समीक्षा: मैंगोसिल : समसामयिक यथार्थ और विकास का रोग / भुवाल यादव - अपनी माटी

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सोमवार, जुलाई 06, 2020

समीक्षा: मैंगोसिल : समसामयिक यथार्थ और विकास का रोग / भुवाल यादव

                 'समकक्ष व्यक्ति समीक्षित जर्नल' ( PEER REVIEWED/REFEREED JOURNAL) अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-32, जुलाई-2020
                   मैंगोसिल : समसामयिक यथार्थ और विकास का रोग- भुवाल यादव                                                   
चित्रांकन: कुसुम पाण्डेय, नैनीताल
भारत में बीसवीं शताब्दी के नवें दशक से औधोगीकरण और शहरीकरण की प्रक्रिया बहुर तेजी से चलीI विदेशी कम्पनिया बड़े पैमाने पर भारत में स्थापित हुईI इसके कारण सामाजिक परिवर्तन भी हुये इस सामाजिक परिवर्तन को विद्वानों ने विकास की संज्ञा भी दी हैI विकास सत्ता की तरह ही सकारात्मक और नकारात्मक होता हैI विकास एक तरफ जहां व्यक्ति और समाज विशेष के लिए सौंदर्य, समृद्धि और सभ्य होने का प्रतीक है, वहीं दूसरी तरफ आम-आवाम की बस्ती उजड़ने, गरीबों को गरीबी की गर्त में ढकलने और बर्बर होने का कारण बनता जा रहा है। ऐसी नीतियां-परिस्थितियां जिनके कारण सत्ता और विकास की नकारात्मक छवि की सामना जनता को करनी पड़ती है; का विरोध करने वाले व्यक्तियों को उनके दिक् और काल के बाहर फेंक दिया जाता है। क्योंकि ये सब किसी श्रेष्ठ नस्ल, वर्ग, जाति या सभ्यता के अतीत और वर्तमान के अन्याय और पाप के ऐसे सबूत होते हैं जिन्हें वे (श्रेष्ठ, नस्ल, एवं जाति वर्ग के लोग) हमेशा छुपाए रखना चाहते हैं। इनके जैसे जीवन जीने वाले लोग व्यावसायिक नगर, राजनीतिक देश या सरकार के मास्टर प्लान के सामने अड़चन एवं बाधा पैदा करते हैं। कहानी का कथावाचक 'मैं' और चंद्रकांत ऐसे ही पात्र हैं, जिन्हें बार-बार शहर बदर होना पड़ता है, भगा दिया जाता है। तथाकथित समृद्ध, विकसित सभ्यता एवं समाज के लोग हमेशा इनसे घृणा करते हैं और इन्हें मिटा देना चाहते हैं। इस खेल को खेलने वालों में पूंजी और सत्ता, दोनों पक्ष के लोग शामिल होते हैं।

कहानीकार ने 'मैंगोसिल' कहानी की कथा को क्रमशः 'प्रलय का प्राक्कथन', 'जहांगीरपुरी की गली नंबर सात', 'शोभा भगाकर लाई गई थी', 'मियानी में शोभा', 'पखेरुओं का घोंसला और अंडे', 'अभंग,खुसरो, दरगाह और पहला जीवित बच्चा', 'एक लगतार बड़ा होता सिर', 'पत्थर, कपड़े, मिट्टी और धातु का जीवित पुतला', 'स्थगित मृत्यु और मियानी में जीवन', 'अंधकार में फूटते रंग और 'गलीचे' का जादू', 'मैंगोसिल का वायरस और चींटा', 'फेरीवाला, छत पर धूप, कुकर की सीटी और चीनी पिस्तौल' और  'अंत में डब्ल्यू.एच.ओ. का सर्वेक्षण, सूर्यकांत की डायरी का एक पन्ना और पेंटागन' नाम से चौदह उपशीर्षकों में बांटकर लिखा है। कहानी की शुरुआत ही 'प्रलय का प्राक्कथन' शीर्षक से हुई है I कहानीकार ने कहानी के पहले इसे पढ़ना अनिवार्य बताया है, क्योंकि 'प्रलय का प्राक्कथन' ही पूरी कहानी की पृष्ठभूमि रचता है। आइये! हम भी मैंगोसिल कहानी का 'प्रलय का प्राक्कथन' पढ़ना शुरू करें। मैंगोसिल कहानी वर्तमान की है। और इस वर्तमान को बाजारवाद पूरी तरह से अपने कब्जे में ले लिया है। इस बाजारवाद को स्थापित करने में जितना हाथ पूंजीवादी शक्तियों का है, उतना ही सत्ता का भी। हमें कैसे रहना है? क्या खाना है? क्या पहनना है? कौन-सी वस्तु जीवन और स्वास्थ्य के लिए जरूरी और लाभदायक है?  इसे हम तय नहीं कर पा रहे हैं। विज्ञापन और प्रचार के सूक्ष्म तंत्र हमारी मानसिकता बदल रहे हैI मतलब हम अपने जरूरत के अनुसार न कुछ रख सकते हैं और न ही कुछ खरीद सकते हैं। बाजार में उपलब्ध भौतिक वस्तुओं के अनुसार ही खरीदारी करना है। आम जनता-जनार्दन इस बाजार  व्यवस्था के कारण मारे-मारे घूम रही है और अंततः अपनी जिंदगी भी गंवा बैठती है, "पूंजी और सत्ता के हर रोज फैलते साम्राज्य की अभियांत्रिकी के बुल्डोजर्स एक किसी दिन किसी मेट्रो रेल, फ्लाईओवर, किसी शॉपिंग मॉल, बांध,खदान उद्योग या किसी पांच-सितारा होटल के रूप में, उस मलिन बस्ती में भी पहुंचते हैं और वहां चंद्रकांत थोराट जैसा जीवन समाप्त हो जाता है।"1

कथावाचक 'मैं' अपने आपको न चाहते हुए भी चंद्रकांत के जीवन और नियति से जुड़ा हुआ मानता है। चंद्रकांत और कथावाचक 'मैं' दोनों कहानी में प्रतिनिधि के रूप में पाठक के सामने आते हैं। इसमें चंद्रकांत साधारण या आम जनता का प्रतिनिधि है, जो अपना और परिवार के सदस्यों जीवन का भरण-पोषण किसी पेशा या धंधा से, मजूरी और हडतोड़ मेहनत करके करता है। कथावाचक 'मैं' शिक्षित और बौद्धिक वर्ग के उस संघर्षशील व्यक्ति का प्रतिनिधि है, जो जनविरोधी-नीतियों, सामंती-पूंजीवादी व्यवस्था, भ्रष्ट और तानाशाही सरकारों के खिलाफ आवाज बुलंद करता है, न कि चापलूसी। अर्थात कथावाचक 'मैं' और चंद्रकांत, दोनों सरकार और पूंजीपतियों के मास्टरप्लान में गतिरोध पैदा करते हैं। इसीकारण इन दोनों को रास्ते से हटा दिया जाता है या मिटा दिया जाता है, क्योंकि "यह संपन्नता और समृद्धि की अनैतिक संस्कृति के सौंदर्य को फ़क़त अपनी मानवीय उपस्थिति से ही असुंदर और संदिग्ध बनाता रहता है। इसीलिए समृद्ध विकासशील सभ्यताएं जब-जब अपना 'सौंदर्यीकरण' करती है तब-तब ऐसे जीवन को मिटा डालना चाहती है। उसी तरह जैसे झाड़ू से कचरा ड्राइंगरूम के बाहर फेंका जाता है।"2 इस समृद्ध विकासशील सभ्यताओं और इनकी सौंदर्यीकरण के कारण अगर कोई किसी जंगल, पहाड़ या गांव में जाकर बसता है, तो वहां पर भी समृद्धि और विकासशील सभ्यता का प्रतीक पूंजी और सत्ता का संयुक्त रचना हमारे जीवन को डूबा ले जाता है।

