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किसान आन्दोलन : ऐतिहासिक पृष्ठभूमि/सुशील कुमार

Written By अपनी माटी,चित्तौड़गढ़ on शनिवार, नवंबर 11, 2017 | शनिवार, नवंबर 11, 2017

त्रैमासिक ई-पत्रिका
अपनी माटी
(ISSN 2322-0724 Apni Maati)
वर्ष-4,अंक-25 (अप्रैल-सितम्बर,2017)
                     किसान विशेषांक

                      किसान  आन्दोलन : ऐतिहासिक पृष्ठभूमि/सुशील कुमार 

       
किसान प्रतिरोध भारत के इतिहास में बहुत पुरानी संस्कृति है। मध्यकालीन शासन काल में भी सामंती ढांचे में किसान पिस रहा था उस समय के किसान विद्रोह की झलक उस समय के तत्कालीन साहित्य और इतिहास में मिलती है। मध्यकालीन समय में विद्रोही किसानों के गाँव मवासके रूप में पहचाने जाते थे। औपनिवेशकालीन अंग्रेजी सत्ता काबिज होने के पश्चात् भारत में और दमन करती थी। किसानों के दमन, शोषण, उत्पीड़न की राजनीतिक-आर्थिक गाथा है। जब किसान कोई समाधान नहीं निकाल पा रहे थे, तब किसान औपनिवेश और सामंती नीतियों के खिलाफ प्रतिरोध शुरू कर दिए और इन प्रतिरोधों का दमन शुरू हो गया था। अब किसानों ने सामूहिक विद्रोह की राह चुन ली। ये विद्रोह सशस्त्र रूप भी धारण किए थे। शुरुआत 1767-68 ई. में त्रिपुरा के शमशेर गाजी विद्रोह से हो गई. ‘‘जब सभी मान्य विकल्प समाधान के संदर्भ में अपने हथियार डाल देते हैं। तब उत्पीड़ित वास्तविक हथियार हाथ में उठाता है। इसके प्रयोग  के जरिए वह सत्ता से टकराता है और सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में गुणात्मक बदलाव लाने की कोशिश करता है। उसके संघर्ष कभी सफल होते हैं, कभी नाकाम रहते हैं पर इनकी भी ऊर्जावान निरंतरता बनी रहती है। इससे खेतिहर समाज की जीवंतता सिद्ध होती है। उदाहरण के लिए 1778 से लेकर आज तक सैकड़ों छोटे-बड़े विद्रोह हो चुके हैं।’’  आइये, हम इन किसान बगावतों पर एक नजर डालें।

      पचास हजार संथाल किसान लड़ाकू वीरों के संग्राम को लीजिए। इन संथाल किसानों पर भयंकर अत्याचार ढाने वाले सूदखोर, महाजनों, जमींदारों और विदेशी सरकार के नापाक त्रिस्तरीय गुट के अत्याचार शोषण के खिलाफ किसानों ने बड़ी वीरता और उत्साह से लड़ाई चलाई। उनमें से आधे से ज्यादा किसानों ने लड़ते-लड़ते अपनी जान की आहुति दे दी। संथालों और त्रिगुट में संघर्ष क्यों छिड़ा? संथाल किसानों ने जमीन को साफ करके खेती योग्य बनाया था। ‘‘सर जार्ज कैंपबेल ने उनकी प्रशंसा में कहा है कि जंगलों को साफ करने और जमीन को  खेती के योग्य बनाने में वे परिश्रमी ही नहीं, बल्कि निपुण भी थे।’’2

      अंग्रेजों ने नई भूमि व्यवस्था लागू कर दी जिस वजह से उनकी साफ की गई खेती योग्य जमीन जमींदारों के पास आ गई। अंग्रेज और जमीदारों ने कृषि पर मालगुजारी भी बढ़ा दी । शुरुआत में संथाल लोग पुरानी जगह छोड़कर नई जगह जमीन साफ करके खेती करने लगे। अंग्रेजों की नई व्यवस्था ने वहाँ पर भी उनका पीछा नहीं छोड़ा। ‘‘अपनी देवभूमि से भगाए जाने पर उन्होंने राजमहल की पहाड़ियों के चारों ओर फैले हुए मैदानों के झाड़-झंखार और जंगलों को बड़ी मेंहनत से साफ किया, जमीन के बड़े-बड़े खित्ते खेती के काबिल बनाये और फिर जिंदगी शुरू की। उन दिनों इस प्रदेश को दमने कोह कहते थे।’’3

     सर जार्ज कैंपबेल ने उनकी परिस्थिति का वर्णन इन शब्दों में किया है – ‘‘उनका यह वाजिब ख्याल है कि जमीन उसकी है जिसने उसे पहले जोता है। अगर वे उससे हटने पर मजबूर किये जाते हैं, तो वे और भीतर जंगलों में चले जाते हैं और ऐसी जगहों में, जहाँ वे सताए नहीं जायेंगे, नये खेत तैयार करते हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश अब वे उस हद पर पहुँच चुके हैं। जहाँ से और आगे बढ़ना मुमकिन नहीं है क्योंकि अब वे अपने को गंगा के समतल मैदानों की सरहद पर पाते हैं, यानी ठीक उस जगह पर जहाँ जमीन के लिए सबसे ज्यादा होड़ है और जहाँ लगान की दरें बहुत चढ़ गई हैं।’’4

