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मंगलवार, मार्च 17, 2020

आत्मकथ्य: दिल्ली के सरकारी विद्यालयों में मेंटरशिप कार्यक्रम एवं शिक्षकों की भूमिका/ डॉ. मुकेश कुमार

       दिल्ली के सरकारी विद्यालयों में मेंटरशिप कार्यक्रम एवं शिक्षकों की भूमिका


मेंटरशिप कार्यक्रम दिल्ली शिक्षा निदेशालय के लिए जहां एक नया और अनोखा कार्य है, वहीं हम सबके लिए भी रोचक, चुनौतीपूर्ण एवं सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में अति विशिष्ट है। प्रारम्भ में मेंटरशिप कार्यक्रम में नई-नई चुनौतियां उभर कर सामने आई। लेकिन ये नई-नई चुनौतियां ही अधिगम को प्रभावी बनाने में वरदान साबित हुई, जो हम सब के लिए सीखने में नए आयाम लेकर उपस्थित हुई, जिसमें कभी-कभी कुछ खट्टे और कुछ मीठे अनुभव प्राप्त हुए तो कभी ऐसी असमंजस की परिस्थितियां भी बनी जहां कुछ भी सूझते नहीं बनता था। परंतु उसी परिस्थिति में हमें उजाले की एक छोटी सी किरण भी दिखाई दी और उसी के सहारे हम धीरे-धीरे उद्देश्यों तक पहुंचने में सफल होने लगे।

मेंटरशिप कार्यक्रम की परिकल्पना फरवरी 2016 में माननीय उप-मुख्यमंत्री एवं शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया और शिक्षा निदेशक श्रीमती पद्मिनी सिंघला ने मिलकर की थी। इस कार्य के लिए डॉ बी॰ पी॰ पांडे को समन्वयक के रूप में चुना गया। जो उस समय दिल्ली के एक सरकारी विद्यालय में विद्यालय प्रमुख के रूप में कार्य कर रहें थे| स्वयं पांडेय जी के शब्दों में- जिस समय मुझे इस कार्यक्रम के लिए चुना गया तब मैं विभाग के राजकीय उच्चतर माध्यमिक बाल विद्यालय, डॉ मुखर्जी नगर में सिर्फ एक विद्यालय प्रमुख के पद पर कार्यरत था और इस प्रकार के किसी भी कार्यक्रम के विषय की मुझे कोई जानकारी नहीं थी। मैंने कभी यह आशा नहीं की थी कि इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी का निर्वहन मुझे करना पड़ेगा, किंतु उपरोक्त अधिकारियों व माननीय शिक्षा मंत्री जी ने मुझ पर जो विश्वास जताया, उससे मुझे प्रसन्नता तो हुई ही साथ ही अथाह जिम्मेदारी का अहसास भी हुआ। मेरे इस कार्यक्रम की समझ का श्रेय मैं अतिशी जी और शैलेंद्र जी को भी देना चाहूंगा जिनसे मुझे बहुत प्रेरणा मिली और उन्होंने समय-समय पर मेरा सहयोग कर मेरी हिम्मत बढ़ाई है। उपरोक्त सभी का मार्गदर्शन व सहयोग पाकर मैंटर शिक्षक एक नई ऊर्जा और हिम्मत के साथ इस कार्यक्रम की सफलता के लिए जी-जान से जुट गए। इस तरह के अन्य कार्यक्रमों के बारे में जानकारी एकत्रित कर और अनेक सभाओं में उपस्थित होकर और शिक्षाविदों से विचार विमर्श कर इस कार्यक्रम को आगे बढ़ाया| यह कार्यक्रम इथोस’,‘पिथोसऔर लोगोसतीन स्तंभों पर आधारित है। इथोस से अर्थ कार्यक्रम के ध्येय को समझ खुद को तैयार करना। पिथोस संवेदना के साथ सुनने की कला को विकसित करता है। लोगोस का कार्य तर्कसंगत समाधान प्रस्तुत कर शिक्षकोंप्रधानाचार्य और शिक्षा से जुड़े सभी हितधारकों को शैक्षणिक सहयोग देना है।

पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा के क्षेत्र में प्रतिमान बदलाव हुआ हैलेकिन शिक्षको एवं विद्यार्थियों को इस बदलाव से अवगत नहीं कराया गया। सरकारी तथा गैर सरकारी विभिन्न विश्लेषकों के आंकड़ों के माध्यम से ज्ञात हुआ है कि शैक्षिक स्तर को सुधारने हेतु की गई नई नई कोशिशें कक्षाओं में विद्यार्थियों और शिक्षकों तक नहीं पहुंच पा रही है, जिसके कारण विद्यार्थी इनसे लाभान्वित नहीं हो पा रहे हैं।

