समीक्षा : तुझसे नाराज़ नहीं ज़िंदगी..../ डॉ. महेश दवंगे - अपनी माटी

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समीक्षा : तुझसे नाराज़ नहीं ज़िंदगी..../ डॉ. महेश दवंगे

       समीक्षा : तुझसे नाराज़  नहीं ज़िंदगी..../ डॉ. महेश दवंगे 

                                कोई उम्मीद दूर तक नज़र नहीं आती, फिर भी जीना किसी से प्यार हो                                                    जैसे.....                                                                                                          - कुँवर नारायण


कुँवर नारायण की उपर्युक्त ग़ज़ल मनुष्य जीवन की निराशा और जिजीविषा को अभिव्यक्त करती है। जीवन सुख-दुःख का प्रतीक है। उतार-चढ़ाव से भरा है। अतः उम्मीद खोकर जीना तकलीफ़देह होता है। उम्मीद और सपने मनुष्य के अंतरग साथी होते हैं। जिस दिन टूटते-बिखरते हैं
, जीवन यात्रा थम-सी जाती है। औरत का जीवन इसी टूटते-बिखरते सपनों के बीच झूलता रहता है। औरत सदियों से शोषित-पीड़ित जीवन जी रही है। पुरुषसत्तात्मक समाज ने अपने लिए मनचाही जिंदगी स्वीकार कर औरत को सड़ी-गली परंपराओं में कैद किया है। उसे गुलाम बनाया है। हालाँकि आधुनिक औरत इन गुलामी की जंज़ीरों को तोड़ने में कुछ हद तक कामयाब रही है। उसने साहस और संघर्ष से पुरुषसत्तात्मक समाज को चुनौती दी है। बड़े ओहदों को हासिल कर अपनी कामयाबी की नई दुनिया रची है। स्त्री विमर्शके बहाने औरत ने अपनी लड़ाई मिलकर लड़ी है। कृष्णा सोबती, मैत्रेयी पुष्पा, मृदुला गर्ग, प्रभा खेतान, ममता कालिया, कमलेश बक्शी आदि कई रचनाकारों ने अपने आत्मसंघर्ष को कथा-कहानियों में अभिव्यक्त किया है। यह कथाएँ औरत की शोषण परंपरा का इतिहास हैं। वैसे, स्त्री और पुरूष एक-दूसरे के सहयोगी और पूरक हैं। एकदूजे के बिना आधे-अधूरे हैं। पूर्णता दोनों के एकरूप होने में है। मगर पुरूष ने चालाकी से अपने वर्चस्व को स्थापित किया। साथ ही औरत की अभिव्यक्ति पर बंदिशें डाल उसे चारदीवारी में कैद किया। चित्रा मुद्गल कहती है,स्त्री के जन्मते ही उसके मुँह पर ताले जड़ दिए जाते हैं। ताले उसके मुँह पर नहीं जड़े जाते, मुँह के बहाने उसके मस्तिष्क पर लगाए जाते हैं। उन तालों को तोड़े बिना स्त्री अपनी चैतन्यता को अपनी आवाज़ में नहीं ढाल सकती। आवाज़ को शब्दों में नहीं रच सकती। शब्द बहुत ढीठ होते हैं। कलम के भ्रूण में जब तक नहीं पकते औरों तक नहीं पहुँचते।1


औरत ने अपनी आवाज़ को कलम से मुखर किया। मस्तिष्क के बंधनों को ठुकराया। शब्द को शस्त्र बनाया। ये ऐसे शब्द हैं, जो सदियों से चली आ रही परंपरा की आँच में तपकर सैलाब बनकर रचनाओं में उमड़ पड़े हैं। ये रचनाएँ पुरुषवादी मानसिकता के खिलाफ तोप का काम करती हैं। ये लड़ाई पुरूषके खिलाफ नहीं पुरूषवादी मानसिकता के खिलाफ है। और ये तब तक चलेगी जब तक औरत अपने हक, अधिकार नहीं पा जाती। वह आत्मसम्मान और स्वाभिमान से जीना चाहती है। मगर कई विपरित स्थितियाँ उसे नरकनुमा यातनाओं में ढकेल देती हैं। ये यातनाएँ उसकी आस्था और विश्वास को तोड़ती हैं। फिर जीवन की अँधेरी दलदल में उसकी यात्रा शुरू होती है। अपनों का संग-साथ उजियारा देता है मगर अपनों की प्रताड़ना इस दलदल को और खौफ़नाक बनाती है। लेखिका कमलेश बक्शी की रचनाएँ औरत के इसी धूप-छाँव की यात्राएँ हैं।


