Latest Article :
Home » , , , , , , » बाबा नागार्जुन के उपन्यास ‘बलचनमा’ में अभिव्यक्त किसान जीवन/ऐश्वर्या पात्र

बाबा नागार्जुन के उपन्यास ‘बलचनमा’ में अभिव्यक्त किसान जीवन/ऐश्वर्या पात्र

Written By Manik Chittorgarh on शनिवार, नवंबर 11, 2017 | शनिवार, नवंबर 11, 2017

त्रैमासिक ई-पत्रिका
अपनी माटी
(ISSN 2322-0724 Apni Maati)
वर्ष-4,अंक-25 (अप्रैल-सितम्बर,2017)
किसान विशेषांक
               
बाबा नागार्जुन के उपन्यास बलचनमामें अभिव्यक्त किसान जीवन/ऐश्वर्या पात्र

अपने लेख का प्रारंभ मैं बाबा नागार्जुन के उस गिरफ्तारी से करना चाहूँगी जो अमबारी में किसान आंदोलन (1939 ई.) का नेतृत्व करने के कारण हुआ था। वह उनकी पहली जेल यात्रा थी। उपन्यास लिखने की कला उन्हें जेल के अन्दर राहुल जी के सान्निध्य से प्राप्त हुई। इससे पूर्व वे ज्यादातर कविताएँ लिखा करते थे और उनकी मैथिली कविताओं में भी किसान जीवन के संघर्ष, दु:ख और करूणा की मार्मिक अभिव्यक्तियाँ विस्तार के साथ फैली हुई  हैं, और क्यों न हो वे स्वंय भी तो गरीब किसान परिवार से थे। अत: बाबा नागार्जुन के इस किसान प्रेम के संबंध में मदन कश्यप लिखते हैं – “नागार्जुन की किसान चेतना का विस्तार तीस के दशक में सहजानंद सरस्वती के किसान आंदोलन के दौरान हुआ। वे राहुल सांकृत्यायन के साथ किसान संघर्ष में शरीक हुए। ... बाबा सक्रिय रूप से आंदोलन में कूद पड़े और जेल भी गये। उन दिनों जड़ पार्टीबद्धता से ग्रस्त बुद्धिजीवियों-आलोचकों ने बाबा पर हमला भी किया। उनके विरूद्ध पुस्तिका निकाली गयी। मगर वह नागार्जुन की किसान चेतना थी जिसने जनता के मनोभावों को पकड़ा और आंदोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित किया और उसी किसान चेतना के बदौलत वे आजीवन कम्युनिस्ट बने रहे, जबकि उन्हे पानी-पी-पी कर कोसने वाले क्रांतिकारी सबके सब उत्तर-आधुनिक हो गये।”1 मदन कश्यप के इस कथन से एक बात स्पष्ट हो जाती है कि नागार्जुन ने किसान जनित समस्याओं को बड़े ही करीब से देखा है और कहीं न कहीं उस यथार्थ को आत्मसात भी किया है। तभी तो उनकी कविताओं से लेकर उपन्यास तक सब में किसान-मजदूर से संबंधित विभिन्न समस्याओं की चर्चा है। प्रेमचंद की भाँति बाबा नागार्जुन ने भी वर्ग संघर्ष के तत्व को अपनी रचनाओं में जगह दी है।


