सिनेमा : हिन्दी सिनेमा के विकास में मिथकीय पात्रों एवं कहानियों का योगदान/अनुराधा पाण्डेय - अपनी माटी Apni Maati

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सिनेमा : हिन्दी सिनेमा के विकास में मिथकीय पात्रों एवं कहानियों का योगदान/अनुराधा पाण्डेय

             हिन्दी सिनेमा के विकास में मिथकीय पात्रों एवं कहानियों का योगदान


(गूगल से साभार)
 परिचय- (Introduction)


सिनेमा विधा के विकास में चित्रकला, नाट्यकला, प्रदर्शन कला आदि का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। मानव अपने प्रारंभिक विकास के समय से ही विविध प्रकार की चित्रकारी, शिल्पकारी आदि अपनी भावनाओं को प्रकट करने के माध्यम के रूप में किया है या फिर मनोरंजन के लिए किसी न किसी रूप में इनका प्रयोग करते चला आ रहा है। पाषाण काल में विविध प्रकार के औजारों के निर्माण से लेकर आग का आविष्कार आदि, विज्ञान और कला के रूप में ही विकसित हुए। गुफाओं में जानवरों के चित्र या फिर पेड़ों आदि के चित्र मानव सायास अथवा अनायास रूप में बनाते रहा है। इन सभी बिंदुओं को क्रम में रखते हुए मानव की विकास प्रक्रिया को समझा जाता है। विकास प्रक्रिया में थोड़ा आगे आने के पश्चात् विविध प्रकार के आयोजन,पूजा-पाठ आदि में मानव ने अपने विचारों को थोड़े अधिक विकास और ऊर्जा के साथ प्रदर्शित करना शुरू किया। प्राथमिक चरण में इनका संबंध देवताओं को प्रसन्न करने से लेकर रोग निवारण और भूत-प्रेत से मुक्ति पाने आदि के रूप में अधिक होता था। इसके अंतर्गत विविध प्रकार के नृत्य, गायन, विविध आंगिक चेष्टाएं और कलाओं के माध्यम से इनका आयोजन किया जाता था। धीरे-धीरे इन आंगिक चेष्टाओं और इन पूजा-पाठ के तरीकों में थोड़ी बहुत हेर-फेर करके विविध प्रकार के मनोरंजन के तरीके विकसित होने लगे। इनमें विविध प्रकार के नृत्य, गीत, आखेट, मनोरंजन आदि का आयोजन होता था। इन सभी प्रारंभिक तरीकों ने थोड़े-बहुत रूप परिष्कार के बाद एक कला का रूप ले लिया जिसे बाद में रंगमंच, नाटक, प्रदर्शनकारी कला आदि के रूप में स्वीकार किया जाने लगा।
सभ्यता के विकास के साथ-साथ मानव अपने विचारों और भावनाओं को जिस माध्यम से प्रस्तुत करते आ रहा है उसे भी आज के समय में कला का एक माध्यम माना गया है। इतिहास के अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि, मानव के विकास के समय से उसकी सभी क्रियाएं, आंगिक चेष्टाएं आदि नाटक या अभिनय का एक अंग रूप थे। मानव की भावनाओं को अभिव्यक्त करने के माध्यम के रूप में प्राचीन समय से यह एक कला के रूप में विद्यमान रहा है। इन विविध प्रकार की आंगिक चेष्टाओं, धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से मानव जाति ने न केवल अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त किया बल्कि अपना मनोरंजन भी किया। मानव अपने विकास के समय में बहुत सी प्रकृतिक क्रियाओं से अनभिज्ञ था। 
वह यह नहीं समझ पाया था कि जिस भोजन, पानी, हवा, धूप आदि का वह उपयोग करता है, जिस पर उसकी जीवन शैली निर्भर है वे सब उसे कैसे प्राप्त हुए हैं। इसीलिए वह इन सभी प्राकृतिक उपादानों की पूजा करता था। इन सभी को वह दैवीय अथवा जादुई मानता था। धीरे-धीरे जब मानव को इसका ज्ञान होने लगा तो उसने अपने पूजा और संस्कारों के रूप को परिमार्जित करने लगा। ये पूजा-पाठ, उसके संस्कार, धार्मिक मान्यता आदि के रूप में स्थापित होते गए और धीरे-धीरे इसने मिथकीय रूप ले लिया। इन पर उनके कथा-कहानी आदि बन गए। मानव की इन मान्यताओं के बारे में सिनेमा का इतिहास में लिखा है कि- “हालांकि इन मान्यताओं और संस्कारों की नींव वास्तविकता पर आधारित थी, लेकिन कथा-कहानियों में इनके रूप में और इनकी व्याख्या में बहुत बदलाव होते रहे। अधिकतर कथाओं में या मिथकों में दैवीय शक्तियों की पूजा की जाती थी जिससे उनको खुश रखा जा सके। इनके शारीरिक अभिव्यक्तियों और प्रदर्शन में इन्हीं मिथकीय या दैवीय चरित्रों की पूजा होती थी और यही संस्कार बाद में नाटकीय अभियक्ति के विकास का रूप ले लिया”[1] इस प्रकार विकास के ये प्रारंभिक सोपान रंगमंच के रूप में विकसित हो रहे थे।
