल्पनाएँ दमित एवं कुंठित हैं।’’ (तार सप्तक की भूमिका) इस वासनायुक्त प्रेम का एक उदाहरण उनकी ‘सावन मेघ’ कविता है - ‘‘आह मेरा श्वास है उत्तप्त-/धमनियों में उमड़ आयी है लहू की धार-/प्यार है अभिशप्त-/तुम कहाँ हो नारी?’’

प्रेम में सेक्स का अपना अलग महत्व है। इस तरह स्त्री से सेक्स की माँग के चित्र अज्ञेय की कविताओं में दिखाई देते हैं।  उनके कविताओं प्रणय के अनेक उदाहरण हमें दिखाई देते हैं। लेकिन इसका मतलब नहीं है कि उनके लिए प्रेम मात्र वासना-तृप्ति का साधन है। प्रेम को वासना तृप्ति का साधना मानने वालों को वे रोगी कहते हैं। कवि ने मांसल प्रेम को भी अभिव्यक्ति अपनी कविताओं में दी हैं। ‘तुम्हारी छातियों के बीच मेरा घर है’ आदि पंक्तियाँ इस तरह का उदाहरण है। अज्ञेय कविता में प्रेम के अनेक रंग दिखाई देते हैं। वे अपनी प्रेमिका को प्रेम देकर मुक्त करना चाहते हैं। वे प्रेम में होकर प्रेम से मुक्ति की कामना भी करते हैं। उनकी कविताओं में प्रेम के एक जैसे चित्र बार-बार नहीं आते हैं, उनमें समय के साथ बदलाव दिखाई देता है। अज्ञेय ने जेल में ज़्यादातर प्रेम की कविताएँ ही लिखी हैं। ये कविताएँ कहीं से भी अधकचरे प्यार की नहीं लगती हैं। विद्यानिवास मिश्र ने उनकी प्रेम कविताओं के बारे में कहा है - ‘‘जेल में लिखी कविताएँ अधिकतर प्यार की’’ उच्छल आवेगी प्यार की रचनाएँ हैं पर बड़ी गहरी, लगता नहीं है कि यह अधकचरे प्यार की कविताएँ हैं, एक सीझे हुए प्यार की कविताएँ लगती हैं। सीझ कर लिखने का भाव भाई के साथ निरंतर रहा।’’ (अज्ञेय : वन का छंद, विद्यानिवास मिश्र, संकलन एवं सं. गिरीश्वर मिश्र, गणेश शुक्ल, वाणी प्रकाशन)


डॉ. विनायक काले
सहायक प्रोफेसर, हिंदी विभागए तमिलनाडु केन्द्रीय विश्वविद्यालय
नीलक्कुड़ी परिसर,, तिरुवारूर, तमिलनाडु-610 005

संपर्क 08106643484,09585345093
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