                        नागार्जुन एक साथ जनवादी कवि, विरोधी प्रकृति के व्यक्ति और खांटी राजनीतिक लेखक हैं। उनकी रचनाओं को सीमित दृष्टि से कभी आंका ही नहीं जा सकता। वे भले ही प्रेमचंद की परंपरा के लेखक हैं लेकिन उनके विद्रोही स्वभाव, राजनीतिक समझ और तो और समाज के प्रति उनका जो समर्पण भाव है उसी के कारण उनके सारे पात्र संघर्ष की बात करते हैं। प्रेमचंद जहाँ विद्रोह का संकेत भर ही देते हैं वहीं पर नागार्जुन विद्रोह कर के दिखाते हैं। बलचनमा केवल जमींदारों के शोषण और अत्याचार की गाथा ही नहीं बल्कि किसान विद्रोह का और उसके संघर्ष की भी गाथा है। गोपाल राय के शब्दों में – “ ‘बलचनमाकेवल इसलिए उल्लेखनीय उपन्यास नहीं है कि उसमें कृषक-मजदूरों के अत्याचार और शोषण की सही तस्वीर है, वरन् इसलिए भी कि उसमें नागार्जुन ने जमींदारों से किसानों के संघर्ष की शुरुआत की कहानी लिखी है। प्रेमचंद किसानों की गरीबी, बेकारी और जहालत की कहानी लिख गए थे, पर उनकी मुक्ति की दास्तान वे नहीं कह पाए थे। प्रेमचंद के उपन्यासों में जमींदारों के विरुद्ध किसानों का विद्रोह केवल सांकेतिक होकर रह गया है, वे उसे सही कलात्मक परिणति नहीं प्रदान कर सके हैं। गोदानका होरी तो खैर विद्रोह करने वाली पीढ़ी का आदमी ही नहीं है पर नई पीढ़ी का गोबर भी इस दृष्टि से उल्लेखनीय पात्र नहीं बन पाया है। लगता है, ‘गोदानका गोबर ही बलचनमा के रूप में सही रूप में उभरा है। अपनी आदर्शवादी मन:स्थिति के कारण प्रेमचंद गोबर के चरित्र को यथार्थवादी परिणति नहीं दे पाते, पर बलचनमा का विकास बड़े ही स्वाभाविक रूप में होता है ।”2

                   इस तरह हमारे सामने एक ऐसे उपन्यासकार उभरकर सामने आते हैं जो प्रेमचंद की परम्परा के उपन्यासकार कहलाते हैं। गोपाल राय इसके सम्बन्ध में लिखते हैं – “नागार्जुन प्रेमचंद की परम्परा के उपन्यासकार है । अंतर यह है कि जहाँ प्रेमचंद ने उत्तर-प्रदेश के अवध-बनारस क्षेत्र के किसानों की कहानी के माध्यम से समस्त उत्तरी भारत के किसानों की भाग्य-गाथा प्रस्तुत की, वहाँ नागार्जुन ने मिथिला अंचल को अपने उपन्यास का विषय बनाया। पर बड़ा अंतर यह है कि उपन्यास क्षेत्र में प्रेमचंद के उत्तराधिकारी होकर भी नागार्जुन प्रेमचंद की तरह मिथिला के किसानों के जीवन का अंकन उतने व्यापक फलक पर नहीं कर पाए । उनका विजन’, उनकी दृष्टि-परिसर प्रेमचंद की तरह व्यापक और वैविध्यपूर्ण नहीं है।’’3 गोपाल राय का उपर्युक्त कथन किसी हद तक सही है कि नागार्जुन में प्रेमचन्द की भाँति मार्मिक प्रसंगों की पकड़ नहीं है जिसके कारण उनके अनेक उपन्यास उतने प्रसिद्ध नहीं हो पाए जितने की प्रेमचंद के उपन्यास हैं। किन्तु सौ बात की एक बात यह भी है कि जो विद्रोही स्वर 'बलचनमाके मार्फ़त पाठकों तक पहुँची हैं वह बाबा नागार्जुन को उपन्यास के क्षेत्र में प्रतिष्ठित करने के लिए पर्याप्त है।