कमलेश बक्शी हिंदी की सशक्त हस्ताक्षर हैं। उन्होंने अपने लेखन से औरत के हकअधिकार की लड़ाई लड़ी है। सुरंग से बाहर और अंतहीन भटकन’ उपन्यास औरत के संघर्ष की महागाथा है। दरअसल इसमें दो कथाएँ स्वतंत्र रूप में अंकित हैं। यह दो उपन्यासों के मेल से बनी अद्भूत रचना है। सुरंग से बाहर’ उपन्यास 1981 में एवं अंतहीन भटकन’ उपन्यास 1982 में पहले ही प्रकाशित हो चुके हैंइसका नया संस्करण सुरंग से बाहर और अंतहीन भटकन’ नाम से 2005 में प्रकाशित हुआ। इसमें नायिका स्वेता (सुरंग से बाहर) एवं नीता (अंतहीन भटकन) की संघर्षपूर्ण कथा अंकित है। कथाएँ भले ही दो हों लेकिन औरत की नियति एक-सी है। दुनिया के किसी भी साहित्य से स्त्री चरित्र को उठाया जाए उसके संग हजारों चीखें सुनायी पड़ेंगी। आजीवन सुरंग से बाहर’ निकलने की कोशिश करती स्त्री की अंतहीन भटकन’ खत्म होने का नाम ही नहीं लेती। गुमनामी के इस दलदल में स्त्री को अपने अस्तित्व को सहेजना मुश्किल होता है। यह राह तब और मुश्किल होती है जब अपने ही उसे गुमनामी की इस दलदल में झोंक देते हैं। इतिहास गवाह है कि औरत को अपनी लड़ाई अपनों से ही लड़नी पड़ी है। अपनों के दिए जख्मघाव उसे नासूर बनकर कुरेदते रहे हैं। गैरों से तो लड़ा जा सकता हैअपनों से क्या शिकवा करें? लेकिन अपनों का सहयोग अमिट घावों को भी मिटा देता है। जीवन के विषैले पल को अमृत बना देता है। लेकिन औरत अंतहीन संघर्ष की दहलीज पर खड़ी हैकोई सुरंग से बाहर’ पड़ती है तो कोई अंतहीन भटकन’ के लिए अभिशप्त है।

उपन्यास की दोनों कथा नायिकाएँ समूचे स्त्री जाति का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसमें अंकित कथा कपोल कल्पित नहीं बल्कि जमीनी हकीकत से जुड़ी है। नायिका स्वेता और नीता दोनों भी एक ही मंज़िल की राही हैभले ही दोनों के रास्ते अलग-अलग हों। स्वेता अपने पति विशाल से पीड़ित है। उसके भीतर औरत के लिए सम्मान नहीं है। वह घर का इकलौता स्वामी हैजहाँ स्वेता की हैसियत किसी गुलाम से कम नहीं है। स्वेता बैंक में नौकरी करती हैउसकी ही तनखा से घर की जरूरतें पूरी होती हैं। मनचाही ज़िंदगी जीने के ख़्वाब उसके जीवन से कोसों दूर हैं। जैसे, विशाल पत्नी स्वेता से कहता है‘‘तुम्हें यहाँ रहना है तो मेरे अनुसार रहना होगा समझी। समानता का दर्शन अपने पास रखो। अधिक अकड़ने की आवश्यकता नहीं है। मुझे हर प्रश्न का उत्तर चाहिए।’’2 


दरअसल स्वेता अपने पति से प्यारआदर के अतिरिक्त सम्मान से जीने का हक़ चाहती है। किंतु पुरुषी अहं में चूर विशाल पत्नी स्वेता की हर माँग को ठुकराता है। तो दूसरी ओर पति रितेश के व्यवहार से भी नीता दुखी है। रितेश के लिए नीता महज पैंसे कमाने की मशीन हैजो हर महीने उनके परिवार द्वारा लिए कर्ज़े के हप्ते भरने के काम आती है। रितेश ने नीता से शादी नौकरी करने की शर्त पर ही की थी। नीता इच्छा न होते हुए भी महज़ परिवार के खातिर नौकरी करती हैमगर बदनसीब को बदले में प्यार के बोल भी नहीं मिलते। पति का अजनबी की तरह व्यवहार नीता को कचोटता है। अन्य स्त्री या पुरूष द्वारा की गयी प्रशंसा से भी रितेश दुखी होता है। दरअसल पुरूष प्रधान समाज और परिवार में आज भी स्त्री को सम्मान नहीं मिला है। नौकरी करनेवाली स्त्री भी प्रताड़ित जीवन जीती है। शायद पुरूष कहीं भी संतुष्ट नहीं है। यदि पत्नी नौकरी करती है तो मन में इर्ष्या है और अनपढ़ है तो उसे घृणा महसूस होती है। आखिर पुरूष क्या चाहता हैवह इन स्थितियों में तालमेल क्यों नहीं बिठा पाता? यही वजह है आए दिन परिवार टूट रहे हैंबिखर रहे हैं। यही वो स्थितियाँ हैंजहाँ से औरत की ज़िंदगी जहन्नुम बन जाती है। स्टेशन से सफ़र करते समय स्वेता हमेशा सोचती है‘‘सुरंग से सीटी बजाती ट्रेन उसे चीखती सी लगती। वह जानना चाहती थी स्टेशन अंधियारी सुरंग से गुजरते पीड़ा हो रही हैउसकी मंज़िल जहाँ वह शांत जी सके कितनी सुरंगों के बाद आएगी। कौन-सी सुरंग अंतिम होगी। जिससे गुज़र वह सुख की साँसें ले सकेगी। अब तक हर दिन एक घने अँधेरों से घिरी सुरंग में वह अकेली छूट जाती हैअत्यधिक कठिनाई से ही अँधेरों से उभर नहीं पातीक्षण को भी सुखद उजियाला नहीं मिल रहाकितनी लंबी सुरंग है जीवन उसका...।’’3 


