आलेख: आदिवासी कला एवं संस्कृति की समकालीन चुनौतियाँ /डॉ. संदीप कुमार मेघवाल - अपनी माटी Apni Maati

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आलेख: आदिवासी कला एवं संस्कृति की समकालीन चुनौतियाँ /डॉ. संदीप कुमार मेघवाल

                    आदिवासी कला एवं संस्कृति की समकालीन चुनौतियाँ                                 
    
भारत की आदिम कला एवं संस्कृति बहुत समृद्धशाली रही है। यहाँ आदि-अनादि काल से परम्पराओं का संचरण होता आया है। भारत के गुफा कालीन चित्र, हड़प्पा, मोहन जोदड़ों सभ्यता से प्राप्त अद्भुत सांस्कृतिक वैभव के साक्ष्य हैं। किसी भी सभ्यता की पहचान उसकी विशिष्ट संस्कृति होती है। ऐसी ही संस्कृति भारतीय आदिवासी संस्कृति के संदर्भ में देखनें को मिलती हैं। आदिवासी कला परंपरा के स्रोत इनके सांस्कृतिक उत्सव मे आज भी वैसे ही देखने को मिलते हैं। उत्सव पर यह कलात्मक दृश्य एवं प्रदर्शनकारी कला रूपों जैसे भित्ति अलंकरण, वस्तुसज्जा, नृत्य, नाट्य एवं संगीत का अद्भुत वैभव देखने को मिलता है। भारत के अनेक राज्यों मे आदिवासीयों बसाव बहुलता के साथ है। इनकी क्षेत्रीय विविधता के साथ अलग-अलग संस्कृति के बिम्ब हैं। जैसे मध्यप्रदेश में गोंड पेंटिग, छत्तीसगढ़ एवं उत्तरप्रदेश डोंगरा शिल्प, राजस्थान मे मंडना, बिहार मे मधुबनी पेंटिग, महाराष्ट्र मे वर्ली पेंटिंग, आंध्रप्रदेश में लेदर पपेट पेंटिंग, कर्नाटक में मेसुर पेंटिंग, पश्चिम बंगाल में पटवा पेंटिंग, उड़ीसा मे पटचित्र एवं पूर्वाञ्चल राज्य में भी सांस्कृतिक वैभव हैं।

भारतीय आदिवासी कला इतिहास के संदर्भ में ध्यान आकर्षित करे तो, गुफा कालीन आदिमानव से लेकर समकालीन दौर तक इस कला परंपरा मे कई सांस्कृतिक उतार-चढ़ाव देखने को मिलते हैं। यह किसी भी सांस्कृतिक परम्परा में एक स्वाभाविक क्रम है, कि संस्कृति में समय काल के अनुसार परिवर्तन होकर नए कलेवर चढ़ते जाते है। यह कार्य भारतीय आदिवासी कला के संदर्भ में भी देखने को मिलता है। पाश्चात्य का विलय रूप खासकर दृश्य एवं प्रदर्शन कला क्षेत्र मे खूब देखनें को मिल रहा है। जैसे भारत की आदिवासी कला में चित्रांकन, नृत्य, गीत, वस्तु सौंदर्यकरण का पाश्चात्य फ्यूजन रूप बहुत देखा जाने लगा है। जैसे इनदिनों विभिन्न सांस्कृतिक आयोजन में आदिवासी गीत के साथ आधुनिक गीतों का संयोजन सुनने को मिल रहा है। अन्य उदाहरण में आदिवासी अंगालेखन में गोदना (टेटु) की प्राचीन परंपरा रही है। अंगालेखन की प्रथा धार्मिक आस्था सौंदर्य लालसा और मानवीय आकांक्षाओं पर आधारित है। इन अभिप्रायों में फूल, बावड़ी, चौक, पलंग(पद चिन्ह), मोरियो (मोर), सितावाडी, मासली (मछली), आम्बों (आम्रवृक्ष), खजूरी-रोकड़ी(वृक्ष), मोढ़ बाकिया(वक्राकार), आंखियाँ, दाढ़ी, लाड़ा-लाड़ी(वर-वधु), विषु(बिच्छु), आदि प्रमुख हैं।1 लेकिन आज, इन पारंपरिक प्रतिकों ने पाश्चात्य संसर्ग प्राप्त कर मिश्रित रूप ले लिया है। आज अंगालेखन का चलन पहले की तुलना में सभी जाति वर्ग मे तेजी से बढ़ने लगा है। यह देसी एवं विदेशी विलय रूप में चल रहा है। लेकिन आदिवासी अंगालेखन के मूल स्वरूप में विद्यमान नहीं हैं। आज के रूपाकार बदल गए है, जैसे हाथ पर कोई ध्येय वाक्य, श्लोक या धार्मिक लाईन लिखना, ऐसा लगता है कि विज्ञापन की टेग लाईन लिखी गई हो। राम, हनुमान, शिव के चित्र, स्वयं का व्यक्ति चित्र, माँडना, दिल (प्यार के प्रतीक) बनाकर उसमें प्रेमी जोड़े का नाम अंकित करना एवं आधुनिक डिजाइन का प्रचलन ज़ोर-शोर से होने लगा है। 

