आत्मकथ्य: बदलता समय और बदलती शिक्षा/ गुणवंत कुमार - अपनी माटी Apni Maati

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मंगलवार, मार्च 17, 2020

आत्मकथ्य: बदलता समय और बदलती शिक्षा/ गुणवंत कुमार

                                  बदलता समय और बदलती शिक्षा

जब हम शिक्षा की बात करते हैं, तो शिक्षा से हमारा तात्पर्य ज़िंदगी जीने से होता है। सीख लेने से होता है। लेकिन आज के दौर में शिक्षा का मतलब बदलता जा रहा है। शिक्षा का व्यावहारिक ज्ञान से कोई मतलब नहीं रह गया है। आज के समय में शिक्षा, बस नौकरी पाने का साधन मात्र रह गई है। अगर किसी विद्यार्थी से पूछा जाए कि तुम किस लिए पढ़ रहे हो? तो उसका सीधा उत्तर यही होगा मैं नौकरी पाने के लिए पढ़ रहा हूँ।”  बहुत कम होंगे जो कहेंगे कि मैं नौकरी पाने के लिए पढ़ रहा हूँ। साथ ही मैं इसलिए भी शिक्षा ग्रहण कर रह हूँ ताकि एक अच्छा इंसान बन सकूँ, भीड़ से अलग दिख सकूँ। शिक्षा चाहे सामाजिक, राजनीतिक, वैज्ञानिक, तकनीकी हो वह हमारे जीवन को सहज करती है। शिक्षा से हमारा भटकाव है, हम इसके सही अर्थ तक पहुँचने में अक्षम हो रहे हैं और इसका जिम्मेदार कौन है?  यह जानना पड़ेगा। जब तक किताबी कीड़े बनकर शिक्षा प्राप्त करेंगे शायद तब तक हम शिक्षा का सही अर्थ नहीं समझ पाएँगे। निदा फ़ाज़ली जी की कविता की एक पंक्ति बहुत चर्चित है-
                                                     धूप में निकलो घटाओं में, नहाकर देखो
                          ज़िंदगी क्या है? किताबों को हटा कर देखो

फ़ाज़ली जी कह रहे हैं कि किताबों को हटाकर ज़िंदगी को देखो, इसका मतलब यह नहीं कि हम पढ़ना ही छोड़ दें। इनका कहना हैं कि आप जो ज्ञान ग्रहण कर रहे हैं उसे व्यावहारिक जीवन में लाएँगे तो जीवन जीने का मजा आएगा। वैसे विद्वानों ने शिक्षा को बहुत खतरनाक बताया है ये हमें सोचने-समझने की ताकत देती है और जब शिक्षा से विचार आते हैं तो इतने शक्तिशाली होते हैं कि उनके आगे गोला-बारूद भी कुछ नहीं है। इसी के दम पर आर्यों ने मूलनिवासियों पर राज किया। आर्य शिक्षित थे इसलिए उन्हें सभ्य भी कहा जाता है। वे कितने सभ्य थे, यह हम सभी जानते हैं

मौर्यों, गुप्तों, मुगलों और अंग्रेजों ने सदियों तक राज किया क्योंकि, वह शिक्षा को अपने जीवन में उतारकर विचार उत्पन्न करते थे। शिक्षा में शिक्षक की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। कहा जाता है- शिक्षक वह है जिसकी गोद में आंधी और प्रलय खेलते दोनों हैं। यह शिक्षक पर निर्भर करता है कि वह किस प्रकार की फसल तैयार करता है। आज एक बच्चा अपने गुरुजी के सामने खुलकर बोलने से शर्माता है, वह स्टेज पर जाकर बोलना तो दूर क्लास में बोलने से भी हिचकिचाता है। जब कक्षा में शिक्षक पढ़ाते-पढ़ाते कुछ पूछ लेता है तो आधे से ज्यादा बच्चों के सिर नीचे झुक जाते हैं इसलिए कि कहीं हम से न पूछ ले। आप कहेंगे कि पढ़ने में ध्यान नहीं देते होंगे। नहीं, ऐसा कहकर आप बस अपनी कमजोरी छिपा सकते हैं। आज के समय में शिक्षा का महत्व क्या है? इसी पर एक शिक्षक का जवाब है-

मुझे स्कूल जाना है। बच्चों को पढ़ाने के लिए। उसी वक्त दिल से सवाल निकलता है-
पढ़ाने के लिए! और क्या पढ़ाने के लिए?
पाठ्यक्रम पढ़ाने के लिए?
बच्चों को कुछ सिखाने के लिए?
लेकिन दिल इस उत्तर को स्वीकार नहीं करता।
                                                                     ( अज्ञात )

मुझे लगता है कि आज की वर्तमान शिक्षा का संबंध किसी भी प्रकार से शिक्षा से नहीं है। सब जगह नौकरी पाने के लिए ही पढ़ाया जाता है, कहीं नौकरी देने के लिए नहीं पढ़ाया जाता है। चींटियों की तरह एक के पिछे एक चल दिए। मैं पहले ही बता चुका हूँ कि हम आज शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं ताकि नौकरी कर सकें। सरकारी नहीं सही तो प्राइवेट ही परंतु नौकरी के लिए पढ़ना। क्या करे स्थिति ही ऐसी बना दी गई हैहम इतने किताबी कीड़े हो गए हैं कि घरवालों को भी समय नहीं देते। दूसरी कक्षा का बच्चा भी इतना भारी बैग लेकर स्कूल जाता है। कुल मिलाकार आज की शिक्षा हमारे दिमाग से संवेदनाएँ खत्म करती जा रही हैं और इस तरह हम असंवेदनशील बनते जा रहे हैं।

