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आधी दुनिया:महिला सुरक्षा और मानवाधिकार -सांवर मल

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, मार्च 26, 2017 | रविवार, मार्च 26, 2017

त्रैमासिक ई-पत्रिका
वर्ष-3,अंक-24,मार्च,2017
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आधी दुनिया:महिला सुरक्षा और मानवाधिकार -सांवर मल

चित्रांकन:पूनम राणा,पुणे 
आज एक बार फिर नारी सुरक्षा और उसके सम्मान को लेकर सम्पूर्ण देश चिंतित हैI आज फिर एक प्रश्न पुनः उभर कर हमारे सामने तांडव कर रहा है क्योंकि आज नारी सुरक्षा के सारे प्रबंध सवालो के घेरे में है I आज के युग में जीने वाले जहाँ मानवाधिकार के लिए काम करने वाली संस्थायें,महिला आयोग,संविधान द्वारा संरक्षण,नित नए कानून बनाकर,पुराने कानून में बदलाव लाकर जो नारी सुरक्षा की एक सुकून की बयार का माहौल उत्पन्न किया गया आज वह माहौल पुनः कलंकित हो रहा I आज पुनः नारी की सुरक्षा के तमाम प्रबंधो पर प्रश्न चिन्ह लग रहा है Iयह प्रश्न चिन्ह केवल उन हाई प्रोफाइल केस से ही नहीं जिन्हें हम दिल्ली बस कांड या गाज़ियाबाद के कैब कांड के रूप में याद करते Iयह प्रश्न वहां और भी ज्यादा खतरनाक है जहाँ इस प्रकार के महिला कानून व मानवाधिकार की समझ व शिक्षा प्रायः नहीं पहुँच पाती है Iदरअसल मैं बात कर रहा हूँ हमारे देश की उस 70% जनसँख्या की जो गाँवो में निवास करती है I 30%जनसँख्या जो शहरों में निवास करती है,अपनी सुरक्षा से सम्बंधित कानून व मानवाधिकारों के बारे में जागरूक है लेकिन फिर भी वहां निर्भया,दामिनी,दीप्ति जैसे केस संकट पैदा कर रहे है तो वहां के हालात और परिणाम तो और भी खतरनाक होंगे जहाँ की महिलायें इस प्रकार के कानूनों की शिक्षा व जानकारी  से वंचित हैI
                                
जहाँ तक देश में महिलाओ की सुरक्षा का सवाल है तो कानून तो है लेकिन उन्हें दरकिनार कर अपराध हो रहे हैI 2009 में CBI के अनुमान के मुताबिक 30लाख लडकियों की तस्करी की गई,जिनमे से 90%को देह व्यापार के धंधे में धकेल दिया गयाI NATIONAL CRIME BUREO की एक रिपोर्ट के अनुसार 1971 से 2012 तक दुष्कर्म के मामलों में 880% की बढ़ोतरी दर्ज़ की गई तो गत 3 वर्षो में कन्या भ्रूण हत्या के 1.2 करोड़ मामले दर्ज किये I

 एक अनुमान के मुताबिक ग्रामीण इलाको की 56% महिलायें सुरक्षा कारणों से उच्च शिक्षा में नहीं जा पाती है I हर साल 9000 महिलायें दहेज़ के लिए प्रताड़ित मामलों में काल कलवित हो जाती हैIइन स्तिथियों को थोडा और विस्तार से देखें तो EMNESTY INTERNATIONAL(विश्व भर में मानवाधिकारों पर काम करने वाली एक गैर सरकारी संस्था) की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में हर 15 सेकंड पर एक महिला दुष्कर्म से प्रताड़ित होती हैI हर साल लगभग 7 लाख स्त्रियाँ दुष्कर्म का दंश झेलती हैIरिपोर्ट में सबसे दुखद पहलू यह है की लगभग 40% भारतीय महिलायें पति के द्वारा कठोर वंचना का शिकार होती है या अन्य किसी प्रकार की प्रताड़ना का शिकार होती हैIयह स्थिति तब और भी ज्यादा गंभीर हो जाती है जब ऐसे मामलो में 50 में से एक प्रकरण पुलिस से सुरक्षा की गुहार लगाता है या पारिवारिक मामलों के न्यालाययों में दर्ज हो पता हैI