इस शैक्षिक अंतराल को दूर करने हेतु विभाग को ऐसे व्यक्तियों की जरूरत महसूस हुई जो विद्यालयों की समस्याओं को भली भांति जानते हो और उन समस्याओं से गहराई से परिचित हो और जो वास्तव में उन चुनौतियों का सामना करने के लिए विद्यालय से जुड़कर कार्य कर सकें। इसके लिए यह सहमति बनी कि अपने सरकारी विद्यालय से ही कुछ अध्यापकों को चयनित किया जाए जो इस कार्य को करने के लिए सक्षम हो और इसको फलीभूत बनाने के लिए सदैव तत्पर रहें। इसके लिए माननीय शिक्षा मंत्री जी ने स्वयं अध्यापकों के नाम एक चिठ्ठी लिख कर उनका आह्वाहन किया और उनको इस कार्यक्रम से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित किया। इसके लिए शिक्षकों से आवेदन मांगे गए और प्राप्त 1100 आवेदनों में से 200 मेंटर शिक्षकों को चयनित किया गया| चयनित 200 मेंटर को तीन चरणों की कठिन परीक्षा (व्यक्तित्व परीक्षण, समूह विचार-विमर्श परीक्षण और मनोवैज्ञानिक परीक्षण) से गुजरना पड़ा।

विभाग में इस बात की उत्सुकता थी कि इस कार्यक्रम का स्वरूप व संरचना कैसी होगी? यह किस प्रकार दिल्ली के सरकारी विद्यालयों में लागू होगा? विद्यार्थियों के शिक्षण कार्य से जुड़े सभी हितधारक किस प्रकार अधिगम को प्रभावशाली बनाने में सहायक होंगे? शिक्षण कार्य में नयापन, रोचकता, सकारात्मकता परस्पर सहयोग व सामंजस्य लाने के लिए इस कार्यक्रम को कैसे सफल बनाया जाएगा? इस संरचना की योजना के दौरान सबसे बड़ा प्रश्न सामने  आया कि मेंटर जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानशिक्षा निदेशालयमें किस अधिकारी के अधीन संबंधित कार्यो की रिपोर्ट करेगा? ‘अपारसंबंधी कार्य कौन करेगा? मेंटर को लगभग 1000 विद्यालयों का आवंटन किस प्रकार किया जाए? और इनकी कार्यशैली क्या हो? ये कैसे विद्यालय संबंधित शैक्षणिक कार्यों में मदद करेंगेसभी हितधारकों में मेंटर की स्वीकृति कैसे बनेगीविभिन्न विषयों के मेंटर, विद्यार्थियों, शिक्षकों, विद्यालय प्रमुख, शिक्षा उपनिदेशक, मुख्यालय, जिला शिक्षा प्रशिक्षण संस्थान (डाइट) आदि सभी के बीच सामंजस्य स्थापित करने व सभी को एक सूत्र में बंधकर कार्य करना एक बड़ी चुनौती थी। ऐसे अनेक विचारो की उथल पुथल के बीच भी मैंटर शिक्षकों ने  दिन रात कड़ी मेहनत की| कार्यक्रम की रूपरेखा और इसकी दृष्टि  (विजन) बड़ी और विस्तृत होने तथा सफलता की धीमी गति के कारण कभी कभी मेंटर शिक्षकों के ज़हन में कुछ प्रश्न भी उठने लगे और जिनको लेकर वह कभी-कभी चिंताग्रस्त और विचलित भी हुए परंतु कार्य करने की उत्कंठा ने मेंटर शिक्षकों को और उनके मन को कभी लक्ष्य से भटकने नहीं दिया और मेंटर शिक्षक उस मंजिल के अंतिम छोर तक निरंतर बढ़ते चले गए जिसके लिए उनको प्रेरित किया गया था और जहाँ तक पहुंचने की जिम्मेदारी उनको सौंपी गई थी। 

