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आलेखमाला :रामचन्द्र शुक्ल का साहित्येतिहास लेखन – बर्नाली नाथ

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, मार्च 26, 2017 | रविवार, मार्च 26, 2017

त्रैमासिक ई-पत्रिका
वर्ष-3,अंक-24,मार्च,2017
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आलेखमाला :रामचन्द्र शुक्ल का साहित्येतिहास लेखन – बर्नाली नाथ

     
चित्रांकन:पूनम राणा,पुणे 
साहित्येतिहास वह साहित्यिक विधा है जो हमें मानवता के क्रमिक विकास से परिचित कराती है तथा यह ज्ञान की वह शाखा है जिसमें युग चेतना और साहित्य चेतना का अनिवार्य योग होता है। इतिहास नामों की तालिका-मात्र नहीं है। वह घटनाओं और तिथियों की भी सूची मात्र नहीं है और साहित्यिक इतिहास भी लेखकों की इसी तिथिमूलक तालिका नहीं है, जिसमें उनकी कृतियों का सिर्फ विवरण और सारांश मात्र रहे। इन्ही आधारों पर साहित्य तथा समाज की निरंतर विकासशीलता को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी ने व्यवस्थित ढंग से अपने साहित्य इतिहास ग्रन्थ के द्वारा हमारे सामने रखा है। 

   आचार्य रामचन्द्र शुक्ल प्रमुख आलोचक, निबंधकार, समीक्षक और इतिहासकार हैं । उन्होंने हिन्दी साहित्य के इतिहास को सर्वप्रथम हिन्दी शब्द सागर की विशद भूमिका के रूप में प्रस्तुत किया तथा इसके पश्चात शब्दसागर में लिखित ‘हिन्दी साहित्य का विकास’ को परिवार्तित तथा परिमार्जित कर सन् 1929 ई. में उन्होंने ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ नाम से प्रकाशित करवाया। यह पुस्तक हिन्दी साहित्य जगत के लिए वह बीज बिंदु है जिसे छोड़कर हम हिन्दी जगत में पदार्पण नहीं कर सकते हैं। शुक्ल जी 19 वीं शताब्दी के मध्य से आरम्भ होने वाली भारतीय नवजागरण के प्रतिनिधि चिन्तक हैं और प्रगतिशील चेतना के अग्रगामी विचारक भी हैं। मैनेजर पाण्डेय ने कहा है कि – ‘उनकी (शुक्ल जी) इतिहास दृष्टि के निर्माण में राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन की चेतना भी मौजूद है। इस चेतना के कारण ही वे साहित्य और समाज के विकास के बीच सम्बन्ध की खोज करते हैं और समाज, भाषा और साहित्य के इतिहास में जनता की महत्वपूर्ण भूमिका की पहचान करते हैं ।’ साहित्यिक इतिहास का उनका विभावन इन पंक्तियों में देखने को मिलते हैं – “ जबकि प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिम्ब होता है...इस दृष्टि से हिन्दी साहित्य का विवेचन करने में यह बात ध्यान में रखनी होगी कि किसी विशेष समय में लोगों में रूचिविशेष का संचार और पोषण किधर से और किस प्रकार हुआ...”। संभवतः यहाँ वह जो कह रहे हैं कि समयानुसार लोगों में रुचिविशेष का संचार और पोषण किधर से किस प्रकार हुआ यही उनके अनुसार संचित प्रतिबिम्ब है। उक्त कथन के द्वारा यह भी प्रमाणित हो जाता है कि जनवादी आधार ही शुक्ल की इतिहास-दृष्टि का पहला उल्लेखनीय बिंदु है । यद्दपि उन्होंने अपने इतिहास के प्रारम्भ में दिए गए वक्तव्य में ‘जनता’ की जगह ‘शिक्षित जनता’ शब्द का प्रयोग किया था। यह शिक्षित जनता क्या है इस पर सवाल बना हुआ है। डॉ शिवकुमार मिश्र इस पर लिखते हैं कि – ‘शुक्ल के काल विभाग में आने वाले ‘जनता’ शब्द और प्रारम्भिक वक्तव्य के ‘शिक्षित जनता’ शब्द को लेकर यह नहीं कहा जा सकता कि जनता के बारे में शुक्ल जी का दृष्टीकोण अंतर्विरोधी या अस्पष्ट है। शुक्ल जी का इतिहास जिन साहित्यिक रचनाओं का इतिहास है, वे शिष्ट साहित्य के अंतर्गत आने वाली रचनाएँ हैं। शिष्ट और लोक साहित्य का भेद ही शिक्षित और अशिक्षित जनता को आधार मानकर किया गया है । आचार्य शुक्ल साहित्य की मूलवर्ती भावराशि का सम्बन्ध सामान्य जनता की चित्तवृत्ति की संचित प्रतिबिम्ब से ही मानते हैं, अर्थात वे यह मानते हैं कि साहित्य में जहाँ तक रचना और उसके सम्यक आस्वाद का प्रश्न है, उसका सम्बन्ध शिक्षित जनता तथा सुसंस्कृत मानस से ही होता है। यह सुशिक्षित तथा सुसंस्कृत मानस कोई ऐसी अवधारणा नहीं है, जिसके आधार पर उनकी इतिहास-दृष्टि के मूलवर्ती जनवादी आधार को खंडित किया जा सके...।’ हाँ लेकिन यहाँ लोक साहित्य और शिष्ट साहित्य का भेद बताना भी सही नहीं है। खैर जो हो शुक्ल जी साहित्य, जनता तथा समाज के सम्बन्ध को भलीभाँति जानते हैं और उन्होंने अपने पहले वक्तव्य को संशोधित कर ‘जनता’ शब्द के साथ हमारे सामने अपने साहित्य इतिहास ग्रन्थ को रखा है। 