जब भी किसी नगर या देश की सांस्कृतिक बनावट को सुंदर एवं विकसित करने का उद्योग किया जाता है, तब धरती से केवल जल-जंगल ही नष्ट नहीं होते; बल्कि "बहुत से ऐसे देवी-देवता भी डूब जाते हैं, जो हजारों वर्ष पहले, किसी त्रेता या द्वापर में, स्वर्ग से उतर कर पत्थरों और पांडुलिपियों में इसलिए बस गए थे कि वह हमारी पीड़ाओं को कम करें। कि वे हमारे उत्पीड़न और विनाश को सह्य बनाएं।"3 ऐसे ही आजकल विकास और सौंदर्यीकरण के नाम पर बनारस में विश्वनाथ मंदिर के चारों तरफ बसे घरों एवं दुकानों को तोड़ दी गई है। जबकि कहा जाता है कि यहाँ मंदिरों में घर और घर में मंदिरों का पाया जाना बनारस की सांस्कृतिक विरासत और विशेषता है। विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर के निर्माण के चलते लगभग हजार से ऊपर मंदिरों को तोड़ा गया है, जो बहुत ही प्राचीन थी। लाखों लोग बेघर और बेरोजगार हो गए, रही-सही कसर कोरोना आपदा ने पूरा कर दिया। खैर, कोरोना भारत ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व को तहस-नहस कर रखा है। लेकिन मैं कोरोना आपदा को एक साजिश मानता हूं,जिसके जरिए देशों की अर्थव्यवस्था को चौपट कर सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को बंद किया जा रहा है और वर्तमान में प्राइवेट व विदेशी कंपनियों को स्थापित किया जा रहा है या आने वाले समय में अनेक कंपनियां स्थापित की जायेगी। भारत के विभिन्न राज्यों में जहां-जहां विद्युत उत्पादन हेतु डैम बनाया गया या बनाया जा रहा है वहाँ पर हजार-पांच सौ घरों का नष्ट और परिवारों का विस्थापित होना एक नियति बनती जा रही है, जिसे भूगोल और समाजविज्ञान के विद्वान अच्छी तरह से रेखांकित कर सकते हैं।

विकास और सत्ता की गुणगानों की विरुदावलियां गाने या लिखने वाले भी अपनी कहानी, कविता और संगीत में मेहनतकश, गरीब, बेरोजगार, असंतुष्ट, बेचैन और भूखे लोगों को विषय वस्तु नहीं बनाते हैं। ये उनके लिए अजनबी होते हैं,क्यों ? यह सोचने और विचार करने की बात है। ऐसी घटनाएं केवल भारत में ही नहीं घटी या घट रही है, बल्कि विश्व के अन्य देशों में भी। जैसे सन् 2003 में अफगानिस्तान, इराक, बोस्निया में, दो-ढाई हजार साल पहले मोहन-जोदड़ो और मेसोपोटामिया में, और कहानी लिखते वक्त कर्बला, बगदाद फजुल्ला,नजफ, नसीरिया या गजा पट्टी में जो हो रहा था, क्या वह दिल्ली के गुडगांव, नोएडा सीलमपुर, भीलसवा और महरौली में घटने वाली घटनाओं से भिन्न थी?  या नर्मदा ,बेतवा कृष्णा, कावेरी, अमेजन, बोल्गा, मिसीसिपी, नील, सिंधु, गंगा, तुंग भद्रा, कोसी, गंडक आदि तमाम नदियों की घाटों पर जो हो रहा है या किसी भी बड़े-बड़े शहरों में विकास के नाम पर जो हो रहा है, वह किसी मायने में किसी से अलग नहीं है। केवल देश और स्थान को लेकर भिन्नता है। लेकिन इन सब घटने वाली घटनाओं के पीछे वही कारण है, जो पूरे विश्व को अपने कब्जे में ले  रखा है अर्थात पूंजीवादी शक्तियाँ और इसे आगे बढ़ाने में सत्ता अपना दोनों हाथ लगा रखी है।

लेखक 'प्रलय का प्राक्कथन' को केवल ठीक से पढ़ने का ही सुझाव नहीं देता, बल्कि 'प्रत्येक शब्द और वाक्य और उनके बीच की खाली जगहों और सन्नाटे को बांचने' पर जोर दिया है। हमें यह ध्यान रखना होगा कि पढ़ना और बांचने के बीच बहुत फर्क होता है। पूरे विश्व में घटने वाली इन घटनाओं को केवल ईश्वरी देन मानना उचित नहीं है। हम इन घटनाओं को (निवर्तमान अद्यतन) का विस्मरण इसलिए न करें कि यह क्षणिक है या क्षणभंगुर है; और ये सब ऊपर वाले का लीला है। बल्कि हमें इस पर चिंतन करने की जरूरत है और जब आप चिंतन करेंगे तो इन घटने वाली घटनाओं के पीछे का कारण, जीवन और जगत का सारा रहस्य खुलकर सामने आ जाएगा। फिर आप काल की इस लीला ( निवर्तमान और शाश्वत महाकाल) से मुक्त होकर कथावाचक 'मैं' और चंद्रकांत की तरह इस व्यवस्था परिवर्तन हेतु 'किसी नये ऐतिहासिक महाक्रांति की प्रतीक्षा' करने लगियेगा, जो हमेशा से किसी नए निर्माण के लिए सदा अनिवार्य हुआ करता है। और यही होगा "अतीत की इति और भविष्य के आदि का युगांतरकारी पल।"4