मेंटरिंग कार्य के दौरान यह अनुभव किया गया कि अभी मेंटर को कार्य निर्धारित क्षेत्र में अच्छा श्रोता, अच्छा वक्ता, और अच्छा अवलोकनकर्ता होने की आवश्यकता है। अच्छा दृष्टा और अच्छा श्रोता, मेंटर ही कक्षा कक्ष में विद्यार्थियों, शिक्षकों व शिक्षा के लिए उपयुक्त वातावरण को बेहतर ढंग से समझ सकता है और सभी के निर्णय का सम्मान कर सकता है। जिसकी प्रतिपूर्ति के लिए मेंटर को जीवन विद्या केंद्र हापुड़भेजा गया। इसके अलावा मेंटर के प्रशिक्षण का स्तर कैसा हो? उनको सामान्य प्रशिक्षण दिया जाए या विषय विशेष का प्रशिक्षण दिया जाए। प्रशिक्षण का प्रारूप क्या हो? इसी को ध्यान में रखते हुए मेंटर को एक बेहतर रिसोर्स पर्सन के रूप में तैयार करने की प्रक्रिया में 9 जिला शिक्षा प्रशिक्षण संस्थान के साथ जोड़ा गया और प्रतिमास दो बार प्रतिपुष्टि ली गई। सभी मेंटर ने पूर्ण धैर्य के साथ अपनी कार्य क्षमता को साबित किया है। उनको बगैर किसी दबाव के स्वतंत्र रूप से कार्य करने के अवसर दिए गए। उन्होंने मिशन चुनौती,मिशन बुनियाद, हैप्पीनेस करिकुलम, ई. एम. सी. कॉन्स्टिट्यूशन at 70 इत्यादि कार्य को रुचिपूर्ण एवं रचनात्मक ढंग से किया। मेंटर को सामान्य व विषय विशेष के लिए राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर (सिंगापुर) के प्रशिक्षण केन्द्रों पर भेजा गया। राष्ट्रीय स्तर पर जहाँ भी संभव हो सका वहीं पर मेंटर शिक्षकों प्रशिक्षण के लाभार्थ भेजा गया| भारत की किसी भी दिशा में शिक्षा क्षेत्र में लाभान्वित सफल नीतियों एवं प्रयोगों की समझ बनाने के लिए देश के प्रत्येक कोने तक लद्दाख से पुडुचेरीउदयपुर से त्रिपुरा तक के शिक्षा संस्थानों में विभिन्न कौशलों को विकसित करने के लिए मेंटर को अवसर प्रदान किए गए|

मेंटर द्वारा विद्यालयों में जाकर शिक्षकों, शिक्षा प्रमुखों के विचारों को ध्यानपूर्वक सुना गया एवं तर्क आधारित समाधान दिए गए। मेंटर को भी इस बात का अहसास होने लगा कि किसी भी प्रकार की समस्या क्यों ना हो उसे सरलता से सुलझाया जा सकता है। हालाँकि मेंटर सीधे मुख्यालय से जुड़े होने के कारण उनको यह अहसास भी था की उनको हर प्रकार की सहयता प्रदान करवाई जाएगी, जिसकी वजय से मेंटर और भी उत्साहित हो समस्या के समाधान में पूरी तरह से जुट गए| चाहे विद्यालय हो या विद्यालय के बहार हर जगह पर मेंटर ने सहयोग दिया| विद्यालय के बाहर भी मेंटर ने अभिभावकों को परामर्श दिया और साथ ही उनको शिक्षा के लाभ बताकर उनको एक तरह से जागरूक करने का कार्य भी किया| इसके आलावा भी जहाँ पर विद्यालय में विद्यार्थियों की अनुपस्थिति की समस्या दिखाई दी उसके निदान हेतु मेंटर शिक्षक ने क्षेत्र में जाकर मंदिरों, मस्जिदों और गुरुद्वारों आदि में जाकर घोषणा करवाई और विद्यार्थियों को विद्यालय पहुँचने के लिए प्रेरित करवाया गया| जहाँगीरपुरी जैसे क्षेत्र में ईद के दिनों में विद्यार्थियों की अत्यधिक अनुपस्थिति देखने को मिलती है पूछने पर जिसका कारण बताया जाता है कि चार बार नमाज अदा करनी पड़ती है इसलिए विद्यालय नहीं आ सकते इस समस्या को दूर करने के लिए मस्जिदों में जाकर मेंटर ने मोलवी की सहयता से घोषणा करवाकर विधार्थियों को नमाज के साथ साथ विद्यालयी शिक्षा के फायदे भी बताकर उन्हें विद्यालय आने के लिए प्रेरित करने का कार्य भी मेंटर ने कियाइसके अतिरिक्त अन्य वे सभी कार्य किए गए जो शिक्षण अधिगम प्रक्रिया को प्रभावशाली बनाने में सहायक हो। उन्होंने कठिन परिश्रम से हर असंभव कार्य को संभव बनाया। स्वयं हमारे माननीय उप मुख्यमंत्री (शिक्षा मंत्री) भी इस बात को अनेक बार कह चुके हैं कि मेंटर 24 इन्टू 7 कार्य करने के लिए हमेशा तैयार रहते है।