दरअसल ये सभी घटनाक्रम आज के समाज में उत्पन्न उस दूषित सोच का परिणाम है,जिसे आप और हम जो सभ्य कहलाने में बड़ा फख्र का अनुभव करते है लेकिन मौके बेमौके समाज को पुरुष प्रधान मानने के हिमायती भी है, जिस सोच को हम सीधे मुँह स्वीकारते भी नहीं हैIनारी स्वतंत्रता की वकालात करने वालो की सोच में व्यापकता तो नज़र आती है लेकिन धरातल पर वे उस काम को अंजाम नहीं दे पाते है I वे केवल वाद विवाद ,तर्क वितर्क या बहस में नारी को मनचाहे कपडे पहनने की आज़ादी या धरती को परशुराम की तरह पुरुषविहीन कर देने के नारों से आगे नहीं बढ़ पाती हैI                          


आज महिला सुरक्षा के जिन पहलुओ पर कानूनी संरक्षण, संवैधानिक संरक्षण विभिन्न संस्थाओं द्वारा जागरूकता कार्यक्रम आदि सब हो रहा है,बावजूद इसके सभी को दरकिनार करते हुए अपराध कम नहीं बल्कि ज्यादा हो रहे है Iयह स्थिति हमारे कार्यों,हमारी सोच पर कुठाराघात  है की आखिर क्यों ?इतना प्रयास पर नतीजा शून्यI
मत्वपूर्ण मुद्दा यह है की आज हम स्त्री सम्मान व उसकी गरिमा के लिए झंडे बैनर उठाये सड़क पर तो उतर आते है पर वह सभ्य कहलाने वाला समाज अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ता नज़र आता है और वहां हम केवल और केवल सरकार को ही कोसते नज़र आते है Iपरन्तु गौर करने वाली बात यह है की इस प्रकार के मुद्दों पर दायित्व केवल सरकार का ही नहीं बल्कि हमारा भी है की हमने समाज को क्या दिया ?क्योंकिं अक्सर ऐसे मुद्दों पर भाषण तो बहुत अच्छे देते है लेकिन खुद अपनी सोच की गारंटी नहीं ले पाते है I वास्तविकता तो यह है की समाज को सर्वप्रथम मनोचिकित्सा की सर्वाधिक आवश्यकता है I

दूसरी तरफ हम देखते है की संवैधानिक उपबंधो,कानूनों,महिला सुरक्षा को संरक्षण देने वाले कानूनों की असल पहुँच बहुत कम हैIशहरी माहौल में लोग जागरूक है ,लेकिन वह तो भारत की कुल आबादी की 30% जनसँख्या ही है 70% तो ग्रामीण क्षेत्र की है जहाँ इन कानूनों की पहुँच की जरुरत है ,असल जागरूकता की जरुरत है ,जिन्हें हम पूर्ण कर पाने में या साथ ले पाने पूर्णतया असमर्थ हैI इसका परिणाम यह है की सरकारी और गैर सरकारी एजेंसियों की रिपोर्ट में महिला अपराधो का बढ़ता ग्राफ हमारे हौंसले और प्रयासों पर पानी फेर देता है I इस बात पर गंभीर मंथन होना चाहिये की आज समाज के बहुत बड़े तबके को जागरूकता की मुख्य धारा में किस प्रकार लाया जाये ?नारी सुरक्षा पर हमें आत्मावलोकन करना होगा ,आत्मचिंतन करना होगा,निरंतर प्रयास करने होंगे,हमरी व्यवस्थाओ का पुनर्मूल्यांकन करना होगा ,केवल तख्ती और मोमबत्ती से हमारा काम नहीं चलने वाला नहीं हैIआज कानून के रखवालों की व्यवस्था भी मजबूत करने की आवश्यकता है उन्हें केवल हाई प्रोफाइल केस का संधान कर ही राहत की साँस नहीं लेनी चाहिए Iऐसे मुद्दों पर कानून की पहुँच पहले से बेहतर करने की आवश्यकता है तथा कानून की जागरूकता की पहुँच अंतिम छोर पर बैठी महिला तक बनाने की आवश्यकता है , ऐसा नहीं है कि महिला सुरक्षा का मुद्दा केवल मैट्रो शहर तक ही सीमित हैI