                        अतः यह कहना गलत न होगा कि 'बलचनमाअपनी कथ्य में किसी भी दृष्टिकोण से गोदान से कम नहीं है। गोदान अगर हिंदी साहित्य का अब तक का अनूठा उपन्यास है तो बलचनमाभी अपने आप में सम्पूर्ण हैं। किसान मजदूरों की गाथा उसमें कूट - कूटकर भरी है। कुल मिलाकर हम ये देख सकते हैं कि प्रेमचंद और नागार्जुन दोनों ने अपनी-अपनी जगह पर रह कर  किसानों की कथा बड़ी ही मार्मिकता के साथ दर्शाया है । एक ने अवध-बनारस के किसानों की करूण कहानी कही तो दूसरे ने मिथिला के किसानों की कही पर दोनों ने बड़ी ही पैनी नजर से किसान-मजदूरों की कटु यथार्थ का चित्रण किया है, जिससे स्वयं गोपाल राय भी सहमत होते हुए नजर आते हैं और कहते हैं- बलचनमा नागार्जुन का वह उपन्यास है जिसने उपन्यासकार के रूप में उन्हें प्रतिष्ठापित किया और यह दुखद सत्य है कि वे फिर उस ऊँचाई तक न पहुँच सके। इसका कारण संभवतः यह है कि बलचनमाकी रचना के पीछे एक गहरी प्रेरणा, मिथिला के किसानों की अभाव और शोषण पूर्ण जिन्दगी का तीखा अनुभव है। यहाँ नागार्जुन का मिथिला के निम्न वर्गीय जीवन का समस्त अनुभव एक प्रभावशाली विजनके रूप में परिणत हो गया है, जिसके कारण उपन्यास सहज-सशक्त बन गया है। बलचनमामें मिथिला के ग्रामीण जीवन का उत्कट यथार्थ अपनी सम्पूर्ण प्रखरता में चित्रित हुआ है।”4

        नागार्जुन ने बलचनमा के माध्यम से स्वाधीनता पूर्व जमींदारों के शोषण और दमन का चित्रण बड़े ही बारीकी से दिखाया है। उदाहरण स्वरुप बलचनमा का यह संवाद द्रष्टव्य है, जिसमें वह कहता है – “मैंने मन ही मन सोचा- अच्छा तो भगवान् करते ही हैं। चार प्राणी का परिवार छोड़कर मेरा बाप मर गया, यह भी भगवान ने ठीक ही किया। भूख के मारे दादी और माँ आम की गुठलियों का गुद्दा चूर-चूरकर फाँकती हैं, यह भी भगवान ठीक ही करते हैं। और, सरकार आप कनकजीर और तुलसीफूल के खुशबुदार भात, अरहर की दाल, परवल की तरकारी, घी, दही, चटनी खाते हैं, सो यह भी भगवान की ही लीला है। चौकोर कलम बाग़ के लिए आपको हमारा दो कट्ठा खेत चाहिए और हमें चाहिए अपने चौकोर पेट के लिए मुट्ठी भर दाना। अच्छी तरह मुझे याद नहीं है कि माँ को जबरन कैसे राजी किया गया, लेकिन मझले मालिक का कलम बाग़ आखिर चौकोर हो ही गया। बदले में बटायी के तौर पर धान का खेत तो कौन कहे, अंगूठे का वह पुराना निशान भी वापस नहीं मिला। कहा गया कि मिल नहीं रहा है, कागजात के नीचे तुम्हारा वह छोटा-सा पुरजा कहीं दब गया है।”5

                    गरीबों का जमीन हड़प लेना जमींदारों के लिए कितनी आम बात थी उसका यहाँ पर पर्दाफाश हुआ है। इसके अतिरिक्त  जमींदारों और महाजनों का सूदखोरी का भाण्डाफोड़ भी हुआ है। जिसका प्रमाण छोटी मलिकाइन का यह संवाद है- कामत सफ़ेद पत्थर की गोल मटोल पनसेरी जब तोलने लगे तो ठुड्डी हिलाकर बराम्हनी बोली - ऊँ हूँ! यह नहीं है वह बटखरा जिससे तौलकर मिला था... ऊँ हूँ... हँ ऽ ऽ ऽ ! सच बघारने आयी है - गरजकर मलिकाइन ने कहा देखो तो कामत, फूदन मिसर की यह विधवा क्या बक रही है? जब पेट जलने लगता है तब तो आ-आकर नाक रगड़ती है, ईसर-परमेसर, अनपुर्ना-लछमी जाने क्या-क्या बनाकर पैर पकड़ती है ! मौके पर न दो धान तो समूचे गाँव को बरमबध लगेगा, दो तो लौटाते समय... फटता है ! संइयाडाही, कहती है कि बटखरा बदला हुआ है !!”6

