वक्तव्य : रामचरित मानस हमारी जातीय चेतना का अंग है -प्रो. कुमुद शर्मा - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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वक्तव्य : रामचरित मानस हमारी जातीय चेतना का अंग है -प्रो. कुमुद शर्मा

               रामचरित मानस हमारी जातीय चेतना का अंग है : प्रो. कुमुद शर्मा

तुलसी हिन्दी साहित्य के एक ऐसे कवि है, जिनका विरोध भी हुआ और जिन पर विवाद भी हुए। ये बात सही है कि उनसे सहमत और असहमत हुआ जा सकता है लेकिन उनके साथ रहना हमारे समाज का विवशता है, हमारी लाचारी है। एक सवाल उठाया था अवनिजेश अवस्थी ने .... उन्होंने कहा कि रामचरितमानस अवधी में लिखा गया और बाद में संस्कृत में लिखा गया। लोकभाषा में क्यों लिखा गया ये सवाल मेरे मन में भी पैदा हुआ। अवधी को जानने वाले लोग कम थे। उसकी बजाय भोजपुरी की संख्या ज्यादा थी, फिर भी क्या वजह है कि तुलसी अवधी  को चुनते हैं, वह शायद इसलिए कि अवधी  में लिखेंगे राम का चरित, रामचरित मानस तो स्थानीयता के कारण उसमें प्रामाणिकता का पुट ज्यादा होगा और विश्वसनीयता ज्यादा होगी मुझे लगता है कि यही कारण है कि तुलसी अवधी को चुनते हैं।

अवनिजेश जी ने यह बात उठाई कि मध्यकाल था, निरंकुशता थी.... उसके बीच जब रामराज्य की परिकल्पना उभर कर आती है तो तुलसी को एक कवि के रूप में में, मर्यादा पुरूषोत्तम के रूप में प्रतिष्ठापित करती है। प्रमोद जी ने भी एक बात कही कि सम्पूर्ण मनुष्य बनाने की बात, ... सम्पूर्ण मनुष्य बनाने की एक परिकल्पना हमारे सामने तुलसी रखते हैं.... ये एक बड़ी बात है, जिसकी वजह से उनका साहित्य बहुत दूर तक जाएगा।

कुछ और सूत्र भी थे जो इस समय मंच से निकल कर आए.... तुलसी की प्रासंगिकता को लेकर। देखिए मैं अगर आज यहाँ खड़ी हूँ तो इसकी वज़ह से नहीं है कि मेरा विषय मध्यकाल है क्योंकि मैं आधुनिक काल की हूँ, आधुनिक काल पर मेरा विशेष अध्ययन है, मीडिया पर मेरा विशेष अध्ययन है लेकिन जिस तरह से परवरिश हुई और शैक्षिक प्रांगण में, देश में, समाज में जो एक परिवेश था उसमें मध्यकालीन साहित्य से अलग नहीं रहा जा सकता था। मेरे गुरू डा. जगदीश गुप्त उन्होंने मुझसे कहा था कि तुम आधुनिक  साहित्य पर काम कर रही हो, लेकिन याद रखना जो विद्यार्थी मध्यकाल को नहीं समझता वो सही मायने में अध्यापक नहीं हो सकता है। इसलिए जब मध्यकाल पर बोलने की बात आती है तो मैं मना नहीं करती, सोचने की बात आती है तो भी मना नहीं करती .... और इस नाते से आज यहाँ पर हूँ एक पाठक के नाते से। तुलसीदास आधुनिक साहित्य में तो आते ही हैं, आधुनिक साहित्य में उनके मूल-मंत्र यात्रा करते हैं, लेकिन अगर हम पीछे जाए तो हम देखेंगे कि जब तुलसी का प्रादुर्भाव होता है, साहित्य और समाज के पटल पर तो वह क्रांतिकारी भूमिका में आते हैं.... सांस्कृतिक दृष्टि से।.... लेकिन आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को ये कहना पड़ता है कि हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में तुलसी का आना एक चमत्कार की तरह है।

