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राजस्थान के किसान जयदेव सिंह से अभिनव सरोवा की बातचीत

Written By Manik Chittorgarh on शनिवार, नवंबर 11, 2017 | शनिवार, नवंबर 11, 2017

त्रैमासिक ई-पत्रिका
अपनी माटी
(ISSN 2322-0724 Apni Maati)
वर्ष-4,अंक-25 (अप्रैल-सितम्बर,2017)

                                 राजस्थान के किसान जयदेव सिंह से अभिनव सरोवा की बातचीत


नमस्कार, अपना परिचय दीजिए।
किसान- नमस्कार जी! मेरा नाम जयदेव सिंह है। मैं झुंझुनूँ जिले के मलसीसर ब्लॉक के गाँव बासड़ी का मूल निवासी हूँ।

आपके घर में कितने सदस्य हैं?
किसान- वर्तमान में मेरे परिवार में छोटे-बड़े 10 सदस्य हैं।

परिवार की आय का मुख्य साधन क्या है?
किसान- वर्तमान में दोनों बेटे राजकीय सेवा में हैं। वर्ष 2012 से पहले खेती ही हमारी आय का मुख्य ही नहीं बल्कि एकमात्र जरिया था।

आपके पास कुल कितने एकड़ जमीन हैं?
किसान- एकड़ में मुझे ज्ञात नहीं बस इतना बता सकता हूँ कि हमारे यहाँ कच्ची बीघा के हिसाब से 18 बीघा जमीन है जो कि पूर्ण रूप से कृषि कार्य लायक नहीं है।

क्या इतनी जमीनें आपके परिवार के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त हैं?
किसान- अभी आय का जरिया बदल गया है। बेटों के नौकरी लगने से पहले बड़ी तंगी रहती थी। एकमात्र जरिया होने के कारण बेटों को मजदूरी भी करनी पड़ती थी। अब जाकर स्थिति कुछ सुधरी है। 

क्या खेती के अलावा आय के अन्य साधन भी हैं?
किसान- अभी बेटों की तनख्वाह है। इससे पहले यही एकमात्र जरिया था अपना पेट पालने का।

सिचाई व्यवस्था के साधन क्या हैं? मौनसून या बोअरबेल?
 किसान- 1990 के दशक में बोरवेल था पर भूमिगत जल के नीचे चले जाने के कारण बन्द करवाना पड़ा और वर्तमान में मानसून का ही सहारा है।

आपके खेत किस तरह के हैं? टुकड़ों में बँटा हुआ छोटे-छोटे प्लॉट या एक जगह बड़ा प्लॉट।
किसान- एक जगह ही सारे खेत है।  

आजकल मौनसून का संतुलन बिगड़ रहा है? इसका खेती पर क्या असर पड़ रहा है?
किसान- मानसून के बिगड़ते संतुलन का फसल पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ रहा है। कई बार वर्षा के अभाव में फसल सूख जाती है तो कई बार पकने के समय होने वाली अत्यधिक वर्षा से तैयार फसल नष्ट हो जाती है। ऐसी फसल को बाजार में बहुत कम भाव मिलते हैं। खेत मे होने वाला बाजरा भी स्वाद हीन हो जाता है।

आप किस प्रकार की खेती करते हैं? पारंपरिक या आधुनिक।
किसान- जोत का छोटा आकार और मानसून की निर्भरता आधुनिक खेती में बड़ी बाधक है। पारंपरिक खेती ही एकमात्र उपाय है।

साल भर में आप कितने फसल पैदा कर लेते हैं?
किसान- एक ही फसल ले पाते हैं मुश्किल से। ये भी जरूरत और उम्मीद के मुताबिक नहीं हो पाती। इसकी खास वजह मानसून की अनियमितता है।

सरकार किसानों के लिए कई तरह की सुविधाएँ जैसे कि बीज, खाद, ट्रेक्टर, थ्रेसर आदि सब्सिडी के साथ उपलब्ध करा रही है तथा कई कृषि सुधार के लिए कई योजनाएँ चला रही है। आपको इन सुविधाओं और योजनाओं का लाभ मिल रहा है?
किसान- मुझे खाद और बीज का लाभ जरूर हुआ है। अन्य सुविधाओं का नहीं। खाद बीज का लाभ भी पूर्ण रूप से नहीं बल्कि कभी-कभी मिल पाता है।

 क्या आप किसान क्रेडिट कार्ड से लाभान्वित हो रहे हैं?
किसान- हाँ! मुझे इसका लाभ मिलता है। पिछले साल अकाल की वजह से मुझे 12000 के लगभग ऋण माफी मिली थी।

बैंक से किसानों को कम ब्याज दरों पर ऋण  दिया जाता है, क्या आपको इसका लाभ मिला है?
किसान- नहीं

