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शोधमाला:संस्कृति की कविता:आविन्यों/डॉ.अमृत प्रजापति

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, मार्च 26, 2017 | रविवार, मार्च 26, 2017

त्रैमासिक ई-पत्रिका
वर्ष-3,अंक-24,मार्च,2017
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शोधमाला:संस्कृति की कविता:आविन्यों/डॉ.अमृत प्रजापति

चित्रांकन:पूनम राणा,पुणे 
‘आविन्यों’ अशोक वाजपेयी का छठा कविता-संग्रह है जो 1995 में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित है। ‘आविन्यों’ फ्रान्स का एक प्रमुख कलाकेन्द्र है। इस संग्रह की कविताओं के प्रकाशन के पूर्व लगभग दस वर्ष पहले फ्रान्स सरकार के सांस्कृतिक आमंत्रण पर कवि अशोक वाजपेयी फ्रान्स गये थे। वे यहाँ करीब उनतीस दिनों तक रुके और आविन्यों कलाकेन्द्र में बैठकर सिर्फ उनतीस दिनों में उन्होंने पैंतीस कविताएँ और सत्ताईस गद्य रचनाएँ लिखीं। वे सारी की सारी रचनाएँ इस संग्रह में संग्रहित हैं।

‘आविन्यों’ फ्रान्स का एक मध्यकालीन कार्थूसिपन संप्रदाय का मठ ला शत्रूज है। यह संप्रदाय मौन में विश्वास करता है। इस मठ का स्थापत्य एक तरह से मौन का स्थापत्य है। इस संग्रह की कविताओं में विशेष रूप से प्रेमासक्ति की बात बहुत ऊँची भावभूमि से कवि ने की है। मठ के एकान्त वातावरण में ज़रूर कुछ ऐसी विशिष्टता रही होगी, जिसने आशोकजी के अज्ञात कोने को झकझोरा होगा कविता लिखने के लिए। इन की कविताओं पढ़कर ऐसा ज़रूर महसूस होता है कि कवि अनछुए गलियारों में जाने के लिए उत्प्रेरित हुए। और इसी मठ का प्रभाव इस संग्रह की रचनाओं में विशिष्ट रूप से देखने को मिलता है। अशोकजी के लिए ‘ला शत्रूज’ ईसाई मठ रूपक से अधिक क्रिश्चयन धर्मस्थल से लिपटी पवित्रता का प्रतीक है। और इस मठ के आध्यात्मिकता ने ही अशोकजी को कविता लिखने के लिए प्रेरित किया होगा। इस संग्रह की कविताओं में कवि अतीत की स्मृतियों को वर्तमान के साथ पिरो देता है। इस संदर्भ में निर्मल वर्मा की टिप्पणी देखिए – ‘आविन्यों’ की इन कविताओं में अतीत और वर्तमान का यह परस्पर भेदी व्यापार कुछ अजीब तरीके से होता है – “जहाँ मध्यकालीन मॉनेस्टरी के उपादानों के बीच कवि को अपने अतीत के गोपनीय स्मृति-स्थल दखाई दे पाते हैं, जैसे हम कब्र किसी और की खोलते हैं।” (अशोक वाजपेयी, पाठ-कुपाठ, पृ. 224)

आविन्यों के मठ में जाकर कवि का असंतोष ईश्वर से नहीं इसाई संप्रदाय की ‘एक ईश्वरीय’ अवधारणा से हैं। जो मनुष्य की भावनाओं पर इतना गहरा प्रभाव डालती है, जहाँ अन्य भावनाओं और अनुभूतियों को ईश्वर की एक मात्र आस्था के बीच अपने में स्थगित करना पड़ता है और जहाँ यह आस्था टूटती है, तो समूचा जीवन अर्थहीन और निस्सार जान पड़ने लगता है। इसके विपरीत भारतीय पंरपरा में इस तरह का कोई दबाव या बंधन नहीं है। इसके संदर्भ में निर्मल वर्मा टिप्पणी करते हैं – “कभी-कभी अशोक की इन कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि बाइबिल की एक ईश्वरीय अवधारणा उनके भारतीय आध्यात्मिक संस्कारों को अवरुद्ध और आकर्षित करती है।”(वही, पृ. 227)