सिनेमा का वर्तमान प्रचलित रूप जिस रूप में हमारे सामने मौजूद है उसकी पृष्ठभूमि निर्मित करने में रंगमंच, लोक नाट्य व नृत्य, नाटक आदि का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। सिनेमा के इस विकास के बारे में डॉ.महेंद्र मित्तल लिखते हैं कि “भले ही किन्हीं पूर्वाग्रहों के कारण अथवा साहित्य शास्त्र की बंधी हुई परिपाटी के कारण चित्रपट को किसी साहित्यिक विधा अथवा कला का स्तर प्रदान न किया गया हो, किंतु आज इस तथ्य से विमुख नहीं हुआ जा सकता कि सामाजिक क्षेत्र में सिनेमा ने अपना एक निजी सांस्कृतिक परिवेश धारण कर लिया है और इसी परिवेश में साहित्य एवं कला के विभिन्न अलंकारों की जगमगाहट लक्षित की जा सकती है।”[2] इस प्रकार आधुनिक समय में सिनेमा के विकास के प्रेरक तत्व रूप में यही सब माध्यम रहें हैं। आधुनिक समय में विविध प्रकार के तकनीकी विकास से कई प्रकार की समस्याओं का समाधान आसानी से किया जाने लगा। इसी तकनीकी विकास के एक सफल कदम के रूप में सिनेमा की शुरुआत हुई थी।
आज हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं। तकनीकी विकास की एक सदी को हम पूर्ण कर चुके हैं। बीसवीं सदी के अंतर्गत औद्यौगिक क्रांति की वजह से विविध प्रकार की तकनीकी का विकास हुआ और इस तकनीकी विकास के माध्यम से सिनेमा जगत में विविध प्रकार के प्रयोग हुए। आज आधुनिकता की इस ज़ोर और तकनीकी विकास के सामर्थ्य को यदि देखा जाए तो अमेरिका की तकनीकी विकास के माध्यम से विविध प्रकार की फिल्मों की सूटिंग की कल्पना इतनी मजबूत है की वह पृथ्वी से अलग ग्रहों पर की हुई सूटिंग सी प्रतीत होते हैं। तकनीकी विकास के माध्यम से कल्पनाओं को बहुत आसानी से साकार किया जा सकता है। हॉलीवुड की बहुत सी फिल्में इसका ज्वलंत उदाहरण हैं, जिनमें पृथ्वी से लेकर दूसरे ग्रहों के काल्पनिक चित्रण से लेकर दूसरे एलियन प्रकार के जीवों का चित्रण भी बहुत आसानी से दिखाया जा रहा है। सिनेमा एक ऐसा रचनात्मक माध्यम है जिसके माध्यम से विविध प्रकार की सामाजिक,सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्थितियों के चित्रण से लेकर अनेक प्रकार के चरित्रों को भी बहुत ही कलात्मक तरीके से प्रदर्शित किया जा सकता है। सिनेमा के क्रमिक विकास पर ध्यान दिया जाए तो यह स्पष्ट रूप में दिखता है कि यह अपने साहित्य व समाज से सदैव ही जुड़ा रहा है। सिनेमा का संबंध तात्कालिक सामाजिक परिस्थितियों के प्रदर्शन में अटूट रूप से दिखता है।
सिनेमा का विकास तकनीकी क्रांति का एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। तकनीकी विकास में जिस रूप में प्रगति समय-समय पर होती रही है, ठीक वही परिवर्तन हमें सिनेमा के विकास में भी देखने को मिलता है। सिनेमा दृश्य माध्यम की एक महत्त्वपूर्ण और सर्वाधिक प्रचलित विधा है। दृश्य बिंबों के माध्यम से संचालित होने वाली इस विधा को आज के समय में सेल्यूलॉइड लिटरेचर के रूप में भी जाना जाता है। सिनेमा विधा का प्रभाव प्रत्येक समाज के जनमानस पर गहरे रूप में देखा जा सकता है। आधुनिक समाज की प्रत्येक व्यावहारिक क्रिया से लेकर सामाजिक क्रियाओं में इस विधा का महत्त्व व प्रचलन देखने को मिल सकता है। सिनेमा मनोरंजन और ज्ञान को एक साथ लेकर चलता है। सिनेमा ही एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा किसी भी संदेश को देश की ऐसी जनता तक भी पहुंचाया जा सकता है जिसे पढ़ने-लिखने नहीं आता है, जो पूर्णतः निरक्षर है। सिनेमा की इसी विशेषता को ध्यान में रखकर यह स्वीकार किया जाता है कि सिनेमा के इतिहास के माध्यम से किसी भी देश या समाज के विकास और सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश को आसानी से जाना समझा जा सकता है

सिनेमा का विकास (Development of Cinema)