                   सूदखोरी एवं जमीन हड़पने से जमींदारों का पेट नहीं भरता तो वे गाँव के गरीब किसान के बहु-बेटियों पर बुरी नजर डालने से भी पीछे नहीं हटते थे। जमींदारों की इसी बेहयाई को बलचनमा कुछ इस प्रकार बयान करता है – “हाँ, तो हमारा गाँव जमींदारों का गाँव था। बड़े घरों के क्या जवान, क्या बूढ़े, बहुतेरे की निगाह पाप में डूबी रहती थी। गौना होकर कोई नई-नवेली किसी के घर आती तो इन लुच्चों की आँख उसकी घूँघट के इर्द-गिर्द मंडराया करती। जब तक आधी-पौनी निगाह से ये उसे देख न लेते तब तक नींद न आती, बदमासों को । कई बार ऐसा होता कि जिसे देखने को बाप बेताब हो उठता उसी पर बेटा भी फिदा !”7 उसी प्रकार बलचनमा की बहन रेवनी के साथ बलात्कार की कोशिश बाबू लोगों के बेहयाई का नमूना है। रिलीफ फंड का घपला करना और गरीबों का पैसा आपस में बाँट लेना जमींदारों के बेईमानी का सबूत है। समझे भैया, बीस आदमियों के नाम सवा पाँच सौ रुपए की खैरात लिखी गई लेकिन लोगों को मिले सिरिफ दो सौ छ: रुपए! कुएँ सुधारने के नाम पर एक हजार रुपैया मिला। उस रकम को छोटे मालिक ने, बल्ली बाबू और दासजी ने आपस में बाँट लिया था।”8 अत: हम देख सकते है कि बलचनमाभारतीय किसानों पर होने वाले अमानुषिक अत्याचारों की अभिव्यक्ति  है। नागार्जुन ने जमींदारों-सामंतों की इन्हीं सूदखोरी, बेईमानी, घपला जैसे प्रवृत्तियों पर करारा प्रहार किया है।

        बलचनमा के मार्फ़त किसान समाज के विभिन्न पहलूओं पर पाठकों की दृष्टि पहुँची है। जिसमें बलचनमा अपनी जीविकापार्जन के लिए मजबूरी के कारण उसी अत्याचारी मालिक के पास काम करता है जो उसके पिता का हत्यारा होता है । बलचनमा न चाहते हुए भी सामन्ती जीवन का त्रासदी झेलता है । गरीबी के कारण शिक्षा से तो वंचित रहता ही है साथ ही साथ अपने खेलने कूदने के दिन में जमींदारों के यहाँ मजदूरी करने पर विवश हो जाता है। जमींदारों के अनैतिक व्यवहारों, निर्ममता तथा गाली गलौज से पीड़ित होता है । वास्तव में गरीबी नरक है भैया, नरक । चावल के चार दाने छींटकर बहेलिया जैसे चिड़ियों को फँसाता है उसी तरह ये दौलतवाले गरजमंद औरतों को परपंच (प्रपंच) में फँसा मारते हैं ! उनके पास धन भी होता है और अकल भी होती है । अपरंपार होती है उनकी लीला।”9  समय के साथ बलचनमा मजदूर से किसान और किसान से पुनः मजदूर बनता है। लेकिन किसान के परिश्रम का मीठा स्वाद उसने चखा है। वह मेरी उपजाई हुई पहली फसल थी। डेढ़ कट्ठा खेत में छ: पसेरी मड़ुआ हुआ था। कितना मीठा होता है अपनी मेहनत का फल, खुद के उपजाए हुए मड़ुआ की लाल रोटी खाकर पेट चाहे भर जाए, हियाव नहीं भरेगा तुम्हारा; हाँ।”10 