    ये नई आर्थिक व्यवस्था संथाल किसानों के लिए बहुत ही पीड़ादायक साबित हुई। अंग्रेजी व्यवस्था के संरक्षण में जमींदारों की जमीन को हड़पने की नीति खूब सफल हो रही थी। जब तक संथाल जमीन को साफ करते, खेती के काबिल बनाते, तब तक जमींदार चुप रहते। जमीन खेती के काबिल बनते ही जमीदार जमीन पर अपनी मिल्कियत और अत्यधिक मालगुजारी वसूलने में तनिक भी देरी नहीं दिखाते। 1856 ई. के कलकत्ता रिब्यूने इस संदंर्भ में लिखा। ‘‘दमन की सरहद पर रहने वाले लोभी जमींदार कुछ दिनों से उनकी जमीनों पर अपनी लालच भरी निगाह डालने लगा है।’’5 संथाल किसान किस-किस तरह से किन-किन लोगों का जुल्म सह रहे थे . इसको उनके समकालीन लेखक ने कलकत्ता रिब्यूमें लिखा था। ‘‘जमीदार, पुलिस, तहसील और कचहरी के अमलों ने एक ऐसी व्यवस्था कायम कर रखी है, जिसके अन्दर दब्बू और डरपोक संथालियों से रूपये ऐंठे जाते हैं, जोर-जुल्म से वसूलिया की जाती हैं, उन्हें जमीन से जबरन बेदखल किया जाता है, मारा-पीटा जाता है और गालियाँ दी जाती हैं और अनेक किस्म के छोटे-छोटे जुल्म किये जाते हैं। 50 से 500 रुपये सैकड़े कमरतोड़ सूद, हाट और बाजार में झूठे बटखरे, अमीरों का जान-बूझकर और ओछेपन की भावना से इस गरीब फसल पर अपने मवेशियों टहओं, खच्चरों और हथियों तक को छोड़ देता। और इस प्रकार उनकी भूमि में उत्तराधिकार प्रवेश करना-इस किस्म की गैरकानूनी कार्रवाइयाँ अक्सर होती रही हैं। यह भी देखा गया है कि कुछ लोगों ने संथालों से मुचलके की माँग की है। कर्ज के बंधक के रूप में शर्मनाक मांगे की गयी हैं और यह उत्पीड़न का एक और तरीका रहा है।’’6

     इस प्रकार जमींदारों के साथ महाजनों का भी उत्पीड़न था। कलकत्ता रिब्यूने लिखा है कि ‘‘संथालों ने कर्ज के बदले अपनी फसल को, अपने मवेशियों को और खुद अपने को और अपनी बीबी-बच्चों को बिकते देखा, और तारीफ यह है कि कर्ज की दस-गुनी रकम भरने के बाद भी यह कर्ज उनके ऊपर एक भार बना ही रहता था।’’7 संथाल किसान जो उत्पादन करते थे व्यापारी आकर उनकी असली कीमत से बहुत कम दाम पर खरीद लेते थे। संथाल हाट-बाजार में अपना उत्पादन बेचने जाते थे। हाट सप्ताह में दो दिन लगते थे। हाट में बाहरके व्यापारी आते थे। ये व्यापारी सस्ता माल खरीदकर मंहगे दामों पर कलकत्ता मुर्शिदाबाद भेज देते थे। बहुत सारी वस्तुए विदेश भी चली जाती थी। ये संथालों के श्रम का खुलेआम शोषण करते थे।

    इस सब के ऊपर रेल के निर्माण में लगे यूरोपीय कर्मचारियों का उत्पीड़न अलग था। 1856 ई. के कलकत्ता रिब्यूने रेलवे लाइन में नियुक्त यूरोपीय कर्मचारियों द्वारा किए गये इस किस्म के जुल्म की जैसे बिना दाम दिये बकरी के बच्चे, मुर्गियाँ वगैरह ले लेने, दो संथाल स्त्रियों को जबरदस्ती भगा ले जाने और हत्या तक की घटनाओं के विवरण दिये हैं।”9

     सूदखोरों, जमीदारों, व्यापारियों, यूरोपियनों और सरकारी अफसर एवं मुलाजिमों के जुल्म के कारण संथाल किसान भारी संकट में आ गया था। संथालों की शांतिप्रियता की वजह से उन्हें दब्बू और कायर समझ लिया गया। सहने और समय बीतने के साथ जुल्म बढ़ता गया। बढ़ते जुल्म से संथालों में बेचैनी और असंतोष बढ़ने लगा था। संथालों के गाँवों के गाँवों में विचार-विमर्श होने लगा कि आखिर क्या किया जाए? कौन सा सही रास्ता निकाला जाए? बहुत समय से ये सीधे-सीधे संथाल लोग बड़े सब्र और खामोशी से जुल्म सहते आए थे। पर जुल्म कम होने की जगह बढ़ता ही गया था। आखिरकार तत्कालीन व्यवस्था ने उन्हें खुली बगावत का रास्ता अख्तियार करने पर मजबूर कर दिया। जहाँ सरकार ने संथालों के पिछले विद्रोह 1811, 1820, 1830 से कोई सबक नहीं सीखा।