सिनेमा अर्थात् चलचित्र, यानि चलते हुए बिंब। सिनेमा के अंतर्गत एक स्थान से दूसरे स्थान तक गति करते हुए चित्रों को दिखाया जाता है। ये चित्र पर्दे पर गति करते हैं और पर्दे पर मौजूद होते हैं। इसी कारण इसे चित्रपट कहा गया। प्रसिद्ध इतिहासकार सिनेमा के विकास पर लिखते हैं कि “लगभग 25 हजार वर्ष पूर्व सभ्यता के पूर्वार्ध में किसी अनजान चित्रकार ने एल्टामीरा स्पेन की गुफाओं में बहुत से पैरों वाले एक सुअर का भित्ति चित्र बनाया था, जो शायद मनुष्य का प्रथम प्रयास था, जिसमें चित्र को गति के महत्त्व के साथ प्रस्तुत किया गया था।”[3] इसके पश्चात चित्रों को गत्यात्मक रूप में दिखाने के कई प्रयास हुए और इस दिशा में जाइट्रोप नामक यंत्र के आविष्कार ने बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। इसका आविष्कार सन् 1935 के लगभग हुआ। यह एक ऐसा यंत्र था जिसमें बहुत से चित्रों को एक चरखे के माध्यम से पास-पास चिपका दिया जाता था और इसके आगे एक और चर्खी लगी होती थी और जब इसे घुमाया जाता था। इसे देखने पर ऐसा प्रतीत होता था कि चित्र चल रहे हैं। इसी कड़ी में विलियम जॉर्ज होर्नर नामक अंग्रेज़ ने सन् 1833 में एक यंत्र का आविष्कार किया था जिसे शैतान का चक्र नाम दिया गया था। इस यंत्र के माध्यम से छाया चित्र बनाए जा सकते थे और इससे जो छायाचित्र प्रतिबिंबित होते थे वे किसी प्रेत की छाया के समान दिखते थे। इसीलिए इस यंत्र को यह नाम दिया गया था। इसके अंतर्गत एक चर्खी पर एक के बाद एक बहुत से चित्रों को चिपकाकर लपेट दिया जाता था। फिर एक छोटे छेद के माध्यम से इस पर प्रकाश डालते हुए इससे निर्मित छायाचित्र को दीवार पर छायांकित किया जाता था। चर्खी को एक आदमी धीरे-धीरे आराम से घुमाते रहता था। इस चर्खी को घुमाने से दीवार पर प्रतिबिंबित होने वाले छायाचित्र गतिमान रहते थे और वे चलते हुए से प्रतीत होते थे।

सन् 1839 के आस-पास लुईस डेगयुरे जो फ्रांसीसी मूल से थे, इन्होंने छायांकन करने वाले कैमरे का आविष्कार किया। “इस आविष्कार के पश्चात सेन-फ्रांसिस्को के अंग्रेज़ फोटोग्राफर इदवियार्ड माइब्रिज ने सन् 1877-1880 में सिनेमा के कैमरे का आविष्कार किया। अपने इस प्रयोग में इन्होंने एक साथ में पच्चीस कैमरे एक सीध में लगाए थे और इनकी सहायता से एक दौड़ते हुए घोड़े की तस्वीर खींची थी।”[4] इसमें कैमरों को एक साथ संचालित करने के उद्देश्य से उनके शटर एक धागे से इस प्रकार बांधे थे कि, जब घोड़ा उन कैमरों के सामने से दौड़ा तो एक के बाद एक धागा टूटता गया और शटर खुलकर बंद होते गए। इस तरह से उस घोड़े की पच्चीस तस्वीरें खींची और उन्हें एक साथ रखने पर क्रमशः रखने पर घोडा दौड़ता हुआ प्रतीत होने लगा था।

इस आविष्कार के पश्चात् थॉमस एल्वा एडिसन का आविष्कार सिनेमा जगत के लिए तकनीकी क्रांति साबित हुआ। इन्होंने फ़ोनोग्राप और बिजली के बल्ब का आविष्कार किया। सिनेमा के प्रयोग हेतु इन्होंने सिनेमा की व्यवस्थित संरचना निर्मित की और इसकी सफलता हेतु कई प्रयोग किए। इन्होंने सन् 1887 में चल रहे अपने एक प्रयोग के माध्यम से 3 अक्टूबर 1889 में न्यू जर्सी नगर जे वेस्ट ऑरेंज क्षेत्र में स्थित अपनी प्रयोगशाला में सिन्मेटोस्कोप नामक यंत्र का सफल परीक्षण किया और सिनेमा का ऐतिहासिक प्रदर्शन भी किया था। इस दिशा में अगली कड़ी के रूप में ल्युमिए ब्रदर्श का योगदान सबसे महत्त्वपूर्ण रहा। इन्होंने व्यापारिक इच्छा से प्रेरित होकर फ्रांस में सिन्मेटोस्कोप का प्रसारण किया और अपने नए-नए प्रयोगों के माध्यम से छोटी-छोटी फिल्मों का फिल्मांकन किया। भारत में पहली दफा मुंबई के होटल में इनके द्वारा ही फिल्मांकन कराया गया था।