पूरा संग्रह तीन खंडों में विभाजित है -- ‘किस भूगोल में’, ‘किस सपने में’ इस उपशीर्षक के अंतर्गत कविताएँ हैं, जो लगभग पैंतीस के करीब हैं। छायाचित्र के उपखंड का नाम ‘मौन के स्थापत्य में’ दिया है। कवि ने आविन्यों में रहकर जो गद्य रचनाएँ कीं उनके उपशीर्षक का नाम ‘हमेशा एक दरवाजा’ है, किन्तु हम सिर्फ कविताओं अर्थात् ‘किस भूगोल में’ और ‘किस सपने में’ उपखंड की व्याख्या प्रस्तुत करेंगे।

जैसा कि हम पहले ही कह चुके हैं कि अशोक वाजपेयी मूलतः प्रेम के कवि हैं और उनका एक प्रमुख चिंतन मृत्यु-बोध को लेकर भी है। प्रस्तुत कविता-संग्रह में मृत्यु-बोध से संबंधित कविताओं की संख्या नगण्य है और इस संग्रह में उनकी प्रेम-कविताएँ बहुत स्पष्ट, एक श्रृंगारिक कवि के रूप में प्रभाव छोड़ जाती है। इसके पहले हम कहीं कह आये हैं कि अशोक वाजपेयी समकालीन हिन्दी साहित्य में प्रायः अकेले प्रेम-काव्य के कवि हैं, लेकिन दोनों प्रकार के काव्यों में महत्वाकांक्षा से वे दूर हैं। ज़रूरत पर वह ईश्वर से प्रार्थना भी कर लेंगे। अगर उनको यह लगता है कि इसके अलावा कोई दूसरा तरीका प्रेम के लिए जगह बनाने के नहीं और ज़रूरत पर प्रेमी को भी याद कर लेंगे, क्योंकि उसके बिना प्रेम कैसे किया जा सकता है यह वे बता नहीं सकते। लेकिन प्रेमिका के बिना प्रेम हो सकता है तो अशोक वाजपेयी की कविता में प्रेमिका नहीं रहेगी और अगर ईश्वर के बिना मुक्ति हो सकती है तो अशोक वाजपेयी की कविता में ईश्वर नहीं रहेगा। जबकि इन कविताओं से गुज़रते हुए हमें बार-बार प्रेमिका के भी और ईश्वर के सभी अस्तित्व का आभास होता रहता है।

इस संग्रह की कविताएँ श्रृंगारिक हैं। अशोकजी एक समर्थ श्रृंगारिक कवि के रूप में उभरकर सामने आते हैं, किन्तु जैसा कि हमें ज्ञात है – अशोक वाजपेयी की कविताओं में मृत्यु-बोध के दर्शन हमें अनेक बार होते हैं। इसलिए श्रृंगारिक कविताएँ लिखते हुए कवि अपने इस चिंतन से मुक्त नहीं हो पाये हैं। पहली ही कविता उनके मृत्यु-बोध और जीवन की क्षणभंगुरता की कविता है। उसका शीर्षक है – ‘समय अब यहाँ नहीं’ रचना में काव्य-नायक कहता है कि समय अब कहाँ नहीं आता। यहाँ तो सिर्फ काल आता है। समय और काल का यों तो शाब्दिक अर्थ एक ही होता है, किन्तु काल में एक विशेष अर्थ ध्वनित होता है, जो मृत्यु के अर्थ से मिलता है। इसीलिए हमारे यहाँ सर्वत्र काल और मृत्यु पर्यायवाची शब्द माने नहीं जाते। आविन्यों शहर के इस सांस्कृतिक वातावरण में जहाँ प्राचीन पत्थरों से बनी हुई इमारते हैं वहाँ बैठे हुए काव्य-नायक महसूस करता है कि यहाँ पर अब समय का एहसास नहीं होता है। यहाँ आने के बाद सिर्फ मृत्यु का एहसास होता है। समय आता है ऐसा लगता है, किन्तु मृत्यु अपने भारी पदचापों से चलती है ऐसा लगता है कि शताब्दियों पुराने लम्बे गलियारों से निकल कर वह यहाँ आ गयी है। यद्यपि यहाँ धूप भी आती है प्राचीन पत्थरों को रोशन करने के लिए। ओस भी गिरता है चुपचाप प्राचीन हरीतिमा और पूर्वा को हरियाली में तबदील करने के लिए। यहाँ नमी भी ठहरी रहती है जैसे प्रार्थना, किन्तु यहाँ मृत्यु के पदचाप नहीं सुनाई देते। यहाँ आते ही ऐसा लगता है कि मृत्यु का साम्राज्य है और सूना-सूना लगता है।

‘किस नाम से’ नामक रचना में मृत्यु-बोध का प्रसंग तो दिखाई देता है, किन्तु इसे मैं प्रेम-कविता कहना चाहता हूँ, क्योंकि इस रचना को पढ़ते हुए कहीं-कहीं ईश्वर के होने का एहसास होता है और कहीं-कहीं प्रेमिका को संबोधित करने का। 