    संथाल किसान प्रतिरोध के आगे दमनकारी स्थानीय पुलिस, जमीदारों के एजेंट महाजन और व्यापारी सिर पर पैर रख कर भागे। इस पराजय से अंग्रेज सरकार घबराकर मार्शल लॉ’ (फौजी कानून) क्षेत्र में लागू कर दिया। फौज को यह छूट दी गई ‘‘बागियों को नेस्तनाबूद करने के लिए जो कार्रवाई जरूरी समझे करें।’’10

    स्थानीय जमींदारों, दूर दराज के रैयत वाले नवाब, राजाओं ने निजी सहायता दी और साधन भी मुहैय्या कराए। जैसे भी इन विद्रोही किसानों को खत्म कर दिया जाए। ‘‘जमींदारों और नीलहे साहबों ने भी सरकार की सहायता के लिए अपने साधनों का उपयोग किया।...मुर्शिदाबाद के नवाब नाजिम ने भी ‘‘अपने निजी खर्च पर हाथियों का एक दल भेजा। 27 सितम्बर को बर्दवान के कमिशनर ने लिखा कि विद्रोहियों के खिलाफ जो सेनाएं भेजी गयी थी, उनका पूरा खर्च गोरे नीलहे साहबों ने दिया था।... इस आन्दोलन को खत्म करने के लिए बागियों की हत्या करने के फरमान से लेकर संघर्षशील नेताओं पर इनाम की घोषणा की गई। बगावत के सरगना के लिए 100,00 रूपये, हर दीवान (इनकी संख्या 3 या 4 मानी जाती थी) के लिए 5,000 रूपये, परगना हर छोटे मुखिया के लिए 1,000 रूपयेका ऐलान किया गया। 3050 रूपये मासिक वेतन पर गढ़वालियों का एक रक्षा दल नियुक्त किया गया। रास्तों की निगरानी, तथा सुरक्षा करेगा और गोपनीय सूचनाएं फौज को मुहैया करायेगा ।”11

    ये इतिहास का वर्ग संघर्ष लग रहा था जहाँ सारा दमनकारी शोषक वर्ग एक तरफ हो गया था। दूसरी तरफ शोषित जुल्म सहने वाले संथाल किसान और उत्पीड़ित शोषित किसान का  वर्ग था ‘‘हमें जो खबरें मिली हैं, उनसे मालूम होता है कि ग्वाले, तेली और दूसरी जातियाँ संथालों को जालिमाना हरकतों के लिए भड़का रही हैं और उनकी रहनुमाई कर रही है। ये लोग उन्हें खबरें देते हैं उनके लिए नगाड़े और डुगडुगी बजाते हैं, उनकी कार्यवाही का संचालन करते हैं और उनके गुप्तचरों का काम करते हैं। इन लोगों को और लोहारों को, जो उनके तीर और कुल्हाड़े बनाते हैं, माकूल सजा दी जानी चाहिए और सरकार विद्रोहियों के खिलाफ जो ऐलान करना मुनासिब समझती है, उसमें फौरन इन्हें भी शामिल कर लेना चाहिए।’’12

    ये शोषित वर्ग अलग-अलग जाति और अन्य आदिवासी अस्मिताओं में बंटें थे पर शोषण, जुल्म से मुक्ति चाहता था। इनका संगठन संरनात्मक ढांचा अपने स्वभाव और जरूरत अनुसार सुदृढ़ और अनुशासित था। जुलाई को भागलपुर के कमिश्नर के नाम उसने जो पत्र लिखा, उससे साफ मालूम होता है कि संथाल किन तरीकों से अपनी लड़ाई चला रहे थे। उसने लिखा हमने सुना है कि विद्रोही छोटे-छोटे जत्थे बनाकर चलते हैं लेकिन नगाड़ों की आवाज पर वे दस-दस हजार की तादाद में जमा हो जाते हैं। उन बगावतों की तरह, जिनमें जनता उठ खड़ी होती है| विद्रोहियों ने भी छापामार लड़ाई और उसके एक स्थान पर अपने दोस्तों को इकट्ठा करने की सैनिक प्रणाली अपनाई। भारतीय रंगमंच पर संथाल विद्रोहियों के दलों का आना एक नया ही अनुभव था। यह पहली जन-सेनाएं थीं और उनमें भाड़े के टट्टू नहीं, बागी किसान थे, जिन्होंने अत्याचारियों के खिलाफ हथियार उठाया था। यह उनके संगठन और उनके स्वैच्छिक अनुशासन की बहुत बड़ी कामयाबी थी, कि बिना किसी फौजी-ट्रेनिंग के 10,000 से भी अधिक आदमियों को थोड़े समय की ही सूचना पर जमा कर लिया जाता था या अपनी-अपनी जगहों पर भेज दिया जाता था।’’13

     इस संदर्भ में ताकतवर वर्ग अपनी एकता, कार्यनीति, रणनीति से विद्रोहियों को दबा दिया। तत्कालीन रूप निर्दयी, क्रूर दमनकारी साम्राज्यवादी सेना इस किसान आन्दोलन को दबा दिया। सम्पूर्ण रूप से इसको कुचलने में असफल रहा। यह विद्रोह बिना रक्तपात के नहीं दबाया गया। उसमें हृदयहीनता के साथ, जो निर्दयी साम्राज्यवादियों के लिए ही संभव थी, इस विवरण को इस तरह समाप्त किया गया है...दरअसल उनमें से आधे लोग मार डाले गये। इसका अर्थ यह है कि इससे पहले कि विद्रोह को पूरे तौर से दबाया जा सका, 30 से 50 हजार विद्रोहियों में से 15 से लेकर 25 हजार तक को कत्ल कर दिया गया। जुलाई और अगस्त के चिरस्मरणीय दिनों में राजमहल की पहाड़ियाँ खून से नहवाई गई। कान्हू और विद्रोह के दूसरे नेता फरवरी 1856 के तीसरे हफ्ते तक जमात्रा के उत्तर-पूर्व में ऊपरबंदोह नामक स्थान पर पकड़े गये और उन्हें फांसी दे दी गई।

