गोविन्द मिश्र के उपन्यासों में शिक्षा व्यवस्था का स्वरूप -अनिल कुमार - अपनी माटी

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गोविन्द मिश्र के उपन्यासों में शिक्षा व्यवस्था का स्वरूप -अनिल कुमार

गोविन्द मिश्र के उपन्यासों में शिक्षा व्यवस्था का स्वरूप/ अनिल कुमार 

गोविन्द मिश्र हिंदी के चर्चित कथाकार माने जाते हैं, उन्होंने बारह उपन्यास, बारह कहानी संग्रह, यात्रा-वृत्तांत, कविता, आलोचना आदि का लेखन कार्य किया है। आपको को साहित्य अकादमी एवं सरस्वती सम्मान से सम्मानित किया गया है। उनके उपन्यासों में शिक्षा व्यवस्था के वर्तमान स्वरूप की आलोचना की गयी है। 

गोविन्द मिश्र के उपन्यासों में शिक्षा व्यवस्था पर पर्याप्त प्रकाश डाला गया है। शिक्षा मूल्यों की संवाहिका होती है। आज के समय में शिक्षा का बाजारीकरण तेजी से हुआ है। बाजारीकरण के कारण  जिन नैतिक मूल्यों की शिक्षा दी जाती थी, वह गायब हो गयी है। शाम की झिलमिलउपन्यास में गोविन्द मिश्र ने इस सावल को रेखांकित करते हुए लिखा है "मैं जनता हूँ कि मैं बुद्धिमान नहीं पर उस वक्त का आदमी हूँ जब आदमी की नस्ल आज से बेहतर थी। क्योंकि हमारी पढ़ाई बेहतर थी। आज कहाँ हैं पहले जैसे नेता, डॉक्टर, अध्यापक, अफसर कोई भी। हर चीज में गिरावट क्यों हैं-साहित्य, सिनेमा, शिक्षा, संगीत कुछ उठा लीजिये। आज जो हैं उन्हें सामने जो दिखाई देता है, वे उसी से चालित होते हैं, कुछ और सोचने का बूता नहीं, इंटरनेट पर टिके, कल्पनाशीलता से शून्य, सूचनाओं से बजबज नौंनसैसिकल।"[1] गोविन्द मिश्र के कई उपन्यासों में प्राइमरी शिक्षा व्यवस्था से लेकर उच्चशिक्षा व्यवस्था तक की आलोचना की गयी है।   

प्राइमरी शिक्षा व्यवस्था, समाज की बुनियाद होती है, आज वहीं घोर भ्रष्टाचार व्याप्त हो गया है लाल पीली जमीनउपन्यास में खंदिया (बाँदा) के स्कूल में जिला कलेक्टर के खिलाफ छात्रों के द्वारा आन्दोलन और फिर राजनीतिज्ञों के द्वारा राजनीति की कुटिल चालों की ओर इशारा किया गया है सरकार द्वारा प्रदत्त संसाधनों पर क्षेत्रीय नेताओं का प्रभुत्त्व या अधिकार का उल्लेख किया गया है। छोटी उम्र के बच्चे आन्दोलन करके राजनीति को हवा देने का कार्य करते हैं, हाईस्कूल और इंटरमीडिएट के विद्यार्थियों को कलेक्टर आफिस पर उकसा करके अराजक तत्त्वों के द्वारा व्यवस्था को छिन्न-भिन्न किया जाता है। स्कूल में प्रिंसिपल पद की होड़ में राजनीति और उसमें मास्टर कंठी की मौत जैसी स्थितियों का आ जाना भी शामिल है, अस्सी से नब्बे के दशक की यह शिक्षा व्यवस्था जस की तस बनी हुयी है। बोर्ड के इम्तिहान में नक़ल माफियाओं का आतंक और क्षेत्रीय नेताओं की भागीदारी, मनचले छात्रों की गुंडागर्दी जैसी स्थितियाँ दर्शाई गयी हैं, जिनका लाभ स्कूल खोलने वाले राजनेता उठाते हैं। आज का बड़ा व्यवसाय वकीली, राजनीति और शिक्षा हो गयी है। समाज में यदि व्यवस्था सुचारू रूप से चल रही है तो राजनेता को चैन नहीं मिलता है। वकील बोस साहब कोर्ट की वकीली छोड़कर राजनेता बन जाते हैं और स्कूल के बहाने अपनी राजनीति चमकाना चाहते हैं। जिसका साथ पुलिस-प्रशासन, गाँव के मुखिया, जाति के प्रमुख और अध्यापक तथा छात्र तक देते हैं।