“भाषा की कगार पर खड़ा
मैं उसे किस नाम से पुकारूँ --
जो उसे मुक्त करे
आकाश में, पृथ्वी में,
जल, पावक और समीर में?”(पृ.18)

यह पाँच तत्व – आकाश, पृथ्वी, जल, पावक और समीर इन्हीं तत्वों से सारा ब्रह्मांड बना है। मनुष्य की देह बनी है। फिर इसे भाषा की चौहद्दी में कैसे बाँधा जा सकता है? कवि की यही चिन्ता व्यक्त हुई है इस रचना में।
अशोक वाजपेयी की यह स्पष्टता है कि ‘वह नहाती है’ एक सशक्त प्रेम-कविता है। इस में नायिका का दैहिक वर्णन किया है। और यह रचना कवि को मध्यकालीन रीति कवियों के नज़दीक ले जाती है। 

“वह नहाती है
बन्द स्नानघर भी
खुला नदीतट है
-- जल फिर-फिर पहचानता है
उत्तुंग को, गहरे बसे हुए को,
श्यामाच्छादित त्रिभुज को
वह नहाती है
प्राचीन तन्वंगी
अनंत के ओसारे में
कविता के गवाक्ष के नीचे
लज्जारुण जल से
या उत्तेजित कविता से।”(पृ. 20)

अशोक वाजपेयी की कविता में जो स्त्री नहा रही है, वह एक ऐसा वाक्य है जिसकी आकांक्षा और योग्यता तो प्राचीन तन्वंगी की ही है, किन्तु जिसका तात्पर्य किसी भी धर्म में पढ़ना आसान है। ‘विलम्ब’ रचना प्रेमिका की प्रतीक्षा कर रहे नायक के विरह और व्याकुलता को व्यक्त करती है। जैसा कि हमने पहले ही कहा – इस संग्रह की अधिकांश कविताएँ प्रेम-कविताएँ हैं। इन कविताओं में नायिका और प्रेमिका की उपस्थिति लाजमी है। ‘वह बैठती है’ रचना में नायिका के क्रिया-कलाप व्यक्त हुए है। ‘हाथ छूते हैं पृथ्वी आकाश’ कविता अन्य रचनाओं से जरा हटकर है। इसमें काव्य-नायक मनुष्य के हाथों की सामर्थ्य की अभिव्यक्ति करता है। ‘पदाघात’ संघर्ष का भी प्रतीक है और जागृति का भी। अशोक वाजपेयी ने नायिका-भेद भी लिखा है। ‘वासिक सज्जिका’, ‘अभिसारिका’ और ‘विरहोत्कण्ठिता’ शीर्षक रचनाएँ नायिका-भेद की हैं। ‘अभिसारिका’ रचना में प्रियसमागम के लिए जा रही नायिका के गमन की क्रियाएँ व्यक्त हुई हैं। 

“वह जा रही है
नदी जाती है सागर की ओर
झरने जाते हैं नदी की ओर
जल जाते हैं झरने की ओर
वह जा रही है
पृथ्वी सूर्य की ओर
शब्द कविता की ओर
प्रार्थना ईश्वर की ओर
रास्ते में काँटे हैं
अंधेरा और सर्प है
कामातुर देवता और अनिष्ट हैं
पर वह जा रही है
नदी पृथ्वी की कविता
वह प्रिय की ओर निश्शब्द जा रही है।”(पृ. 27)

‘विरहोत्कण्ठिता’ में नायिका अपने प्रेमी का इन्तजार कर रही है। नायक ने वचन दिया था, किन्तु आया नहीं है इसीलिए नायिका प्रतीक्षा में, विरह में व्याकुल है। यह नहीं इसके आगे की कुछ कविताएँ नख-शिख वर्णन की हैं। नख-शिख वर्णन में अशोकजी का ध्यान इस पर अधिक है कि अंग क्या  करते हैं? इस पर कम कि अंग क्या? ‘मृगलीन खंजन अमल’ इस कविता में लगभग नहीं है और है तो बहुत सीधे ढंग से। ‘बाँहें’ कविता में काव्य-नायक नायिका के नख-शिख वर्णन और उसके बाँहों का वर्णन करते हैं कि वह अपने प्रेमी को आगोश में भर लेती है तो ऐसा लगता है जैसे सारा समय और आकाश उसके आलिंगन में भर गया हो। सारे रंग, आकार, वसंत, धूप और गरमाहट ही इसकी बाँहों में समा गयी हो। उसकी बाँहें अपने  प्रेमी को किसी देव की कृपा की तरह घेरती हैं। ऐसा लगता है कि उसकी बाँहों में आते ही वह क्षण दिन की परिधि से बाहर आ गया हो। ऐसा लगता है जैसे शाखा के बिना ही कोई फूल खिल गया हो। जैसे आकाश खिड़की के काँच के टुकड़ों के धुँध पर उसका नाम लेकर चला गया हो –

