सम्पादकीय : महामारी जिसने दुनिया की तस्वीर बदल दी / जितेन्द्र यादव - अपनी माटी

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बुधवार, अक्तूबर 28, 2020

सम्पादकीय : महामारी जिसने दुनिया की तस्वीर बदल दी / जितेन्द्र यादव

सम्पादकीय : महामारी जिसने दुनिया की तस्वीर बदल दी / जितेन्द्र यादव 



एक साल पूर्व तक शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि एक ऐसी महामारी आएगी जो दुनिया की गति को थाम लेगी। जीवन इस कदर ठहर जाएगा कि मौत के साए में लोग दुबके हुए घरों में कैद हो जाएंगे
, मन्दिर-मस्जिद और गिरजाघरों पर ताले लटक जाएंगे। इस महामारी ने अनगिनत समस्याएं पैदा की हैं, समाज का शायद ही कोई तबका होगा जो इस महामारी से उपजी अव्यवस्थाओं को न झेला हो। अचानक कल-कारखाने और यातायात के साधन बन्द होने से भारत की एक बहुत बड़ी आबादी जो महानगरों में काम करती है, उसके लिए यह महामारी एक बड़ी आपदा के रूप में दिखाई दी। लोग पैदल और साईकिल से हजारों किलोमीटर की यात्रा करने के लिए विवश हुए।

यह सत्य है कि धनाढ्य लोगों द्वारा बाहर से लाई गई कोरोना महामारी की सजा देश के सबसे कमजोर और गरीब तबके को ज्यादा झेलनी पड़ी है। कोई देश में थाली और ताली बजाकर कोरोना से लड़ने को पर्याप्त समझ रहा है। कोरोना ने भारत की आर्थिक और सामाजिक  विषमता को सतह पर ला दी है। प्रवासी मजदूरों के लिए तो यह महामारी किसी नरक से कम नहीं रही। यह विचारणीय है कि पूरी दुनिया में फैला इस प्रकोप में क्या सभी जगह गरीबों को ऐसे ही अव्यवस्था का शिकार होना पड़ा है? जिस लॉकडाउन को रामबाण की तरह पेश किया जा रहा था किन्तु लॉकडाउन के बावजूद भी भारत दुनिया के कोरोना प्रभावित सूची में दूसरे पायदान पर पहुँच चुका है। यानी रोकथाम को लेकर तैयारी में सरकार द्वारा कहीं न कहीं चूक हुई है।


यह विडंबना ही है कि देश में कोरोना के भय से कॉलेज और विश्वविद्यालय नहीं खोले जा रहे हैं लेकिन वही दूसरी तरफ चुनाव आयोग बिहार में विधानसभा का चुनाव करवा रहा है, जिसमें लाखों लोगों की भीड़ इकठ्ठा हो रही है। जहाँ नेता सोशल डिस्टेंसिंग की सलाह दे रहे थे आज वहीं लाखों की भीड़ को संबोधित करके वोट मांग रहे हैं।इस महामारी में सरकारी स्तर पर अव्यवस्थाओं के बावजूद भी एक सराहनीय कदम देखने को मिला कि लोग मानवता के कारण एक दूसरे की खूब मदद भी कर रहे हैं, खाने-पीने से लेकर कई तरह की सुविधाएं व्यक्तिगत अथवा संगठन स्तर पर इस आपदाभरे माहौल में अपनी जान जोखिम में डालकर सेवा की है। इससे यह साबित होता है कि मानवता अभी जिंदा है।


हर महामारी अपने पीछे एक बड़ी छाप छोड़कर जाती है। कोरोना की वजह से बेरोजगारी और महंगाई अपने चरम पर पहुँच चुकी है, इस वजह से पहले की अपेक्षा जीवन जीना औऱ भी कठिन हो गया है। कोरोना की वजह से विषमता की खाईं और भी चौड़ी हुई है। इस विषमता से निपटने के लिए सरकार द्वारा व्यापक योजना की दरकार होगी।

अपनी माटीका यह अंक आप लोगों के सामने प्रस्तुत है। कोरोना-काल की इस विषम परिस्थिति में भी हमारी टीम ने जिस जुनून के साथ निकाला है, वह काबिले-तारीफ है।


                                   अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-33, सितम्बर-2020, चित्रांकन : अमित सोलंकी

                                       'समकक्ष व्यक्ति समीक्षित जर्नल' ( PEER REVIEWED/REFEREED JOURNAL) 

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