इस महा-जलप्लावन, प्रलय की प्रतीक्षा या जो कुछ कह लें, जब तक अपना शक्ल अख्तियार नहीं कर लेता है; तब तक कथावाचक 'मैं' और चंद्रकांत थोराट जैसे लोगों का सिर लगातार बड़ा होता जाएगा। डॉक्टरों ने इसे एक लाइलाज रोग बताया है, जिसका नाम मैंगोसिल है। लेकिन एक बार छोटे सरकार यानी अमीर खुसरो की दरगाह के पास एक बूढ़े फकीर ने कहा था, "इसका इलाज एक किताब में मौजूद है।लेकिन ... वह किताब लिखी जानी बाकी है।"5 यह संयोग ही है कि चंद्रकांत, कथावाचक 'मैं' और सूरी की भांति उस बुढ़े फकीर का सिर एवं आंख में समानता है, जिसकी पुष्टि कहानीकार ने किया है। जब कथावाचक 'मैं' और चंद्रकांत, दोनों सूरी का अंतिम संस्कार दिल्ली के निगमबोध घाट पर कर रहे थे, तभी कथावाचक 'मैं' छोटे सरकार के मजार पर मिले उस बूढ़े फकीर को देखा, "जिसकी आंखें चीटियों की तरह लाल थी... उसका सिर उसकी धर की तुलना में बहुत ज्यादा बड़ा था, जिसे वह अपनी फटी-पुरानी चादर के भीतर छुपाने की लगातार कोशिश कर रहा था।"6 यह बूढ़ा फकीर उस सूफी-संत समाज का प्रतिनिधि है, जिन्होंने पिछले कई सौ सालों से समाज को सही दिशा और गति देने का काम किया है। आज के बाबाओं के चरित्र से एकदम अलग, समाज को लेकर चिंतित और चिंतन करने वाले उस बूढ़े फकीर द्वारा बताया गया 'मैंगोसिल' का इलाज का उल्लेख जिस किताब में किया गया है; वह किताब व्यवस्था का प्रतीक है। इसी व्यवस्था को परिवर्तन करने में कथावाचक 'मैं' और चंद्रकांत जैसे लोग अपने भारी और बेइंतहा दुखने वाले सिर को अपने कंधे पर ढोते हुए लगे हैं। इससे आने वाले समय में कथावाचक 'मैं', चंद्रकांता और सूरी जैसा कोई दूसरा आदमी जीवन जीने को विवश न होगा। इस व्यवस्था परिवर्तन के लिए वह बूढ़ा फकीर सुझाव देता है कि अगर आपको व्यवस्था परिवर्तन करना है, तो आपको अपनी और अपनी चारों ओर फैली जिंदगी को देखना होगा, उनके बीच का अंतर समझना होगा; क्योंकि ऐसे लोगों का जीवन प्रत्येक जरूरी और अहम मामलों से जानबूझकर अलग रखा जाता है।

जहांगीरपुरी की गली नंबर सात चंद्रकांत जैसे दबे-कुचले और उत्पीड़ित लोगों का निवास स्थल है, जो विकास के असंतुलन और कचड़े का ढेर सा लगा हुआ दिखता है। पूरे इलाके से निकलने वाले मल-मूत्रों एवं कचड़ों से निर्मित, जो देखने में मोबिल, ग्रीस, तेल और प्लास्टिक के घोल के काले गाढ़े द्रव से बना कोई रासायनिक मिश्रण लगता है। आप जिस किसी भी बड़े शहरों में रहते हों, वहां पर ऐसी रिहायशी इलाके देख सकते हैं। कहने के लिए इन क्षेत्रों में कुछ ऊँचे आधुनिक मकान भी हैं, लेकिन वह उसी तरह है, जैसे समूचे उपमहाद्वीप की भयावह गरीबी के दलदल और कीचड़ के बीच चमकते हुए संगमरमर के कुछ बेशकीमत अनमोल टुकड़े हों। राजधानी की 'नगरपालिका' बिजली और पानी की सबसे ज्यादा कटौती इन्हीं बस्तियों में करती है, क्योंकि कमजोर और निर्बल को परेशान करना और सताना ही सत्ता का असली चरित्र रहा है।

मैंगोसिल नाम का रोग का कारण यही जहांगीरपुरी जैसी इलाके हैं, जो सत्ता और पूंजीपतियों के द्वारा दबे-कुचले, उत्पीड़ित और गरीबों के रहने का निवास स्थल है और ऐसी इलाके पूरे देश में है। इसी इलाके में दीप्ति और शालिनी जैसी 'सी' ग्रेड मॉडल रहती हैं और साबुन, हेयर रिमूवर और अंडर गारमेंट्स के विज्ञापनों के अतिरिक्त होटलों और प्राइवेट पार्टियों में भी जाती हैं। छाया मैडम जैसी औरतें भी रहती हैं, जो अपने बच्चों और बूढ़ी सास का पालन रहम दिल वाले पुरुषों की मदद से करती हैं। ये सब ऐसा काम शौक से नहीं करती, बल्कि यह इनकी मजबूरी है। लेकिन सवाल यह है कि ऐसे इलाके किन परिस्थितियों की देन है? ऐसी परिस्थितियां क्यों बनती हैं? अगर बनती भी है, तो इन्हें दूर करने के लिए, समाप्त करने के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकारें कौन-कौन-सी योजनाएं लाई? ये योजनाएं धरातल पर कितनी सफल रहीं ? सफलता नहीं मिली, तो उसके पीछे का क्या कारण रहा?

चंद्रकांत और शोभा का परिवार इसी जहांगीरपुरी की गली नंबर सात के मकान नंबर ई-3/1 के छोटी सी कमरे में रहता था। मियानी के ठीक सामने नाली है। इसके कारण कमरे में अकसर नमी और कभी-कभी तेज बदबू रहा करती थी। बरसात में केंचुए, कनखूजरे, गोजर, घोंघे और मेंढक उनके कमरे के अंदर आ जाते। शोभा अपनी सात बार के गर्भधारण का नष्ट होना, जो 'सही समय के पहले गिर जाता या जन्म के दो-चार महीने बाद मर जाते'  इन्हीं कीटाणुओं और मच्छरों को मानती। साल पंचानवे में शोभा ने एक बच्चों को जन्म दिया और नाम रखा गया सूर्यकांत, प्यार से दोनों उसे सूरी कहते थे। बच्चा जन्म के समय एकदम स्वास्थ्य था, लेकिन बाद में तबीयत खराब रहने लगी। बुखार लगता, माथा दुखती और सांस लेने में दिक्कत होती थी। सूरी का सीर हर रोज, हर पल बढ़ा होता जा रहा था। कुछ दिनों बाद शोभा और चंद्रकांत को यह महसूस होने लगा था, "सूरी का सिर ही बड़ा नहीं हो रहा है, उसका दिमाग भी उसकी उम्र के बच्चे से ज्यादा विकसित हो रहा है। वह हर रोज कम बच्चा बचा रह रहा है।"