(गूगल से साभार)
सिनेमा जगत में इन प्रारंभिक आविष्कारों और प्रयोगों के द्वारा सिनेमा के शुरुआत की पहल हुई थी। धीरे-धीरे इस कड़ी में नए-नए आयाम विकसित होते रहे और सिनेमा का विकास भी होता रहा। यह प्रारंभिक पहल ही क्रांति थी जिसके माध्यम से इस जगत को एक नई विधा मिली। आज के समय में सिनेमा जगत अपने विकास की चोटी पर है और इसकी आखिरी परिणति क्या होगी इसका कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता। सिनेमा जगत में चाहे वह भारतीय परिदृश्य में हो या वैश्विक परिदृश्य में नित नए-नए प्रयोग हो रहे हैं और नए-नए बदलाव भी। इन तमाम प्रयोगों और बदलाव के मध्य एक बात जो सतत विद्यमान रही और अपने अस्तित्व को बनाए रही, वह है सिनेमा, समाज और साहित्य का संबंध। साहित्य और समाज का निरंतर चित्रांकन सिनेमा के माध्यम से होता रहा है। समाज को बदलने की इच्छा, दर्शकों तक संदेश पहुंचाने की परंपरा और अपने समाज के प्रति सिनेमाकारों की जवाबदेही निरंतर सक्रिय रूप में देखने को मिलती रही है। हालांकि इनमें भी कई उतार चढ़ाव आए हैं पर यह परंपरा मंद भले हुए पर अपना अस्तित्व बनाए रही।

सिनेमा का भारतीय परिदृश्य (Indian Scenario of Cinema)

भारतीय परिदृश्य में सिनेमा का विकास पाश्चात्य तकनीकी विकास के माध्यम से ही संभव हुआ था। भारत में सर्वप्रथम जो चलचित्र सिने-विकास के रूप में दिखाई गई वह 7 जुलाई,1886 को शाम 6 बजे मुंबई के वाटसन होटल में दिखाई गई थी। इसमें चलती हुई रेलगाड़ी, दीवार को गिराना, एक बच्चे द्वारा नास्ता करना आदि के चलचित्र दिखाए गए थे। इसमें 28 दिसंबर, 1885 को पेरिस में पहली बार स्टेशन पर आ रही रेलगाड़ी, फैक्ट्री से छूटने के बाद घर जाने के लिए बाहर आते मजदूरों का दृश्य तथा बगीचे में पानी देते माली के चलचित्र दिखाए गए थे। इस चलचित्र के माध्यम से लोगों ने पहली बार अपनी आंखों के सामने चलती-फिरती चित्रों को देखा था। यह दृश्य किसी आश्चर्य से कम नहीं था। इन चित्रों के माध्यम से लोगों ने एक बार फिर गुजरे हुए समय को कैद पाया और फिर से उन बीते पलों को जीता हुआसा महसूस किया और यह आनंद बार-बार सिनेमा को देख कर लिया जा सकता था।

हिंदी मूक सिनेमा एवं मिथकीय पात्र एवं कहानियों पर आधारित फिल्में (Silent Hindi Cinema and Movies based on Mythical Characters and Stories)

भारतीय परिप्रेक्ष्य में सिनेमा की शुरुआत मूक सिनेमा के रूप में हुई। इस शुरुआती दौर के सिनेमा में भारतीय धार्मिक, मिथक, पुराण आदि से कथानक लेकर फिल्में बनाई गई। इस कड़ी में पहली भारतीय मूक सिनेमा का श्रेय राजा हरिश्चंद्र को दिया जाता है। इस फिल्म का निर्माण सन् 1913 में धुंडीराज गोविंद फालके द्वारा किया गया था। इस फिल्म के कथानक का आधार महाभारत है। मूक सिनेमा के दौर में बनने वाली फिल्मों का आधार यदि देखा जाए तो इस दौर की आधे से भी अधिक फिल्में धार्मिक और पौराणिक कथानकों पर ही आधारित थीं, या फिर इनके चरित्र भारतीय साहित्य या समाज के मिथक से लिए गए होते थे। इस दौर में एक कथानक पर ही कई-कई फिल्मों का निर्माण किया गया था। सिनेमा का यह दौर ऐसा था जिसमें सिनेमा के नाम पर मात्र चित्रों को दिखाया जाता था। इस युग में निर्मित फिल्मों का आधार सामाजिक दृष्टि को आधार में रखकर भी किया गया था। इस समय का भारतीय समाज शिक्षा और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में बहुत ही पीछे था। समाज में विभिन्न प्रकार के अंध-विश्वास फैले हुए थे। जाति प्रथा, पितृसत्ता, सामंतवाद, अंधविश्वास आदि विविध प्रकार की सामाजिक बुराइयां विद्यमान थीं। लोगों को किसी भी प्रकार इन अंधविश्वासों से यदि रोका जा सकता था तो इसका एक-मात्र उपाय उनकी धार्मिक आस्था के माध्यम से प्रेरणा देना था। इसके अतिरिक्त धार्मिक कारणों की वजह से भी बहुत सी धार्मिक फिल्मों का निर्माण हुआ था।