      बलचनमा और होरी में बस यही अंतर है कि होरी भारतीय किसान की दुर्बलताओं और अभावों का प्रतीक है जबकि बलचनमा आधा किसान और आधा मजदूर है। इसके बावजूद नागार्जुन ने बलचनमा में स्वतंत्रता के बाद जो किसान आन्दोलन हुए है उसे नए सिरे से पेश किया है। उपन्यास के अंत में बलचनमा का माड़ खा कर जमीन पर बेहोश होकर गिरना एक नयी राजनीतिक चेतना को विकसित करता है। कहीं न कहीं बलचनमा ये दिखाने में सफल हुआ है कि सामंती प्रथा का नाश और किसानों की आजादी यूँ ही घर बैठे-बैठे नहीं मिलने वाली है। किसानों को अपने हक के लिये बाबू लोगों के विरूद्ध जाना ही पड़ेगा। वर्षों से चली आ रही गुलामी प्रथा के विरुद्ध अपनी आवाज बुलंद करनी ही पड़ेगी। किसानों को विद्रोह करना ही होगा। वस्तुत: किसान और जनसाधारण में जन जागृति उत्पन्न कराना एक तरह से बलचनमा का ध्येय बन गया है। बलचनमा के द्वारा नागार्जुन ने किसानों मजदूरों को संगठित कर सामंत वर्ग के विरुद्ध संघर्ष का नया रास्ता दिखाया है। जो इस प्रकार है किसान भाइयो, माँगने से कुछ नहीं मिलेगा। अपनी ताकत से ही अपना हक आप पा सकते हैं। आपकी ताकत क्या है? एका है आपकी ताकत, संगठन।”11

                     इस के अतिरिक्त बलचनमाउपन्यास में जमींदारों की अनैतिक कर्मों को नागार्जुन ने कई जगह पर उजागर किया है । जैसे सिर्फ दो आम के लिए बलचनमा के पिता को खूंटी से बांधकर पीट-पीटकर मार देना उसी निर्ममता का उदाहरण है। कितना भयावह दृश्य है जब एक चौदह साल का बच्चा अपने पिता के मृत्यु का बखान इन शब्दों में कर रहा हो – “बारह बरस की उम्र में मेरा बाप मर गया। ... मालिक के दरवाजे पर मेरे बाप को एक खभेली के सहारे कसकर बाँध दिया गया था। जाँघ, चूतर, पीठ और बाँह सभी पर बाँस की कैली के निशान उभर आए हैं। चोट से कहीं कहीं खाल उधड़ गई है और आखों से बहते आँसुओं के टघार गाल और छाती पर से सूखते हुए नीचे चले गये हैं ... चेहरा काला पड़ गया है। होंठ सूख रहे हैं। अलग कुछ दूर पर छोटी चौकी पर यमराज की भाँति मझले मालिक बैठे हुए हैं। दाएँ हाथ की उँगलियाँ रह-रह मूँछों पर फिर जाती हैं... उनकी वह लाल और गहरी आँख कितनी डरावनी है, बाप रे ! मेरी दादी काँपते हाथों मालिक के पैर छाने हुए है।  उसके मुँह से बेचैनी में बस यही एक बात निकल रही है कि दुहाई सरकार की, मर जाएगा ललुआ ! छोड़ दीजिए सरकार ! अब कभी ऐसा न करेगा, दुहाई मालिक की ! दुहाई माँ-बाप की... और माँ रास्ते पर बैठी हाय-हाय करके रो रही है, और मैं भी रो रहा हूँ। मेरी छोटी बहन की तो डर के मारे हिचकी बँध गई है।”12   