“उसकी बाँहें घेरती हैं
प्रेम को
प्रिय को
आकाश और समय को
उसकी बाँहें बुलाती हैं
रंग, आकार, पर्वत और धूप को
शिशिर में ठिठुरती गरमाहट की इच्छा को
उसकी बाँहें घेरती हैं
देवकृपा की तरह
उसकी बाँहें घेरती हैं
क्षण बाहर हो जाते हैं दिन की परिधि से
फूल शाखा छोड़कर खिल जाता है हवा में
आकाश खिड़की के काँच की धुन्ध पर लिखने लगता है
उसी का नाम”(पृ. 29)

‘ओठ’ में नायिका के ओठ का वर्णन है। तीन खंडों में विभाजित ‘सुबह’ कविता प्रकृति के सौन्दर्य को अभिव्यक्त करती है। 
‘दिवंगत माँ के नाम पत्र’ माँ पर अशोक वाजपेयी ने अनेक कविताएँ लिखी हैं। उनके पहले कविता-संग्रह ‘शहर अब भी संभावना है’ में माँ पर लिखी गई कई बेजोड़, लाजवाब कविताएँ हैं। ‘दिवंगत माँ के नाम पत्र’ कविता में और उन कविताओं में बहुत फर्क है। प्रस्तुत रचना काव्य-नायक ने अपनी माँ के नाम पत्र-आकार में लिखी है। भावनाएँ वही हैं, माँ के प्रति प्रेम और आत्मग्लानि। इसमें एक ऐसा बेटा, जो अपनी माँ के देहान्त के वक्त उसके पास मौज़ूद नहीं होता है उसकी माँ को पत्र लिख रहा है और उसकी ग्लानि इस पत्र में तो है, किन्तु माँ के प्रति जो प्रेम व्यक्त हुआ है वह वाकई लाजवाब है। कवि अशोक अपनी माँ को दिदिया कहते थे –

“अनंत में जहाँ तुम हो
पितरों के जनाकीर्ण पड़ोस में
वही अपने ढीले पेण्ट को सम्हालता
मैं भी हूँ गुड्डुन
जैसे यहाँ इस असंभव सुनसान में तुम हो
इस कविता, इन शब्दों, इस याद की तरह
दिदिया....”(पृ. 43) 

‘दो प्रार्थनाएँ’ दो खंडों में विभाजित है। आविन्यों तथा फ्रान्स के ला शत्रूज में बैठकर लिखी हुई कविताओं में स्थानीयता की छाप शब्द-दर-शब्द देखी जा सकती है। ‘मुझे शब्द चाहिए’ में एक स्थान-विशेष तथा उसके वातावरण को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया है –

“मुझे शब्द चाहिए
यह उम्मीद कि मेरे बाद भी रह पायेंगे
कुछ समय
मुझे चाहिए बीतनेवाली नहीं खुलनेवाली धूप
प्रार्थना नहीं पुकार
चुप्पी नहीं चीख
सिसकियाँ, आँसू, हँसी
मुझे ऐश्वर्य नहीं शब्द चाहिए...” (पृ. 50)

 ‘प्रेम खो जायेगा’ अनास्था से जन्मे नैराश्य और नैराश्य के परिणाम स्वरूप मृत्यु के आतंक और आतंक से जन्मे हुए भय की रचना है। हक़ीक़त में यह मृत्यु-बोध की रचना है। 

“गली पहले खत्म हो जायेगी
दरवाज़े बंद
धूप आने में असमर्थ
बीतने के भय के अलावा कोई नहीं होगा साथ
प्रेम खो जायेगा
जीर्णोद्धार के लिए नहीं मिलेंगे औज़ार
रफ्फू करनेवाला धागा नहीं सूझेगा आँख को
दृश्यालेख से हरियाली, पक्षी
और बेंच पर हर दिन किसी देवता की तरह बैठा बूढ़ा
ओझल हो जायेंगे
प्रेम खो जायेगा...”(पृ. 51)