चंद्रकांत के मुताबिक डॉक्टरों ने सूरी की बीमारी को लाइलाज बताया था। यह बीमारी किसी अज्ञात वजह से एक न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर भी हो सकता है। कोई वायरल बॉयो-जेनेटिक प्रभाव या किसी खास प्रदूषण का प्वॉजनस असर के कारण उसके सिर के कोशिकाओं का विकास शेष शरीर के मुकाबले अधिक तेजी से हो रहा है। ऐसी बीमारी के कारण सूरी का जीवन दो-ढाई साल ही था। एक बार कथावाचक 'मैं' अपने किसी परिचित डॉक्टर से इसके बारे में पूछा था तो उसका कहना था, "उसे ऐसे किसी रोग के बारे में कोई जानकारी नहीं हैI 'मेनाइंजोसिल' नामक एक रोग होता तो जरूर है, लेकिन वह रीढ़, कमर कहीं भी हो सकता है। इसी तरह हाइड्रोसेफैलिस होता है, जिसमें सिर के भीतर का द्रव बाहर न निकल पाने के कारण, वहां कुछ सूजन आ जाती है, सिर थोड़ा बढ़ भी सकता है, लेकिन उसका तो इलाज है और फेटल (घातक) नहीं होता। उस डॉक्टर ने कहा-तुम इस रोग के जो लक्षण बता रहे हो, वैसे रोग का जिक्र चिकित्सा विज्ञान के किसी भी किताब में नहीं है।"8 डॉक्टर द्वारा जिस मेनाइंजोसिल नामक रोग का उल्लेख किया गया है, उसमें और मैंगोसिल में क्या अंतर है? केवल शब्दाकार का या कुछ और? गांवों में कहा जाता है कि अधिक काम करने और पौष्टिक आहार न मिलने के कारण आदमी कमर और रीढ़, दोनों से झुक जाता है।

सूरी अपने बेढ़ंगे अननुपातिक बढ़ते सिर व रोग के बारे में एक दिन कहा था, "मेरे सिर के भीतर जो रोग है, वह उस गंदे नाले से पैदा हुआ जो हमारे मियानी के पास बहता था। इसके बाद कुछ देर तक शून्य में देखते रहने के बाद उसने गंभीरता से कहा 'मैंगोसिलनाम का यह रोग जिस वायरस से पैदा हुआ है, मालूम है, उस वायरस का नाम क्या है?...गरीबी!"9 यह उस सूरी की बात थी जो खुद मैंगोसिल रोग से पीड़ित था। लेकिन वह सात-आठ वर्ष के बाद से ऐसी बातें कर रहा था, जो हतप्रभ, स्तब्ध और आश्चर्यचकित करने वाली थी। कहानी में वह भविष्यवक्ता के रूप में भी पाठक के सामने आता है‌। सूरी की जान मैंगोसिल बीमारी से नहीं जाती है, बल्कि उपेक्षा का शिकार होने कारण वह आत्महत्या कर लेता है। इसी बात की पुष्टि करने के लिए कहानीकार कहानी के तेरहवें उपशीर्षक 'अंत में डब्ल्यू.एच.ओ. का सर्वेक्षण, सूर्यकांत की डायरी का एक पन्ना और पेंटागन' की रचना करता है। इसमें कहानीकार लिखता है कि जिस रोग को मैंगोसिल नाम से जाना जा रहा है, जिसके वायरस के बारे में सूरी ने खुद ही पता लगाया था, उस रोग से निश्चित ही उसकी मृत्यु नहीं हुई थी।

 सूरी के मां-बाप और अन्य जनों के व्यवहार और उसकी डायरी की पृष्ठ 56 पर लिखी गई कविता से स्पष्ट है कि सूरी की मृत्यु उपेक्षित होने या उपेक्षा का शिकार होने के कारण आत्महत्या करने से हुई। वह अपनी डायरी में लिखा था-
 "यू आर स्टिल अलाइव यू आर नॉट अलोन येट -
शी इज़ स्टिल बिसाइड यूं, विद हर एंप्टी हैंड्स,
एंड जॉय रीचेज यू बोल एक्रास इम्मेंस प्लेंस,
थ्रू मिस्ट्स एंड हंगर एंड फ्लाइंग स्नो,
मिजरेबल इज़ दि मैन हूं रन्स फ्रॉम अ डॉग इन हिज़ शैडो ...
एंड पुअर दि वन हूं होल्ड्स आउट हिज़ रैग आफ लाइफ़ टु बेग मर्सी ऑफ अ शैडो ..."10 मतलब साफ है कि आपको दुनिया में रहना है, तो आपको दयनीय होकर नहीं रहना है, और न ही दया का भीख मांगना है। कविता की यह प्रवृति सूरी , चंद्रकांत और कथावाचक 'मै' के साथ उस बूढ़े फकीर में भी है, जो छोटे सरकार के मजार के पास मिला था। इन सब में एक ऐसी जिजीविषा है, जो करोड़ों अन्याय सहने वाले और कठिन जिंदगी जीने वाले लोगों में अक्सर पाई जाती है। लेकिन ज्यों हि इन्हें कोई उपेक्षित नजरों से देखने या अपमानित करने लगता है, तो ये अपनी जिंदगी से दूर भागने लगते हैं; और यही घटना सूरी के साथ भी घटित होती है।

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार संसार, तीसरी दुनिया के करोड़ों-करोड़ बच्चे कुपोषण, गंदगी और गरीबी के कारण जानलेवा बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। चौंकाने वाली सूचना यह है कि इन बच्चों को एक ऐसे बीमारी अपनी चपेट में ले रही है, "जिसमें बच्चों का सिर उसके बाकी शरीर की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ता है और उसके मस्तिष्क का व्यवहार और अस्वाभाविक हो जाता है।"11 सबसे अधिक चौंकाने वाला दस्तावेज पेंटागन का है, जिसके अनुसार इथियोपिया, घाना, भारत, बांग्लादेश, इराक, अफगानिस्तान, श्रीलंका, निकारागुआ और ब्राजील समेत 67 देशों में ऐसे बच्चे लगातार जन्म ले रहे हैं, जिनका सिर बहुत तेजी से बढ़ रहा है। यही नहीं, अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे विकसित देश भी इससे अछूता नहीं है। सबसे अधिक विचारणीय पेंटागन की यह टिप्पणी है कि इस समय के सभी देशों की सरकारों को इन बड़े सिर वाले बच्चों पर निगाह रखने की जरुरत हैं। लेकिन क्यों ? पेंटागन यह बात बताना भूल गया है। इन बड़े सिर वाले बच्चों के लिए सरकारें कौन-सी काम की है? इन बड़े सिर वाले बच्चों की संख्या क्यों बढ़ रही है? सरकारें उसे रोकने के लिए क्या कर रही है? पेंटागन बड़े सिर वाले बच्चों की आइडेंटिटी दी है, " वे गरीब घरों में गंदगी और कुपोषण के बीच पैदा हुए हैं। उनकी आंखें चींटियों की तरह लाल है। और उन्हें नींद लगभग नहीं आती। ...  और शायद वे सब कुछ जानते हैं।"12 इन सभी तथ्यों से स्पष्ट है कि मैंगोसिल रोग का असली कारण गरीबी, गंदगी और कुपोषण है।