चूंकि, यह दौर सिनेमा के शुरुआत का था, इसलिए आस्था की भावना से प्रेरित होकर इस प्रकार की फिल्मों का निर्माण हुआ। इन फिल्मों के आधार रूप में कथानक का माध्यम रामायण और महाभारत ही थे। इनसे ही विविध प्रकार के चरित्रों को आधार बनाकर फिल्में बनाई गईं थीं। इन फिल्मों में कालिया मर्दन (1919), लंका दहन (1917), नल दमयंती (1920), शकुंतला (1920), वीर अभिमन्यु (1922), सावित्री (1923) आदि जैसी धार्मिक फिल्में बनीं थीं। इनके अतिरिक्त तमाम भक्त चरित्रों और संतों के आख्यान पर भी फिल्में बनीं। प्रह्लाद, ध्रुव, विदुर, तुकाराम, ज्ञानेश्वर आदि जैसे चरित्रों पर फिल्में बनीं। इन फिल्मों का मुख्य आधार इन संतों के जीवन को आदर्श रूप में दिखाना और दर्शकों को समाज में एक अच्छा चरित्र बनने के लिए प्रेरित करना भी था। स्त्री चरित्रों को आधार बनाकर भी इस दौर में फिल्मों का निर्माण हुआ था। इनमें शकुंतला पर कई फिल्में बनीं। इसके अतिरिक्त सती सावित्री, सुलोचना, द्रौपदी, अनुसूया आदि जैसे देवी चरित्रों पर फिल्में बनीं। इनमें से अधिकतर धार्मिक फिल्मों का निर्माण दादा साहब फालके द्वारा किया गया था। अपने बारे में बताते हुए इन्होंने 19 अक्टूबर 1913 को केसरी समाचार पत्रमें अपना साक्षात्कार देते हुए कहा था कि “मैं सभी विषयों पर फिल्में बनाऊंगा।, पर विशेषकर प्राचीन संस्कृत नाटकों और नए मराठी नाटकों पर। फिर भारत के विभिन्न आचार-विचारों पर, सामाजिक मूल्यों पर और वैज्ञानिक और शैक्षणिक विषयों पर मैं फिल्में बनाऊंगा।”[5] दादा साहब फालके के इस वक्तव्य से यह ज्ञात होता है कि उनका मुख्य ध्येय भारत के बारे में लोगों को बताना था। भारत के समाज को सभी धार्मिक दृष्टिकोण से परिष्कृत करना था।

 सन् 1913 में दादा साहब फालके के निर्देशन में लगभग 25 धार्मिक फिल्में बनीं। इसके बाद सन् 1913-1925 के बीच जो फिल्में बनीं उनमें से कुछ पर पारसी रंगमंच का प्रभाव देखा जा सकता है। इनके द्वारा बनीं फिल्मों में कुछ राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर आधारित फिल्में भी बनी थीं। हालांकि यह उद्देश्य बहुत पुरज़ोर रूप में नहीं था। हिंदी सिनेमा जगत में पारसी रंगमंच को खुद को भी स्थान दिलाना था। इसी उद्देश्य से प्रेरित होकर कुछ मनोरंजन आधारित फिल्में बनीं। “मूक सिनेमा के दौर में लगभग 1313 फिल्में बनीं थीं।”[6] इन फिल्मों में लगभग आधे से भी फिल्में मिथकीय पात्रों अथवा मिथकीय कहानियों पर निर्भर थीं।