थियोडोर मेनन के नज़रिए से –“मानवाधिकार की जागरूकता व ज्ञान की जरुरत शांति व युद्ध दोनों स्थितियों में महत्वपूर्ण है I”मानवाधिकार की शिक्षा व्यक्ति व समाज की अभिवृति को सकारात्मक दिशा में परिवर्तित कर एक वैश्विक समाज की संस्कृति का निर्माण किया जा रहा है Iमानवाधिकार शिक्षा के उद्देश्य विद्यार्थी को जागरूक करने ,उन्हें उनके मानवाधिकारों से परिचित कराने में सुरक्षा प्रदान करने में तथा जहाँ कही भी मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है वहां पर उनके अधिकारों का बचाव हो सके तथा वे इस असीम संसार में अपने सपनो की उड़न ख़ुशी से भर सकेIआज मनावाधिकारों का संरक्षण विश्व के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती हैIसम्पूर्ण मानव जाती,आतंकवाद,अत्याचार,शोषण,उत्पीड़न से पीड़ित मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए मेग्नाकार्ता,बिल ऑफ़ राइट्स एवं मानवाधिकार का घोषणा पत्र जारी किये गये Iइसके बावजूद भी दुर्भाग्य की बात है की आमजन के लिए मानवाधिकार आज भी मृगमरीचिका बने हुए है Iआज सम्मानपूर्वक जीवनयापन की समस्या सम्पूर्ण मानवजाति के लिए एक बहुत ही जटिल समस्या बनी हुई है Iकदम कदम पर तिरस्कृत,उत्पीडित एवं असुरक्षित है Iदुर्भाग्य की बात है की मानव जाति पर जितने कहर इन दिनों ढाये जा रहे है उतने शायद पहले कभी सुनने को नहीं मिले Iइनमे नारी तो आज सबसे ज्यादा पीड़ित है Iनारी अत्याचार आज द्रोपदी के चीर की तरह बढ़ रहा है Iतंदूर में जलती नारी देह उत्पीडन का ज्वलंत उदाहरण है Iप्रतिदिन नारी अपहरण,व्यपहरण,दहेज़-उत्पीडन,और दुष्कर्म की आग में झुलस रही है Iनारी की रक्षा का भार ढोने वाली पुलिस स्वयं नारी को उत्पीडित कर रही है Iजयपुर का गुर्दा प्रत्यारोपण कांड मानवाधिकारों पर प्रशन चिन्ह लगा गया Iउपभोक्ता को बाजार में छला जा रहा हैIनडियाद(गुजरात) के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट तथा भागलपुर(बिहार)के अपर जिला एवं सेशन न्यायाधीश के साथ पुलिस का तथाकथित अभद्र व्यवहार न्यायपालिका की स्वतंत्रता एवं गरिमा पर आघात है I