चंद्रकांत थोराट और कथावाचक 'मैं' में कई समानता है। कभी-कभी कथावाचक 'मैं' स्वयं कहानीकार के रूप में आया है और अपने को विश्व के हर लेखकों की जीवन से तुलना कर बैठता है, जैसे "शायद हर लेखक ऐसा ही गटर का जीवन जीता है। लेकिन मैं शायद ज्यादा घबरा जाता था, क्योंकि मैं बड़ा और महान लेखक तो नहीं था।"13 कथाकार ने इन्ही दोनों के पारिवारिक जीवन के जरिए चकाचौंध की चमक में विलीन होने वाले जीवन और उसकी पराजय को अपनी कल्पना शक्ति के माध्यम से रेखांकित किया है। इन सब के पीछे का कारण शहरी क्षेत्रों का सौंदर्यीकरण और विकास को बढ़ावा देना है। यह संभव होता है, उस शहरी क्षेत्र में बसने वाले गरीबों को उजाड़ कर। अगर इसके खिलाफ कथावाचक 'मैं' और चंद्रकांत के जैसे लोग अपनी जुबान से कुछ कहते हैं, तो उन्हें बार-बार शहर बदर होना पड़ता है। कथावाचक 'मैं' की रचना में ऐसा आतियथार्थ है। जिससे किसी भी ईमानदार लेखक की रचना उसे और उसके परिवार को और अधिक असुरक्षित और अधिक विपन्न बनाती है‌। और वह भी ऐसे समय में जब "दुनिया बहुत तेजी से बदल रही थी‌। दिल्ली और दूसरी राजधानियां उससे भी तेजी से। यहां हर जगह अब बस एक ही ध्रुव बचा था। निर्मम, बर्बर, लोलुप, अनैतिक सत्ता और समृद्धि का ध्रुव।"14 यह अतियथार्थ सत्ता की कलई खोल कर रख देता है और जो सत्ता की कलई खोलने का काम करता है, उसकी दुर्दशा क्या होती है?  किसी से छुपा नहीं है। अगर व्यक्ति अपनी बिरादरी के उन लोगों से (जो सत्ता की चापलूसी करते हैं) अपने पक्ष में कुछ कहने को कहता है, तो ये लोग उसके साथ अजीब तरीके का बर्ताव करते हैं। उनकी बातों को सुनकर ऐसा लगता है कि जो उनके लिए विष है, वही अब कथावाचक के लिए अन्न है, सहारा है और वह जीवन गुजर-बसर करने के लिए जरुरी भी हैI

कथावाचक 'मैं' अक्सर चंद्रकांत के साथ निजामुद्दीन ओलिया की दरगाह जाता है। दोनों चुपचाप दोनों बैठ कर गरीब कव्वालों को सुनते। दोनों अपने-अपने घरों की ओर अपना जीवन खोजते हुए लौटते। कथावाचक 'मैं' लगातार खुसरो की उस भाषा के बारे में सोचता, जिसमें उन्होंने पहली बार कविता को पैदा किया। जिन्हें आधार बनाकर खुसरो ने कविता लिखी, वह कौन लोग थे? इनकी संख्या अचानक इतनी बड़ी कैसे? जबकि सभी शासक जनता की भलाई काम ही करते रहे है। इसी बीच कथावाचक की एक और किताब प्रकाशित होती है, इसके कारण उसे नकलची, चोर, पागल कुत्ता, साम्प्रदायिक, सामंत और नक्सलबाड़ी आदि संज्ञाओं से नवाजा गया।क्यों?  क्या कोई गरीब जब कुछ तरक्की करता है, तो उसे ऐसे संज्ञा से नहीं नवाजा जाता है? ऐसे सवालों का सामना नहीं करना पड़ता है? यही 'क्यों?' कथावाचक 'मैं' और दबे-कुचले, उत्पीड़ित एवं गरीबों का प्रतिनिधि चंद्रकांत को एक भूमि पर ला खड़ा करता है। "फासीवाद एक नए चेहरे के साथ सामने में मैजूद था। अवैध पूंजी और अपराधी हिंसा की अपनी ताकत को उन्नीसवीं-बीसवीं सदी की महान् विचारधाराओं के परदे के पीछे ढंकता-छुपाता हुआ। उसने पिछली शताब्दियों के महान् आदर्शों को अपने अनैतिक महत्वाकांक्षाओं और वासनाओं की अदम्य आग में जलाकर राख कर डाला था।"15 और वह भी इन दोनों के सामने मतलब पूरी दुनिया के सामने।

सूरी के मां-बाप उसके प्रति तटस्थता,निस्संगता और उससे दूरी बनाने की कोशिश करने लगे थेI कथावाचक मैंभी सूरी को देखने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। कभी-कभी कथावाचक 'मैं' को भी सिहरन होने लगता है कि शोभा और चंद्रकांत सूरी के साथ हर पल कैसे रहते हैं। बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक की परिस्थितियां देखकर कथावाचक 'मैं' को हमेशा डर लगता है, क्योंकि वह अपनी रचनाओं में अपने समय के यथार्थ को व्यक्त करता। कोलोनाइजर्स, प्रॉपर्टी डीलर्स, आला पुलिस अधिकारी, प्रोफेसर टाईप दलाल, जो क्रांतिकारी संगठनों और संस्थानों में शामिल हो गए थे,  वे सब मिलकर उसे (कथावाचक 'मैं' जैसे लोगों को) भूखा मार डालते। यह वही समय है, जब दिल्ली जैसे शहर के लाखों झुग्गियों-झोपड़ियों में अचानक रहस्यमई ढंग से आग लग जाता था, सौंदर्यीकरण के नाम पर गरीबों को उजाड़ दिया जाता। उस झोग्गी-झोंपड़ियों में रहने वाले और अधिक गरीब एवं बेरोजगारी के शिकार हो जाते। उपरोक्त से स्पष्ट है कि कथावाचक 'मैं' अपने व्यक्तिगत अनुभवों और पीड़ा को कहानी के पात्रों के साथ जोड़ता है। इससे कहानी में लेखक के समकाल का परिदृश्य उभरता है। इस परिदृश्य के माध्यम से पाठक समाज उस समय की राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक गतिविधियों से अवगत होता है। इस परिदृश्य को तैयार करने के लिए ही कथावाचक 'मैं' अपना अनुभव रखता है- "शायद मैं धोखे से उस यथार्थ में चला आया था या ढकेल दिया गया था, जहां एक वास्तविक जीवन नहीं, कविता का डरावना, दु:स्वप्न जैसा अतियथार्थवादी दृश्य था। ऐसा अतियथार्थ, जिसमें किसी भी ईमानदार लेखक की हर रचना उसे और उसके परिवार को और अधिक असुरक्षित, और अधिक विपन्न बनाती है।"16 या "मैं पिछले पंद्रह साल से बेरोजगार था। मेरे पास डिग्रियां थी, स्वर्णपदक थे, स्वास्थ्य था, काम का अनुभव और काबिलियत थी, लेकिन जिस काम के लिए भी मैं आवेदन करता, रिजक्ट कर दिया जाता। मेरी जगह किसी बहुत कम शिक्षा, अनुभव, लेकिन संपर्क और पहुंच वाले व्यक्ति को नियुक्त कर दिया जाता। एक ऐसी भ्रष्ट सत्ता बन गई थी, जिस तक मेरे जैसे लोगों की कोई पहुंच नहीं थी।"17

