वक्तव्य : रामराज्य जागतिक समस्याओं का आदर्श समाधान है / प्रो. चन्दन चौबे - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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वक्तव्य : रामराज्य जागतिक समस्याओं का आदर्श समाधान है / प्रो. चन्दन चौबे

 रामराज्य जागतिक समस्याओं का आदर्श समाधान है
         
मेरे विद्यार्थी दूर-दूर से मुझे सुनने आते हैं, हर बार आते हैं। वो आते हैं तो मुझे लगता है कि मुझे कुछ ऐसा करना चाहिए जो मुख्य वक्ता जैसा हो। लोग कहते हैं कि आपके नाम के साथ क्या लिखूँ? हिन्दी में नाम के साथ-साथ लिखने की एक परम्परा है। सुप्रसिद्ध फलाना-फलाना मैं कहता हूँ मेरे नाम के साथ हिन्दी था उपभोक्ता लिख दीजिए। मैं हिन्दी का कन्ज्यूमर हूँ। मित्रों! जब तुलसीदास जी पर बात हो रही है और सभी विद्वान बैठे हुए हैं तो आमतौर पर हिन्दी की संगोष्ठियों का माहौल भक्तिनुमा होता है। ग्रियर्सन को पढ़ रहा था। आपको पता है जार्ज ग्रियर्सन हिन्दी के प्राथमिक इतिहास लेखकों में से है। जार्ज ग्रियर्सन द्वारा रचित द माडर्न वर्ना क्यूलर लिटरेचर ऑफ़ हिन्दुस्तानहम सभी पढ़ाते हैं कि हिन्दी का लगभग पहला कायदे का इतिहास है। आप सबको पता है कि सन् 18880 में ‘एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगालमें इसे अपनी पत्रिका के विशेषांक के रूप में छापा था। इसमें लगभग 952 कवियों का ग्रियर्सन विवेचन करते हैं। ग्रियर्सन का उल्लेख एक खास कारण से करना है। आपने पढ़ा होगा कि ग्रियर्सन हिन्दी साहित्य के इतिहास को ग्यारह अध्यायों मे विभाजित करते हैं। उसमें छ्ठा अध्याय तुलसीदास है और आठवाध्याय तुलसीदास है और आठवाँ शीर्षक है तुलसी के अन्य परवर्ती ऐसा आप सभी मानते है कि ग्रियर्सन हिन्दी साहित्य का प्रवृत्तिगत इतिहास लिख रहे हैं, उनकी नजर सांस्कृतिक इतिहास पर थी। ग्रियर्सन अंग्रेज थे श्रीमान जी आप सब जानते हैं, पर उन्होंने वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ़ इण्डिया नहीं लिखा बाल्कि हिन्दुस्तान लिखा। मेरा संकेत उस ओर है जहाँ हिन्दी साहित्य के इतिहास के आरम्भिक दौर में पूरे इतिहास के कालखण्ड को तुलसीदास की केन्द्रियता में कहने की कोशिश हो रही है। तुलसीदास और तुलसीदास के परवर्ती एक तेरे आने से पहले, एक तेरे जाने के बादएक और हिन्दी साहित्य के प्रामाणिक इतिहास पार है- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल। शुक्ल जी का हिन्दी साहित्य में एक बड़ा अनूठा स्थान है। शुक्ल जी ने तरफ जहाँ चपट मारी आज तक वो वहीं सहला रहा है। अगर किसी के बारे में उन्होंने कुछ कह दिया तो पचास साल तक हिन्दी साहित्य उसी पर बहस कर रहा है। कई बार तो लगता है कि मजे-मजे कुछ कह रहे हो और वो हिन्दी साहित्य की दिशा बन बैठी हो। शुक्ल जी जनता की चित्तवृत्ति के साथ साहित्य के स्वरूप में परिवर्तन का इतिहास लिख रहे थे मैं लोगों का उल्लेख इसलिए कर रहा हूँ कि इन दोनों लोगों की इतिहास दृष्टि के केन्द्र मे तुलसीदास है। मित्रों इस केन्द्रियता को रेखांकित करने की जरूरत है। मैं मजाक में कहता हूँ कि ग्रियर्सन और शुक्ल जी न तो साहित्य परिषद् के सदस्य थे और न ऐसा करके उन्हें किसी पुरस्कार समिति का सदस्य होना था। ऐसा क्यूँ कर रहे थे? मैं तो पूरब का आदमी हूँ। मेरा बचपन मानस की चौपाइयों की छांव में बीता है। मेरी अक्षर ज्ञान की प्राथमिक यादें तुलसीदास और रामचरितमानस से जुड़ी हुई हैं इसलिए जब प्रो. पूरनचंद ठण्डन साहब ने आदेश किया तो बिना ये पूछे कि कितना पैसा देंगे , मैंने कहा कि मैं भाषण दूँगा।