इन सभी प्रश्नों का उत्तर है-“मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम-1993”इस अधिनियम से मानवाधिकार जगत में आशा की एक नई किरण का संचार हुआ है Iअधिनियम की धारा 2 में “मानव अधिकार” की परिभाषा दी गई है Iइसमें अंतर्राष्ट्रीय अभिसमयों में समाहित एवं भारतीय संविधान द्वारा प्रत्याभूत जीवन स्वतंत्रता,समानता और व्यैक्तिक गरिमा से संबद्ध अधिकारों को सम्मिलित किया गया है Iइसका मूल लक्ष्य मानव जीवन और उसकी गरिमा को सुरक्षा प्रदान करना है Iसंविधान के अनुच्छेद 21 में प्राण व दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है Iवर्तमान परिवेश में यह स्वतंत्रता इतनी व्यापक मानी जाने लगी है कि इसका अर्थ केवल “जीने के अधिकार”तक ही सिमित नहीं रहकर “सम्मानपूर्वक जीने के अधिकार”तक विस्तृत हो गया है Iअब इसमें शिक्षा,चिकित्सा,निशुल्क विधिक सहायता,त्वरित विचरण,पर्यावरण संरक्षण जैसे विषय भी समाहित हो गये हैI
मानवाधिकारों में सम्मिलित है –

  • 14 वर्ष से कम आयुवर्ग के बच्चों को निशुल्क शिक्षा का अधिकार (उन्नीकृष्णन बनाम स्टेट ऑफ़ आंध्र प्रदेश ,1993 ए.सी.सी.645)
  • शिक्षा का अधिकार,(पीचेरिकिया बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया ए.आई.आर.1994-केरल 27)
  • कामकाजी महिलाओं का यौन उत्पीडन से संरक्षण,(श्रीमती विशाखा बनाम स्टेट ऑफ़ राजस्थान,ए.आई.आर.1997ए.सी.3011)
  • पीने के लिए पानी प्राप्त करने का अधिकार (पुटप्पा होनप्पा तलवार बनाम डिप्टी कमिश्नर धारवाड़,ए.आई.आर.1998 कर्णाटक 10)
  • ऐसे और भी कई निर्णय है जिनमे मूल अधिकार और मानवाधिकार को संरक्षण प्रदान किया गया है 
  • मानवाधिकार शिक्षा के प्रयास

मानवाधिकार शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए अनेक तरीके है  जैसे –ORIENTATION COURESES,REFRESHER COURSES,SHORT TERM TRAINING PROGRAMME जो की ACADAMIC विद्यार्थियों के लिए ,पुलिसकर्मियों के लिए और अन्य सरकारी कार्यालयों में कर्मचारियों के लिए ,जैसा की इंदिरा गाँधी मुक्त विश्वविद्यालय ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सहयोग से तथा कनाडाई मानवाधिकार आयोग ने 20 से अधिक विद्यालयों,महाविद्यालयों के अध्यापकों को सफलतापूर्वक प्रशिक्षण प्रदान किया हैI

               आज विभिन्न विश्वविद्यालय ने मानवाधिकार शिक्षा को बढ़ावा देने में अहम योगदान दिया है Iवास्तव में विश्व विद्यालय अनुदान आयोग ने विशेष प्रस्ताव के साथ विश्वविद्यालयों को इस प्रकार की शिक्षा देने को प्रोत्साहित किया है इस प्रकार अनेक विश्वविद्यालयों में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने मानवाधिकार शिक्षा में डिग्री व डिप्लोमा पाठ्यक्रम शुरू किये हैIइसके सामान ही राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी रूचि जाहिर करते हुए नारीवादी न्यायशास्त्र पर पर डिग्री व डिप्लोमा पाठ्यक्रम का निर्माण कर रहा है I इन सबके आलावा चंडीगढ़ में अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों जैसे  HUMAN RIGHT UNIT (HRU),COMMONWEALTH SECRETARIAT-LONDON(UK) आदि संस्थाओ से मानवाधिकार शिक्षा के लिए वचनबद्ध हुए है 