फिर भी क्या करें? पढ़ना तो पढ़ेगा ही। बढ़ते दामों तथा निजीकरण से शिक्षा सभी के द्वार नहीं पहुँच पा रही है। गरीब परिवार से जुड़े विद्यार्थी मैट्रिक और स्नातक जैसे-तैसे निकाल लेते हैं। लेकिन आगे क्या? कहाँ जाए? क्या करेंशिक्षा को मात्र आज एक धंधा बना दिया गया। अब तो इतनी समस्याएँ उत्पन्न हो गई हैं कि विद्यालयों और विश्वविद्यालयों पर दिन-दहाड़े हमले हो रहे हैं जिसे किसी जमाने में विद्या का मंदिर कहा जाता था, उसे भी बंद करने पर तुले हुए हैं। गाँव का पटेल नहीं चाहता कि यह गरीब मेरे बराबरी में बैठे। सरकार नहीं चाहती कि लोग पढ़कर सरकार से सवाल पूछे। परेशान और गरीब इंसान क्रांति करने को हमेशा तैयार ही रहता है। अमीरों के लिए पढ़ना-पढ़ाना तो चुटकी का खेल है। यहाँ नहीं तो विदेश पढ़ लेंगे।

हर साल 10 लाख बच्चों में से 10 हजार बच्चों का चयन आई.आई.टी. के लिए होता है। यहीं से विद्यार्थी को लगता है कि अब तो मेरे ज़िंदगी खत्म हो जाएगी। अब कुछ नहीं कर सकता।", उन्होंने जिस से ज्ञान प्राप्त किया है वह खुद एक किताबी कीड़ा है। न कभी खुद किताबों से बाहर निकला है न कभी बच्चों को निकलने दिया। यह अच्छे शिक्षक के गुण नहीं हैं। आज के समय में इतनी प्रतियोगिता हो चुकी है कि उसे पार करना हर किसी के बस की बात नहीं है। इससे दुखी होकर वह आत्महत्या करने जैसा विचार मन में ले आते हैं। इसमें कहीं न कहीं उसके माता-पिता और शिक्षक जिम्मेदार होते हैं। हम तो कह देते हैं कि तुम अगर प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुए तो तुम्हें तुम्हारी मनपसंद चीज दिलाएँगे लेकिन यह नहीं कहते कि उत्तीर्ण नहीं हुआ तो क्या करेंगे? जब बच्चा अनुत्तीर्ण हो जाता है तो माता-पिता उसे ऐसी ही दृष्टि से देखते हैं कि जैसे बच्चा अपना न होकर किसी और का हो। वह समाज में हँसी का पात्र बन जाता है। हम क्यों हमेशा नकारात्मक बात ही बोलते रहते हैं? असल में दिक्कत यहाँ है कि हम बच्चे के पैदा होने से पहले ही नाम के साथ यह तय कर देते हैं कि हमारा बच्चा क्या बनेगा? डॉक्टर, इंजीनियर वगैरह-वगैरह। अगर बच्चे ने कला (ARTS) विषय का चयन कर लिया तो मत पूछिए उसका क्या हाल होता है? मतलब कोई देशद्रोही काम कर दिया हो जैसे। सपने हमेशा माँ-बाप के होते हैं और उन्हें पूरा करना बच्चों को होता है। मैं देशभर के सभी माता-पिता से विनम्रतापूर्वक पूछना चाहता हूँ कि अगर आपको अपने सपने इतने ही प्यारे हैं तो आपने क्यों नहीं पूरे किए? हाँ किसी कारणवश नहीं कर पाए तो ये क्यों भूल जाते हैं मेरे जैसे जो सपने मैं किसी जमाने में देखा करता था वैसे से ही सपने मेरे इस बच्चे के भी होंगे?

आज के समय में हम परिवारसमाज और मित्रों से कटते जा रहे हैं। इनसे ज्यादा समय हम तकनीकी चीजों को दे रहे है। असल में बात यह है कि हम निरंतर मशीन बनते जा रहे हैं। इसी कारण हमारी मानवीय संवेदनाएँ खत्म होती जा रही हैं। मैं यह नहीं कहता कि तकनीक अपने आप में कोई बुरी चीज है, इसका त्याग कर देना ही श्रेयस्कर है। मैं तो यही कहता हूँ कि यह आज हमारी ख़्वाहिश न रहकर जरूरत की चीज बन गई है और बने भी क्यों न? लेकिन निर्णय यह करना है कि हम इसका उपयोग कितना सकारात्मक कर रहे हैं? ऐसे में चिंताजनक यह है कि आज विश्वविद्यालयों की लाइब्रेरियों का समय घटाया जा रहा है। फीस में लगातार वृद्धि की जा रही है। कोई पढ़े तो कैसे? इधर आज के लोग किताबों से ज्यादा वाट्सएप्प और फेसबुक के ज्ञान को महत्व दे रहे हैं।बहुत सी उलझनों के बीच मेरा यह आत्मकथ्य आपको एक विद्यार्थी के मन और अनुभूतियों से छोटा सा परिचय देगा ऐसी आशा है

गुणवंत कुमार
बी.ए. हिन्दी (ऑनर्स)
महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालयवर्धा (महाराष्ट्र)

           अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) शिक्षा विशेषांक, मार्च-2020, सम्पादन:विजय मीरचंदानी, चित्रांकन:मनीष के. भट्ट

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