आलेख : बहुभाषिकता: कक्षाई स्वरूप और हकीक़त / डॉ. मुकेश कुमार - अपनी माटी

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बुधवार, अक्तूबर 28, 2020

आलेख : बहुभाषिकता: कक्षाई स्वरूप और हकीक़त / डॉ. मुकेश कुमार

आलेख : बहुभाषिकता: कक्षाई स्वरूप और हकीक़त / डॉ. मुकेश कुमार


बहुभाषिकता के विचार को लेकर हमारे देश में भ्रम की स्थिति है। किस रूप में हमारा देश बहुभाषी है?  सर्वप्रथम यह जानना हमारे लिए बहुत आवश्यक हो जाता है। खासकर उस देश के निवासियों के लिए जो एक ऐसे देश में रहकर जीवन यापन करते हैं, जहाँ पर अनेक बोली और भाषाएँ बोली जाती हैं। उन लोगों के लिए भी बहुभाषा की समझ बेहद जरूरी हो जाती है, जो उसे समझना चाहते हैं। जो लोग साक्षरता, शिक्षा, बौद्धिक विकास, मानव अस्तित्व और सामाजिक बदलाव के साथ जुड़ने का दावा करते हैं, या यूं कहे कि जुड़े होते हैं, उनके लिए भी बहुभाषिकता के सही स्वरूप को पहचानना जरूरी है। कुछ लोगों की मान्यता है कि भारत देश बहुभाषी इसलिए भी है क्योंकि उसके संविधान की आठवीं अनुसूची में बाईस भाषाएँ हैं, जिसको देश के असंख्य नागरिक व्यवहार में लाते हैं।


कुछ लोगों का यह सोचना है कि देश के अनेक हिस्सों में अलग-अलग भाषाओं के विद्यालय कार्य कर रहे हैं। जिनमें प्रमुख रूप से दिल्ली का नाम आता हैं। जब देश में असंख्य भाषाई विद्यालय है तो फिर हमारा देश बहुभाषी क्यों नहीं है? कुछ लोगों का मत है कि भारत में केवल बीस या तीस भाषाएँ नही बल्कि लगभग १६३२ भाषाएँ बोली जाती हैं, इसलिए जिस देश में इतनी अधिक भाषाएँ बोली जाती हो वो भला एकभाषी कैसे हो सकता है? यानी वो संविधान के बाद से ही बहुभाषी है। कुछ तो यहाँ तक कहते है कि भारत बहुभाषी इसलिए भी है कि यहाँ पर भिन्न-भिन्न भाषाओँ में समाचार पत्र प्रकाशित होते हैं। अनेक भाषाओँ में फ़िल्में बनती है। किताबें भी अनेक भाषओं में प्रकाशित होती है। टेलीविजन और रेडियों पर भिन्न-भिन्न- भाषाओँ में कार्यक्रम प्रसारित होते हैं। शिक्षा, कार्यालय और न्यायालय आदि का कामकाज कई भाषाओँ में एक साथ होता है। इस कारण से भी भारत बहुभाषी है।


इन सभी विचारों में बहुभाषिकता का कोई ना कोई रूप अवश्य निहित है, परन्तु इन सभी विचारों से बहुभाषिकता को परिभाषित नहीं किया जा सकता। बहुभाषिकता को समझे बिना उसके प्रति समर्पित, अनुरागमय और संवेदनशील हुए बिना बहुभाषिकता के मूल ढांचे को तथा उसकी प्रकृति को समझना कठिन है। मुझे दिल्ली के कुछ सरकारी विद्यालयों का अवलोकन करने का अवसर प्राप्त हुआ। मैं छटी कक्षा (निष्ठा समूह) में अवलोकन के लिए गया। कक्षा में लगभग पचास विद्यार्थी उपस्थित थे। इस कक्षा में ज्यादातर विद्यार्थी निम्न मध्यम वर्गीय परिवेश से थे। मैंने देखा की शिक्षिका बच्चों को सामाजिक अध्धयन विषय का उपविषय “विवधता की समझ” नामक अध्याय पढ़ा रही हैं। शिक्षिका का प्रयास सराहनीय था। वह कक्षा को रूचिकर बनाने के साथ-साथ बड़ी लगन और ऊर्जा से विद्यार्थियों से जुड़ाव स्थापित करने की भरपूर कोशिश में वयस्त थीं। मैंने देखा कि शिक्षिका द्वारा प्रश्न पूछने पर अगली पंक्ति में बैठे अधिकतर विद्यार्थी ही शिक्षिका के प्रश्नों के उत्तर दे रहे हैं, पीछे की पंक्ति में बैठे ज्यादातर विद्यार्थियों की सहभागिता कक्षा में न के बराबर है। वे डरे सहमे और नीरस दिखाई दे रहे हैं। वे शारीरिक रूप से कक्षा में उपस्थित जरूर है, परन्तु उनका मन और मस्तिष्क कक्षा से बहार है।