वास्तुकला के क्षेत्र में भी भारतीय आदिवासी आवास की झोपड़ी को आधुनिक रूप देकर देशी एवं विदेशी मिश्रित रूप बहुत देखने को मिल रहे हैं। कई बड़े प्रतिष्ठान (सरकारी भवन, होटलों, सार्वजनिक स्थलों) में आदिवासी भ्रम रूपी झोपड़ी बनाई जाने लगी हैं। इसमें आदिवासी वास्तुकला का आवरण देने की कोशिश की है, लेकिन ऊपरी सज्जा जैसे केलु एवं कई आंतरिक सज्जा के उपयोग की वस्तु को प्लास्टिक रूप देकर सजाया जाता है। यह आदिवासी झोपड़ी के प्रतिरूप मात्र है, जो सिर्फ अल्पाहार ग्रहण करें इतने समय के लिए ही ठीक है, इसमें वास्तविक आदिवासी स्थापत्य की आत्मा नही हैं। 

प्रदर्शनकारी कला में मेवाड़ की सुप्रसिद्ध भील आदिवासी की पारंपरिक नृत्य- नाटिका गंवरी में इन दिनों विदेशी एवं आदिवासी संस्कृति के मिश्रित रूप देखनें को मिल रहे हैं। गंवरी के प्रारम्भिक स्रोत में नृत्य-नाट्य में प्रयोग किए जाने वाले मुखौटे मिट्टी के हुआ करते थे। धीरे-धीरे यह रूप लकड़ी एवं अब प्लास्टिक रूप मे तब्दील हो गए हैं। ऐसे ही पूरा गंवरी का कॉस्टयूम बदल गया है। डायलॉग में आधुनिकता आ गई है। इनके वास्तविक कला रूप प्रतिदिन धूमिल होते जा रहे हैं। गंवरी को जब से सांस्कृतिक धरोहर के रूप मे प्रस्तुत कर शहर में मंचन कर प्रोत्साहित किया जाने लगा है, तब से इस पर परदेशी संस्कृति का विलय रूप ज्यादा देखनें को मिल रहा है। संस्कृति के विलय के नव रूप सामान्य आदिवासी जीवन में भी देखनें को मिल रहे हैं। पहनाव, आभूषण एवं घर की साज-सज्जा में उपयोगी शिल्प की वस्तुएं जैसे लकड़ी को प्लास्टिक एवं लोहे मे ढ़ाल दी गई हैं। आदिवासी प्रतिकों को भी हूबहू ढाला गया है। इनके कला रूपों का व्यापारी लोग आभूषण एवं उपयोगी वस्तु बाजार में प्रयोग कर आदिवासी शिल्प के नाम से धड़ल्ले से व्यापार कर रहे हैं। इनके वास्तविक कला रूप के हकदार को उनका हिस्सा नहीं मिलता है। व्यापारिक दृष्टि से उत्पादित शिल्प वास्तविक आदिवासी शिल्प की आत्मा से काफी दूर हैं। यह मात्र आदिवासी एवं विदेशी कला का विलय रूप हैं। जैसे आभूषण, पारंपरिक वस्त्र, आदिवासी चित्र, सुपड़ा, टोकरी, परात ऐसे कई उपयोगी शिल्प में देखनें को मिल रहा है।
  