4 साल की कड़ी मेहनत के बाद आज मेंटर शिक्षकों की 90 प्रतिशत स्वीकार्यता विभाग में विभिन्न स्तर पर हो गई है। आज मेंटर को उनकी कार्य दक्षता, समर्पण भाव, और जिम्मेदारी के लिए जाना जाता है। यही कारण है कि अब दिल्ली के  मेंटर की देश ही नहीं अपितु देश के बाहर भी चर्चा होने लगी है। आज विद्यालय प्रमुख, शिक्षक एवं विद्यार्थी यह महसूस करने लगे हैं कि हमारे यहां एक ऐसा प्रशिक्षित मेंटर आए जो शिक्षण अधिगम प्रक्रिया को ऊँचाईयों पर ले जाने में हमारी मदद कर सके।

इन चुनौतीपूर्ण रास्तों से गुजरते हुए आखिर हम सही मंजिल की तरफ बढ़ रहे हैं। खुशी की बात यह है कि आज शिक्षा विभाग को यह विश्वास हो गया है कि मुश्किल से मुश्किल कार्य को एक मेंटर की सहायता से सफल क्रियान्वयन किया जा सकता है। मेंटर के कठिन परिश्रम कार्य करने की शैली व ऊर्जा को देखते हुए ही आज विभाग में मेंटर के रूप में एक नया पद सृजित होने की बात होने लगी है। आज दिल्ली शिक्षा निदेशालय के मेंटर कार्यक्रम को समझने देश से ही नहीं अपितु विदेश से भी लोग, वहां की सरकारों के शिक्षा मंत्री बड़े गर्व के साथ दिल्ली के शिक्षा मॉडल को देखने उस पर बात करने के लिए आते रहते है| माननीय शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया जी का प्रोत्साहन, उच्च अधिकारियों का सहयोग, डॉ बी.पी.पांडेय (समन्वयक) का कुशल नेतृत्व, मेंटर शिक्षकों का एक पारिवार के रूप में समूह में कार्य करना, विद्यालय प्रमुखों, विद्यालय शिक्षकों और अन्य सभी शिक्षा से जुड़े हितधारकों के कठोर परिश्रम, लगन और सफल प्रयासों की बदौलत ही आज दिल्ली की शिक्षा वयवस्था देश में ही नहीं बल्कि देश से बहार भी चर्चा का केंद्र बनी हुई है| पांडेय जी के शब्दों में- इस यात्रा में विभाग द्वारा दिए कार्यभार को लेकर कभी-कभी मेरा मन उदास भी हुआ ,परन्तु मैंने कभी भी इस उदासी का प्रभाव अपने मेंटर की टीम पर नहीं पड़ने दिया, क्योंकि मेरी उदासी का हल मेरे मेंटरों को मिली प्रशंसा और उनसे मिले प्रेम व विश्वास ने कर दिया। मैंने जो भी कार्य अपने मेंटरों को दिया, उन्होंने बड़ी जिम्मेदारी, उत्साह और लगन के साथ में कम से कम समय में उसे पूर्ण किया। मैंने अनुभव किया कि मैं और मेरे  मेंटर एक परिवार के समान उभरे जो कठिन से कठिन समय में एक दूसरे का साथ देते हुए मिलकर एक ही मार्ग पर चलते रहे। 