मूक सिनेमा दौर में फिल्मों का अधिकतर निर्माण लोक प्रचलित कथानकों और मिथकों से लेने की एक वजह दर्शक भी थे। भारतीय परिदृश्य में सिनेमा का विकास मूक सिनेमा के रूप में अभी अपनी प्रारंभिक अवस्था में ही था। भारत की अधिकांश जनता को यह पता भी नहीं था कि इस प्रकार का प्रयोग संभव भी है। चित्रपट पर सिनेमांकन इनके लिए एक चमत्कार रूप में था। इस दौर में सिनेमा बहुत प्रचलित नहीं हुआ था पर लोकप्रिय जरुर था। इसलिए उन्हीं कथानकों को आधार बनाकर शुरुआती दौर में फिल्में बनाई गई थीं, जो दर्शकों को आसानी से समझ में आ सकें। यह मूक सिनेमा का दौर था, तकनीकी इतनी विकसित नहीं हो पायी थी कि फिल्मों में आवाज की व्यवस्था की जा सके। दर्शकों के सामने ऐसे चरित्र जिन्हें वे बिना आवाज के ही समझ सकें, इसका खयाल रखना बहुत जरूरी था। यही कारण था कि इस दौर की फिल्में मिथकों और रामायण, महाभारत के कथानकों और चरित्रों पर अधिकतर आधारित थीं। दर्शक जिनकी वेश-भूषा और साज-सज्जा देख कर ही समझ सकते थे कि वे किस विषय पर बात कर रहे हैं या उनके मध्य क्या संवाद चल रहा है। इस तरह के कथानकों को दर्शक आसानी से समझ सकते थे।
­हिंदी सिनेमा के मूक दौर में भी कई प्रकार के प्रयोग हुए थे। कुछ कथानक धार्मिक ग्रंथों से लिए गए थे तो कुछ मिथकों से भी। इन सभी के माध्यम से समाज में एक आदर्श स्थापित करने की भावना बहुत महत्त्वपूर्ण थी। इस समय का भारतीय समाज कई प्रकार के सामाजिक कुरीतियों और अंधविश्वास में फंसा हुआ था। बहुत सी फिल्मों के माध्यम से समाज में छुआ-छूत, अंधविश्वास की भावना को दूर करके सौहार्द की भावना विकसित करने के प्रयोजन से फिल्मों को बनाया जाता था। इस दौर की एक बात और भी बहुत महत्त्वपूर्ण थी कि धार्मिक फिल्मों के कुछ चरित्र जो अपने अभिनय के द्वारा बहुत ही प्रसिद्ध हो जाते थे तो, जब वे परदे से बाहर आते थे तो लोगों के बीच, आम जनता के बीच उनको उसी चरित्र के रूप में देखा जाता था। दर्शक उन्हें उसी श्रद्धा से देखते थे और उनको पूजते भी थे। मूक सिनेमा के समय तकनीकी उपलब्धता के आधार पर सिनेमा जगत में कई तरह के प्रयोग हुए। इस दौर में भी शुरुआत के बाद लगातार बेहतर बनाने और बेहतर दिखाने के प्रयत्न क्रमशः रूप में देखने को मिलते हैं। निर्देशक अपनी क्षमता के अनुसार सिनेमा के माध्यम से अपनी निजी इच्छा या विचार को दिखाने में सफल भी रहे।

हिंदी सवाक और मिथकीय पात्रों एवं कहानियों पर आधारित फिल्में (Sound Hindi Cinema and Movies based on Mythical Characters and Stories)

सवाक सिनेमा की शुरुआत तकनीकी विकास के माध्यम से संभव हुई। वैश्विक परिप्रेक्ष्य में यदि देखा जाए तो,पाश्चात्य देशों में सवाक सिनेमा की शुरुआत भारत से 3-4 साल पहले ही हो गई थी। इसलिए पहली सवाक फिल्म सन् 1927 में वार्नर बंधुओं द्वारा निर्मित द जॉज सिंगर थी। मूक सिनेमा के बाद यह पहली बोलती फिल्म थी जिसमें लोगों ने बोलते हुए और चलते हुए चित्रों को परदे पर देखा। सन् 1927 में तकनीकी विकास के माध्यम से मानव कल्पना को एक साकार रूप मिलना शुरू हुआ था। सिनेमा जगत में बोलने वाली फिल्मों का प्रादुर्भाव होना शुरू हुआ। भारत में इस तकनीकी को आयात किया गया और फिर यहां पर सवाक सिनेमा की शुरुआत हुई थी। यहां सवाक सिनेमा की शुरुआत सन् 1931 में आर्देशिर ईरानी के निर्देशन में बनी पहली फिल्म आलमआरा से हुई थी। इंपीरियल फिल्म कंपनी द्वारा यह फिल्म बनाई गई थी और इस फिल्म का प्रदर्शन 14 मार्च सन् 1931 को मैजेस्टिक सिनेमा, बंबई में हुआ था।

चूंकि सवाक सिनेमा की शुरुआत में ही तकनीकी उपलब्धता की वजह से पैसों का बजट बड़ा बनाना पड़ा। इस कारण शुरुआत में जो भी फिल्में बनीं उनका मुख्य उद्देश्य पैसा कमाना था। भारतीय परिदृश्य का सिनेमा विदेशी तकनीकी के आयात पर ही टिका हुआ था। इसका विकास धीरे-धीरे हुआ। हालांकि बोलती फिल्मों का परदे पर आना भारतीय समाज के लिए बड़ा आश्चर्य था। लोगों में मूक सिनेमा को देखना ही बड़ा आश्चर्य था और ऐसे में सवाक सिनेमा का आना और परदे पर चलने के साथ-साथ बोलते हुए चरित्र जिनको सुना जा सके यह सब यहां की जनता के लिए बहुत बड़ा आकर्षण रहा। इस आकर्षण के चलते ही इस दौर में बहुत सारी फिल्म कंपनियां धीरे-धीरे विकसित हुई और स्थापित भी हुईं।