पूरी कहानी में शोभा का जीवन दो भागो में चित्रित है। पहला चंद्रकांत के साथ भाग आने के पहले का यानी अपने विवाहित पति रमाकांत के साथ का जीवन और दूसरा चंद्रकांत थोराट के साथ का। पहले में उसे वह सब करना पड़ता है, जो नहीं करना चाहिए, लेकिन मजबूरी में करती है। शोभा चंद्रकांत के साथ भाग आने के पहले सारणी में अपने निकम्मे, दलाल, सट्टाबाज और झूठ-फरेब की जिंदगी जीने वाले पति रमाकांत के साथ रहती थी। शोभा पर एक दरोगा की नजर गड़ गई। तीन महीने तक शोभा का जीवन नरक से भी भयावह और अमानवीय यंत्रणादायक बना रहा। केवल दरोगा ही नहीं, कुछ दिन बाद उसके साथ एक गोरा-चिट्टा बिल्डर भी आने लगा। रमाकांत, दरोगा और बिल्डर की उम्र शोभा के उम्र से क्रमशः बीस, तीस और पैंतीस वर्ष अधिक थी। अर्थात शोभा मात्र बीस साल की लड़की थी। इन बेशर्मियों को शोभा के साथ गंदी और अप्राकृतिक हरकत करने में शर्म भी नहीं आती।

दरोगा और बिल्डर रमाकांत के घर बराबर मुर्गे एवं दारू की पार्टी करते रहते थे। रमाकांत अपने चरित्र के कारण ऐसी पार्टियों के लिए हमेशा हामी भर देता था। एक दिन ऐसी ही पार्टी चल रही थी, लेकिन वह पार्टी शोभा के लिए नर्क की यातना लेकर उतरी। आप आजकल आए दिन अखबारों में पढ़ते हैं- बलात्कार, गुप्तांगों को नुकसान पहुंचाना और फिर उसकी हत्या। ऐसी ही घटना शोभा के साथ उस रात घटी। बिल्डर और दरोगा ने शोभा के साथ अप्राकृतिक काम किया। हां, थोड़ी देर रुकिए! बिल्डर और दरोगा दोनों दो प्रतीकों के रूप में कहानी में दिखते हैं। बिल्डर पूंजीपति का और दरोगा सत्ता का प्रतीक है। यही दोनों (पूंजी और सत्ता) मिलकर प्राकृतिक संसाधनों का दोहन बड़े पैमाने पर कर रहे हैं। शोभा को प्रकृति ही मानिए। ऐसे भी प्रकृति को नारी ही माना जाता है। प्रकृति का उपभोग हिसाब से करना उचित रहता है। लेकिन बिल्डर ने शोभा के रेक्टम में बीयर की बोतल घुसेड़ दी। इस पर सत्ता का हँसता हुआ खेल देखिए! दरोगा ने हँसतें हुए पूछा कि ये क्या कर रहे हो? तो बिल्डर ने कहा, "अरे यार पीछे ड्रिल करके जरा बोर बड़ा कर लेने दे, तभी तो नीचे मोटर फिट होगा! साला मेरा बीस हॉर्स पॉवर का जेनुइन क्रांप्टन का मोटर है।"18 इतनी बात कहने के बाद ठहाके के साथ बिल्डर हंसने लगा। पूरे विश्व में प्रकृति का दोहन व लूट पूंजी और सत्ता, दोनों मिलकर हंसते हुए कर रहे हैं। उन्हें किसी के मरने-जीने से कोई मतलब नहीं है। 'अपना काम बनता भाड़ में जाए जनता।' वस अपना काम होना चाहिए। अपना स्वार्थ सधना चाहिए। शोभा ने ऐसी जिल्लत भरी जिंदगी से छुटकारा पाने के लिए ही बिल्डर का ड्राइवर चंद्रकांत को एक रात अपने साथ भगा लाई। दोनों जहांगीरपुरी की गली नंबर सात के मकान नंबर ई-3/1 में रहने लग।

इसी जहांगीरपुरी की गली नंबर सात के मकान नंबर ई-3/1 में शोभा के जीवन का दूसरा भाग चंद्र कांत के साथ शुरू होता है। बहुत मिन्नत और चिढ़ौरी करने के उपरांत चंद्रकांत शोभा के साथ भागकर आया था। इस मकान में रहते हुए साल पर साल गुजरते गए, दोनों बुढ़ापे की ओर अग्रसर हुए, जिंदगी में घटने वाली हरेक घटनाएं घटी। लेकिन "इस बीच सात बार शोभा गर्भवती हुई। ... आने वाले बच्चे के लिए वह मोजा, कपड़े, गद्दे सिलते-बुनती रही, खाने-पीने में हर तरह का परहेज करती रही, लेकिन हर बार बच्चा या तो सही समय के पहले गिर जाता या जन्म के दो चार महीने बाद किसी बीमारी में मर जाता।"19 इसी कारण चंद्रकांत और शोभा चिंतित रहते। किसी तरह आठवें बच्चे के रूप में सूर्यकांत अर्थात सूरी अंततः बच गया। इसी सूरी के प्रति संवेदना की अनुभूति को आधार बनाकर कथा की संरचना विस्तार पाती है। सूरी का जन्म से लेकर मृत्यु तक की जिंदगी अथवा प्रसंग ही कथा को अर्थान्वित करता है।

शोभा का वास्तविक चरित्र मातृत्व का है। जब तीन महीने के सूरी को सांस लेने में दिक्कत हो रही थी, बहुत तेज बुखार थी, तब का शोभा का मातृत्व देखने और प्रशंसा करने योग्य है। औरत किसी भी चरित्र की रही हो, लेकिन अपने बच्चों के प्रति उसका चरित्र मातृत्व का ही होता है और वह अपनी संपूर्णता को बच्चों पर न्यौछावर कर देती है। शोभा सूरी को गोदी में लेकर परेशान थी। बच्चे को दूध पिलाने के लिए अपनी स्तनों को उसके मुख से सटा दी और लगातार हिचकियां के साथ रोये चली जा रही थी। "शोभा के भीतर अपने बेटे के लिए मातृत्व की एक तेज आंधी पैदा हुई। बहुत तीव्र आवेग। उसके स्तनों की घुंडिया उस आवेग में उभरकर तन गई और उसके शरीर की समस्त शिराओं में बहने वाला सारा रक्त मां की ममता के उस संकटग्रस्त आपातकालीन रसायनिक क्रिया में, तेजी से दूध बनता हुआ, उसी ओर दौड़ने लगा, जिधर अज्ञात बुखार, सिर की असहनीय पीड़ा और भूख के बावजूद बिना रोए चुपचाप तीन महीने का नन्हा सा सूरी अपने मुंह से स्तनों को चूस रहा थाI ... शोभा को लग रहा था, जैसे उसकी देह की अनगिनत शिराएं, उसके फूले हुए दोनों स्तनों की ओर बहने वाली असंख्य अदृश्य नदियों में बदल गई हैं। उसकी देह एक धीमी सनसनाहट में कांप रही थी। उसके शरीर की करोड़ों कोशिकाएं और नाड़ियों में कोई एक ऐसा रहस्यपूर्ण संगीत बज रहा था, जो रक्त के दूध में बदलने का अलौकिक, आदिम संगीत होता है। ... और जिसे इस पृथ्वी पर कोई और नहीं, सिर्फ स्त्री ही सुनती और जानती है।"20 इसी मातृत्व का एक दृश्य उदय प्रकाश अपनी कहानी संग्रह '... और अंत में प्रार्थना' में संकलित 'आत्मकथ्य' में सोन नदी में अपने 'स्वयं' को डूबने पर 'धनपुरिहाइन' नामक स्त्री द्वारा बचा लिये जाने की खुशी में उस स्त्री की रोने पर लिखा है- "सिर्फ स्त्रिया जानती हैं कि किसी जीवन को जन्म या पुनर्जन्म कैसे दिया जाता है।"21