उन्होंने 900 वर्षों के इतिहास को चार कालों में विभक्त किया है और इसमें से आदिकाल को लेकर उनकी मान्यताएँ काफी विवादास्पद हैं और इससे हम सभी वाकिफ हैं। कैसे उन्होंने अपभ्रंश और देशभाषा की 12 पुस्तकों के आधार पर ही एक काल का नाम और प्रवृत्ति को निर्धारित कर दिया था। अपभ्रंश साहित्य पर वह यह भी कहते हैं कि इनमें से कई पुस्तके जैनों के धर्म-तत्व-निरूपण संबंधी हैं जो कि साहित्य की कोटि में नहीं आती और उनका उल्लेख केवल अपभ्रंश का व्यवहार कब से हो रहा था यह दिखाने के लिए किया गया है। अब यहाँ सवाल ‘धर्म-तत्व-निरूपण’ पर उठता है। क्या वाकई उसमें धर्म-तत्व ही दिया हुआ है जो सिर्फ यही कहकर नकार देना कि धर्म-तत्व-निरूपण संबंधी है इसलिए साहित्य की कोटि में नहीं आ सकता है, जबकि उस काल में सिद्ध तथा जैन साहित्य का प्रणयन प्रचुर मात्रा में हुआ था। धर्म का मोहर लगा देने से ही वह साहित्य के बाहर चला नहीं जाता है और एक प्रकार से देखा जाए तो भारतीय साहित्य की अवधारणा में मिथक ही जुड़ी हुई है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने शुक्ल जी की इस अवधारणा का खंडन किया है और इससे भी हम सभी अवगत हैं ही । जैसे कि द्विवेदी जी ने कहा है कि उन 12 पुस्तकों में से कोई सिर्फ नोटिस मात्र है और कोई का निश्चित मूलरूप ही प्राप्त नहीं है, ऐसे में यही कहा जाएगा कि जो अपभ्रंश के प्राप्त साहित्य हैं उसे धर्म तत्व का नाम देकर साहित्य की कोटि से नकारना और जो नोटिस मात्र हैं उसे साहित्य के अंतर्गत स्वीकारना असंगत है तथा विरोधाभासी है ।  