पति की प्रताड़ना जीवन के रास्तों को उबड़-खाबड़ बना देती है। मानो जिंदगी ट्रेन की तरह महज़ सुरंगों के भीतर से दौड़ रही है। मगर चारों ओर फैले अँधेरे को चीर नहीं पा रही है। वर्तमान समय औरत के लिए सुरक्षित नहीं है। नकाबपोश आँखें हमेशा उसे ताकती रहती हैं। वह हर समयहर जगह अपने को डरावना महसूस करती है। लेकिन दुःख इस बात का है कि कई बार औरत ही औरत के ख़िलाफ़ जंग का ऐलान करती है। सास-बहू’ का रिश्ता आज भी इसीलिए बदनाम है। सिनेमासीरियल में तो कई नकारात्मक स्त्री चरित्र उभरे हैं, जो औरत की ही तबाही चाहते हैं। स्कूलकॉलेजहोस्टल की कई महिलाएँ आपसी इर्ष्या में ही जीती रहती हैं। (कुछ अपवाद अवश्य हैं ) दरअसल औरत को अपनी लड़ाई मिलकर लड़नी चाहिए। लेकिन औरत के बीच ही इर्ष्याद्वेषमत्सर ने जगह बनाई है। अंतहीन भटकन’ उपन्यास इसी विचार से निर्मित है। यह फ्लैशबैक शैली में लिखा गया उपन्यास है। नीता की बेटी उर्मि के एक प्रश्न ने इस अंतहीन भटकन’ को जन्म दिया है। दरअसल नीता शादी से पहले से ही बैंक में नौकरी करती है। वह नौकरी करने के सख्त ख़िलाफ हैमहज अपने पिताकाका की इच्छा खातिर वह नौकरी स्वीकार करती है। रितेश से शादी भी नौकरी के कारण ही होती है। अतः शादी के बाद भी नीता अपनी नौकरी त्यागती नहीं। पास-पड़ोस की औरतों के लिए यही विषय काफ़ी हो जाता है। नीता का नौकरी करना इनके दिल को दुःख देता है। अतः वे नीता की बेटी के मन में ज़हर फैलाती है। इस उपन्यास की शुरूआत ही उर्मि के इस वाक्य ‘‘माँतुम रोज़ काम पर जाती होमेरे पास नहीं बैठती। चारू की माँ पूरा दिन घर में रहती है।’’4 दरअसल नीता भी नौकरी छोड़कर अपने परिवार और बच्ची को समय देना चाहती हैलेकिन घर की आर्थिक अभाव की स्थितियाँ उसे नौकरी करने के लिए मजबूर करती हैं। पास-पड़ौस की औरतें नीता के पक्ष में खड़ी नहीं रहती और हरदम उसे तकलीफ़ देती हैं।

 

आज औरत और विज्ञापन का अटूट रिश्ता-सा बन गया है। हर प्रोडक्ट के विज्ञापन के लिए सुंदर औरत का होना अनिवार्य हो गया है। दरअसल आज भी औरत को भोगवादी दृष्टि से ही देखा जाता है। सामंती मानसिकता का निर्वहन करने वाला समाज आज भी मौजूद है। जो हरदम स्त्री के चारित्र्य को नीलाम करता रहता है। उसकी श्रेष्ठता का आधार उसकी बौध्दिकता को न मानकर उसके स्त्री होने को ही माना जाता है। लेखिका ने दूसरे पक्ष को भी बेखौफ़ रखा है। सुरंग से बाहर’ उपन्यास की स्वेता जब अपनी सहेली वर्षा के साथ 31 दिसंबर की रात पारसी जिमखाना पहुँचती हैजहाँ पाश्चात्य रंग-संगीत से गूँजता वातावरण है। नये वर्ष का स्वागत करने के लिए यहाँ भीड़ इकट्टा हुई है। रंग-बिरंगे वस्त्रों और फूलों से सुसज्जित महिलाएँ चलती- फिरती परेड़-सी घूम रही हैं। खाने-पीने के बीच में बैंड की आवाज़ जोर से बज रही है। सब नाच कर पसीना-पसीना हो गए हैं। नीता इन सबके बीच असहज महसूस करती है। रात के 2 बजे ब्यूटी कन्टेस्ट स्पर्धा शुरू हुई। लड़कियाँ लचकते हुए दोनों तरफ घूमकर ब्युटी कन्टेस्ट की शुरूआत करती हैं। स्वेता यह देखकर दंग रह जाती है। वह सोचती है‘‘दोष स्त्रियों का है वे सौंदर्य प्रदर्शन के लिए मंच पर क्यों उतरती हैं। पुरूष निर्णायक हो या दर्शक कैसी निगाहों से स्त्री तन को घूरते हैं। यहाँ भी स्त्री उसे पुरूषसत्तात्मक समाज के हाथ की कठपुतली लगी। चारों ओर खडे़ अनेक युवक बेतुके शब्दों से स्वागत कर रहे थे। उसे लगने लगा द्रौपदी का चीरहरण हो रहा है, पांडवों के घर की लाज असहाय खड़ी है।’’5 दरअसल स्वेता पारंपरिक मान्यताओं के ख़िलाफ़ है मगर आधुनिकता के नामपर देहप्रदर्शन करने वाली औरतों का भी वे पुरजोर विरोध करती हैं। लेखिका ने इस दृष्य के बहाने स्त्रियों की इस विचारधारा का विरोध किया है। वर्तमान में पूनम पाण्डेयराखी सावंत आदि कई महिलाएँ जो स्वतंत्रता के नामपर उच्छृंखलता का प्रदर्शन करती हैंजिससे औरतों की तरफ देखने का समाज का नज़रियां बदल जाता है। जहाँ औरत स्वयं प्रदर्शन की वस्तु बन जाए उन स्थितियों का विरोध करने का साहस औरत को जुटाना होगा ऐसा लेखिका मानती हैं।