फिल्म आलमआरा पारसी रंगमंच का बहुत प्रसिद्ध नाटक था। फिल्म रूप में इसका अनुवाद जोसेफ डेविड ने किया था। आर्देशिर ईरानी के अतिरिक्त इस फिल्म के अन्य मुख्य निर्माता और पात्र रुस्तम भरूचा, पेसी करानी, मोती गिडवानी, सहायक कलाकार जिल्लो, पृथ्वीराज कपूर आदि थे। अभिनेता के रूप में मास्टर बिट्ठल और अभिनेत्री मिस जुबैदा थीं। यह फिल्म एक नई संभावना के विकास के रूप में बनाई गई थी। तकनीकी विकास के माध्यम से एक क्रांति रूप में ही सवाक सिनेमा विकसित हुआ। सन् 1931 में ही सवाक सिनेमा की दूसरी फिल्म नूरजहां बनी। इसका निर्देशन मोहन भवनानी द्वारा किया गया था। यह फिल्म भी इंपीरियल फिल्म कंपनी द्वारा ही बनाई गई थी। इस फिल्म के निर्माण का उद्देश्य पैसा कमाना और मनोरंजन था। भारतीय सिनेमा जगत में इन दोनों फिल्मों के निर्माण व प्रदर्शन के बाद सिनेमा जगत में बहुत सकारात्मक बदलाव हुए। विविध प्रकार के क्षेत्रीय भाषाओं में भी यह विकास धीरे-धीरे बढ़ने लगा था। भारत के विविध राज्यों की प्रादेशिक भाषाओं में भी सवाक सिनेमा की शुरुआत धीरे-धीरे होने लगी थी। इन राज्यों में बंगाल, महाराष्ट्र, मद्रास और पंजाब मुख्य थे। इन भाषाओं में भी इस तकनीकी को ग्रहण किया गया था और सवाक सिनेमा के निर्माण की प्रक्रिया विकसित हुई।

सन् 1935-36 का दौर सवाक और मूक सिनेमा दोनों ही प्रकार का रहा। सन् 1935 से सवाक सिनेमा बननी शुरू हुई, परंतु मूक सिनेमा भी इसके साथ-साथ बनीं। इस दौर में ऐतिहासिक कथानकों से जुड़े कथानकों पर फिल्मों का निर्माण बहुत हुआ। नई-नई फिल्म कंपनियों का विकास हुआ। जिनमें सागर फिल्म कंपनी, रंजीत मूवीटोन, इंपीरियल फिल्म कंपनी, प्रभाव फिल्म कंपनी, सरस्वती सिनेटोन, वाडिया मूवीटोन, कोल्हापुर मूवीटोन आदि प्रमुख थे। इस समय मुंबई में लगभग 80-90 फिल्म कंपनियों का विकास हुआ था। इस दौर में बनने वाली फिल्मों में प्रभात फिल्म कंपनी द्वारा बनने वाली फिल्में अयोध्या का राजा, जलती निशानी, माया-मछेन्द्र (1932) और अमृत मंथन (1934), धर्मात्मा (1935) आदि थीं। रंजीत मूवीटोन द्वारा बनने वाली फिल्मों में देवी-देवयानी (1931), राधा रानी (1932) थीं। न्यू थिएटर्स कंपनी द्वारा बनने वाली फिल्में पूरन भक्त और राजरानी मीरा (1933), चंडी दास (1934), धूप-छांव और देवदास (1935) हैं। वाडिया मूवीटोन द्वारा बनने वाली फिल्म वामन अवतार (1934) और बॉम्बे टाकीज़ द्वारा निर्मित सबसे चर्चित फिल्म अछूत कन्या (1936) आदि इस दौर में निर्मित होने वाली प्रमुख फिल्में थीं। इन फिल्मों का मुख्य उद्देश्य पैसा कमाना और फिल्म उद्योग को स्थापित करना था। इसी कारण से फिल्मों में बोलने की क्षमता विकसित होने के बाद भी निर्देशक उन्हीं धार्मिक और मिथकीय पात्रों और कथानकों को आधार बनाकर फिल्में बना रहे थे। इन फिल्मों का भारतीय समाज के तत्कालीन परिस्थितियों से सीधे तौर पर कोई सरोकार नहीं था। अप्रत्क्ष रूप में भले ही थोड़े-बहुत नैतिक संस्कार को प्रसारित करने की मनोकामना रही हो। सीधे तौर पर इन फिल्मों को समाज से और तत्कालीन परिस्थितियों से जुड़ा हुआ नहीं कह सकते और वास्तव में ना तो ऐसा था ही।