      अंग्रोजी भारत मित्रऔर कलकत्ता रिब्यूजैसी आन्दोलन की समकालीन पत्रिकाओं के संपादकीय से मालूम होता है, 15 से 25 हजार संथालों की हत्या से भी संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने, जो जिंदा बच रहे थे, उनके लिए और भी सख्त सजाओं की मांग की गई। भारत मित्रके संपादक ने लिखा है – ‘‘खून के प्यासे इन जंगलियों ने न तो उम्र का लिहाज किया है और न औरतों का। उनके दिलों में खौफ और दहशत पैदा करके ही हम इस बगावत को दबाने की उम्मीद कर सकते हैं। उन्होंने जो शर्मनाक जुर्म किये हैं उनका बदला लेना और किसानों को आगे न हरकतों से बचाना जरूरी है। संथाल यह समझते हैं कि वे बड़े मजे से महीना भर तक कत्ल और लूटमार कर सकते हैं और इसके लिए जरूरी नहीं कि उनसे बदला लिया जाएगा। अगर सरकार संगीनों की नोंक पर बैठी रहना नहीं चाहती, तो यह बिल्कुल जरूरी है कि ख्याल उनके दिलों से हटा या मिटा दिया जाए। इस उद्देश्य की सफलता के लिए उन्हें जो सजा दी जाए, वह मुकम्मल होनी चाहिए, ताकि भविष्य में दंगाइयों को कामयाबी की कोई सूरत नजर न आए, वह इतनी हौलनाक हो कि हर आदमी यह जान और समझ जाए कि बगावत का क्या नतीजा होता है, और वह इतनी सख्त और पुर असर हो कि लोग यह जान जायें कि उनकी जिंदगी और खुशहाली सस्ते दामों में नहीं बिक सकती। हम इन संथालों को पेगू रवाना कर देंगे और उनके एक-दो सरदारों को नहीं, बल्कि जिन जिलों में बगावत का असर है, उनकी तमाम आबादी को हिन्दुस्तान अभी उस मंजिल पर नहीं पहुँचा है कि यहाँ पर सशस्त्र विद्रोह को उसी तरह नजरअंदाज कर टाल दिया जाए, जैसा कि अंगरेज मिनिस्ट्री ने चार्टिस्टों20 के एक जत्थे को मांफी देकर या आयरिश दशभक्तों के एक गिरोह को देश निकाला देकर किया। संथालों को सजा देने का काम एक स्पेशल कमीशन सुपुर्द किया जाए, जैसा 1838 में कनाडा में किया गया था. या अगर इस तरीके को अनुचित समझा जाए तो भी उनके गाँवों पर लूटमार की रकम के बराबर जुर्माना लगाया जाए और जर्माने की रकम उनके बीच बांट दी जाए, जो उनके सताए गये हैं. इस कौम को सजा देने के लिए और अंग्रेजी हुकूमत का रोब और दबदबा फिरसे कायम करने के लिए, यह जरूरी है कि आप संथाल जनता बिना सजा पाये न रहने पाये.’’14 इस तरह संथाल किसान के प्रतिरोध को कुचल दिया गया. संथाल किसान और देश के अन्य भाग के किसानों पर जुल्म और अत्याचारों का अंत नहीं हो गया. उल्टे, ये दमन, शोषण हत्याचार और भी बढ़ गया. फिर भी संथाल विद्रोह एक महत्वपूर्ण दिशा में पूर्ण सफल रहा. सरकार को संथाल जाति को संज्ञान में लेना पड़ा. इस क्षेत्र-वर्ग समुदाय से आने वाले लोगों का एक राजनीति इकाई मानना पड़ा. तत्कालीन राज्य सत्ता को संथाल किसानों की विशेष सामाजिक-आर्थिक स्थिति को मान्यता देने के लिए मजबूर होना पड़ा.

     संथाल किसान प्रतिरोध की गूँज देश के अन्य भागों में सुनाई पड़ने लगी. देश में छोटे-बड़े आदिवासी किसान के सैकड़ों विद्रोह हो रहे हैं. औपनिवेश कालीन साम्राज्यवादी और सामंती गठबंधित राज व्यवस्था में सैकड़ों छोटे-बड़े आदिवासी किसान विद्रोह हुए। जिसे राज्य सत्ता ने अपने वर्ग शत्रुओंको शत्रुओकी तरह ही कुचल कर रख दिया। जिनमें ‘‘पहाड़िया सिरदार 1778, कोली (1784-1818), चौरी आन्दोलन (1795-1800), छोटा नागपुर विद्रोह (1807-08), गुजरात का भील विद्रोह (1809-28), असम आदिवासियों का विद्रोह (1828), मुडा विद्रोह (1834), महान कोल विद्रोह (1831-32), संथाल विद्रोह (1855, इसकी विस्तृत चर्चा ऊपर की गई है), उड़ीसा का जुआंग विद्रोह (1861), कोमा आदिवासी विद्रोह (1862, 18791880), नागा विद्रोह (1879), मणिपुर विद्रोह (1891), बिरसा मुडा (1920-21), भूमकाल (1910-11), वर्ली विद्रोह (1946-48), नागा विद्रोह (1963-71), मिजो विद्रोह (1966-71), बिहार, आन्ध्र प्रदेश, उड़ीसा, झारखंड जैसे राज्यों के आदिवासी अंचलों में मौजूद प्रतिरोध की लहरों को गिना जा सकता है.’’15