तुलसीदास हिन्दी कि विश्वविद्यालयों कवि नहीं है। उनको कवि संगठनों, विश्वविद्यालयों पाठ्यक्रमों ने नहीं बनाया है वे हिन्दी समाज के कवि हैं। हिन्दी समाज अपनी जय-पराजय को जीवन-मरण को, यश-अपयश को उनकी कविताओं में देखता है। उनकी कवितायें पाठ्यक्रमों ने नहीं बनाया है वे हिन्दी समाज के कवि हैं। हिन्दी समाज अपनी जय-पराजय को जीवन-मरण को, यश-अपयश को उनकी कविताओं में देखता है। उनकी कविताएँ जीवन अपनी जागतिकता का समाधन पढ़ लेता है। मित्रों क्या हुआ है हिन्दी की कविताओं मे पालिटिकली करैक्ट और पालिटिकली इनकरैक्ट शब्दावली में पूरा विमर्श चलता है। जैसी सरकार वैसा विमर्श पर 400 साल से हिन्दी जगत में हिन्दी मन में अगर कोई कवि अपनी जगह बनाए हुए है तो कुछ तो कारण होंगे। आप कल्पना कीजिए कि कविता कैसे मंत्र में बदल जाती हैं ; आप सोचिए साहब, हम अपने शुभ-अशुभ को अपने भविष्य के अच्छेपन को इन पंक्तियेां में पिरोते हैं जब चलते हैं तो तुलसीदास की कविताओं से भगवान की अर्चना करके चलते है कि हमारा शुभ-शुभ करना हमारा प्रोमोशन हो जाए। कविता की चरम सार्थकता है कि आपके जीवन के पवित्रतम भावों की अभिव्यक्ति मंत्र के रूप में वो करे। मित्रों तुलसीदास भक्त कवि अवश्य है पर सभी भक्त कवि तुलसी जैसे लोकप्रिय नहीं है। यानी उनकी भक्ति के अलावा भी कुछ ऐसी चीज है जो तुलसीदास को लोकप्रिय बनाती है। क्या है? तुलसीदास की भक्ति और उनके दर्शन और चितन के केन्द्र भले ही ब्रह्य हो परन्तु उनकी कविता के केन्द्र राम लोकनायक है। यह लोक 16वीं-17वीं शताब्दी का भारत है जो मलेच्छा क्रांतिसु सुतेतेसुहै। मैं इन दिनों एक किताब लिख रहा हूँ। आएगी और वह भक्तिकाल के उद्भव पर है। ये मलेच्छा क्रांतिसु सुतेतेसुऔर सोलह आना और चार आना आने वाली पर है कि आखिर क्या कारण है कि ऐतिहासिक तथ्य को झुठलाते हुए भक्तिकाल की और व्याख्याएं की गई-

जहाँ खेती ना किसान को भिखारी को ना भीख भली, बनिज को बनज ना चाकर को चाकरी,
जीविका विहीन लोग सिद्धमान सोच वश कहे एक एकन सो कहाँ जाए का करी।
ये सच......ये सच भारतीय आदमी का सच है। ऐसे कठिन समय में मर्यादा, विवेक

       बणानाम वद संधणाम वशाणाम छंद शाम आपि।
      मंगलाणाम चिकर्तारो वन्दे वाणी विनायको।।