 जार्ज ग्रियर्सन को यह कहना पड़ता है कि उत्तर भारत में तुलसी महात्म बुद्ध के बाद दूसरे नायक हैं। क्या वजह है कि तुलसी को नायकत्व मिलता है? तुलसी भारतीय समाज में ही नहीं, वे भारत से निकल कर त्रिनिनाद, चायना, फीज़ी तक पहुँचते हैं और आज अमेरिका और इग्लैंड की भूमि पर भी पढ़े जाते हैं। उनका रामचरितमानस दूर-दूर तक गूँजता है... क्या बात है। ... हम प्रासंगिकता की बात करते हैं। मैं समझती हूँ कि उसका जो कारण है, वह यह है कि तुलसी के काव्य की लोकप्रियता का, उसकी सार्वभौम स्वीकृति का, कि तुलसी अपने काव्य के फलक पर संबंधों का एक व्याकरण गढ़ते हैं और संबंधों का ऐसा व्याकरण गढ़ते हैं कि वह आपके जीवन जीने की आचार-संहिता सिखाया जाता है, वह ऐसा धर्म  सिखाता है जो विश्व-धर्म  बन जाता है... ये रामचरितमानसकी प्रासंगिकता पर लगातार तीन दृष्टियों का आलोचकों ने चर्चा की है। वे तीन बिन्दु हैं,.. दार्शनिक दृष्टि से जब प्रासंगिकता पर चर्चा हुई, तो उससे तुलसी के काव्य-ग्रंथों का अर्थ निर्धारण हुआ नैतिक दृष्टि से जब चर्चा हुई तो उनके काव्य में जो कन्टेन्ट है, जो रस है उसको मूल्य बोध के रूप में विवेचित करने की बात आई और जब तात्विक दृष्टि से प्रासंगिकता की बात हुई तो जो घटनाएँ रामचरित मानस में घटती हैं, उन घटनाओं के बीच कारण-कार्य संबंध क्या है, उनका अर्थ-विश्लेषण करने की कोशिश हुई और इन सब के बीच तुलसी समादृत रहे हमारे भारतीय पैमानों पर सवाल है- आज तुलसी की क्या प्रासंगिकता है... जबकि हम तमाम तरह के आयातित चश्मों से चीजों को देखने के आदी हो गए हैं। अगर मैं जगत की बात करूँ तो वहाँ पर मानव अधिकार की बात होती है, दलित-विमर्श की बात होती है, स्त्री-विमर्श की बात होती है, सामाजिक थ्योरी की बात होती है... तमाम तरह की थ्योरी हमने पश्चिमी देशों से आयात कर ली हैं और उन चश्मों से हम साहित्य को देखने की कोशिश करते हैं।