 

भारतीय समाज में परिवार संस्था महत्वपूर्ण है। व्यक्ति के विकास का आधार परिवार ही है। माता- पितादादा-दादी आनेवाली पीढ़ी को संस्कारित कर भावी पीढ़ी का पथप्रदर्शन करते हैं। पारिवारिक सहयोग की दृष्टि से स्वेता और नीता दोनों भी समृद्ध हैं। दोनों को भी संघर्षपथ पर चलते हुए पारिवारिक सदस्यों का सहयोग मिलता है। संयुक्त परिवार के चलते दोनों परिवारों की सदस्य संख्या अधिक हैबावजूद आपसी प्रेमसद्भावना के चलते सभी सदस्य आत्मीयता से एक-दूसरे से जुडे़ हैं। भारतीय संस्कृति इस परिवार व्यवस्था के चलते भी महान मानी जाती है। पाश्चात्य देशों में मियाँ-बीबी-बच्चे तक ही परिवार की संकल्पना सीमित है। अंतहीन भटकन’ उपन्यास में लेखिका ने मि. फाक्स जैसा चरित्र गढ़ा हैजो मूलतः विदेशी हैलेकिन भारतीय रंग में रंगकर भारतीय बन गया है। वह एक बुजुर्ग हैजिसके आँखों की रोशनी मिट गयी है। वह नीता से कहता है‘‘भारत की आज़ादी के बहुत वर्ष बाद यहाँ आ गया था। आधुनिक बनते पाश्चात्य देश ममताविहीन सूखा-सा जीवन जीते हैं। अपनापन कहीं नहीं। सहकुटुंब का वहाँ से निशान भी मिट गया है। कितने जुड़ें रहते हैं लोग कुटुंब में। माँ तो मुझे बचपन में ही छोड़ चली गयी थीतब सौतेली माँ आई। वह गई दूसरी सौतेली माँ आई। मेरे लिए घरघर नहीं रहा।’’6 मि. फाक्स के यह विचार उनके दुःख-दर्द के साथ ही भारतीय परिवार व्यवस्था के मजबूत पक्ष को दर्शाते हैं। यही वजह है विशाल से तलाक़ के बाद स्वेता का परिवार बड़ी ही सहजता से स्वेता का स्वीकार करता है। माताभाईबहन उसके दुःख को कम करने की हरदम कोशिश करते हैं। मगर वर्तमान में पाश्चात्य देशों में परिवार बसने लगे हैं और भारत में उजड़ने लगे हैं। दिनोंदिन बढ़ती तलाक़ की माँग परिवार व्यवस्था के सम्मुख प्रश्नचिह्न खड़ा करती है। साथ ही पारंपारिक और आधुनिक पीढ़ी के बीच वैचारिक टकराव भी शुरू हुआ है। शादी-ब्याह के प्रसंग में यह टकराव तीव्रता से महसूस किया जा सकता है। बच्चे अपनी मर्जी से विवाह करना चाहते हैं तो परिवार की प्रतिष्ठा को ठेस लगती है। अपने पल भर मे पराए हो जाते हैं। परिवार या प्रेमी में से एक ही विकल्प दिया जाता है। यदि लड़की द्वारा प्रेमी का चुनाव किया जाए तो परिवार और समाज से उसे बहिष्कृत ही किया जाता है। उसका मुँह देखना भी पाप माना जाता है। बचपन से संजोये रिश्तें अकस्माक बिखर जाते हैं। नीता की चचेरी बहन रजनी जब अपनी इच्छा से प्रेमी रवि के साथ भाग जाती है तो परिवार को गहरा सद्मा लगता है। समाज में थू-थू होने लगती है। ऐसे में रजनी के पिता कहते हैं ‘‘पैदा होते ही मर जाती कलंकिनी। जरा न सोचा बीस-बरस के नाते-रिश्तें पल में तोड़ आई। कभी मुँह न दिखाए तो अच्छानहीं तो टुकडे-टुकडे कर दूँगा।’’7 