शोभा के मातृत्व जीवन का और भी प्रसंग है, जो सूरी और दूसरे लड़के अमरकांत से ताल्लुक रखता है। सूरी की बीमारी को लेकर शोभा को अपने ऊपर शक होता। वह तीस साल पहले की सारणी वाली घटना को ही एक-एक करके सात बच्चों के मरने का कारण मानने लगी थीI एक और प्रसंग है, जो अमरकांत के जन्म के समय का है। जब चंद्रकांत कथावाचक 'मैं' से कहा कि तुम नहीं आओगे, तो हमें चैन नहीं पड़ेगा। समझ लो, ये शोभा की जिद है। "शोभा कह रही है अगर तुम नहीं आओगे तो अमरकांत भी ठीक नहीं रहेगा। ... तुम्हें आना ही आना है।"22 इस प्रकार हम देखते हैं कि एक मां अपने बच्चे का जीवन को सुरक्षित देखने के लिए कुछ भी करने को तैयार है, यहां तक कि आतिथ्य सत्कार भी।

अब हम आते हैं शोभा के दांपत्य जीवन पर। उस दांपत्य जीवन पर, जिससे सृष्टि की रचना हुई है। सूरी शोभा की स्तन से दूध पीते-पीते सो गया। शोभा भी चंद्रकांत के बगल में लेट गई। ब्लाउज खुले होने कारण दोनों स्तन दिख रहे थे। चंद्रकांत इन दोनों स्तनों का अलौकिक (सूरी की तबीयत खराब होने पर दूध पिलाते वक्त) जादू देखा था, जो उसकी कल्पना में समा नहीं रहा था। इन्हीं दोनों सुंदर गोल स्तनों ने तेज बुखार और असह्य पीड़ा में कराहते हुए सूरी को एक निश्चिंत पीड़ाहीन गहरी नींद दी थी। "ओह! क्या इनमें कोई औषधि ... कोई अमृत है? बिठोबा का प्रसाद?  जीवन की लड़ाई में हारते हुए किसी पराजित निर्बल, अकेले और गरीब पुरुष या शिशु का सुरक्षित शरण्य!"23 पता न इस दुनिया की कौन सी रीति है कि व्यक्ति ऐसी परिस्थितियों में ही कामुक या किसी के प्रति सम्मोहित होता है। चंद्रकांता और शोभा भी कामुक स्थिति में पहुंच जाते हैं। "यह भी एक जादू ही था, जो अब फिर से शुरू हो गया था। शोभा की देह की उन असंख्य शिराओं और नाड़ियों में, जिनमें वस अभी कुछ ही पल पहले, उसका सारा रक्त दूध में बदला हुआ, नदियों की तरह उधर दौड़ रहा था, जहां उसके नन्हे से बेटे सूर्यकांत का मुंह था, अब इस पर उसकी देह की उन्हीं शिराओं में जैसे कोई मादक द्रव्य बहने लगा। उसकी पूरी चेतना और देह को अदम्य वासना और आदिम उत्तेजना के एक नये संगीत में डुबाता हुआ। और किसी उन्माद में यह भी उसी दिशा की ओर दौड़ रहा था, जहां अब और सूरी का मुंह नहीं, चंद्रकांत का होठ रखे हुए थे।"24 लेकिन एक चीज समझ में नहीं आती कि कथावाचक 'मैं' स्वयं इस परिस्थिति में क्यों आकर खड़ा हो जाता है? केवल आकर खड़ा भर नहीं होता, बल्कि अपनी आंखों देखा हाल सुनाने लगता है, "चंदू ... चंदू !! वह फुसफुसाई और अपनी देह का सारा जोर लगाकर उसके ऊपर छा गई। ... चंद्रकांत की सांसें रुंध रही थी, लेकिन वहां शुरू था, एक स्त्री का अनोखा, अलौकिक, इन्द्रजालिक खेल।"25 कथावाचक 'मैं' इन दोनों के काम को 'विरोधाभासी अनिर्वच क्रीड़ा' माना है। एक जगह और, जब अमरकांत के जन्म के बाद चंद्रकांत और शोभा के विशेष आमंत्रण पर कथावाचक 'मैं' उनके घर पहुंचता है। वहां पर शोभा की उत्फुल्लता और सुंदरता को देख कर कथावाचक शोभा के प्रति कामुक हो जाता है। कथावाचक की इस कामुक भावना को शोभा द्वारा पकड़ ली जाती है। इसके बाद कथावाचक 'मैं' शोभा के ऊपर एक तरह का लांछन लगाता दिखता है, "वे एक ऐसी स्त्री की आंखें थीं, जो किसी भी पुरुष के भीतर के पशु को सहलाना और उसे पालतू बनाना बहुत अच्छी तरह से जानती है। एक भी बेफिक्र स्त्री की आत्मविश्वास से भरी बिंदास आंखें।"26 अब सवाल यह उठता है कि क्या कथावाचक स्वयं की छवि को बचाने के लिए यह आरोप लगाता है? या शोभा की कामुकता को साबित करने के लिए? या शोभा का वास्तविक चरित्र ही यह है? निश्चित ही कथावाचक अपनी कमी को छुपाने के लिए शोभा की यह छवि गढ़ता है। अगर ऐसा नहीं होता, तो फिर शोभा अपने विवाहित पति रमाकांत के यहां से बिल्डर का ड्राइवर चंद्रकांत को अपने साथ भगाकर क्यों लाती?  रमाकांत के यहां तो तीन-तीन मरद थे।

सूरी का संपूर्ण जीवन मैंगोसिल कहानी को एक अच्छी गति और दिशा दिया है। सूरी ऐसे बच्चों और व्यक्तियों का प्रतीक है, जो अपने समय और समाज से लगातार उपेक्षित होते रहे हैं। अपने आपको जीवित रखने के लिए जन्म से मृत्यु तक संघर्षरत रहते हैं। सूरी का सिर हर रोज, हर पल भारी और बड़ा ही नहीं होता जा रहा था, बल्कि उसका दिमाग भी अपने उम्र के बच्चों से कई साल बड़ा हो गया था। उसे अगर कभी हंसी भी आती, तो बिल्कुल अप्रत्याशित घटनाओं और बातों पर। डॉक्टरों द्वारा निश्चित भविष्यवाणियों को गलत सिद्ध करता हुआ, किसी अनहोनी-असंभव घटना की तरह सूरी लगभग नौ वर्ष जीवित रहा।