सवाल ये भी पैदा होता है कि आज समय बहुत तेजी से बदल रहा है आप आज की युवा पीढ़ी को किस तरह बताएंगे कि आज तुलसी का रामचरित मानस और तुलसी आपके जीवन में तुलसी की कितनी अहमियत है, कैसे बताएंगे? ये युग हाई टेक्नोलॉजी का युग है, कृषि, सभ्यता के युग से आगे बढ़कर आप हाई-टेक्नोलाजी के युग में पहुँच गए हैं... ये भूमण्डलीकरण का युग है, ये बाजारवाद का युग है, ये पॉप-कल्चर का युग है, बच्चे इनके रंग में रंगे हुए हैं, तब तुलसी की क्या प्रासंगिकता है? इस सवाल के जवाब में मैं टाईम्स ऑफ़ इंडियाकी कल की एक खबर का उदाहरण देना चाहूँगी। खबर थी कि- आज पूरे विश्व में व्यक्तिवाद का अंधड़ बह रहा है... सर्वे किया गया कि 1907 के बाद से लेकर 51 वर्ष तक लगातार ये सर्वे हुआ और उस सर्वे के बाद जो तथ्य निकलकर आए हैं, उसमें यह कहा गया कि व्यक्तिवाद में 12% की बढ़ोत्तरी हुई है और ये माना गया कि आज संचार- माध्यमों के जरिए, हाई-टेक्नोलाजी के माध्यमों के जरिए आज का मनुष्य अपने देश से निकल कर अन्य देशों के लोगों तक पहुँच रहा है लेकिन दूसरी तरफ उसके सामूहिकता के वृत्त सिकुड़ रहे हैं और व्यक्तिवाद के खेल में वह लगातार सिमटता जा रहा है... नतीजा क्या है कि आप मनोवैज्ञानिक बिमारियों के शिकार हो रहे हैं। क्या वजह है कि दीपिका पादुकोण के पास यश भी है, पैसा भी है लेकिन उसके बाद भी वह डिपै्रशन का शिकार होकर, हास्पिटल में एडमिट होती है। सायक्लाजिकल साइंसनाम की एक पत्रिका में यह बताया गया है कि इसका कारण है कि आर्थिक वैभव और पश्चिमी संस्कृति जो पश्चिमी संस्कृति हमें अकड़ रही है उससे आज हम क्लचर लैक के शिकार हो रहे है कान्द्रा- कल्चररेशन के शिकार हो रहे है, डिकल्चररेशन के शिकार हो रहे है.....तब.....आपके पास जो विकल्प बचता है तो वह है तुलसी का व्यावहारिक प्रतिमान। तुलसी का सांस्कृतिक प्रतिमान जो हमारे पास है लेकिन पूरे विश्व के पास आज के समय में यदि कल्चर अलटरनेटिव है तो वो है तुलसी का राम-चरितमानस... ये एकमात्र ग्रंथ है जो एक ऐसी संस्कृति को एक ऐसी आचार संहिता को सिखाता है जिसकी सार्वभौम स्वीकृति है। प्राण जाए पर वचन न जाई-धर्म -निष्ठा का ऐसा आदर्श रखते है कि तुलसी कि जिसकी सार्वभौमिक स्वीकृति हो जाती है... तुलसी रामचरितमानस के माध्यम से पारिवारिक, सामाजिक, और राजनीतिक मूल्यों का बीज रोपते हैं। बात आई थी रामराज्य की....तो एक बात मैं भी कहना चाहती हूँ। एक पंक्ति आती है- जो अनीति कछु भाखौं तो मोहि बरजो भय बिसराईतुलसी राम के मुख से कहलवाते है।

अपनी प्रजा को कि अगर तुम्हें कहीं अनीति दिखाई देती है, तो निर्भय होकर मुझसे कहो...इसे कहते है अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता... जिस रामराज्य में प्रभुता राजा के पास नहीं है, प्रभुता प्रजा के पास है जहाँ प्रजा का हर व्यक्ति...एक व्यक्ति की असहमति से राम-सीता को निर्वासित कर देते है उस सीता को जो उनके हृदय पर राज करती है, अपने हृदय के निर्वासन को राम सहते है एक व्यक्ति की असहमति से, क्योंकि वे लोकतऩ्त्र में विश्वास करने वाले व्याक्ति है प्रजा की प्रभुता को स्वीकार करते है ये निरंकुशता और दासता के बीच जिस लोकतन्त्र की परिकल्पना तुलसी करते है उसी पर पूरे विश्व का लोकतन्त्र आगे पलता है उसी पृष्ठभूमि पर पूरे विश्व का लोकतन्त्र संवर्धित होता है, संरक्षित होता है और उसी आधार पर जिस रामराज्य की परिकल्पना तुलसी ने की है आपका स्वाधीनता आंदोलन उसी पर लड़ा जाता है। याद कीजिए जब 1920 में स्वाधीनता आंदोलन की बागडोर गाँधी के हाथ में आती है, गाँधी का पदार्पण होता है तो अपने स्वराज्य की कल्पना वे रामराज्य से लेते हैं।