                             इन सभी कार्यों के अलावा यदि हम सभी धरातल पर कार्य करना चाहते है तो हमें किसी भी संगठन या संस्था के साथ हीं आज भी हमारी महती आवश्यकता है की हम सभी बुजुर्गो के साथ बैठकर उनके अनुभवों का फायदा लेना चाहिए I इन सब के लिए हमें समय समय पर विभिन्न कार्यशालाओं,संगोष्ठियों का आयोजन किया जाना चाहिए जिस से नए विचार उत्पन्न हो सके Iयह कार्य मानवाधिकार के क्षेत्र में कार्य करने वाले NGO व विभिन्न संस्थायें या किसी अन्य प्रकार की संस्थाएं कर सकती है I

केवल शहरी नागरिक ही अपने मानवाधिकार के प्रति जागरूक व शिक्षित है जो मांग कर सकते है की सरकार उनके मानवाधिकार का अवलोकन करेंI मानवाधिकारों की जानकारी के लिए अवलोकन एक जरुरी उपकरण है तथा मनावाधिकारों को बढ़ावा दें और आमजन के विचारो में परिवर्तन लाये की मनावाधिकारों का उल्लंघन अस्वीकार्य है I समाज में शांति और प्रगति तभी हो सकती है जब प्रत्येक को अपने अधिकारों का पता हो तथा राज्य व सरकार मानवाधिकारों की सुरक्षा की गारंटी प्रदान करते हो I मानवाधिकारों के सिद्दांतों का मात्र अभिकथन ही जो की संविधान व अनेक कानूनों के माध्यम से कहा गया है,पर्याप्त नहीं है Iलोकतंत्र में लोकतान्त्रिक गरिमा जिसका निर्माण व कार्य मनावाधिकारो की गारंटी से ही संभव है I आज के समाज में मानवाधिकारों के ज्ञान व उनकी सुरक्षा की महती आवश्यकता हैI


नारी समाज का अभिन्न हिस्सा है Iअतीत से ही नारी का समाज में सर्वोपरी स्थान रहा है Iसमाज और कानून में नारी को पर्याप्त संरक्षण मिलने लगा है Iप्रत्येक क्षेत्र में नारी पुरुष के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ने लगी है Iयहाँ तक सत्ता में भी उसकी भागीदारी सुनिश्चित हुई है Iसंविधान के अनुच्छेद 243घ में पंचायतीराज संस्थाओं में महिलाओं के 1/3 स्थान आरक्षित किये गये है अब तो विधान सभाओ और संसद में भी 1/3 स्थान आरक्षित करने की मांग की जाने लगी है I यहाँ यह कहना उचित होगा की जब से मानवाधिकार संरक्षण कानून बना है और राष्ट्रीय महिला आयोग का गठन हुआ है ,नारी की स्थिति समाज में और अधिक सुदृढ़ होने लगी है लेकिन अभी तक पर्याप्त नहीं है Iहमरी न्यायिक व्यवस्था ने भी नारी विषयक मानवाधिकारों की समुचित व्यवस्था की है I

                      मैं यहाँ स्टेट ऑफ़ पंजाब बनाम गुरमीत सिंह (ए.आई.आर.1996 एस.सी.1393) के मामले का उल्लेख करना चाहूँगा जिसमे उच्चतम न्यायालय द्वारा यह राय व्यक्त की गई कि बलात्संग जैसे मामलों की सुनवाई यथासंभव महिला न्यायाधीश द्वारा ही की जायेIइसी सन्दर्भ में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिया गया एक और क्रांतिकारी निर्णय अवलोकन योग्य है “बुद्धिसत्व गौतम बनाम कुमारी शुभा चक्रवती”(ए.आई.आर.1996एस.सी.922)के मामले में एक शिक्षक द्वारा अपनी शिष्या का यौन शोषण किया गया था Iउच्चतम न्यायलय ने इसे गंभीरता से लिया और मामले के विचारकाल तक उत्पीडित महिला को 1000/-रूपये प्रति माह प्रतिकार के रूप में दिए जाने का आदेश दिया I