     ये प्रतिरोध साम्राज्यवाद और सामंतवाद के विरुद्ध था. संरचनात्मक जुल्म और शोषण के खिलाफ एक नई व्यवस्था को प्रस्तुत भी कर रहे थे. अल्प काल के ही सही उन्हेंने अंग्रेजी साम्राज्यवाद और देशी सामंतवाद से आजाद (मुक्त) घोषित कर दिया था. ये आन्दोलन सम्पूर्णता में कई प्रवृत्तियों के विरूद्ध शरू हुए थे। ‘‘इन विद्रोहों की जड़ों में थे सामंती और औपनिवेशिक सत्ताओं द्वारा लादी गई उत्पीड़क भू-व्यवस्था, बाहरी शासन मशीनरी, बढ़ते औद्योगिकीकरण के दबाव, जल-जंगल-जमीन पर वैध-अवैध कब्जा, आदिवासी संस्कृति का विकृतिकरण, अमौद्विक अर्थव्यवस्था का बाजारीकरण, सरल व एकल आयामी देशज प्रौद्योगिकी का सामंतीकरण और बहुआयामी जटिल प्रौद्योगिकी की प्रतिस्थापना जैसे कारण.’’16 इन आन्दोलनों की प्रतिरोधी संस्कृति से आदिवासी किसान प्रभावित होकर नई ऊर्जा के साथ अपनी मुक्ति की राह और सपना देख रहा है। ये इन प्रतिरोधों की महत्वपूर्ण और सार्थक सफलता है.

गैर आदिवासी समाज जिसे मुख्यधाराका समाज भी कहा जाता है. इस समाज के किसानों को जातिगत सामंती शोषण, उत्पीड़न के साथ औपनिवेशिक दासता को भी झेलना पडा। भूमिहीनता, पलायन, बंधुआ मजदूरी, बेगार, अकाल जातिगत भेदभाव छुआछूत, औपनिवेशिक मशीनीकरण से लघु एवं कुटीर उद्योग का ह्रास, अंग्रेजों की प्रत्यास गुलामी जैसी भयानक समस्याओं से किसानों को जूझना पड़ रहा था. अत्यधिक मालगुजारी, सूद की ऊँचीदर और जमीन से बेदखली, बार-बार पड़ने वाले अकाल ने देशभर के किसानों को आन्दोलित कर दिया। किसान वर्ग तंगहाली, बदहाली और लाचारी में जीने को मजबूर हो रहा था. देशी-विदेशी शासक शौकत के साथ जिंदगी का आनंद लेकर जी रहे थे. किसानों को ये प्रवृत्ति ने भी आक्रोशित किया था. एक वर्ग की भूख लाचारी से हत्या हो जा रही थी. किसान अन्य गरीब सेवारत कर्मचारियों का खून खौलने लगा था। जो दक्षिण से लेकर उत्तर तक किसान व सैनिक विद्रोह की श्रृंखला बन गई.

  किसानों के अंदर धधक रही ज्वाला को उन्होनें आंदोलन के रूप में रूपांतरित किया था. इन्हीं आंदोलनों में चंपारण और अवध के किसान आंदोलन है. चंपारण में औपनिवेशिक, अंग्रेजी राज्यसत्ता और उनके दलाल भू-स्वामी जमींदारों ने भांति-भांति तरह से किसानों पर जुल्म ढाहें और शोषण किया. उनकी ऊपज और संपत्ति की लूट खसोट करते थे. 23 जुलाई 1917 ई. को प्रताप (औपनिवेशिक कालीन दौर में किसान चेतना एवं उनके सवालों पर लिखने वाला महत्त्वपूर्ण पत्र था जिसे कानपुर से गणेश शंकर विद्यार्थी निकलते थे) ने लिखा की चंपारण के नीलू गया जी के पंडों की भांति मुर्दे की जायदाद से लूट खसोट करते हैं. जब किसी का पिता मर जाता है और उसका पुत्र कोठी में मालगुजारी दाखिल करने के लिए जाता है तब बिना माल ऐठे मृत पिता का आमालनामा उसके पुत्र के नाम से नहीं लिखा जाता।"17 चंपारण के किसान पर अन्य तरह के शोषण के बारे में युवा आलोचक रामाज्ञा शशिधर अपनी पुस्तक 'किसान आंदोलन की साहित्यिक जमीन में लिखते हैं 'चंपारण में गोर बागान मालिकों ने 19वीं सदी में किसानों में एक इकरारनामा लिया जिसके अनुसार किसानों को एक बीघा खेती के लिए तीन कठ्ठे में नील बोना पड़ता था. इसे तिनकठिया पृथा कहते थे. 1900 ई के बाद कृत्रिम रंगों ने नील बाजार में धक्का दिया। पहले विश्वयुद्ध के दौरान नील व्यापर में ज्यादा मंदी आने के कारण गोरे जमींदारों ने चंपारण के किसानों पर सारा आर्थिक बोझ लाद दिया, नील उगाने की बाध्यता से मुक्ति के बदले उन्होनें शरहबेगी (लगान वृद्धि) अथवा (एकमुश्त मुआवजा) की मांग की' चंपारण में जो अबवाब तीन रूपए बीघा वसूली किया जाता था उसे कहीं सलामी कहीं तिनकठिया और कहीं लगान कहा जाता था. 1917 ई. के आस-पास चंपारण में आर्थिक शोषण अपने चरम पर था." 18 (किसान आंदोलन की साहित्यिक जमीन, रामाज्ञा शशिधर पेज १४)  इस शोषण, जुल्म के खिलाफ चंपारण के किसान लामबंद हुए थे और उन्होंने मुक्ति के लिए संघर्ष छेड़ दिया था. एक स्तर पर शोषणकारी वर्ग को पीछे हटकर किसानों से बातचीत और समझौते के लिए मजबूर होना पड़ा था.