बेटी पर जान छिडकने वाले पिता के विचार पारंपारिक विचारों के गहरे प्रभाव को दर्शाते हैं। समाज भी रजनी के चारित्र्य पर लांछन लगाता है। वह भागी तो एक पुरूष के साथ ही लेकिन लांछन हमेशा स्त्री पर ही लगाए जाते हैं। पुरूष यहाँ से भी सहज छूट जाता है। समाज ने स्त्री-पुरूष के लिए अलग-अलग नियम बनाए है। पति की मृत्यु स्त्री को विधवा बनाती है। लेकिन पत्नी की मृत्यु पति को विधुर नहीं बनाती। कुछ ही दिनों में उसकी दूसरी शादी करायी जाती है। तो पत्नी सफेद साड़ी पहनकरबाल कटवाकर नरकनुमा यातना भुगतती हैं। दरअसल श्रृंगार नारी की प्रकृति है। पति की मृत्यु के बाद भी मानवीयता की दृष्टि से उसे जीने का अधिकार मिलना चाहिए लेकिन दुर्भाग्य से आज भी कई घरों में जी रही कपड़ों की सफ़ेदी समाज के दागदार चरित्र को रेखांकित कर रही है।

 

वर्तमान समय में स्त्री शिक्षित होकर स्वाभिमान से जीवन जी रही है। अब चारदीवारी के भीतर उसकी दुनिया नहीं है। वह भी सपने देखने का और उनको पूर्ण करने का हौसला रखती है। वह मुक्त रूप से समाज में विचरण कर सकती है। स्त्री सशक्तीकरण ने औरत के भीतर आत्मविश्वास जगाया है। अब स्त्री परिवार में बोझ या आश्रित नहीं हैबल्कि आर्थिक रूप से परिवार की बागडौर भी थाम रही हैं। दरअसल आर्थिक अभाव एवं अशिक्षा ने ही स्त्री शोषण को जन्म दिया था। आर्थिक सक्षमता से ही शोषण परंपरा का अंत संभव है। स्वेता की माँ का भी पिता द्वारा निरंतर शोषण किया जाता है। वह अपनी माँ को अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ने की प्रेरणा देती है। स्वेता सोचती है‘‘पहले स्त्री वर्ग को अपनी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करनी चाहिए। अपने पाँव पर खड़ी स्त्री अपने लिए राह खोजने की शक्ति पा सकती है। अपने वर्तमान और भविष्य के लिए निर्णय ले सकती है। अपने जीवन को नया मोड़ दे सकती है। संघर्ष से हारकर आत्महत्या की ओर न बढ़कर वह अकेली भी जी सकती है।’’8 दरअसल लड़ने के लिए आर्थिक सक्षमता आवश्यक है। वर्जीनिया वुल्फ ने भी इसी बात को अपनी किताब ए रूम ऑफ़ वंस ओनमें अभिव्यक्त किया है। वे मानती हैं औरत के पास अपना निजी कमरा और ख़ुद कमाया धन होना चाहिए, जिससे औरत को अपनी दुनिया रचने की और विरोध करने की आज़ादी मिलती है। शायद स्वेता की माँ अपने पति का विरोध इसीलिए नहीं कर पायी क्योंकि आर्थिक रूप से वह उनपर ही निर्भर थी लेकिन वह खुद चाहती थी मेरे बच्चे पढ़ लिखकर बडे़ ओहदों पर जाए और आर्थिक सक्षमता हासिल करें ताकि अन्याय-अत्याचार का विरोध कर सके। स्वेता भी अर्थशास्त्र में बी.ए. कर बैंक में नौकरी हासिल करती है। पति विशाल से तलाक़ के बाद जीवन में उदासी छा जाती है। मगर बैंक में नौकरी करते हुए अपने अस्तित्व को बनाए रखती है। वह विधवा की तरह जीवन नहीं जीती। ऐसे में एक दिन रेसकोर्स में उसकी मुलाकात रंजन नामक व्यक्ति से होती हैजो रेस में दौड़नेवाले घोडों की जानकारी लोगों को मिलने हेतु पत्रिका चलाता है। रंजन का व्यक्तित्व सहज है। उसकी भी शादी हुई हैमगर पत्नी कामिनी विदेशों की चकाचौंध में आकर रंजन को छोड़कर चली जाती है। रंजन और स्वेता की मुलाकातें बढ़ती है और दोनों एक-दूसरे को चाहने लगते हैं। घरवाले भी अपनी संमति से दोनों का विवाह करवाते हैं। स्वेता मन में उमंग और सपने लिए दुबारा घर की दहलीज लाँघती है। 

स्वेता को रंजन से सबकुछ मिलता हैजिसकी कामना एक स्त्री करती है। रंजन के भीतर स्वेता के लिए सम्मान की भावना है। दरअसल वर्तमान समय में स्त्री के लिए दूसरा ब्याह करना आसान नहीं है। धर्म और परंपरा की गुहार लगाता समाज इसमें कुछ-कुछ अवरोध निर्माण करता है लेकिन पढी़-लिखी स्त्री अपनी खुशियों को हासिल करना जानती है। स्वेता भी पढ़ी-लिखी एवं स्वाभिमानी स्त्री है। वह पारंपारिक मान्यताओं का विरोध करती है। क्योंकि वह जानती है‘‘धर्म के ठेकेदारों ने ढकोसलों का ऐसा भुलावा समाज की आँखों पर चढ़ा दिया है कि व्यक्ति सत्य को पहचान ही नहीं पाता। धर्म ने केवल पुरुषों को सत्ता दी। पत्नी की मृत्यु के बाद वह कंधा नहीं देता क्योंकि उसे विवाह करना है। विधुर के सगे संबंधी जोर डालने लगते हैं। दसवें दिन ही भैया बच्चों की सोचो कैसे चलेगा .. बच्चे नहीं तो भैया नाम चलाने वाला तो चाहिए। घर घरनी बिन भुत का डेरा... लडकियों के रिश्ते ... कुँवारी लड़कियों के आने लगते हैं। पुरूष के लिएकोई बंधन नहीं।’’9 