आचार्य शुक्ल की साहित्येतिहास लेखन में उनकी इतिहास दृष्टि और आलोचना के निर्माण के पीछे भक्तिकाल के साहित्य की महत्वपूर्ण भूमिका है और यही उनकी आलोचना और इतिहास का केन्द्रीय विषय है। शुक्ल जी के भक्ति के उदय संबंधी मान्यता भी विवादास्पद है। उनका मानना था कि भक्ति काल इस्लाम के आक्रमण की प्रतिक्रया का फलस्वरूप है। उनका कथन है कि “अपने पौरुष से हताश जाति के लिए भगवान की शक्ति और करुणा की ओर ध्यान ले जाने के अतिरिक्त दूसरा मार्ग ही क्या था?” उनका मानना था कि मुसलमान शासक अत्यंत आक्रमक थे और उन आक्रान्ताओं ने तेजी से इस्लाम का प्रचार आरम्भ कर दिया था और उस समय दक्षिण में भक्ति की लहर चल रही थी और अनुकूल परिस्थिति पाकर वह उत्तर भारत में भी विकसित होने लगी। अगर ऐसा ही है तो मुसलमान सबसे पहले उत्तर भारत में प्रवेश किये थे ऐसे में वहीं भक्ति को सबसे पहले उमड़ना चाहिए था पर उमड़ा वह दक्षिण से और एक अन्तर्विरोध यह है कि अगर वह मुसलमान आक्रान्ताओं के इतने ही बात करते हैं तो सूफी कवि जायसी उनके इतने प्रिय कैसे हो सकते हैं? क्योंकि जायसी, ‘पद्मावती हिन्दू ह्रदय के मर्म’ को स्पर्श कर पाते हैं, क्या इसीलिए? भक्तिकाल के अंतर्गत उनके द्वारा लिखा गया पहला वाक्य है – “देश में मुसलमानों का राज्य प्रतिष्ठित हो जाने पर हिन्दू जनता के ह्रदय में गौरव, गर्व और उत्साह के लिए अवकाश न रह गया।” यह वाक्य आज के समय में पुन: दोहराना बड़ा घातक-सा लगता है। उस समय के धार्मिक, राजनीतिक जो भी परिस्थिति रहा होगा या फिर उस समय के परिस्थिति में ‘लोक-जागरण’ जो अनिवार्य था उसको ही बनाए रखने के लिए शायद उन्होंने ऐसे इस्लाम की प्रतिक्रया का सहारा लिया होगा, लेकिन यह वाक्य हिन्दू-मुसलमान सम्बन्ध पर एक बहुत बड़ा आघात है। कई आलोचकों ने शुक्ल जी के भक्ति संबंधी कथन का विरोध किया है, जिसमें से प्रमुख आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी हैं और उन्होंने स्पष्ट किया कि ‘अगर इस्लाम न भी आया होता तो बारह आना वैसा ही होता जो आज है।’

भक्तिकाव्य संबंधी कुछ और बातें जैसे – निर्गुण भक्ति और कबीर एवं सूरदास के सन्दर्भ में उनकी दृष्टि कुछ अलग ही थी जिस पर बाद के आचार्य विवाद करते हैं। सबसे पहले तो उन्होंने आदिकाल में ही नाथ और सिद्धों की रचनाओं को साम्प्रदायिक मानकर उसको हिन्दी साहित्य में स्थान नहीं दिया जबकि सबसे पहला साहित्य उनका था। इस से पूर्व नाथ और सिद्ध की परम्परा बौद्धों से जुड़ती है जिससे शुक्ल जी सहमत नहीं हैं। नाथ मत का विकसित रूप ही संत मत है। तो यहाँ सवाल उठता है कि संत मत को उन्होंने भक्तिकाल में स्थान दिया लेकिन उसीके परम्परा से जुड़ने वाली चीजों को आदिकाल में स्थान नहीं दिया। वह निर्गुण की तुलना में सगुन सम्प्रदाय को अधिक महत्त्व देते हैं और अवतारवाद के भी पोषक रहे हैं। 

आचार्य जी की प्रवृत्ति बेहतर से बेहतर की ओर छाँटने की प्रवृत्ति थी। एक को गिराकर दूसरे को उठाने की प्रवृत्ति उनमें झलकती है। उन्होंने इस छाँटने के चक्कर में ही सिर्फ कुछ को ही महत्व दिया और विशाल साहित्य को छोड़ दिया। इसी प्रवृत्ति के कारण न उनकी राय कबीर के लिए अच्छी थी और न सूर के लिए। कबीर के बिषय में कहते हैं – कबीर अनपढ़ जरुर थे पर प्रतिभा उनमे बड़ी प्रखर थी, फिर ऐसा कहकर यह कहना कि वह कवि नहीं थे, यह बात कुछ स्पष्ट नहीं हो पाती है कि आखिर वह कबीर के बारे में बताना क्या चाहते हैं? समाज सुधार पक्ष को सहमति देते हैं तो ऐसे में कबीर ने कुछ तो मार्ग अपनाया होगा समाज सुधार के लिए, लेकिन शुक्ल जी कोई सपष्ट बयान नहीं रखते हैं। अगर वह कवि नहीं थे तो उनमें प्रतिभा किस चीज की थी और अगर प्रतिभा किसी अन्य विषय में थी तो उसमें कबीर का नाम क्यों नहीं आता है? शुक्ल जी निर्गुण सम्प्रदाय को कोई महत्त्व नहीं देते हैं। वे कहते हैं कि उसमें जो ज्ञान की बातें मिलती हैं वह वेदान्त की हैं, उनमें जो प्रेम मिलता है वह सूफियों से लिया गया है। हठयोग और कुण्डलिनी चक्र आदि योग की बातें नाथ सम्प्रदाय से ग्रहण किया है और उनमें जो दो शब्द सूरति और निरति शब्द हैं वह बौद्ध सिद्धों के हैं। अर्थात् निर्गुण मत का कोई निजी महत्ता नहीं है। 