आधुनिक काल के शुरुआती दौर से आदिवासी संस्कृति शुद्ध पारंपरिक निजता के साथ चलती रही। लेकिन समय के साथ यह संस्कृति पश्चिम के प्रभाव मे आने लगी और अब हालात यह है कि इसके मूल स्वरूप को पहचानना मुश्किल होता जा रहा है। क्यूंकी इस संस्कृति पर प्रतिदिन पाश्चात्य संस्कृति रूपी कलेवर(परत) चढ़ती जा रही है। इस कलेवर रूपी सांस्कृतिक धरोहर को हम आजकल बड़े-बड़े प्रतिष्ठानों में देख सकते हैं। आदिवासी में पाश्चात्य कला एवं संस्कृति के संसर्ग से उत्पन्न नव विलय युक्त आदिवासी संस्कृति को आज के दौर में ट्राइबल फ्यूजन के नाम से पसंद किया जा रहा है। यह सब आधुनिकता एवं वैश्विकरण के दौर में होना स्वाभाविक है। आज हर कोई व्यक्ति अपनी उच्चता का स्तम्भ गाड़कर अलग-अलग सांस्कृतिक मूल्य को स्थापित करना चाहता है। ऐसे दौर में देशी आदिवासी संस्कृति का सहारा लेकर व्यक्ति पाश्चात्य के मिश्रण के फ्यूजन को उत्पन्न कर प्रतिष्ठा पाने को ललायित है। इस नए पाश्चात्य विलय से मूल सांस्कृतिक धरोहर को निश्चय ही नुकसान पहुंचा है। आज हालात यह है, कि कई आदिवासी संस्कृति मूल्य को पहचानना मुश्किल हो गया है। 

हमें प्राचीन आदिवासी संस्कृति से मोह है, हम खोना नहीं चाहते। किन्तु यह भी एक चिंतन का विषय है, कि मानव परिवर्तन को जल्दी स्वीकार नही करता है। क्यूंकी पूर्वाग्रह के स्थापित प्रतिमान से हमे संस्कृति मूल्य ह्रास होने ड़र बना रहता है। किन्तु मानवीय प्रवृत्ति है, कि अपने द्वारा निष्पादित कार्य में कुछ न कुछ नवाचार की जिज्ञासा रखता है। इस क्रम में पूर्व के स्थापित सांस्कृतिक मूल्यों को दाव पर लगाकर नए सांस्कृतिक मूल्य को जन्म देता है। इसलिए प्रतिदिन मूल सांस्कृतिक मूल्यों का ह्रास होता रहता है। यहीं मानव की दुहरी प्रवृत्ति है, कि मूल संस्कृति ह्रास के साथ-साथ नवाचार करता है।
  