    इसी तरह से अवध किसान आन्दोलन (1920-22) प्रारम्भ हुआ. यहाँ स्थाई बंदोबस्त वाली भूमि व्यवस्था के दलाल भू-स्वामी ने जबरिया लगान, नजराने और बेगारी कठोर रूप में लागू कर दी थी. बाबा रामचंद्रदास, सहदेव सिंह और झिंगुरी सिंह के नेतृत्व में रूरे किसान सभा से शुरू हुए इस आन्दोलन ने कुछ ही महीनों में एक और अवध के तल्लुकोदारों और ब्रिटिश सरकार के लिए चुनौती खड़ी कर दी थी. बाबा रामचंद्र गिरमिटिया मजदूर के रूप में कार्य करने फिजी गए थे. वहां से वापिस लौटने के बाद उन्होंने अवध क्षेत्र के जिलों में जाकर किसानों के बीच घूम घूमकर उनकी समस्या जानी, समझी. किसानों के चेतना स्तर पर जाकर बातचीत की, रामायण जनचेतना में कहीं गहरे से जड़ जमाई है. उन्होंने रामायण का पाठ करना शुरू कर दिया. रामायण के माध्यम से बाबा रामचंद्र किसानों को इकठ्ठा करके उनसे रूबरू होते और किसान जीवन की समस्याओं पर चर्चा करते, उन्हें समाधान खोजने को कहते थे. स्वयं को भी किसानों के ऊपर होने वाले जुल्म और शोषण के खिलाफ प्रतिकार के लिए तैयार रखते थे. किसान थोड़े ही दिन में बाबा रामचंद्र को अपना अगुआ घोषित करते हैं. किसान की आपसी एकता और संगठन इतना मजबूत हो गया कि थोड़ा बहुत जुल्म होता और वे उसके खिलाफ उठ खड़े होते और उसके विरुद्ध संघर्ष छेड़ देते. अवध के क्षेत्र में बढ़ते किसान संघर्ष की चेतना से भयभीत होकर तत्कालीन राजसत्ता ने उनके नेताओं को गिरफ्तार कर लिया था, जिस वजह से हजारों की संख्या में किसानों ने जेल को घेर लिया था. मजबूर होकर सरकार ने उनको बिना शर्त रिहा कर दिया था.“1920 ई. के अंत में कुछ किसान नेताओं की छोटे अपराधों में गिरफ्तारी नें समस्याओं के अंतर्विरोध को और तीखा कर दिया. उनका मुकदमा प्रतापगढ़ शहर में होने वाला था, लेकिन सुनवाई के अवसर पर किसानों ने हजारों की संख्या से अदालत का अहाता खचाखच भर दिया था. हजारों ग्रामीण किसान उसी जेल के रास्ते पर खड़े थे, जिसमें किसान नेता रखे गए थे. मजिस्ट्रेट ने पहले तो सुनवाई स्थगित करने का निश्चय लिया लेकिन जब यह देखा कि भीड़ ने जेल को घेर रखा है तो जेल के अन्दर ही सुनवाई करके नेताओं को छोड़ दिया गया. जवाहरलाल के अनुसार यह किसानों की एक बड़ी जीत थी जिसने उनके मन में अपने संख्या बल के बारे में विश्वास पैदा किया." 19

     इस घटना के बाद अवध क्षेत्र के किसानों की एकता बढ़ गयी जिसमें उन्हें अपनी मुक्ति और जरूरत पूरी होने की आशा दिखने लगी. उन्होनें लगान देना बंद कर दिया, जमींदारों की फसल और पूँजी और बाजार से जरूरी चीजें छीनकर अपनी जरूरी जरूरत पूरी करने लगे. किसान अपने आन्दोलन को व्यापक बनाने के लिए जगह-जगह सभाओं का आयोजन करने लगे. इन किसानों के वर्ग संघर्ष को शुरूआती स्तर पर थोड़ी सफलता मिली. उन्होनें जमींदार और राजाओं को भगाकर उनके मजबूत इलाके में भेज दिया, जहाँ उनके अंग्रेज मालिक लाखों की सेना के साथ ऐश कर रहे थे. अंग्रेजों ने अवध प्रांत सेना भेज दी. वहीँ किसान नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया. किसानों पर राजकीय आतंक के साथ भयानक दमन हुआ. साम्राज्य विरोधी ताकतें भी इसका मौन समर्थन करती रही. वहीँ युक्त प्रान्त के वकीलों की शहरी किसान सभा और कांग्रेस के जमींदार समर्थक चरित्र का पोल खोल दिया. अवध में असुरक्षित काश्तकारों ने लड़ाइयां लड़ी जो बेदखली के कारण सर्वहारा ही थे. 1921 ई. में बाबा रामचंद्र की गिरफ्तारी के कागजात आज भी प्रतिबंधित हैं. इससे पता चलता है कि यह आन्दोलन क्यों विफल किया गया.”20