मैंने निश्चय किया कि मैं इसका कारण जानकार रहूँगा कि आखिर कक्षा में कुछ विद्यार्थियों का इस प्रकार का व्यवहार क्यों है? मैं अगले दिन फिर विद्यालय गया और मैंने शिक्षिका से अनुरोध किया कि अगर आपकी अनुमति हो तो क्या आज मैं आपकी कक्षा के बच्चों से बात कर सकता हूँ? शिक्षिका ने अपनी सहमति जताई और मैं कक्षा की ओर चल दिया। कक्षा में पहुँच कर मैंने उन बच्चों से बात की जो कक्षा में चुपचाप और शांत  बैठे थें, परन्तु उन विद्यार्थियों ने हाँ, हूँ के आलावा मुझे कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दिया। मै निराश हुआ और घर लौट आया। मुझे कुछ सूझ नही रहा था कि आखिर उन विद्यार्थियों के साथ ऐसा क्या किया जाए, जिससे कि वो कक्षा में अपनी सहभागिता को दर्ज करने में सफल हो जाए। वे तन और मन के साथ कक्षा में रहें।


कक्षा का दो दिन अवलोकन करने के बाद मुझे एहसास हुआ कि विद्यार्थियों के साथ पढाई के बारे में चर्चा न करके उनके घर, परिवार, और आस-पास के वातावरण के बारे में बात की जाए। मैंने फैसला किया कि कल मैं विद्यार्थियों के परिवेश के बारे में बात करूँगा, जिससे कि मैं उनके साथ जुड़ाव स्थापित करने में सफल हो सकू। मैं कक्षा में गया और मैंने विद्यार्थियों से कहा कि क्या आज आप इस प्रकार की बाते सुनना पसंद करोगे, जो आपके घर में रोज होती हो? आस पड़ोस के वातावरण में आप देखते या सुनते हो। क्या उस बाज़ार के बारे में बात करना पसंद करोगे जहाँ से आप खाने पीने की चीजे खरीदते हो? सभी विद्यार्थियों ने उत्साहित होकर बाते सुनने में रूचि दिखाई और हाँ में उत्तर दिया। मैंने विद्यार्थियों के परिवेश से जुड़े विचारों को प्रस्तुत करना आरम्भ किया। कुछ ही समय में मुझे लगने लगा कि बहुत से विद्यार्थियों का ध्यान मेरी बातों को सुनने में है ही नहीं। अपने आस-पास के वातावरण की बातों को सुनने में जो जिज्ञासा और तत्परता विद्यार्थियों ने दिखाई थी, वह चंद पलों में ही कहीं दूर छूट चली थीं। अब विद्यार्थीं मेरी बातों को न सुनकर अपने अन्य कार्यों में व्यस्त थे। कुछ तो आपस में बाते करने में मस्त थे और कुछ पैन और पुस्तक की अदला बदली करने में लगे थे।


मैंने उनसे पूछा कि आप मेरी बातों को क्यों नही सुन रहे हो? आपका ध्यान कक्षा में क्यों नहीं है? क्या आपको कोई समस्या है? कुछ विद्यार्थियों को छोड़कर अधिकतर विद्यार्थियों की कोई प्रतिक्रियाँ नहीं हुई। मैं अब तक ये अच्छी तरह से समझ चुका था कि मैंने अभी तक विद्यार्थियों से जो बाते साझा कि वो उनको समझ नहीं पाए हैं। मैंने अपनी बात को सुनिश्चित करने के लिए विद्यार्थियों से कुछ प्रश्न भी पूछे परंतु कुछ ही विद्यार्थी उत्तर दे पाए और ज्यादातर उत्तर देने से नदारद थें। कक्षा से उनका जुड़ाव ना होना, उनकी रूचि और उत्साह के क्षीण होने का प्रमुख कारण था कि मेरे द्वारा जो विचार प्रस्तुत किए गए थे उन विचारों के प्रमुख शब्द ही विद्यार्थी समझ नहीं सके थे, जिससे अर्थ को समझने का क्रम टूट गया था। ये क्रम का टूटना ही विद्यार्थियों के सीखने में अवरोध उत्पन्न कर रहा था।  इसलिए यह स्वाभाविक सी बात है कि उनकी सीखने की जो चाहत थी, जो उम्मीद थी और जो आशा थी वो समाप्त हो चुकी थी।