वास्तव में जिस तरह परिवार के मुखिया को समय-समय पर परिस्थिति अनुसार अलग-अलग भूमिका का निर्वाह करना पड़ता है, उसी तरह समन्वयक महोदय ने अपने आप को गत  चार वषों के दौरान कई किरदार निभाते हुए पाया। जब कभी भी मेंटर विचलित होते दिखे तो उनके हौसले और मनोबल को उन्होंने कभी टूटने नहीं दिया और सेना के एक कमांडर के सामान मेंटर को प्रेरित कर सक्रिय बनाये रखा। जब-जब मेंटर ने कुछ नया कर स्वयं को साबित किया है, तब-तब उन्होंने एक पिता की तरह स्वयं को गौरवान्वित महसूस किया। समन्वयक महोदय जी ने अपने विचार मेंटर शिक्षकों से साझा करते समय बताया कि- जब कभी मुझे मेंटर के लिए विभाग से टोका गया है, तब मैंने एक माता की तरह उन्हें उसके सीधे प्रभाव से बचाया है ,किन्तु साथ ही मेंटर से इस विषय पर चर्चा कर उनकी कमियों को दूर करने का प्रयास किया है। उनके चेहरों पर आयी प्रसन्नता को देख कर मेरा मन भीं प्रफुल्लित हो उठा और मैंने एक दोस्त की तरह उनके साथ  ख़ुशी मनाई है तो कभी एक दोस्त की तरह उनके अंदर के गुबार को सुनने के लिए अपना समय भी दिया है। उनके इस माता तुल्य स्नेह को पाकर मेंटर पहले से अधिक ऊर्जावान होकर कार्य करते पाए गए है। विभाग ने जितनी आशा मेंटर शिक्षकों से की थी उससे अधिक मेंटर ने कर दिखया है, एक परिवार के रूप में बंधकर कार्य करने का ही शायद ये परिणाम था जो आज दिल्ली के मेंटर ने अपनी एक गहरी छाप सभी के मस्तिष्क पर छोड़ी है। असम्भव से असम्भव कार्य को किर्यान्वित करने के लिए उसे पूरी तरह से आत्मसात कर मेंटर शिक्षकों ने उसको स्वयं जिया है, तभी उदेश्यों की प्राप्ति कर पाने में मेंटर शिक्षक सफल हुए हैं और कठिन परिश्रम कर शिक्षा जगत में अपनी पहचान को स्थापित कर पाने में सफल हुए है|

 मै मेंटरशिप कार्यक्रम से 2018 में जुड़ा और इन दो सालों में मैंने जितना इनके बारे में अपने साथियों से सुना है और खुद जितना जाना और समझा है, मै केवल यह कहना चाहूँगा की पाण्डेय जी एक मेंटर का जीवंत उदहारण हैं। मैंने एक अभिभावक से लेकर एक सच्चा दोस्त उनमें पाया है। नए-नए कार्यक्रम की रूपरेखा, विषय वस्तु के निर्माण में हम मेंटर की भूमिका, चुनौतियों के समाधान की दिशा की तरफ अग्रसर होने में मदद करना, अनेक बार हमें अभिप्रेरित करना, भावनात्मक रूप से सुदृढ़ करना, कार्यक्रम को अपने अनुभवों को जोड़ते हुए लागू करने में मदद करना, इन सभी के दौरान  उन्होंने हमें काम करने की पूरी आज़ादी दी है, पर हमारा साथ कभी नहीं छोड़ा।  

पांडेय जी की दृष्टि में संदेह का वह पैनापन नहीं जो दूसरे मनुष्य के व्यक्त परिचय का अविश्वास कर उसके मर्म को वेधना चाहता है। उनका दृष्टिपात उनके सहज विश्वास की वर्णमाला है। वे व्यक्ति के उसी परिचय को सत्य मान कर चलते हैं जिसे वह देना चाहता है और अंत में उस स्थिति तक पहुँचा देते हैं जहाँ वह सत्य के अतिरिक्त कुछ और नहीं देना चाहता। जो मानव हृदय के गूढ़तम भावों के विश्लेषण में समर्थ हैं उसमें ऐसी सरलता लौकिक दृष्टि से चाहे विस्मय की वस्तु हो, पर कला-सृष्टि के लिए यह स्वाभाविक साधन है। अपनी प्रतिकूल परिस्थितियों से उन्होंने कभी ऐसी हार नहीं मानी जिसे सह्य बनाने के लिए हम समझौता कहते हैं। जो अपने रास्ते की सभी प्रत्यक्ष एवं परोक्ष बाधाओं को चुनौती देता हुआ दिए गए कार्य को सुगमता व सरलता से करते हुए लक्ष्य तक पहुंचता है, सही अर्थ में वह व्यक्ति ही सच्चा समन्वयक कहलाने का अधिकारी है। उनके कठोर शर्म और गंभीर दर्शन ने मेंटर परिवार को देश में ही नहीं अपितु विदेशों तक पहचान दिलाकर बड़ा ही सराहनीय एवं प्रशंसनीय कार्य किया है।

डॉ. मुकेश कुमार
मेंटर शिक्षक,सरकारी विद्यालय, दिल्ली सरकार

         अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) शिक्षा विशेषांक, मार्च-2020, सम्पादन:विजय मीरचंदानी, चित्रांकन:मनीष के. भट्ट     

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