के संस्कार से एक नायकत्व की रचना करना। ध्यान दीजिएगा मंगल और विवेक ये दो शब्द राम-चरितमानस में इतनी बार आए है कि पूरी राम के व्यक्तित्व की केन्द्रियता को उन्नियमित करते हैं। ये तुलसी की जीवन-दृष्टि के आधार भी बनते हुए नजर आते है। मित्रों मेरे पीएच.डी. के विद्यार्थी बैठे हुए है। मैं उनसे अक्सर कहता हूँ कि तुलसी के राम और उनका रामराज्य इसी मंगल और विवेक की निर्मिति है।

                             मंगल करनी करमल हरनी।
                             तुलसी कथा रघुनाथ की।।

            रामराज्य कोई पंथ का राज्य नहीं है। रामराज्य जागतिक समस्याओं का आदर्श समाधान है। वो मर्यादा है एक पत्नीव्रता होने की। लोकापवाद सहने की वह षड्यन्त्रों और कुचक्रों से निरापवाद बाहर निकल जाने की जिजीविषा हैं। इसमें हम अपना होना देखते ही नहीं राज सत्ता को त्यागकर वनवासियों को संगठित करने का भाव, खलनयाकों नष्ट करने की इच्छा और ताकत के नाम है- राम। बाबा पंडित ब्रह्मदेव चौबे जब किसी दुराचारी को शक्तिशाली होता देखते थे तो कहते थे कि रावण चला गया ये भी चले जाएंगे। कविता की चरम सार्थकता काव्य-पाठ के जीवन-पाठ बन जाने में है। तुलसीदास इसके प्रमाण हैं। तुलसीदास ने ऐसे पात्रों की रचना कर रखी है जो मनुज बपुधरी है। तुलसीदास ने राम का चित्रण किया है, मनुज के रूप में और बार-बार चेताते भी चलते है कि कहीं इन्हें अपने जैसे मत समझ लेना। ये लगभग उसी तरह से है कि नायक हमारे बीच खेल रहा है और बार-बार कोई बाहर कसे इशारा कर रहा है। कि खेल तो रहा है परन्तु तुम्हारे जैसा नहीं है। तुम्हारी समस्याओं का समाधान है। मित्रों-

        भोजन करत बोल जब राजा, नहि आवत जब बाल समाजा।
        कौशल लय जब बोलन जाई, हुमक हुमक प्रभु चलि पराई।।

सबके प्रिय ही राम है। मित्रों जब मैं आपसे कह रहा हूँ कौन नहीं जानता कि तुलसीदास के ईश्वर हैं- सीता लक्ष्मी हैं, लक्ष्मण शेषनाग हैं किन्तु तुलसी की श्रेष्ठता के आधार पति राम हैं जो पत्नी को थकी हुई जानकर बड़ी देर तक पैरों से काँटें निकाल रहे हैं। वो पत्नी सीता है जिनके माथे पर चार कदम चलते ही पसीने को बूंदें आने लगती है। और वे लक्ष्मण है जो लरिका है माफ कीजिएगा तुलसीदास को हिन्दी को श्रेष्ठ कवि ब्रह्मा, लक्ष्मी और शेषनाथ ने नहीं बनाया है। अपितु 16वीं-17वीं शताब्दी के उस गार्हस्थ बोध ने बनाया है जिसका पर्यवेक्षण आप तुलसी की कविता में देख सकते है-
पुर ते निकसि रघुवीर वघु घर घीर दये बहुन.......।

        झलकि भरि भार तनि जलकि पुट सूख गए ध्रा ध्र मय।।
        फिर बूझत है चरणों बखैति पर्ण कुटीर तरहो कितवै।
        तिय की लाखिया तुर..........आंखिया अति चार चलू चल चर्व।।

यह सहज मानवीय है। ये ईश्वरत्व नहीं है। ये वो है जहाँ गाँव का आदमी अपनी पत्नी और अपने बच्चे के लिए सब कुछ कुर्बान कर दे। अरे साहब, हम इतने झाड़-वाड़ खाते रहते हैं। डांट-डपट खाते रहते है, किसके लिए? कि अपने परिवार के लिए एक सुन्दर जीवन बनाए। इस राम से वो जुड़ते है। मित्रों सुन्दर जीवन बनाए। इस राम से वो जुड़ते है। मित्रों। यह नायकत्व तुलसी को अमर बनाता है। यह सहज रूप तुलसीदास को अत्यन्त प्रिय रहा होगा इसलिए उन्होंने जमकर और इस लेकर वर्णन किया है।