निष्कर्ष- (Conclusion)
भारतीय परिदृश्य में हिंदी सिनेमा का साहित्य के साथ संबंध देखा जाए तो यह कहा जा सकता है कि यह संबंध बहुत गहरा रहा है। सिनेमा के शुरुआत रूप में चाहे वह मूक दौर की फिल्में रही हों या सवाक दौर की, इनमें से अधिकांशतः फिल्मों का कथानक साहित्य से जुड़ा हुआ ही रहा है। वह साहित्य चाहे धार्मिक रहा हो या ऐतिहासिक। हम सीधे तौर पर नहीं कह सकते कि ये फिल्में लेखक की निजी कल्पना रही हैं। धार्मिक साहित्य के ग्रंथ रामायण, महाभारत और इनके अलग-अलग पात्रों पर कथानकों का निर्माण करते हुए सिनेमा जगत में फिल्में बनीं और इनके माध्यम से ही सिने जगत का विकास हुआ। यही कारण कि भारतीय सिनेमा के प्रारंभिक दौर की फिल्मों पर धार्मिक प्रभाव ही रहा है। भारतीय हिन्दी सिनेमा के विकास में यदि देखें तो लीक से हटकर चलते हुए फिल्म निर्माण की शुरुआत सन् 1936 से हुई थी। सन् 1935-36 में देश में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई थी। देश में मार्क्सवाद पर बहस होनी शुरू हुई और यहीं से भारतीय समाज की परिस्थितियों पर सवाल उठने शुरू हुए। यह दौर देश के लिए भी बहुत ही महत्त्वपूर्ण था। गांधीवादी विचारधारा के साथ-साथ मार्क्सवादी विचारों को अपने देश में निरूपित करने के प्रयत्न इसी समय से शुरू हुए थे। इस दौर के साहित्य में इन सभी बिंदुओं पर लेखन हो रहा था और यही कारण था कि सिनेमा जगत पर भी इन विचारों का प्रभाव पड़ा। इस दौर से निर्मित होने वाली फिल्में किसान कन्या, औरत, पुकार, नीचा नगर, खानदान आदि जैसी फिल्मों थीं। इनमें वैचारिक बदलाव को देखा जा सकता है। 

भारतीय समाज के ज्वलंत मुद्दे सामाजिक परिस्थितियों से लेकर पराधीनता जैसे विषयों को धीरे-धीर उठाया जाने लगा था। सिनेमा जगत में इन मुद्दों के लिए आवाज उठाई जाने लगी थी। इस समय के बाद से हिन्दी सिनेमा में मिथकीय पात्रों एवं कथानकों पर आधारित फिल्में बनना कम हो गया। इस रूप में यदि देखा जाए तो हिन्दी सिनेमा के विकास में मिथकीय पात्रों एवं कथानकों का बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। मूक सिनेमा से लेकर सवाक सिनेमा तक इन पात्रों एवं कथानकों का महत्त्व बना रहा। इनपर आधारित फिल्मों ने हिन्दी सिनेमा के विकास की दिशा निर्धारित की और इस दौर की जनता को सिनेमा से जोड़ा भी। इन फिल्मों के माध्यम से जनजागरण का काम भी किया गया। जिनमें जाति, छुवा-छूत, अंधविश्वास, संस्कृति आदि से लोगों को चेतस करने का भी काम किया गया।

संदर्भ सामग्री (References)

अग्रवाल. प्रह्लाद. (2012). सिनेमा साहित्य और समाज. नई दिल्ली. अनामिका प्रकाशन.
आनंद. राज अंकुर एवं देवेंद्र. महेश. (2012). रंगमंच के सिद्धांत. नई दिल्ली. राजकमल प्रकाशन.
चेनी. शेल्डान. (2009). रंगमंच. लखनऊ. उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान.
Barthes. Roland. (2012). Mythologies: The Complete Edition in a New Translation. First      American edition.
Carlson, M. (1996). Performance: A Critical introduction. London Rutledge.
Dalmia. Vasudha. (2006) Poetics, Plays, and Performances: The politics of modern Indian      theatre. Oxford University Press.



[1]History of theatre by Allen and Bacon, inc. University of Texas- Austin page no- 2.
Often these myths contain elements based on real events or persons, although they are usually considerably transformed in the stories. Frequently the myths include representatives of super natural forces which the rites celebrate or hope to influence. Performances may then impersonate the mythical character or supernatural forces in the rituals or in Accompanying celebrations. This impersonation is one sign of a developing dramatic sense.  
[2]भारतीय चलचित्र, डॉ. महेंद्र मित्तल, पृष्ठ सं.- 2.
[3]फिल्मफेयर,मार्च 8, 1963, पृ. 15.
[4]What is Cinema? Vol. 1, Basin, Andre, p. no- 16. 
In 1877 and 1880, Muybridge, thank to the imagination generosity of a horse lover, managed to construct a large complex device which enabled him to make from the image of a galloping horse the first series of cinematography pictures.
[5]सिनेमा की संवेदना,डॉ. विजय अग्रवाल, पृ. 40.
[6] In total, 1313 silent films were made in India.
Cinema India the visual culture of Hindi film, Rachel Dwyer and Diva Patel, page no- 15.

डॉ॰ अनुराधा पाण्डेय
पी-एच.डी. (हिंदी अनुवाद)
भारतीय भाषा केंद्र
भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अध्ययन संस्थान
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
ई-मेल: anu.pantran@gmail.com
मो॰- 9015814995

अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) वर्ष-5, अंक 30(अप्रैल-जून 2019) चित्रांकन वंदना कुमारी 

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