धर्म के ठेकेदारों ने औरत को बंधनों में कैद किया है। धर्म और ईश्वर के नामपर कई रीति-रिवाजों को औरत की जीवन पद्धति से जोड़ दिया है। औरत सदियों से इन मान्यताओं का वहन कर रही है। पुरूष ने बड़ी चालाकी से इन मान्यताओं से ख़ुद को मुक्त रखा। जैसे, “कुछ लोगों को यह जानकर अचरज होगा कि धर्म भी स्त्री के संघर्ष का एक महत्वपूर्ण माध्यम रहा है। हाँ, वहीं धर्म, जिसने स्त्री को गुलाम बनाने की प्रक्रिया में ऐतिहासिक भूमिका निभायी है। ईश्वर पुरूष था, अतः वह स्त्री के साथ न्याय कर भी कैसे सकता था?10 लेकिन आधुनिक स्त्री इन धर्म रूपी बेड़ियों को ठुकरा रही हैं। स्वेता भी धर्म के ठेकेदारों की ठेकेदारी को नीलाम करती है और अपनी इच्छा से रंजन से एकरूप होती है। मगर औरत की खुशियाँ चंद दिनों की मेहमान ही ठहरती है। रंजन की अकस्माक मृत्यु स्वेता के घर को उजाड़ देती है। उसके स्वप्नखुशियों को ध्वस्त करती हैं। वह निराशा के गर्त में डूब जाती है। उसके जीवन की यात्रा पुनः एक बार सुरंग के भीतर शुरू होती है।


जीवन सुख-दुःख की यात्रा है। मनुष्य इस सफ़र में संघर्ष करते हुए आगे बढ़ता है। सुख-दुःख के कई ठहराव उसके जीवन में आते रहते हैंजहाँ कुछ पल के लिए वह रूकता है और पुनः निकल पड़ता है अपने लक्ष्य की ओर। मगर औरत के जीवन में सुख के क्षण मृगजल के समान होते हैंजो सुख का केवल आभास रचते हैं, असल में होते नहीं। दरअसल औरत की जीवन यात्रा दुःख-दर्द से होकर ही गुज़रती है। स्वेता या नीता जैसी तमाम औरतें दुःख-दर्द को पीकर जीवन गुज़ारती रहती हैं। नायिका स्वेता भी रंजन की यादों को दिल में संजोकर रखती है। लेकिन यादेंस्मृतियाँ अधिक तकलीफ़ देती हैं। जिस रंजन ने स्वेता के जीवन को अँधेरी सुरंग से बाहर निकाला उसकी मृत्यु पुन: स्वेता को अंधेरी गुफाओं में ढकेल देती हैं। पति विशाल से क्रूरता या घृणा मिली थी मगर रंजन के रूप में एक साथीसहयोगी मिला था। उसका बिछोह स्वेता के दिल-दिमाग को सन्न कर जाता है। वह अपने मन-मंदिर में बसे रंजन से संवाद करती हैउसकी आहट को महसूस करती है। जैसे, ‘‘रंजन अब नहीं सुखद स्मृति है। सुखद स्मृति नहीं अधिक तीव्र वेदना देती है। भीतर तक झंझोड़ देती है। रंजन तुमने कितनी आत्मीयता से मुझे प्यार किया। मैं अतीत के कटु अनुभवोंबीभत्स स्मृतियों से अभी ही बाहर निकली थी। फिर अकेली हो गई। रंजन, क्यों छोड़कर चले गए...बिना कुछ कहेबिना कुछ बताए। अकेले रहना कितना कठिन है। रंजन अब यह फ्लैट खाने को आता है। नितांत अकेली हूँ। मन बुझ गया है .. क्यों ... कहाँ चले गए रंजन।’’11


रंजन की स्मृतियाँ स्वेता के जीवन में उदासी भर देती हैं। उसका जीवन दुःख के दरिया समान हो जाता है। अब वो अपनों के लिए भी दुःख का कारण बन जाती हैं। लेकिन क्या पति का साथ हर औरत को सुखी बनाता हैऐसा है तो नीता का दांपत्य जीवन खुशहाली से वंचित क्यों हैदरअसल पूर्णता आत्मा के मिलन से होती है। रंजन और स्वेता दो जिस्म एक जान की तरह एकरूप हो गए थेमगर नीता और रितेश एक ही घर में रहनेवाले दो अजनबी थे। राह भले ही अलग होदुःख-दर्द का एहसास एक जैसा था। एक हमेशा के लिए हदय में स्मृतियाँ अंकित कर दूर चला गयातो दूसरा पास होते हुए भी हदय छू न सका। अतः स्वेता की सुरंग के भीतर की यात्रा पुनः शुरू होती हैतो नीता अंतहीन रास्तों पर भटकती रहती है।