                       हम यह जानते है कि इन दिनों महिला कर्मक्षेत्र में भी आगे आई है Iवे विभिन्न सेवाओं में कदम रखने लगी है कामकाजी महिलाओं का प्रतिशत बढ़ने लगा है iलेकिन जब कामकाजी महिलाओं के साथ यौन उत्पीडन की घटनाएँ होने लगी तो न्यायपालिका ने उसमे हस्तक्षेप कर यौन उत्पीडिन की घटनाओं पर अंकुश लगाना अपना दायित्व समझा I

                      “विशाखा बनाम स्टेट ऑफ़ राजस्थान (ए.आई.आर.1997एस.सी.3011)का इस सम्बन्ध में एक मत्वपूर्ण मामला है Iइस मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा कामकाजी महिलाओ के साथ यौन उत्पिदीन की घटनाओ की रोकथाम के लिए कतिपय दिशा निर्देश जरी किये थे ,जैसे-

(1)कामकाजी महिलाओं के यौन उत्पीडन सम्बन्धी परिवादों की सुनवाई के लिए शिकायत समितियों का गठन किया     जाये I 
(2)ऐसी सिमितियों का अध्यक्ष महिलाओं को ही बनाया जाये तथा समिति के न्यूनतम आधे सदस्यों के पदों पर महिलाओं को नियुक्त किया जाये I
(3)यौन उत्पीडन निवारण विषयक साहित्य तैयार किया जाये तथा इसका अधिक से अधिक प्रचार प्रसार किया जाये I
(4) जहाँ कामकाजी महिलाये है वहां के नियोक्ता व अन्य जिम्मेदारी अधिकारीयों का कर्तव्य होगा की वो कामकाजी महिलाओ के यौन शोषण का निवारण करें, उन्हें रोकने के उपाय करें तथा दोषी व्यक्तियों के विरुद्ध अभियोजन चलाने की कार्यवाही करे I
(5)केंद्र एवं राज्य सरकारकामकाजी महिलाओं के यौन उत्पीडन की घटनाओं की रोकथाम के लिए समुचित विधियाँ बनायेंI

                             इस मामले में उच्चतम न्यायालयद्वारा यौन उत्पीडन की परिभाषा भी की गई है Iयौन उत्पीडन में निम्नांकित कृत्यों को सम्मिलित किया गया है –

(क)शारीरिक सम्पर्क या ऐसे सम्पर्क का प्रयास 
(ख)यौन सम्पर्क का प्रस्ताव या अनुरोध
(ग)अश्लील टिप्पणियाँ या ऐसे कोई अश्लील संकेत
(घ)कामोत्तेजक चित्रों का प्रदर्शन
(ड)अन्य अशोभनीय या अश्लील आचरण

                           भारतीय दंड संहिता 1860 में भी महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के लिए कठोर दंड की व्यवस्थाएं की गई है Iधारा 354 में लज्जाभंग,धारा 366 में अपहरण,धारा 376 में बलात्संग,धारा 498क में निर्दयता पूर्वक व्यवहार तथा धारा 509 व 510 में स्त्री का अपमान करने को दंडनीय घोषित किया गया हैI   महिलाओं के सिविल और संवैधानिक अधिकारों की बात करें तो संविधान का अनुच्छेद 15 में यह प्रावधान किया गया है की धर्म, मूलवंश,जाति,लिंग,या जन्म स्थान के आधार पर किसी नागरिक के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता है Iअनुच्छेद 16 लोक नियोजन में महिलाओं को भी सामान अवसर प्रदान करता है Iसामान कार्य के लिए सामान वेतन की भी व्यवस्था की गई है I