सूरदास के विषय में कहते हैं कि सूर ने विद्यापति का अनुकरण किया है और दूसरी तरफ कहते हैं कि उनका जैसा वात्सल्य वर्णन का कोई कवि नहीं हो सकता। उनके इन दो मतों के तात्पर्य समझना कठिन होता है।इसके पश्चात् शुक्ल जी उनके राम सदृश्य गोस्वामी तुलसीदास जी की सर्वांगपूर्ण काव्यकुशलता का परिचय देते हैं। वर्णाश्रम धर्म का समर्थन करते हुए वह तुलसी जी के रामचरित मानस के बारे में कहते हुए थकते नहीं हैं। तुलसी जी को समर्थन करते हुए शुक्ल जी कहते हैं कि गोस्वामी जी के प्रादुर्भाव को हिन्दी काव्य क्षेत्र में एक चमत्कार समझना चाहिए। रामभक्ति शाखा के अंतर्गत शुक्ल जी और लिखते हैं कि निर्गुण धारा के संतों कि बानी में किस प्रकार लोकधर्म की अवहेलना छिपी हुई थी। इस बात की सिर्फ तुलसी जी को ही पहचान थी। तुलसी जी ने देखा कि निर्गुण संतों की वचनों से जनता की चित्तवृत्ति में ऐसे घोर विकार की आशंका हो सकती है जिससे समाज विश्रृंखल हो सकता है, उसकी मर्यादा नष्ट हो सकती है। बहुत से अनधिकारी और अशिक्षित वेदान्त के कुछ चलन शब्दों को लेकर, बिना उसके तात्पर्य समझे यों ही ‘ज्ञानी’ बने हुए मूर्ख जनता को लौकिक कर्तव्यों से विचलित करना चाह रहे थे। इशारा किस ओर है हम यहाँ समझ ही सकते हैं। विचारणीय यह है कि यह सब बातें शुक्ल जी की आँखें देख रही थीं कि तुलसी जी की आँखें? इन्हीं कारणों से तुलसी जी ने लोकधर्म की रक्षा करते हुए अवतारवाद के साथ अपनी काव्यकुशलता को भक्ति की गद्-गद् सीमा तक पहुंचाया और शुक्ल जी ने व्यवस्था को बनाऐ हुए रखने के लिए इसको स्थापित किया। इस तरह हम कह सकते हैं कि किस तरह शुक्ल जी ने एक ही कालखंड के कवियों में से एक को गिराकर दूसरे को उठा रहे थे।

रीतिकाल के अंतर्गत शुक्ल जी लिखते हैं कि ‘रीतिकाल में एक बड़े भारी अभाव की पूर्ती हो जानी चाहिए थी, पर वह नहीं हुई। भाषा जिस समय सैकड़ों कवियों द्वारा परिमार्जित होकर प्रौढ़ता को पहुँची उसी समय व्याकरण द्वारा उसकी व्यवस्था होनी चाहिए थी। इससे वाक्यदोषों का पूर्ण रूप से निरूपण होता जिससे भाषा में कुछ और सफाई आती। बहुत थोड़े कवि ऐसे मिलते हैं, जिनकी वाक्यरचना सुव्यवस्थित पायी जाती है।’ फिर आगे वह लिखते हैं – ‘भूषन अच्छे कवि थे।’ पर इस अच्छे कवि के लिए फिर शुक्ल जी लिखते हैं कि ‘भूषन ने जिस रस को लिया उसका पूरा आवेश उनमें था, पर भाषा उनकी अनेक स्थलों पर सदोष है। भूषण की भाषा में ओज की मात्रा तो पूरी है पर वह अधिकतर अव्यवस्थित है। व्याकरण का उलंघन प्राय: है और वाक्यरचना भी कहीं-कहीं गड़बड़ है। यदि शब्दों के रूप स्थिर हो जाते और शुद्ध रूपों के प्रयोग पर जोर दिया जाता तो शब्दों को तोड़-मरोड़कर विकृत करने का साहस कवियों में न होता। पर इस प्रकार की कोई व्यवस्था नहीं हुई, जिससे भाषा में बहुत कुछ गड़बड़ी बनी रही।’ फिर वही शुक्ल जी बिहारी के प्रसंग में कहते हैं कि – ‘किसी कवि का यश उसकी रचनाओं के परिणाम के हिसाब से नहीं होता गुण के हिसाब से होता है। मुक्तक कविता में जो गुण होना चाहिए वह बिहारी के दोहों में अपने चरम उत्कर्ष को पहुंचा है, इसमें कोई संदेह नहीं।’ फिर घनानंद के लिए लिखा है कि – ‘इनकी (घनानंद) सी विशुद्ध सरस और शक्तिशालिनी ब्रजभाषा लिखने में और कोई कवि समर्थ नहीं हुआ। विशुद्धता के साथ प्रौढ़ता और माधुर्य भी अपूर्व है।’ इस तरह उनकी दो मान्यतावाली बातों को समझ पाना कठिन हो जाता है । नाम गिनाके न सही लेकिन सबको अंतर्गत करते हुए कहीं एक जगह दोषों को शुक्ल जी गिनाते हैं तो कहीं एक जगह नाम लेकर उनकी विशेषताएं गिनाते हैं। इस तरह उनका पक्ष किस तरह है इसको जान पाना मुश्किल हो जाता है। 