मित्रों 400 साल बाद भी अगर किसी कविता की याद आती है तो उसके संदर्भवान और प्रीतिकर तथ्य की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। ऐसे ही राम कोल-किरातों के प्रिय है, ऐसे ही राम केवट के प्रिय है, ऐसे ही राम निषाद के प्रिय है और ऐसे ही राम भालुओं के प्रिय है। अरे जरा सोचिएगा रावण ताकतवर है, मेघनाथ और कुम्भकर्ण जैसे लोग उसके पक्ष में हैं। बन्दर, भालू तो राक्षसों के भोजन हैं, परन्तु तुलसीदास के राम बन्दर, भालुओं को संगठित करते हैं। राजसत्ता के बरक्स समाज सत्ता का संग्रह है। ताकत समाज से निकलेगी। ऐसे भी जो लोग कुर्सी से ताकत लेते है, कुर्सी के साथ ही चले जाते हैं। मित्रों निषाद जिस अनौपचारिक आत्मिक शैली में बात करता है राम से, वो सत्ता की भाषा नहीं है वो भागीदारी की भाषा है। सत्ता की भाषा अहम् की भाषा होती है और अहम् की भाषा क्षणिक होती है। भागीदारी की भाषा, प्रेम की भाषा होती है इसलिए वह टिकाऊ होती है। तुलसीदास की भाषा भागीदारी की भाषा हैं साधनहीन लोगों के संकल्प की भाषा है। रावण राम का विरोधी है। वह तुलसी के उन सारे मूल्यों का विरोधी है। वह तुलसी के उन सारे मूल्यों का विरोधी है जिसे राम के नायकत्व के रूप में तुलसीदास स्थापित करते है। वो परपीड़क हैं। इतिहास का एक बहुत बड़ा दंश है कि अत्याचारी शक्तिशाली भी होता है। कविता उस अत्याचारी किन्तु शक्तिशाली का प्रतिपक्ष हे। अरे साहब जिसको आप जीवन में नहीं हरा पाते, उसको कहानियों  में हराते है। वो एक भरोसा है कि तुम हार जाओगे और मैं जीत जाऊँगा, जीत ही गया मित्रों  जब आप तुलसीदास का मूल्यांकन करे तो इस रूप में मूल्यांकन किजिएगा कि तुलसीदास और उनकी रचनात्मकता भारतीय समाज की संभावनाओं का प्र्रमाण है वो हमारे समाज का सपना है और जिस समाज में सपने मर जाते हैं, वो समाज भी मर जाता है। इसलिए  रामराज्य हमारा सपना है। तुलसी और उनकी कविता इस सपने के पक्ष में खड़ी हुई कविता है।

            तुलसी की कविता कहती है कि ‘तुमसे पहले जो शख्स यहाँ तख्त नसीह था उसे भी अपने खुदा होने तुझसे ज्यादा यकीन था’ पर वो चला गया इसलिए तुम भी नहीं रहोगे इसलिए मानवीय बनो। तुलसी की कविता एक संभावना है। आपका धन्यवाद आपने मुझे सुना पर एक बात जरूर तुलसी और तुलसी की कविता हमारे जीवन को निर्देशित करती है, हमारे सपनों को निर्देशित करती है, हमारे भावबोध को निर्देशित करती है।


(प्रो. चन्दन चौबे, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय,दिल्ली)
प्रस्तुति -डॉ. हरकेश कुमार,असिस्टेंट प्रोफ़ेसर,अदिति महाविद्यालय

अपनी माटी(ISSN 2322-0724 Apni Maati) वर्ष-4,अंक-27 तुलसीदास विशेषांक (अप्रैल-जून,2018)  चित्रांकन: श्रद्धा सोलंकी

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