    अवध किसान आन्दोलन में सामंती तत्वों और उनके गुंडों को किसान पराजित करके खदेड़ देते हैं. साम्राज्यवादी अंग्रेजी सेना अपने पालतू वफादार जमींदारों की सहायता में आ जाती है. ये अंग्रेजी राजसत्ता का जमींदारों को संरक्षण था. कांग्रेस और गाँधी किस तरह इन सामंती तत्वों में राजभक्ति की जगह देशभक्ति की भावना पहचान लेते हैं.किसानों को अभी चुप रहना चाहिए, ये स्वाधीन होने का समय है जमींदारों का जुल्म शोषण सह लेना चाहिए, जबकि सामंती व्यवस्था अंग्रेजी साम्राज्यवादी संरचना के आधार के अनुरूप ही थी. सामंतों, जमीदारों को बचाना उनके जुल्म को टालना और छुपाना अंग्रेजी साम्राज्यवाद को ही मजबूत करना था. स्वाधीनता आन्दोलन के समय कांग्रेस के अंग्रेजी साम्राज्यवाद विरोध और सामंती प्रेम के संबंधों का सूक्ष्मता से अध्ययन से ही वास्तविक वर्ग पक्षधरता समझ में आ सकती है.

इसके बाद देश में दो बड़े किसान आन्दोलन हुए, जिन्हें हम तेभागा औए तेलंगाना के रूप में जन सकते है. तेभागा और तेलंगाना गरीब किसानों द्वारा चलाए गए महत्वपूर्ण आन्दोलन थे. दोनों औपनिवेशिक दौर में शुरू हुए थे. भूमिहीन किसानों का भूमि पर उनका वास्तविक हक़ दिलाने की कोशिश करते थे. तेलंगाना किसान आन्दोलन स्वतंत्रता के बाद भी जारी रहा, जिसका तात्कालिक अंत प्रगतिशील, जनपक्षधर, समाजवादी हृदयवाले स्वतंत्र भारतके पहले मुखिया पं. जवाहरलाल नेहरु की सेना ने बड़े देशी अन्दाज में किया था. तेलंगाना के किसान अमानुषिक शोषण और उत्पीड़न से जर्जरित थे. उनके सर पर कितने ही तरह के कानूनी और गैर कानूनी टैक्स थे, उसका हिसाब करना कठिन है. इन शोषकों में प्रधान व्यक्ति थे निजाम , उसके बाद थे जमींदार, जमींदार और देशमुखों का दल. जागीरदार थे बड़े जमींदार. करीब आधा तेलंगाना उनके अधिकार में था. बाकी आधा देश्मुखों के हाथ में था. ये देश्मुख एक ज़माने में निजाम के लिए लगान वसूल करने वाले अधिकारी थे..........निजाम के पास कुल जमीन थी. एक करोड़ पचास लाख बीघा. 15 लाख भू-दास इस जमीन पर खेती का काम करते थे. उससे निजाम की आय होती थी पांच करोड़ रूपए प्रतिवर्ष. उसके आलावा राज्य बजट निजाम 10 लाख रूपए प्रतिवर्ष पाते थे. इसके सिवाय हैदराबाद के अधिकांश कल कारखानें के बड़े बहादुर थे. निजाम के हीरा-मोती और सोने के आभूषणों का दाम कम से कम 600 करोड़ रूपए था.

     निजाम के इस अमानुषिक शोषण शासन के हिस्सेदारों की कुल संख्या थी ग्यारह सौ. निजाम अपने इन 1100 लोगों से मिलकर हैदराबाद की एक करोड़ दस लाख जनता का शोषण करता था. इन 1100 जमींदारों और देश्मुखं के पास कुल 1 करोड़ बीघा जमीन थी. पूरे राज्य के कुल जमीन के 5 भाग में 3 भाग. इन 1100 परिवारों में से सिर्फ 10 परिवारों की वार्षिक आय थी 10 करोड़ रूपए. हैदराबाद के किसानों पर कुल 80 करोड़ रूपए का कर्ज था. और इस कर्ज के अदाई किए हुए सूद का सब पैसा इन्हीं दस परिवारों के हाथ में आता था. यह है भारत के सामंतवादी समाज के बड़े स्तम्भ हैदराबाद के सामंतवर्ग के शोषण का एक संक्षिप्त हिसाब. इसी शोषक वर्ग के कल्पनातीत शोषण और उत्पीड़न के विरुद्ध तेलंगाना के किसानों ने क्रांति की लाल पताका ऊड़ाई थी और इन्हें भगाकर ही तेलंगाना के किसानों ने एक करोड़ आठ लाख बीघा जमीन को शोषण मुक्ति किया था और इस शोषण मुक्त इलाके में प्रतिष्ठित की थी. भारत की प्रथम जनतांत्रिक शासन व्यवस्था.”21