 कोहरे में कैद रंगउपन्यास में छोटे-छोटे छात्रों में देश के प्रति भक्ति की भावना स्कूल से भरी जाती है, ‘मैंपहली बार पुलिस कस्टडी में गया था तब से उसे निर्भीक होकर जीने का बहाना मिल गया  था। उन छोटे बच्चों की देश के प्रति निष्ठा, मूल्यों के प्रति निष्ठा थी, आज के परिवेश में अपने स्वार्थ के लिए अध्यापक और राजनेता स्कूल को माध्यम बनाते हैं।  

 ‘पाँच आगानों वाला घरउपन्यास में उच्चशिक्षा प्राप्त आधुनिक युवाओं का उल्लेख किया गया है। तकनीकी ज्ञान प्राप्त करके वे बाजार के लिए एक मशीन बन जाते हैं। उनके भीतर ज्ञान, गरिमा, मानवीय मूल्य या रिश्तों के लिए कहीं जगह ही नहीं बचती है। पाँच आँगनों वाला घरके पात्र रजिंदर के बेटे बंटू की शिक्षा और विदेश के प्रति दीवानी और उसके भीतर बाजारू सम्बन्ध पर भी प्रकाश डाला गया है। इस बहाने लेखक ने देश की समग्र शिक्षा व्यवस्था पर सवाल भी उठाया है। इसमें विदेशी शिक्षा के प्रति बढ़ते रुझान की ओर संकेत किया गया है, नयी टेकनालाजी और विज्ञान की पढ़ाई हेतु भारतीय छात्रों का झुकाव विदेशों की ओर बढ़ गया है। इंजीनियरिंग, बिजनेस की पढ़ाई और चिकित्सा की शिक्षा हेतु बड़ी मात्रा में भारतीय छात्र बाहर के देशो में शिक्षा पाने हेतु गए हैं। साहित्य और समाज से लेकर नयी विचारधारा तक विदेशों से प्रभावित हो गयी है इनमें एक बड़ा तबका उस वर्ग के छात्रों का रहा है जो भारत में उच्चवर्ग से सम्बन्ध रखते हैं, इन छात्रों ने विदेशी तालीम तो हासिल कर ली किन्तु इनके भीतर अपनों के प्रति नए तरह की नफ़रत ने जन्म ले लिया, यहाँ की शिक्षा पद्धति में उन्हें अब यकीन नहीं रहा। बंटू जैसे छात्रों के मन में अब एक ही लालसा है कि वह विदेश में जाकर पढ़ाई करेगा। गोविन्द मिश्र आज की शिक्षा व्यवस्था की ओर से चिंतित होते हुए लिखते हैं कि "जो खास चीज बंटू में बंबई पहुंचकर पनपीविदेश जाने की तड़प, वह इसी सबसे निकली थी, यों इन दिनों इंजीनियरिंग कर रहे सभी लड़के विदेश जाने का ख्बाब देखते थे।"[2] विदेशी शिक्षा के साथ-साथ वहाँ की संस्कृति को वे ग्रहण कर लेते हैं और इस परंपरावादी देश में उन्हें अपने को स्थापित करने में समय लग जाता है। विदेशों का खुला समाज और संस्कृति उनके सामने होती है, वे उससे प्रभावित भी होते हैं लेकिन कुछ के भीतर देश के प्रति नकारात्मक विचार भी उत्पन्न हो जाते हैं। बंटू नयी शिक्षा की रोशनी में पढ़ा लिखा है उसे यहाँ की संस्कृति से चिढ़ हो जाती है, "पापा! देयर इज नो क्वसचन आफ-चाहनाइट डिपेंड्स अगर जौब सटिसफैक्सन हुआ, एवरीथिंग गोइंग फ़ाईन, देन ह्वाट नौट, वहाँ बसा भी जा सकता है।"[3]  