                           हिन्दू उतराधिकार अधिनियम,1956 की धारा 14 में स्त्रियों को सम्पति में मालिकाना हक़ प्रदान करती है Iश्रम कानून महिलाओं के संकटापन्न संयंत्रों तथा रात्रि में कार्य का निषेध करते है Iमातृत्व लाभ अधिनियम कामकाजी महिलाओं को प्रसूति लाभ की सुविधाएँ प्रदान करता है Iदंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 125 में उपेक्षित महिलाओं के लिए भरण पोषण का प्रावधान हैIइस प्रकार कुल मिलाकर नारी विषयक मानवाधिकारों को विभिन्न विधियों एवं न्यायिक निर्णयों में पर्याप्त संरक्षण प्रदान किया गया है Iबदलते परिवेश में विभिन्न संविधान संशोधन के द्वारा या कानूनों में बदलाव करे के या फिर नए कानूनों का सृजन करके महिला सुरक्षा और मानवाधिकार के प्रयास किये जा रहे है I 

                         बलात्कार जैसी घटनाओं में महिला अपने साथ हुए अपराध की शियाकत पुलिसे थाने में कर सकती है Iयदि वह शिकायत दर्ज करने की स्थिति में नहीं है तो उसके सगे सम्बन्धी शिकायत दर्ज करवा सकते है Iजिस महिला के साथ दुराचरण हुआ है उस महिला की पहचान गुप्त रखी जाएगी Iऐसे मामलो की सुनवाई बंद कमरे में होती है Iपीड़ित महिला को भी ध्यान रखना चाहिए की यदि वह दुराचरण की शिकार हुई है उसे डॉक्टरी जाँच होने तक संभव हो सके तो ना तो नहाना चाहिए और ना ही घटना के वक़्त पहने कपडे धोने चाहिए Iसुप्रीम कोर्ट द्वारा दुराचरण और अन्य यौनिक हिंसाओ के मामले में समय समय पर कुछ दिशा निर्देश जरी किये जाते है , जैसे-उच्चतम न्यायलय ने पंजाब राज्य व गुरमीत सिंह और अन्य 1996 और साक्षी बनाम भारत सरकार2004केस में महिलाओं ,खास कर छोटी लडकियों के साथ होने वाले दुराचरण और अन्य यौनिक हिंसाओं के मामले में दिए गये कुछ मत्वपूर्ण दिशा निर्देश-

(1)पुरुष द्वारा महिला के साथ किये गये बलात्कार के कारन महिला की गोपनीयता और आत्म सम्मान के साथ साथ ,उसके मानसिक,शारीरिक स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है Iइसलिए अदालत को बलात्कार के मामलों को अति संवेदनशीलता के साथ देखना चाहियेI
(2)यदि महिला यौन व्यवहार की आदि भी है तो उसे अदालत द्वारा बुरे चरित्र की महिला नहीं कहा जायेगा Iउस महिला को भी अधिकार है की वह पुरुष को अपने साथ यौन सम्बन्ध बनाने के लिए मना कर सके I
(3)प्रति परीक्षा के दौरान अदालत को यह ध्यान रखना होगा की दूसरे पक्ष द्वारा पूछे गये सवाल महिला को अपमानित न करें I
(4)महिला के बलात्कार व अन्य यौन हिंसा में उसके आत्मसम्मान और गोपनीयता को ध्यान में रखते हुए मुकदमा बंद कमरे में ही चलेगा I इसमें आम जनता को अदालत में जाने की अनुमति नहीं है i
(5)जहाँ तक संभव हो अदालत को अपमे आदेश में महिला का नाम नहीं बताना होगा I
(6)बच्चों के साथ हुई यौनिक हिन्सा व बलात्कार के केसों की सुनवाई के दौरान स्क्रीन या अन्य कोई इंतजाम किया जायेगा, जिसमें कि पीड़ित या गवाह अपराधी का चेहरा या शरीर न देख सके I
(7)अपराधी की ओर से पूछे जाने वाले प्रति-परीक्षा के प्रश्न वारदात से ही सम्बंधित होने चाहिए Iयह प्रश्न बच्ची से प्रत्यक्ष रूप में नहीं पूछे जायेंगे Iयह सवाल कोर्ट में लिखित रूप में पीठासीन अधिकारी के द्वारा बच्ची और गवाहों से सरल भाषा में ही पूछे जायेंगे I

स्त्री की लज्जा भंग से आशय उसे कोई ऐसे शब्द कहना या कोई अंग विक्षेप करने से है जिसमे एक वर्ष का सादा कारावास या जुर्माने से दंडनीय है Iअक्सर सुनने में आता है कि कुछ लोग बच्चो और महिलाओं को नौकरी या कोई अन्य लालच देकर भगा कर ले जाते है ,फिर उनसे वैश्यावृति करवाते है Iयह अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम,1956 के तहत कानूनी अपराध है Iजिसमे निम्न प्रकार दंड का प्रावधान है.......