    तेलंगाना में जनसंघर्ष से वहां किसानों का शासन स्थापित होने लगा. 1948 के पहले 6 महीने के अन्दर ही अत्याचारी जमींदार, देशमुख, जोतदार आदि के हाथ से 30 लाख बीघा जमीन छीन ली गयी. छीन लेने के साथ साथ ही वह जमीन गरीब किसानों, खेत मजदूरों आदि के बीच बाँट देने के बाद जमीन का मालिकाना हक़ उन किसानों का दे दिया.

     कुल तीन तरह की जमीन जब्त की गयी थी. पहली तो वह सब जमीन जो देशमुख, जमींदार ,जोतदार, आदि से छीन ली गयी थी, वह सभी जब्त कर ली गयी. दुसरे वह सब जमीन जो किसानों से देशमुख जमींदार, महाजन आदि ने छीनी थी, उसे जब्त कर जिनकी जमीनें थी, उन्हें लौटा दी गयी. तीसरे प्रोम्बाक या परती जमीन जब्त कर उसे किसानों में बाँट दिया गया.

   इस संघर्ष से किसानों पर जुल्म उत्पीड़न कम हुआ. उन्हें कई पुरानी परम्परागत प्रवृत्तियों से छूट मिली. यह सामंतवादी शासन को ख़त्म करने के लिए किसानों का एक क्रन्तिकारी सशत्र संग्राम था. मुक्ति क्षेत्रों में किसान समितियों ने कृषि कार्यक्रमों को लागू किया. यद्यपि यह काम पूरा नहीं हो पाया. फिर भी 30 लाख एकड़ जमीन का वितरण किया गया, बेगार बंद कर दी गयी, अवैध शोषण और सामंतवादी दमन ख़त्म कर दिए गये. बेदखली बंद कर दी गयी और न्यूनतम मजदूरी लागू कर दी गयी. इस संघर्ष ने कृषि क्रांति के सवाल को बिल्कुल सामने ला दिया जिसके फलस्वरूप कांग्रेस पार्टी को भूमि सुधार कार्यक्रम लेने के लिए मजबूर होना पड़ा.”22


    भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का यह पहला सशस्त्र संघर्ष था. इसमें  हज़ारों किसान तथा पार्टी गुरिल्ला मारे गए और बड़ी संख्या में कम्युनिस्ट कार्यकर्ता तीन से चार साल तक जेल में रहे. आजादी के बाद देश में सामाजिक आर्थिक उत्पीड़न (जुल्म) शोषण के खिलाफ कई महत्वपूर्ण किसान आन्दोलन हुए हैं. जिसमें नक्सलबाड़ी आन्दोलन, श्रीकाकुलम(केरल), भोजपुर(बिहार) और अन्य बहुत सारे आन्दोलन हुए. इनकी परंपरा और ऊर्जा के श्रोत औपनिवेशिक दौर में हुए कृषक व अन्य क्रन्तिकारी आन्दोलन ही थे. तेलंगाना से किसान आन्दोलन अपने संरचनात्मक स्वरुप में आने लगे. जो आज भी अपनी निरंतरता बनाए हुए है.

1.        रामशरण जोशी: किसान समाज और दूसरे संघर्षशील जन. (लेख) हंस, अगस्त, 2006. पृ.101.

2.            एल. नटराजन: भारत के किसान विद्रोह (1850-1980). पृ.28.

3.            वही. पृ 29.

4.            अभय चरण दास: भारतीय किसान. पृ 54-55.

5.            कलकत्ता रिव्यू (लेख) (1856). पृ 238 240.

6.            वही. पृष्ठ० 238

7.            वही. पृष्ठ० 239

8.            वही. पृष्ठ० 240

9.            वही. पृष्ठ० 245

10.          एल. नटराजन: भारत के किसान विद्रोह (1850-1980). पृ. 38

11.          वही पृ 40

12.          वही पृ 39-40

13.          वही पृ 36-37

14.          वाही. पृष्ठ०43

15.          एल. नटराजन: भारत के किसान विद्रोह (1850-1980). पृ.43

16.       रामशरण जोशी: किसान समाज और दूसरे संघर्षशील जन. (लेख) हंस, अगस्त, 2006. पृ.101
17.          वही. पृ.101

18.          गणेश शंकर विद्यार्थी: प्रताप (सप्ताहिक, 23, जुलाई 1917), प्रताप कार्यालय कानपुर.

19.         रामाज्ञा शशिधर: किसान आंदोलन की साहित्यक जमीन. पृ 17.

20.          महेद्र प्रताप: उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन. पृ. 58-59.

21.          रामाज्ञा शशिधर: किसान आंदोलन: वैचारिक परिपेक्ष्य. (लेख) हंस, अगस्त, 2006. पृ.129

22.          वीर भारत तलवार (संपादक): नक्सलबाड़ी के दौर में. पृ.459.



सुशील कुमार 
शोधार्थी,भारतीय भाषा केंद्र ,जेएनयू 
मो.9868650154, ईमेल -skkumarsushil01@gmail.com
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