पाश्चात्य संस्कृति से युक्त यह नव स्वरूप न तो पूर्णत आदिम कहा जा सकता न ही आधुनिक। इस नए सांस्कृतिक स्वरूप को संकर फ्यूजन रूप कहा जा सकता हैं। इस चपेट में आदिवासी युवा परम्परावादी कलाकार भी हैं। यह अपने पुरखों की परम्परा को तो निभा रहे हैं, लेकिन आज के संदर्भ उनकी कला विलय युक्त हो चुकी हैं। एक साक्षात्कार में भोपाल के गोंड आदिवासी कलाकार वेंकट रमन सिंह श्याम कहते हैं कि मैं गोंड हूँ मेरी कला में गोंड आदिवासी तत्व हैं। अन्यथा मैं जड़ से कट जाता। पर मेरी कला समकालीन है, आधुनिक है। मैं अपने समय में और आज का कलाकार हूँ। मेरी कलाकृतियों को महज पारंपरिक मानना उचित नहीं हैं।2 असल में यह तथाकथित मुख्य धारा में बने रहने की होड़ का फ्यूजनरूप के परिणाम हैं। आज का समाज इस मिश्रित रूप को पसंद कर प्रयोग में लेने लगा हैं। हम अपने इर्द-गिर्द के सौंदर्यकरण या मनोरंजन कार्य में पाश्चात्य के साथ भारतीय आदिम संस्कृति के विलय के स्वरूप को जी रहे हैं। हालाकि फ्यूजन संस्कृति मे आदिम संस्कृति के बिम्ब ज्यादा प्रभावशाली होते हैं, इसलिए नए स्वरूप का आकर्षण बढ़ जाता हैं। इसलिए फ्यूजन के नव स्वरूप से संस्कृति का व्यवसायिकरण भी बहुत तीव्र गति से हो रहा हैं। संस्कृति विलय से निश्चित ही पर शुद्ध आदिम संस्कृति को पहचानना मुश्किल हो गया है। इसके लिए उचित दस्तावेजीकरण कर विलय रूप को रोकना चाहिए ओर आदिम संस्कृति के महत्व को प्रकाश मे लाकर समकालीन दौर मे प्रासंगिकता पर ध्यान दिया जाना चाहिए। 

वर्तमान आदिम कला पर शोधकार्य एवं महत्वपूर्ण अवधारणा प्रस्तुत कर बिगड़ते सांस्कृतिक वैभव को कुशलता पूर्वक संग्रह करना चाहिए। इससे भारतीय आदिम सांस्कृतिक वैभव की पहचान मिलेगी।  देशी एवं विदेशी संस्कृति के विलय से उपजी नव संक्रमित संस्कृति के यथोचित मूल्य को पहचान करना। आज का खासकर युवा आधुनिकता के वशीकरण में आदिम संस्कृति मूल्य को भूल चुका है। इसकी पहचान के लिए शैक्षिक आयोजन, संगोष्ठियाँ कर महत्व पर प्रकाश डालना चाहिए। अगर इस प्रकार के विषय पर मूल्यांकन नहीं किया तो एक दिन हम आदिवासी संस्कृति के वास्तविक मूल्यों को देखनें को तरस जाएंगे। आदिवासी मूल सांस्कृतिक मूल्यों को संरक्षित कर खासकर दृश्य एवं प्रदर्शंकारी कला क्षेत्र में विश्वपटल पर आदिवासी कला एवं संस्कृति की पहचान स्थापित करने अवधारणा बनाने की आवश्यकता है। 
  
संदर्भ-
1. भावसार विरबाला, आदिवासी कला, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, नई दिल्ली, 2007, पृ. स. 45
2. साक्षात्कार वेंकट रमन सिंह श्याम, काला रंग सबसे शक्तिशाली, आदिवासी साहित्य, 7-8 अंक, 2016, जेएनयू, नई दिल्ली, पृ.स.- 92  

  डॉ. संदीप कुमार मेघवाल
(स्वतंत्र कलाकार), पता- मु. पो.- गातोड़ (जयसमंद), तहसील- सराड़ा, जिला- उदयपुर, राजस्थान-313905
सम्पर्क sandeepart01@gmailcom90244473502

          अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) वर्ष-5, अंक 30(अप्रैल-जून 2019) चित्रांकन वंदना कुमारी 

1 टिप्पणी:

  1. बहुत ही अच्छा लिखा है ऐसे ही लिखते रहिये। वैसे हम भी शेर-ओ-शायरी लिखते हैं आप चाहें तो इस लिंक पर जा कर पढ़ सकते हैं Zulf Shayari

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