(1)किसी भी व्यक्ति को वैश्यावृति के उद्देश्य से भगा ले जाने पर अपराधी को 3 से 7 साल की सज़ा व 2000 रुपये तक का जुर्माना हो सकता है I
(2)किसी बच्चे की उम्र 16 साल से कम है,अगर वैश्यावृति के लिए भगाया जाता है या बेचा जाता है तो अपराधी को 7 साल या उम्रकैद की सजा हो सकती है I 

                         सारांश रूप में हम यह कह सकते है की संविधान में व अन्य कानूनों के माध्यम से महिला सुरक्षा व मानवाधिकार का संरक्षण तो किया गया लेकिन यदि उसकी जानकारी प्रत्येक तक होगी ही नहीं तो वह केवल और केवल उन पन्नो को ही सुशोभित करती नज़र आती है जिन पन्नो में इनको लिखा गया हैI आज आप और मेरे जैसे युवाओं को आगे आने की आवश्यकता है की वे भी इस पुनीत कार्य में अपना सहयोग दे Iयहाँ गौर करने वाली बात यह है की साथियों जब भी कोई लड़की किसी दुराचरण का शिकार होती है तो हम सभी जरुर जुलूस निकालेंगे,नारे भी लगायेंगे,बहरी सरकार तक अपनी आवाज़ पहुँचाने के लिए हर प्रकार से प्रयास करेंगेIठीक इसी प्रकार के प्रयास हमें कानूनी साक्षरता,मानवाधिकारों की जानकारी उस सुदूर रहने वाली महिला तक भी पहुंचानी होगी I ये ज्ञान का दीप जलाना होगा,अंधकारो को हटाकर नया सवेरा लाना होगा और यह सब संभव है आप सभी के सहयोग सेI सरकार,मानवाधिकार आयोग,महिला सुरक्षा आयोग के साथ-साथ अन्य संस्थाओ को भी इस कार्य के लिए आगे आना होगाI सभी को केवल सोच के सहारे ही काम नहीं करना है उस सोच को धरातल पर लाना होगा तब कही जाकर वो सुकून की बयार बहने लगेगी जिसकी कल्पना एक बच्ची अपनी माँ की कोख में करती है Iयदि हम आज भी इसमें फिर से असफल होते है तो अंजाम सर्वविदित है I    

सन्दर्भ ग्रन्थ-
(1)मानवाधिकार एवं अंतर्राष्ट्रीय विधि,डॉ.टी.पी.त्रिपाठी (इलाहबाद लॉ एजेंसी पब्लिकेशन)
(2)RECENT THOUGHT (THE REFERRED INTERNATIONAL JOURNAL-    JANUARY-2013,YEAR:1,VOL. 3(1)
(3)विद्यार्थियों के लिए कानूनी अधिकार एवं जानकारियां,राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण-जयपुर
(4) मानवाधिकार,जिला विधिक सेवा प्राधिकरण,चित्तौडगढ़(शिवानी जौहरी भटनागर अति.मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट,संख्या-1, संजय कुमार भटनागर,अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट संख्या-2
(5) http://nhrc.nic.in/ 
(6)  http://ncw.nic.in/ 

सांवर मल
पीएचडी रिसर्च स्कॉलर
शिक्षा विभाग,मोहन लाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय,उदयपुर
सम्पर्क:sanwarchoudhary52@gmail.com,9887268511
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