जीवन में कई मोड़ या ठहराव आते हैंजहाँ से जीवन की तस्वीर बदलती है। अनजान रास्ते कभी-कभी लक्ष्य तक पहुँचाते हैं। नाउम्मीदी में से भी उम्मीद उभर आती है। स्वेता की जीवन यात्रा में ऐसा ही मोड़ आता हैजो उसकी डूबती नाँव को किनारे पहुँचाता है। रंजन के अभाव को वह लगातार महसूस करती है और इस मिट्टी के शरीर को मिट्टी में ही दफ़न करने की सोचती है। वह आध्यात्मिकता की राह पकड़ सात पहाड़ियों से घिरे नीलसरोवर के दर्शन की यात्रा पर निकल पड़ती है। यात्रा के बहाने वह उन सभी जगहों को स्पर्श करती जहाँ स्वेता और रंजन ने कुछ सुनहरे पल बीताए थे। अब वह रंजन से एकाकार होने के लिए मिट्टी के शरीर को पहाड़ों को सौंपना चाहती है। शरीर भले ही तुकड़े-तुकडे हो जाए आत्मा प्रकाश पुंज के साथ रंजन की आत्मा में विलीन होगी। ब्रिटिश कथाकार और चिंतक वर्जीनिया वुल्फ ने भी 28 मार्च 1941 में अपनी देह को ओज नदी में समर्पित किया था। अपने आखिरी पत्र में उन्होंने लिखा थामुझे महसूस हो रहा है कि मैं फिर से पागल हो रही हूँ। मैं महसूस करती हूँ कि हम उन्हीं कठिनाइयों को दुबारा नहीं झेल सकते और मैं इस बार इससे उभरना नहीं चाहती। मुझे आवाजें सुनाई देने लगी हैं, और मैं किसी चीज पर मन नहीं लगा पा रहीं हूँ। इसीलिए मैं वहीं कर रहीं हूँ जो सबसे सही है।12


स्वेता भी यही सोचती है, मगर जीवन अपनी इच्छा से नही जीया जाता। कई अनहोनी घटनाएँ जीवन को आकार देती हैं। स्वेता के इस भयानक निर्णय की कल्पना उसी यात्रा का हमराही अविनाश को हो गई थी। वह स्वेता के आँखों में छिपे दर्द को पहले ही भाँप गया था। वह इस अनहोनी घटना को रोकता है। यात्रा पूर्ण होती है। मुंबई में दोनों की मुलाकात होती है जहाँ अविनाश स्वेता से शादी की माँग करता है। वह बैंगलोर के एक फर्म में डायरेक्टर पद पर कार्यरत है। स्वेता के घरवाले भी अविनाश को पसंद करते हैं। और दोनों एक बंधन में बंध जाते हैं। स्वेता की अंधेरी दलदल की यात्रा पुनः समाप्त होती है। मगर नीता की जीवन यात्रा का कोई ओर-छोर नहीं। उम्र बढ़ती जाती हैबेटी उर्मि भी बड़ी हो जाती है। आर्थिक रूप से परिवार भी सशक्त हो जाता है। अब नीता भी ठान लेती है और अपनी अंतहीन भटकन को रोकना चाहती है। पिता की इच्छा और अपनी अनिच्छा से स्वीकारें नौकरी को छोड़ने का साहस वो जुटाती है। अपना पूर्ण समय वो बेटी और परिवार को देना चाहती है। वह बैंक में रिजाइन देती है। उस शाम को वह अपने को हल्का महसूस करती है। उम्र के इस ढलान तक कितनी बार उसने नौकरी छोड़नी की सोची थी लेकिन मायकाससुरालबेटी उर्मि की जिम्मेदारियों के बोझ तले वह दब-सी गयी थी। मगर आज उसने बरसों पुरानी ख्वाहिश को अंजाम दिया था। कभी-कभी लगता है प्रकृति भी औरत के ख़िलाफ़ जंग छेड़ती है। औरत की खुशियों का गला घोंटती है। नीता के साथ भी वही होता है। उसी शाम हुए हादसे में रितेश के पैर की हड्डी टूट जाती हैतो नीता और उर्मि को भी कुछ खरोंचे आ जाती है। काकाकाकीपापाभैयाभाभी सभी की अस्पताल में डयुटी शुरू हो जाती है। नीता और उर्मि कुछ दिनों में ही ठीक हो गईंमगर रितेश को बिस्तर से उठना भी मुश्किल हो गया। नीता तो नौकरी के बंधन से मुक्त हो घर में, परिवार के बीच में रहना चाहती थीमगर यह अनहोनी नीता के दिल को दहला देती है। जैसे ‘‘नौकरी के बंधन से मुक्त हो घर की चारदीवारी में वह रहना चाहती थी। वह शांतएकांत चाहती थी।उसने कितनी ही योजनाएँ बना रखी थीं। यहाँ मिला-भीड़ के अतिरिक्त वेदना... कराह.... चीख... जख्मी... मरीज़... मौत... कोहराम.. उसे लगता सबने उसे घेर लिया है। अस्पताल.. घर... अस्पताल... डॉक्टर...छ. माह मे चल सके... साल भी लगे। हड्डी बराबर न जुड़ी तो तोड़कर फिर ऑपरेशन...पापा की तरह नौकरी छूट गई तब...जिधर आँख उठाओ दुःखक्षोभविराग वह चिंता में डूब गई। छुट्टी खत्म हो रही है...निर्णय...उसे फिर निर्णय लेना है। वह ऑफिस चली गई। मैनेजर से मिली‘‘क्या मैं इस्तीफा वापस ले सकूँगी।’’13