                   ‘बलचनमाबाबा नागार्जुन के किसान जीवन का बेजोड़ नमूना है। इस में वो सभी समस्याएँ हैं जो आज भी किसी न किसी रूप से हमारे समाज में मौजूद हैं। किसानों की गरीबी, भ्रष्टाचार, लूट - खसोट जैसी अनैतिकता आज भी भारतीय गाँव की सच्चायी है। आज भले ही सरकार और सरकारी-गैर सरकारी संस्थाओं के प्रयासों से   समाज में  फैले सामंती तत्वों और प्रथाओं के उन्मूलन की कोशिशें हो रही हैं, पर यह अभी भी समाज में व्याप्त है।  गरीब किसानों की हालत बहुत दयनीय है। स्वतंत्रता के बाद सरकार ने ऐसी बहुत सारी योजनाएँ बनायीं, जिनसे किसानों को आगे बढ़ने में काफी मदद मिली है। लेकिन यह दुर्भाग्य है विकास के तमाम् दावों के बावजूद 21 वीं सदी में किसान आत्महत्या करने पर विवश हैं। बढ़ती उद्योग संस्था के कारण भारतीय किसान संस्कृति खतरे में है। हिंदी साहित्य में अब किसानों के लिये बहुत कम जगह रह गयी है। हिंदी साहित्य में गिने-चुने पुस्तक ही हैं जिनमें किसानों की बात कही गयी है। ऐसे में बाबा नागार्जुन की बलचनमाकी प्रासंगिकता और भी अधिक महसूस होती है।

संदर्भ
  1. •             गद्य कोश (ई सामग्री) किसान चेतना और प्रतिरोध (मदन कश्यप) / नागार्जुन लेख से उद्धृत
  2. •             आधुनिक हिंदी उपन्यास 1, संपादक भीष्म साहनी, रामजी मिश्र, भगवतीप्रसाद निदारिया, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठ – 67
  3. •             वही, पृष्ठ – 66
  4. •             वही, पृष्ठ – 67
  5. •             नागार्जुन रचनावली 4, संपादक शोभाकान्त, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, बलचनमा, पृष्ठ – 135
  6. •             वही, पृष्ठ – 139
  7. •             वही, पृष्ठ – 166-167
  8. •             वही, पृष्ठ – 225
  9. •             वही, पृष्ठ – 167
  10. •             वही, पृष्ठ – 168
  11. •             वही, पृष्ठ  – 235
  12. •             वही, पृष्ठ – 127

ऐश्वर्या पात्र
शोधार्थी,हिंदी विभाग,अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय,हैदराबाद – 500 007, 
मो. 7382549517, ई-मेल aisoryapatra@gmail.com
Share this article :

0 comments:

Speak up your mind

Tell us what you're thinking... !

'अपनी माटी' का 'किसान विशेषांक'


संस्थापक:माणिक

संस्थापक:माणिक
अपनी माटी ई-पत्रिका

सम्पादक:जितेन्द्र यादव

सम्पादक:जितेन्द्र यादव
अपनी माटी ई-पत्रिका

सह सम्पादक:सौरभ कुमार

सह सम्पादक:सौरभ कुमार
अपनी माटी ई-पत्रिका

यहाँ आपका स्वागत है



यहाँ क्लिक करके हमारी डाक नि:शुल्क पाएं

Donate Apni Maati

रचनाएं यहाँ खोजिएगा

हमारे पाठक साथी

सम्पादक मंडल

साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका
'अपनी माटी'
========
प्रधान सम्पादक
सम्पादक
सह सम्पादक
तकनिकी प्रबंधक
========
संपर्क
apnimaati.com@gmail.com
========

ऑनलाइन

Donate Us

 
Template Design by Creating Website Published by Mas Template