धूल पौधों परउपन्यास में उच्चशिक्षा व्यवस्था को आलोचना के दायरे में लिया गया है      एम.फिल, पीएच-डी. जैसी शिक्षा हेतु आयी हुयी छात्राओं के साथ शिक्षकों के व्यवहार का पर्दाफास किया गया है। विश्वविद्यालयों में सेक्स और शिक्षा का अन्तः सम्बन्ध भी दिखाया गया है। नायिका से उसके शोध निर्देशक के बीच शारीरिक शोषण का और मानसिक ह्रास का भी चित्रण किया गया है। विभाग के प्रो० कैशिक आशिक मिजाज के थे, वे अपने को कुछ हट कर दिखाने के लिए कविता भी लिखा करते थे, नायिका का उन्हीं के अंडर शोधकार्य संपन्न होना था, वे उसे कमरे में बुला लेते और तब तक बिठाए रखते जब तक सब चले न जाते, "प्रो० कौशिक ने उससे साफ़-साफ कहा-तुम जानती हो कि मैं कवितायेँ लिखत हूँ, अपनी संवेदना को जीवित रखने के लिए जरूरी है कि उसे सौन्दर्य का स्पर्श मिलता रहे, जैसे पढ़ाई में मैं तुम्हारी मदद करता हूँ, वैसे तुम कवितायेँ लिखने में मेरी मदद करो। मैं तुम्हें बौद्धिक संतोष दूँगा, तुम भावनात्मक संतोष दो। वह प्रो० कौशिक का इरादा भाँप गयी उस बिंदु पर ला दी गयी, जब उसे अपनी जमीन पर खड़ा हो ही जाना था। जब-जब वह ऐसे किसी मुकाम पर पहुँचा दी जाती तो पता नहीं उसके भीतर क्या हो जाता। रीढ़ की हड्डी तन जाती आँखों में चिंगारियाँ निकलने लगतीं।"[4] उच्चशिक्षा व्यवस्था में बढ़ता 'प्राइवेटाईजेशन' डिग्रीधारी लोगों के सामने समस्या खड़ी कर रहा है, इस पर तल्ख़ टिप्पणी करते हुए गोविन्द मिश्र ने लिखा है, "डिग्री मिलते ही उसने उस शहर में लेक्चरर पद के लिए दरख्वास्त लगाना शुरू किया। यहाँ भी धंधेबाजी थी एक और चलन का रास्ता सरकार ने दिखा दिया था। अस्थायी नियुक्तियाँ भी न करो ठेके पर रखो, सत्तर रुपये प्रति लेक्चरर। जुलाई में रखा और गर्मियों की छुट्टियों के पहले ज्यादातर लेक्चररों की छुट्टी देश में उच्चशिक्षा का कबाड़ा हो रहा हो तो अफसरों की पौ बारह थी।"[5] शिक्षा में 'आरक्षण व्यवस्था' के लिए वी० पी० सिंह के द्वारा लाया 'मंडल कमीशन' देश के सवर्णों की आँख में किरकिरी बन गया था, 'धूल पौधों पर' पर की नायिका के सौतेले भाइयों ने उसके एक मात्र सगे भाई को कमीशन की आग में झोंककर जला डाला और कहा कि आरक्षण के विरोध में उसने आत्महत्या कर ली थी। दिल्ली की सड़कों पर प्रगतिशील युवाओं ने आरक्षण का विरोध, मार्च निकाल कर किया था। देश की पचासी प्रतिशत जनसंख्या को उसके हक़ को दिलाना कहाँ का अन्याय था। किन्तु देश के पढ़े-लिखे सवर्ण छात्रों ने उसे अन्याय घोषित किया। प्रसिद्ध इतिहासविद रामचंद्र गुहा ने लिखा-"जैसा कि हिन्दुस्तान में अमूमन कई मामलों में होता है, सरकारी नीतियों के बारे में बहसें अखबारों और अदालतों में की जाती हैं उसके बाद ही वो आम जनता में फैल जाती हैं। 19 सितम्बर को दिल्ली विश्वविद्यालय के एक छात्र राजीव गोस्वामी ने मंडल आयोग कि रिपोर्ट को लेकर सरकार द्वारा स्वीकार कर लिए जाने के खिलाफ अपने शरीर में आग लगा ली। वह बुरी तरह जल गया लेकिन जिन्दा बच गया। उसके ऐसा करने से कई दूसरे छात्र भी आत्मदाह करने पर उतारू हो गए। वे आत्मदाह करने वाले सारे लोग ऊँची जातियों से ताल्लुक रखने वाले हिन्दुस्तानी थे, जो खुद भी सरकारी नौकरी पाने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन अब उनके सपनों को भी नजर अंदाज किया जा रहा था। कुल मिलाकर 200 के लगभग आत्महत्या की कोशिशें हुयीं, जिनमें 62 कामयाब भी हो गयीं।"[6] देश के भीतर हक़ के लिए सदियों से संघर्षरत जनता जब अधिकारों के प्रति जाग्रत हुयी तो सवर्णों ने उसका खुला विरोध किया। साहित्य के माध्यम से गोविन्द मिश्र ने इस ज्वलंत प्रश्न को उठाकर पुनः विमर्श का मुद्दा बना दिया है। धूल पौधों परउपन्यास में व्यक्त मंडल कमीशन की सच्चाई भारत के इतिहास में दर्ज है। जिस ओर अवलोकन की आवश्यकता है।  