15. कृषि अधिकारी और मौसम विभाग आपलोगों को किस प्रकार सहायता करता है?
किसान- कृषि अधिकारी तो कभी आते ही नहीं, हाँ! किसान कॉल सेंटर पर काफी मदद मिलती है। मैं कई बार फोन से इस विषय मे जानकारी ले चुका।

वर्तमान समय में किसानों की आत्महत्याएँ बढ़ी हैं, इसके क्या कारण हैं?
किसान- खेती में लागत का अधिक होना और पक्की फसल बेचने के वक्त कीमतों में आने वाली भारी गिरावट इसकी एक खास वजह है। इसके साथ-साथ मानसून भी अपना रोल निभाती है। किसानों को उनकी फसल का उचित और वाजिब दाम मिलना चाहिए। जब तक ये नहीं होगा इस प्रवृत्ति पर रोक लगाना असंभव सा प्रतीत होता है। किसान को अन्नदाता कहा जाता है पर वो खुद भूखों मरने पर मजबूर है।

17. देशभर में किसान आन्दोलन हो रहे हैं, इसके बारे में आपकी क्या राय है?
किसान- किसान बहुत ही सहनशील और आशावादी इंसान होता है। जितना संतोष एक किसान में होता है उतना किसी भी अन्य व्यक्ति में नहीं होता। वह खाली पेट सोने के बावजूद भी अपनी किस्मत के सिवाय किसी दूसरी चीज को इसका जिम्मेदार नहीं मानता।  फिर भी इन दिनों हुए किसान आंदोलन इस बनी-बनाई धारणा को तोड़ने के लिए काफी हैं। इसका जिम्मेदार सिर्फ किसान को नहीं ठहराया जा सकता। इसके लिए कुछ अन्य लोग ज्यादा उत्तरदायी हैं।किसानों के एक समूह को भड़काकर ऐसे आंदोलनों की बुनियाद तैयार की जाती है। किसान अत्यंत ही भोला होता है। आप उसके साथ थोड़ी-सी सहानुभूति या हमदर्दी दिखाकर उसके मस्तिष्क को अपने वश में कर सकते हैं।
चुनावों के समय जो वादे राजनीतिक दलों द्वारा किये जाते हैं उनके विरोधाभासी कृत्यों के द्वारा हर दल खुद को किसानों का विरोधी साबित करने का भरसक प्रयास करता है। आजकल स्थिति कुछ बदली भी है। किसान का बेटा भी पढ़-लिख गया है। वह अपने पिता को सही जानकारी उपलब्ध करवा देता है। सोशल मीडिया का भी इसमें अहम योगदान रहा है। घर बैठे किसान भी अपने जैसे अन्य किसानों की हालत को देखकर उबल पड़ता है और जाने-अनजाने इन आन्दोलनों का हिस्सा बन जाता है।किसान की फसल का उचित मूल्य देकर और न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करके इस असंतोष को कम करने का प्रयास सक्षम स्तर से किया जाना आवश्यक हो गया है।

क्या सरकार के द्वारा किया जानेवाला ऋणमाफी किसान समस्या का स्थायी हल है?
किसान- मैं यही कहना चाहूँगा कि भूखे को रोटी देना गलत नहीं है पर वह भूखा क्यों है, इस समस्या को दूर करना होगा। किसान को इतना सक्षम बना दिया जाए कि उसे ऋण लेने की आवश्यकता ही न पड़े। ज्याफ वह ऋण लेता भी है तो फसल बेचते ही वह खुद उसे जमा करवाने बैंक जाये, ऐसी व्यवस्था कायम करनी होगी।  किसानों की समस्या का कारण खोजकर उसका निदान करके ही स्थिति को सुधारा जा सकता है। राज्य द्वारा उसे जो खाद-बीज उपलब्ध करवाया जा रहा है उसकी गुणवत्ता उत्तम श्रेणी की हो और जैविक खेती को प्रोत्साहन सिर्फ फाइल्स में नहीं बल्कि धरातल पर दिया जाए। चहेतों को लाभ पहुंचाने की प्रवृति पर रोक लगेऔर हर कार्य पूर्ण पारदर्शिता के साथ हो तो किसानों के आर्थिक हालात सुधरेंगे और जब ऐसा हो जाएगा तो वे खुद अपना ऋण जमा करवाएंगे। वह इतना खुद्दार होता है कि कभी नहीं चाहता कि कोई उसका कर्जदार हो।

क्या आप अपनी संतानों को किसान बनाना चाहेंगे?
किसान- वर्तमान में इसकी आवश्यकता नहीं है। नौकरी लगने से पहले दोनों बेटे खेती का पूरा काम करते थे। अब भी जब छुट्टियाँ के दौरान आते हैं तो अपना समय खेत में बिताते हैं। अब खेती से निर्भरता कम हो गया है।

धन्यवाद, आपने अपना महत्वपूर्ण समय हमें दिया और इतनी जानकारी दी।
किसान- जी! बहुत-बहुत शुक्रिया। नमस्कार। 

अभिनव सरोवा,प्रतापगढ़,मो-93149 11782
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