रामराज्य के आधार पर उनके स्वराज्य की कल्पना है जहाँ आत्मबल है, रामराज्य में जो  आत्मबल है, जो दृढ़ता है, वो वहाँ दिखाई देती है और गांधी के स्वराज्य में जो विभिन्न परिप्रेक्ष्य बाद में उभर कर आते हैं उन सबके सूत्र रामचरितमानस में मिल जाएंगे। मित्रों! लोग कहते है तुलसी कहते हैं, तुलसी अप्रासंगिक है, मध्यकाल पढ़ने की क्या जरूरत है, मध्यकाल पाठ्यक्रमों से बाहर कर दिया जाता है। समाजवादियों की ओर से राम पर लगातार आक्रमण होते हैं, आरोप होते हैं, लेकिन समाजवाद के चोटी के नेता क्या कहते हैं राम के बारे में जरा सुन लीजिए- राम मनोहर लोहिया कहते हैं कि... एक राह होती है और राम के पीछे चला जाता है। और आगे हम उनकी बात को उत्साह देते हैं कि राम के पीछे चलने में मजा आता है, उन्होंने एक राह चुनी और हमें बस उस राह पर चलना है। राम ने निर्णय लिया, बहुत कठिन निर्णय लिया, बड़ा मुश्किल निर्णय लिया लेकिन उन्होंने निर्णय की कड़ी बना दी कि इस निर्णय पर हमें चल निकलना है। कवि कविता करता है, गायक गाने गाता है, चित्रकार चित्राकारी करता है पर इसमें सुनने वाले दो देखने वाले को बहुत से सूत्र मिल जाते हैं। ये तुलसी के राम है जो मसले जाते हैं। इन पर आरोप भी लगते रहे। ये बात मेरे मन में भी आई कि ये कैसे राम हैं जो पत्नी का त्याग करते हैं वो भी गर्भवती पत्नी का। लेकिन बहुत गौर से यदि देखें तो उसके पीछे भी किस आदर्श की परिकल्पना है। हम आज स्त्री के सामर्थ्य की बात करते हैं, स्त्री की शक्ति की बात करते हैं। जिस समय राम ने सीता को निर्वासित किया उस समय क्या राम जानते नहीं थे कि सीता गर्भवती है, अगर उनको सीता की शक्ति और सामर्थ्य पर विश्वास नहीं होता तो अपनी भावी संतानों का भविष्य वे खतरे में नहीं डाल सकते थे। लेकिन उस सीता की शक्ति पर सामर्थ्य पर उनको विश्वास था और उन्होंने अपने व्यक्तिगत हित का शांति का परित्याग लोक के लिए अपनी प्रजा के लिए किया। उसने कहा थामैं अगर आप देखें तो व्यक्तिगत प्रेम का बलिदान देश के लिए है। यहाँ पर राष्ट्र बड़ा है आपके व्यक्तिगत प्रेम से... तो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की भूमि आपको रामचरितमानस में दिखती है। बहुत सारे लोग कहते हैं कि तुलसी नारी -निदंक हैं... कुछ ऐसी पंक्तियाँ है कि ‘किस विधि सिरजी नारी जग माँही, पराधीन सपनेहुं सुख नाही विधाता ने नारी को किस तरह रचा है कि उसको सपने में भी सुख नहीं है, तो स्त्री  की अस्मिता का मध्यकाल में कोई संकेत दिखा देता है तो वह तुलसी के यहाँ है, कबीर के यहाँ नहीं है, सूर के यहाँ नहीं है। महावीर प्रसाद द्विवेदी युग, निर्माता है एक निबंध में वे लिखते हैं कि जो सरस्वतीमें छपा था स्त्री स्वभाव से सुकुमार होती है, कोमल होती है और अगर धर्म -शास्त्रों ने स्त्री को पुरूषों के अधीन रखने का विकल्प सुझाया तो क्या गलत किया क्योंकि वह आपनी रक्षा आप नहीं कर सकती। लेकिन आप देखिए मध्यकाल में तुलसी ने क्या किया सीता की सामर्थ्य पर विश्वास किया। तो ये तमाम सारे बिन्दु हैं जिनको नए सिरे से खंगालने की जरूरत है। 