गोविन्द मिश्र के उपन्यासों में शिक्षा के प्रति अनेक पहलुओं पर विचार किया गया है गाँव की बिगड़ती शिक्षा व्यवस्था और वहाँ की राजनीति का शिक्षा में दखलंदाजी तथा कालेजों में व्याप्त शिक्षा के नाम पर गुंडागर्दी और शिक्षा माफियाओं का शिक्षा का बाजारीकरण, विश्वविद्यालयों में व्याप्त शिक्षक अराजकता, स्त्रियों का शोषण, दलित-पिछड़े बच्चों के साथ जातीय भेदभाव, उन्हें शिक्षा से वंचित करना, तरह-तरह के षड्यंत्रों द्वारा संस्थानों से बहिष्कृत करना सगल बन गया है।


गोविन्द मिश्र आज की शिक्षा पद्धति पर बहुत सारे सवालों को उठाकर उन पर सोचने को विवश कर देते हैं। शिक्षा में आज जितनी अराजकता आ गयी है, शायद पिछले के वर्षों में नहीं रही होगी परजीवी वर्ग के लोग अब शिक्षा पर अपना अधिकार कर के बैठ गए हैं, भारत की बहुसंख्यक आबादी से आने वाले छात्रों और छात्राओं के प्रति विश्वविद्यालयों में उनका सांगठनिक शोषण होता है, जब वे कैंपस में दाखिल होते हैं तभी से उनका बेजा इस्तेमाल शुरू हो जाता है, उनका मानसिक और शारिक शोषण शिक्षा में मैरिट के नाम पर, शोध के नाम पर, नौकरी के नाम पर किया जाता है। 'धूल पौधों पर' उपन्यास के पात्र और दर्शनशास्त्र के प्रो० प्रेमप्रकाश ने शोषण और रिश्वत पर टिप्पणी करते हुए कहा-"जाल ऐसा बिछा रखा है कमबख्तों ने न दो, होम हो जाओ तो भी तुम इस भ्रष्टाचार को तो ख़त्म नहीं कर सकती। एक तुम्हारे न देने पर क्या यह सिलसिला रुक जाएगा ? एक डॉ० कौशिक ही नहीं ठीक इस तरह कितने डॉ० कौशिक कितने विद्यार्थियों को इसे देने को मजबूर कर रहे होंगे ? सबसे भयानक बात कि जो बेचारे बेरोजगार हैं, गरीब हैं उन्हें भी रिश्वत देने के लिए मजबूर किया जाता है और मजबूर करने वाले वे ही लोग जिनके पास वे शिक्षा लेने के लिए आते हैं।"[7] शिक्षा व्यवस्था पर गोविन्द मिश्र ने बहुत ही तल्ख़ टिप्पणियाँ की हैं। जो आज के समय में बेहद प्रासंगिक हो जाती हैं। जब तक शिक्षा व्यवस्था में समरूपता नहीं आयेगी तब तक वंचित तबके के बच्चों का शोषण ऐसे ही जारी रहेगा भारत की शिक्षा व्यवस्था दोयम दर्जे की हो गयी है, इसके सबसे बड़े जिम्मेदार यहाँ के शिक्षा माफिया हैं। यहाँ के राजनीतिज्ञ हैं, जो लुटेरे