रीतिकाल और रीतिकालीन काव्य-सर्जना के सम्बन्ध में आचार्य शुक्ल की मान्यताओं और स्थापनाओं को लेकर विद्वानों का एक वर्ग लम्बे समय से अपना असहमति व्यक्त करते हुए दिखाई देता है। वे यह मानते हैं कि शुक्ल जी का रीतिकाल और रीतिकालीन सर्जना-संबंधी विवेचन न केवल एकांगी है वरन पूर्वाग्रहों से ग्रस्त, दूषित और इस अर्थ में गैर साहित्यिक है कि उसमें कविता के स्वायत्त संसार की उपेक्षा की गयी है, उसे उसके भीतर पाने की कोशिश न करके विजातीय प्रतिमानों के सहारे बाहर से पाने की कोशिश की गयी है और एक अशुद्ध छवि को उभारकर दिखाया है और जिस जमीन पर रीतिकालीन कविता उगी, फैली और फूली थी उसे विध्वस्त करने की कोशिश तथा उसे सहेजने वाली मानसिकता को भी समाप्त करने की पूरी-पूरी कोशिश की गयी थी । 
शुक्ल जी ने आधुनिक काल और उसके साहित्य पर विस्तृत विचार किया है। अपने साहित्य इतिहास में शुक्ल जी ने आधुनिक गद्य साहित्य की परम्परा का पहला उठान भारतेंदु से माना है। भारतेंदु और उनके मंडल के लोगों की जो चर्चा आचार्य शुक्ल ने कही, वह उनके प्रौढ़ तथा संजीदा लेखन का मिसाल है । भारतेंदु और उनके लेखन के बारे में शुक्ल जी ने लिखा है कि ‘उनके भाषा संस्कार की महत्ता को सब लोगों ने मुक्त कंठ से स्वीकार किया, और वे वर्तमान हिन्दी गद्य के प्रवर्तक माने गये।’ फिर आगे लिखा है – ‘भारतेंदु ने उस साहित्य को दूसरी ओर मोड़कर जीवन के साथ फिर से लगा दिया। इस प्रकार हमारे जीवन और साहित्य के बीच जो विच्छेद पड़ रहा था उसे उन्होंने दूर किया।’ अर्थात् शुक्ल जी ने गद्य के क्षेत्र में भारतेंदु के युग-प्रवर्तक व्यक्तित्व को पूरी स्वीकृति दी है। 