 

नीता की ज़िंदगी पुनः उन्हीं रास्तों पर से गुज़रती है। पति का अपाहिजपन उससे आर्थिक सक्षमता की माँग करता है। परिवार का बोझ अब उसी के कंधेपर है। दरअसल औरत और दुःख विकल्प-सा बन गया है। पुरूषप्रधान समाज के रीतिरिवाज या नियति हमेशा औरत के ख़िलाफ़ षडयंत्र रचती हैं। औरत इसके ख़िलाफ़ लडती हैसंघर्ष करती हैं मगर अपने ही शत्रु बनकर सम्मुख आए तो वो मुकाबला नहीं कर पाती। स्वेता या नीता दुनिया से लड़ने का साहस जुटाती हैं मगर अपनों से नही लड़ पाती। इस अंधेरी दलदल से स्वेता को मुक्ति मिलती हैमगर नीता अंतहीन गुमनामी की रास्तों पर भटकती रहती हैं। ससुरालमायकापतिबेटी उर्मि एवं नौकरी के बीच तालमेल बिठाती नीता की ज़िंदगी पुनः उसी मोड़ से शुरू होती है।


सुरंग से बाहर और अंतहीन भटकन’ उपन्यास स्त्री संघर्ष का प्रामाणिक दस्तावेज है। स्वेता’ और नीता’ प्रातिनिधिक चरित्र हैजो संपूर्ण स्त्री समाज का प्रतिनिधित्व करती है। पुरूष प्रधान समाज में स्त्री को हमेशा ही लांछित एवं प्रताड़ित जीवन जीना पड़ा है। वे अरसे से मुक्ति के द्वार को तलाशती आ रही हैं। इन जंज़ीरों से स्त्री को मुक्त कराने में पुरूषों का भी सहयोग रहा है। महात्मा फुलेडॉ.बाबासाहेब आंबेडकरमहात्मा गांधी एवं अन्य कई समाजसुधारकों ने औरत के हकअधिकार की लड़ाई स्वयं लड़ी है। जिसकी बदौलत आधुनिक स्त्री गुलामी एवं दासता से मुक्त हुई है। मगर आज भी सामंती मानसिकता में जीने वाला समाज औरत को भोगवादी नज़रिए से ही देखता है। लेखिका ने इस सामंती विचारधारा का प्रखर विरोध किया है। स्वेता और नीता की लड़ाई पुरूष’ से नहीं हैबल्कि शोषक समाज से है। रंजन और अविनाश जैसे पुरूष चरित्र बड़ी ही सशक्तता से स्त्री के पक्ष में खड़े रहते हैं। दरअसल जीवन दुःख-दर्द का विकल्प नहीं है। जीवन तो ईश्वर का सर्वोच्च वरदान है। अगर अपने सगे-संबंधी साथ हैंतो जीवन का सफ़र आसानी से हँसते-चहकते हुए गुजरता है। मगर स्त्री और पुरूष के बीच खड़ी दीवारें जीवन को नरकनुमा बनाती है। यही वजह है स्वेता या नीता को ज़िंदगी से कोई शिकायत नहीं हैक्योंकि उनकी ज़िंदगी की रफ्तार को पति रूपी पुरूषों ने ही रोका हैतो स्वेता की ज़िंदगी की रफ्तार को पुरूष ने ही थामा है। पति का साथ है तो स्त्री कितने ही बड़े संकट का मुकाबला कर सकती है। इसीलिए तो शायद वे महसूस करती हैकि तुझसे नाराज़ नही ज़िंदगी... मगर हैरानी लोगों के आचरण को देखकर जरूर होती है। 


संदर्भ

1              आख़िर क्यों लिखती है स्त्रियाँ, सं. रजनी गुप्त, पृ.37

2              सुरंग से बाहर और अंतहीन भटकन,कमलेश  बक्शी, पृ. 35

3              वही, पृ.16

4              वही, पृ.129

5              वही, पृ.57

6              वहीं, पृ.139

7              वही, पृ.147

8              वही, पृ.18

9              वही, पृ.121

10     स्त्री-पुरूष कुछ पुनर्विचार , राजकिशोर पृ. 26 

11        वही, पृ.91

12     समयांतर (जनवरी 2016) ,सं. पंकज बिष्ट पृ.43

13        वही, पृ.215

                                                 डॉ. महेश दवंगे

        सहायक अध्यापक, हिंदी विभाग, सवित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय, पुणे-411007

        सम्पर्क : 9822880790, mdawange200@gmail.com

                                  अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-33, सितम्बर-2020, चित्रांकन : अमित सोलंकी

                                       'समकक्ष व्यक्ति समीक्षित जर्नल' ( PEER REVIEWED/REFEREED JOURNAL) 

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