बनकर शिक्षा का व्यवसाय कर रहे हैं। भारत में हालात यह हो गयी है कि नामांकन विद्यालय में और शिक्षा कोचिंग सस्थाओं में, फिर ऐसी क्या बाध्यता है कि शिक्षा के लिए नामांकन विद्यालयों में हों उसे भी कोचिंग संथाओं के हवाले कर देना चाहिए, दूसरी बड़ी बात आज की शिक्षा व्यवस्था में देखी जा रही है कि प्राइवेट विश्वविद्यालयों को खोलने की मान्यता सरकारें दे दिया करती हैं, जहाँ पर वचिंत तबकों से आने वाले बच्चे कभी भी प्रवेश नहीं पा सकते इन विश्वविद्यालयों में डिग्रियाँ मात्र खरीदी जाती हैं, गुणवत्ता नहीं प्राइवेट संस्थाओं का अर्थ ही है गुण हीनता का तकाज़ा। गोविन्द मिश्र के उपन्यासों में इन बहुत सारे सवालों को उठाया गया है, आज आवश्यकता है कि शिक्षा को शिक्षा के रूप में प्रदान किया जाय उसे व्यवसाय का रूप न दिया जाय, बहुत सारी प्रतिभाओं को आज की शिक्षा व्यवस्था ने उपजने से पहले ही ख़त्म कर दिया है। यह स्वस्थ समाज के सपने के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकता है।


[1]शाम की झिलमिल : गोविन्द मिश्र, किताबघर प्रकाशन-नई दिल्ली, प्रथम संस्करण- 2017, पृष्ठ संख्या-10
[2]पाँच आँगनों वाला घर : गोविन्द मिश्र, राधाकृष्ण प्रकाशन-नई दिल्ली, आवृत्ति 2012, पृष्ठ संख्या-113
[3]पाँच आँगनों वाला घर : गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या 113
[4]धूल पौधों पर : गोविन्द मिश्र, वाणी प्रकाशन-नई दिल्ली, आवृत्ति संस्करण-2014, पृष्ठ संख्या-84
[5]धूल पौधों पर : गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या-88
[6]भारत नेहरू के बाद : रामचंद्र गुहा, अनुवादक सुशांत झा, पेन्गुई रेंडम हाउस इण्डिया, गुड़गाँव-हरियाणा. संस्करण 2012, पृष्ठ संख्या-273-274
[7]धूल पौधों पर : गोविन्द मिश्र, पृष्ठ संख्या-86 

अनिल कुमार,शोधछात्र, पीएच-डी. ,हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद
N.S.R. Hostel N. Wing 206, UOH  ,anilkumarjeee@gmail.com
अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) वर्ष-5, अंक 28-29 (संयुक्तांक जुलाई 2018-मार्च 2019)  चित्रांकन:कृष्ण कुमार कुंडारा

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