कुछ आलोचकों का ख्याल है कि शुक्ल जी को आधुनिक काल के साहित्य से कोई ख़ास आत्मीयता नहीं थी, आधुनिक साहित्य के बारे में उन्होंने जो कुछ लिखा है वह महज कामचलाऊ है, खानापूर्ति है, न कि आधुनिक काल के साहित्य और उसके विकास की कोई गंभीर प्रस्तुति। कुछ लोगों का यह भी विचार है कि वे अपने ही ख्यालों में बंदी या तो अपने समय के साहित्य तथा सरोकारों से एकदम कट गए थे या यदि कभी-कभार उन्हें अपने समय की साहित्यिक प्रगति पर कुछ कहना या लिखना पड़ा तो या तो उन्होंने उसकी भर्त्सना की, मजाक उड़ायी या बहुत कामचालाऊ रूप से कुछ कहकर उससे छुट्टी ले ली। सवाल यह है कि क्या सचमुच वे अपने समय से कटे हुए थी? क्या सचमुच मध्यकाल के भक्त कवियों विशेषकर गोस्वामी तुलसीदास के साहित्य से निर्मित उनकी चेतना आधुनिक प्रगति को अंगीकार करने में समर्थ नहीं रह गयी थी, क्या उन्होंने आधुनिक रचनाशीलता की उपेक्षा करके उसके साथ अन्याय किया था उसपर सटीक ढंग से विचार नहीं किया? क्योंकि अगर सच में ऐसा होता तो ऐसी क्या बात है कि शुक्ल जी का ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ न सिर्फ पुरानी पीढ़ी वरन नयी पीढ़ी के भी एक बड़े अंश के द्वारा एक मूल्यावान विरासत के रूप में आज भी समय के इस धरातल पर याद किया जा रहा है । 

अपने समय की हिन्दी आलोचना की स्थिति से शुक्ल जी बहुत ज्यादा संतुष्ट नहीं हैं। द्विवेदी युग तक उनके अनुसार आलोचना गुण-दोष कथन ही बनी रही। द्विवेदी जी पर कहते हैं कि – ‘द्विवेदी जी ने साहित्य तथा भाषा के संसार का महत्वपूर्ण काम तो किया, परन्तु समालोचक के रूप में उनका प्रदेय बहुत स्थायी नहीं रहा, वह प्रारम्भिक किस्म का ही रहा।’

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने केवल हिन्दी साहित्य का इतिहास ही नहीं लिखा है, उन्होंने हिन्दी भाषा के इतिहास पर भी स्वतंत्र और महत्वपूर्ण चिंतन किया है। उनका यह लिखना ‘प्राकृत की अंतिम अपभ्रंश अवस्था से ही हिन्दी साहित्य का आविर्भाव माना जा सकता है।’ यह सिद्ध करता है कि वह केवल साहित्य का इतिहास ही नहीं हिन्दी भाषा संबंधी तत्वों पर भी विचार रखते हैं। साथ ही वे संस्कृत भाषा के समर्थक नहीं थे, वे उन आम भाषा का साथ दे रहे थे जिसमें मानव समुदाय का विकास है। 

अत: हम कह सकते हैं कि शुक्ल जी की इतिहास-दृष्टि के निर्माण में ‘राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन’ स्वतन्त्रता की चेतना मौजूद थी। इस चेतना के कारण ही वे साहित्य और समाज के विकास के बीच सम्बन्ध की खोज करते हैं और समाज, भाषा और साहित्य के इतिहास में जनता की महत्वपूर्ण भूमिका की पहचान करते हैं ।यद्यपि उन्होंने अपने इतिहास लेखन में कुछ कवियों को महत्वपूर्ण स्थान दिया और कुछ कवियों के बारे में संक्षिप्त विवरण मात्र दिया यह सच है कि इतिहास की पुस्तक में किसी कवि की पूरी ही क्या आधा और अधूरी आलोचना भी नहीं हो सकती है। उन्होंने अपने विचार दृष्टि से तथा कुछ विशेष प्रवृत्तियों के निर्धारण करके ही प्रसिद्धि के अनुसार कवियों के बारे में वर्णन किया है। हर व्यक्ति में अपनी-अपनी विचार-धारा तो होती ही है और शुक्ल जी का उद्देश्य भी था कि अपने साहित्य के इतिहास का एक पक्का और व्यवस्थित ढांचा खड़ा करे, न कि कवि कीर्तन ।

चाहे कितने भी अंतर्विरोधों के बारे में हम चर्चा कर ले लेकिन यह सच है कि शुक्ल जी का ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ हिन्दी साहित्य जगत के लिए एक मूल्यवान विरासत है और वह सदा के लिए हमारे इतिहास, साहित्य, समाज तथा रचनाशीलता का मार्गदर्शक है।

  1. रामचन्द्र शुक्ल – हिन्दी साहित्य का इतिहास, काल विभाग
  2. रामचंद्र शुक्ल – हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृष्ठ – 53
  3. उपरोक्त


बर्नाली नाथ
शोधार्थी (हिंदी)
अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय
संपर्क barnalinath001@gmail.com,8297135646
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