कथा में कहानीकार अपने समकाल की समस्याओं और प्रवृत्तियों को अपने पात्रों के माध्यम से बखूबी परिचय करवाया है। कुछ बातें, जो कहलवा पाना असंभव था; उसे सूरी की डायरी में दर्ज करवा दिया है। हां, एक बात ध्यान रखना होगा कि कहानी में सूरी की वह बातें, जो हर किसी को हतप्रभ, स्तब्ध और आश्चर्यचकित करती है; वह सब लेखक की विद्वता की उधेड़-बुन है। सुरी कथावाचक 'मैं' का छोटा स्वरूप था, जो आने वाले समय में किसी भी व्यवसायिक नीति, राजनीतिक देश या सरकार के मास्टर प्लान के सामने अड़चन पैदा कर सकता था। लेकिन प्रकृति का रहस्य देखिए कि सूरी को ऐसा जीवन मिला ही नहीं।

कहानी में बहुत से अवांतर प्रसंग आए हैं, जिससे कहानी की कथावस्तु मजबूत स्थिति को प्राप्त होती है। इन आवंतर प्रसंगों के माध्यम से पात्रों की बातें पाठकों की मनःस्थिति को प्रभावित भी करती है। ऐसे ही एक प्रसंग है, शोभा और चंद्रकांत द्वारा कर्जा लेकर अशोक विहार के फेज फोर में जनता फ्लैट में तीसरी मंजिल मकान लेना। शोभा को इस बात का हमेशा डर बना रहता है कि हम सब अमरकांत के साथ ढेर दिन के मेहमान नहीं है। क्या हमारे बाद (मर जाने के बाद) अमरकांत मकान का कर्जा पटा पायेगा। यह केवल शोभा की ही मन:स्थिति नहीं है, बल्कि इस भागमभाग की दुनिया में शोभा और चंद्रकांत जैसे अनगिनत लोग हैं। कथावाचक केवल दिल्ली का उदाहरण देते हुए बताता है कि एक करोड़ के आसपास लोगों के पास आजीविका का न कोई ठोस आधार है, न भविष्य के लिए कोई जमा पूंजी। "जिन मकानों और घरों में वे रह रहे थे, वे उनके अपने नहीं थे। निजी या विदेशी बैंकों या फाइनेंस कंपनियों के पास हर संपत्ति गिरवी रखी हुई थी। इतने सारे लोग दिन-रात बंधुआ मजदूरों की तरह ब्याज और कर्ज की किस्त चुकाने के लिए काम कर रहे थे।"27 यही एक उदाहरण पूरे भारत या विश्व की शहरी जीवन की वास्तविकता जानने के लिए बहुत है। खैर, यह अलग बात है कि यह प्रवृति अब गांव-देहात में भी बड़े पैमाने पर पैर फैलाना शुरू कर दी है।

कहानी के बारहवें उपशीर्षक 'फेरीवाला, छत पर धूप, कुकर की लंबी सिटी और चीनी पिस्तौल' में चीनी पिस्तौल ही बच्चों को खिलौने के रूप में क्यों लाया गया है? यह भी सोचने वाली बात है। कथाकार चाहता तो खिलौने के रूप में और अन्य खिलौना भी दिखा सकता था। आज जो मार-धाड़ की प्रवृत्ति है, सामंती सोच और ताकतों का आतंक फैला हुआ है, एक देश दूसरे देश के ऊपर हमला कर रहा है, और ये सब बाजारवाद का वर्चस्व की सत्ता को कायम करने एवं रखने के लिए किया जा रहा है। इन्हीं सबका प्रतीक 'चीनी पिस्तौल' है। इसे दिखाने के लिए ही कथाकार चीनी पिस्तौल को खिलौने के रूप में पेश किया है। चीनी पिस्तौल का खिलौने के रूप में दिखाना, उस समय तक भारत देश में चीनी बाजार का वर्चस्व की सत्ता व दबदबा को दिखाता है।

मैंगोसिल कहानी के मुख्य पात्रों के चरित्र को परखने के लिए उदय प्रकाश द्वारा सन् 1998, जनसत्ता में लिखा गया 'हंसते हुए अकेलापन' लेख जरूर पढ़ना चाहिए। इस लेख में ऐसे लोगों की व्यवहारों का उल्लेख किया गया है, जो पूंजीवादी सभ्यता के दूर्निवार, अकेलापन और आत्मनिर्वासन के समकालीन उदाहरण हैं। ये अपने आप से बातचीत करते हैं, अपने आप हंसते, रोते-गाते लोग हैं। इसे "हम अपने समय के मनुष्य के इस दारुण अकेलापन और मानसिक विक्षेप को महानगर की रोजमर्रा जिंदगी का एक सामान्य समाजशास्त्रीय उपलक्षण मानकर, उसकी एक तर्कसंगत व्याख्या कर डालते हैं।"28 ऐसे लोगों को उनके इस जीवन से बाहर निकालने के लिए हमें उनके दुख-सुख को अपने साथ बांटने की जरूरत है। इसे कथावाचक 'मैं' बहुत ही बखूबी के साथ निर्वाह किया है। ऐसे लोग लगभग हर सभ्यता में पाए जाते हैं, लेकिन आने वाले समय में इनकी संख्या और तेजी से बढ़ेगी। इसलिए जरूरी है कि शोभा, चंद्रकांत, सूरी, बूढ़े फकीर और कथावाचक 'मैं' जैसे लोगों की खोज खबर ली जाए। अगर उन्हें ऐसी परिस्थितियों से बाहर निकालने की कोशिश करने में हम सफल रहें या सफल हो जाएं, तो वह दिन दूर नहीं, जब हम पूंजीवादी, फासीवादी और सामंती सोच वाले लोगों को पिछाड़ दें।

संदर्भ

01.'मैंगोसिल', उदय प्रकाश, पेंगुइन बुक्स, हरियाणा, 2006, पृ० 78-79
02.वही, पृ० 79
03.वही, पृ० 80
04.वही, पृ० 82
05.वही, पृ० 83
06.वही, पृ० 174
07.वही, पृ० 128
08.वही, पृ० 135
09.वही, पृ० 153
10.वही, पृ० 175-76
11.वही, पृ० 176
12.वही, पृ० 177
13.वही, पृ० 110
14.वही, पृ० 111
15.वही, पृ० 115
16.वही, पृ० 111
17.वही, पृ० 140
18.वही, पृ० 92
19.वही, पृ० 106
20.वही, पृ० 121
21.'... और अंत में प्रार्थना', उदय प्रकाश, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2010, पृ० 11
22.'मैंगोसिल', उदय प्रकाश, पेंगुइन बुक्स, हरियाणा, 2006, पृ० 138
23.वही, पृ० 123
24.वही, पृ० 123-24
25.वही, पृ० 125
26.वही, पृ० 143-44
27.वही, पृ० 149-50
28.'ईश्वर की आंख, उदय प्रकाश, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2017, पृ० 110
  भुवाल यादव   
शोध छात्रकाशी हिन्दू विश्वविद्यालयवाराणसी

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