‘उसने कहा’ एक प्रेम-कविता है जिसमें प्रेम की शक्ति की अभिव्यंजना है। ‘विन्यास से बाहर’ भी एक प्रेम-कविता है, बल्कि नितान्त माँसल-प्रेम की। 

‘आखिरी शाम की प्रार्थनाएँ’ रचना ला शत्रूज (9, नवम्बर 1994) में लिखी गई वास्तव में आखिरी शाम की प्रार्थना ही है। दूसरे दिन कवि को ला शत्रूज से विदा होना है। कवि यहाँ 14 अक्तूबर से 10 नवम्बर के दोपहर तक रुके थे। इसीलिए उस स्थान पर उसकी आखिरी शाम है और वहाँ से विदा लेते समय उसके मन में तरह-तरह के विचार उठ रहे हैं।  पूरी कविता को पढ़ते हुए ऐसा महसूस होता है, जैसे कवि अपने किसी प्रिय स्थान से विदा हो रहा है। कहीं-कहीं तो ऐसा महसूस हो रहा है कि यहाँ से विदा होते समय उसे इतनी पीड़ा हो रही है, जितनी पीड़ा मृत्यु के एहसास से होती है। इसलिए कवि यहाँ अंतिम बार कुछ प्रार्थनाएँ करना चाहता है, कर लेना चाहता है, क्योंकि उसे एहसास है कि यहाँ दुबारा आना संभव नहीं हो पायेगा। यह उस स्थान पर जीवन की आखिरी शाम होगी।

 ‘पेरिस में सुबह’ रचना पेरिस में 12 नवम्बर 1994 सुबह सवा नौ बजे लिखी गई। इसमें एक नये प्रकार का एहसास व्यक्त हुआ है। कवि कल ही ला शत्रूज में एक लम्बी यात्रा के पश्चात् यहाँ पहुँचा है। ला शत्रूज का जीवन-अनुभव और पेरिस के जीवन-अनुभव में बहुत फर्क है। पेरिस एक व्यस्त शहर है और ला शत्रूज एक सांस्कृतिक स्थान। कवि को महसूस होता है कि स्थान बदल जाने से कोई चीज़ बदल नहीं जाया करती। सिर्फ महसूस होता है कि कुछ बदल गया है। सच पूछिए तो बदला नहीं है। यह बदलना सिर्फ उस तरह का बदलना है जैसे कविता में या जीवन में, वार्तालाप में, एक शब्द के स्थान पर दूसरा शब्द आ जाता है। ठीक उसी तरह एक शहर से दूसरे शहर अपने पर मौसम बदल जाता है और कुछ नहीं बदलता।

निष्कर्ष रूप से कहें तो इस संग्रह की प्रेम-कविताओं में प्रेम के साथ देह के लिए व्याकुलता है। कई जगह पर कवि देह के समर्पण की रूमानी ऐन्द्रिकता में फलते-फूलते नज़र आते हैं। तो कई बार नारी देह को भोगलिप्सा की प्रणीति में अभोग्य-क्षणों की उदासी भी प्रतीत होती है। इस संग्रह में अशोकजी सामाजिकता से नहीं अपनी जड़ों से भी कटे हुए देश, काल से परे, विदेशी ज़मीन पर, अतीत में खोकर अनैतिहासिक, गैर सामयिक समय में प्रवेश करते दिखाई पड़ते हैं। कई कविताओं में कवि ने धार्मिक प्रतीकों का प्रयोग किया है। जिनमें कई कविताओं में तो अभिसार, श्रृंगार, विरह और परिणय में ‘एरोटिक’ प्रतीक भी आते हैं। इन कविताओं में कवि का असंतोष आध्यात्मिक से अधिक एक काव्य-साधक की सौन्दर्य-मूलक चिन्ताओं में प्रकट होता दिखाई पड़ता है। कई कविताओं में कवि पर भय की छाया गहरी दिखाई दी है। ‘भय’ शब्द इस संग्रह में कई बार प्रयुक्त हुआ है। तो कई कविताओं में कवि ने अतीत की स्मृतियों को वर्तमान के साथ पिरो दिया है। इस तरह देखें तो यह संग्रह अशोकजी का एक सशक्त काव्य-संग्रह है।

डॉ. अमृत प्रजापति
एसोसियेट प्रोफेसर (हिन्दी विभागाध्यक्ष)
गवर्मेण्ट आर्ट्स एवं कॉमर्स कॉलेज कडोली
तहसिलः हिम्मतनगर, जि. साबरकांठा (गुजरागुजरात)त
संपर्क:9426881267,amrutprajapati14@gmail.com
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