आज अगर मैं देखती हूँ तो ये पाती हूँ कि क्यों मेरे लिए तुलसी बड़े हैं उनका रामचरितमानस मेरे लिए क्यों बड़ा है, वह इसलिए बड़ा है कि वह हमारी जातीय चेतना का अंग है, हमारी जातीय अस्मिता का अर्थवान बनाता है, उसमें परम्परा का वैशिष्टय है, हमारी सांस्कृतिक गरिमा के व्यापक आयाम हैं, इस दृष्टि से उसको देखने की जरूरत है। प्रमोद जी ने बात कही मनुष्य की। अगर हम साहित्य के पैमाने की बात करते हैं तो साहित्य का स्व-स्वीकृत पैमाना यदि कोई है तो वो है-मनुष्यत्व की रक्षा। साहित्य जीवन की जटिलताओं का साक्षात्कार कराए लेकिन साथ में साक्षात्कार कराते हुए मनुष्यत्व की रक्षा का संकल्प भी आपके भीतर बचा कर रखे। तो जिस रागात्मक संवेदन में पूरा रामचरितमानस रिश्तों में बाँधता है, वह आज संबंधों के व्याकरण में कितनी खलबली है आप देखिए कितनी स्वार्थपरता है और जिस संबंधों के व्याकरण के ताने-बाने में एक विश्रृखंलित समाज को बाँधने की तैयारी तुलसी के राम चरित मानस में मिलती है वह आज भी हमें रोशनी दिखा सकती है क्योंकि भूमंडलीकरण आपके सामने बहुत सारे ऐसे सवालों को खड़ा करता है कि आप भूमंडलीय दौर में किस तरह अपनी मिट्टी की सौंधी महक को बचा सकेंगे, किस तरह बिखरे हुए समाज को भारतीय तंत्र को लोग भूमंडलीकरण दुष्प्रभावों से स्वयं को बचाएंगे। किस तरह से हमारे मानवीय राष्ट्रीय सरोकार बचे रहेंगे ये हमारी बड़ी चुनौती है मुझे लगता है कि अगर आपके पास तुलसी के काव्य की सांस्कृतिक विरासत साथ-साथ यात्रा करती है तो हमें डरने की बिल्कुल जरूरत नहीं है वहाँ पर ऐसी भूमि है जो व्यक्ति को देश से जोड़ती है रागात्मकता का ऐसा धागा है। और तुलसी हमारे आगे के जो रचनाधर्मी कलाकार हैं, कलाकारों में चाहे वे संगीतज्ञ हों, चाहे वे साहित्य फलक पर हों चाहे गायन के फलक पर, सब तुलसी की वाणी को आगे बढ़ाते हैं। प्रेम और आस्था का रचनात्मक स्वरूप गढ़ने वाला हर रचनाकार बाद का और मानवीयता को पूर्णता में प्रतिष्ठापित करने का सपना पालने वाला रचनाकार वहीं से अपनी जमीन तलाशता है। अवनिजेश अवस्थी ने बात की थी कि निराला तुलसीदासलिखते हैं.... मैं राम की शक्ति पूजाकी बात करूंगी। निराला तुलसी से प्रभावित थे। अब बात करते हैं नरेश मेहता के संशय की एक रातकी वहाँ भी तुलसी की सांस्कृतिक मनोभूमि की यात्रा आपको दिखाई देगी तो आज तुलसी आज के परिप्रेक्ष्य में जहाँ पर कि हम व्यक्तिवादिता के खोल में सिमटते जा रहे हैं, जहाँ स्वार्थपरता हावी है, आपके जीवन पर जहाँ संबंधों की उष्मा भी सूखती चली जा रही है वहाँ पर भारतीय सांस्कृतिक प्ररिप्रेक्ष्य में रागात्मक संबंधों को फिर से पुनर्जीवित करने, के लिए सांस्कृतिक पुनर्जीवन के लिए हमें तुलसी की बार-बार जरूरत होगी।

प्रो. कुमुद शर्मा 
हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली 




प्रस्तुति -
डा. आशा देवी 
असिस्टेंट प्रोफेसर 
अदिति महाविद्यालय 

अपनी माटी(ISSN 2322-0724 Apni Maati) वर्ष-4,अंक-27 तुलसीदास विशेषांक (अप्रैल-जून,2018)  चित्रांकन: श्रद्धा सोलंकी

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