मैंने कुछ बच्चों से कहा कि वो अपने घर में रोज इस्तेमाल की जाने वाली कुछ चीजों के बारे में अपनी घर की भाषा में बताओ। विद्यार्थी यह सुनकर आश्चर्यचकित हो गए। शायद उनको यह उम्मीद नही थी कि मैं उनको उनकी घर की भाषा में बोलने को कह रहा हूँ। कुछ विद्यार्थी बहुत हैरान थे। कुछ सहमे से किसी सोच में डूबे हुए थे और कुछ शरमा रहे थे। कुछ विद्यार्थी ऐसे भी थे जो धीरे-धीरे मुस्कुरा रहे थे। मैंने एक विद्यार्थी को खड़ा होने को कहा और उसको अपने घर की भाषा में चीजों के बारे में बताने को कहा। यह सुनकर कक्षा में सन्नाटा पसर गया। फिर उस विद्यार्थी ने शरमाते हुए डरी और कांपती हुई आवाज में अपने घर की भाषा में चीजों के नाम बताने आरम्भ किए। सभी बड़े ध्यान से उसकी बातों को सुन रहे थे। जल्दी ही उसकी कांपती हुई आवाज में आत्मविश्वास दिखाई देने लगा और वह कक्षा में निडरतापूर्वक, संकोचरहित होकर बडे उत्साह से अपने विचारों को प्रस्तुत करने लगा। उसे देखकर अन्य बच्चों की आवाज़ आने लगी, जो मुझे कह रहे थे सर मैं भी अपनी भाषा में बताना चाहता हूँ। हर कोई अपनी भाषा में कुछ ना कुछ बता रहा था। अब शायद यह भी आवश्यकता नहीं रह गई थी कि मैं उनकी समझ को जानने के लिए उनसे कोई प्रश्न करूँ। बहुत से बच्चों ने अपनी भाषा में अपने आस-पास के वातावरण से संबंधित कहानी लिखकर दिखाई। उनकी कहानी में आए कुछ शब्द ऐसे थे जिनको मैं भी नही समझ पा रहा था, परन्तु विद्यार्थियों से पूछने पर वे मुझे आसानी से उस शब्द के अर्थ को हाव-भाव या चित्रों के द्वारा आसानी से समझा पा रहे थे। कक्षा के इस बदलाव से विद्यार्थियों के व्यवहार में परिवर्तन देखने को मिला।


मुझे लगा कि विद्यार्थियों को यदि अवसर दिए जाए तो वह हर संभव प्रयास कर सकते हैं। उनकी भाषा को कक्षा में अवसर देने का परिणाम यह हुआ कि जो विद्यार्थी हमेशा कक्षा में नीरस और नाउम्मीद बने रहते थे, जिनका मन कक्षा में नहीं होता था वो भी अब बिना किसी झिझक के अपनी बातों को मुझसे साझा करने लगे। ऐसे विद्यार्थी अब कक्षा की विभिन्न गतिविधियों में भी भागीदार होने लगे। मुझे भी अब यह समझ आ रहा था कि एक अपरिचित भाषा कक्षा में विद्यार्थियों के योगदान को प्रभावित करती है। उसको भाषाई आधार पर प्रताड़ित ही नहीं करती बल्कि उसको कुंठित भी बनाती है। विद्यार्थियों की घरेलू भाषा उनको कक्षा में भागीदार तो बनाती ही है साथ में सबल भी बनती है। कुछ विद्यार्थियों ने अपने कुछ खास त्यौहारों, गाँव में कही जाने वाली लोकोक्तियों, अपने खान-पान, शादी के अवसर पर गाए जाने वाले गीतों, खेत-खलिहानों और पशुओं आदि के बारे में भी बिना हिचकिचाहट के खुलकर चर्चाएँ की। कुछ ही समय में कक्षा का माहौल ऐसा बन गया था जहाँ सभी एक परिवार की तरह एक दूसरे से कुछ ना कुछ सीखने के प्रयास में लगे थे। एक दूसरे की भाषा को समझने के आलावा एक दूसरे की संस्कृति के बारे में जानना बड़ा ही रोचक था। उस दृश्य को देखकर लग रहा था कि कक्षा में विद्यार्थियों के बीच पहले के मुकाबले अधिक मेल मिलाप और भाईचारा हो गया है। 


वास्तव में विद्यार्थी तभी बेहतर सीख पाता है जब वह सीखने के लिए तैयार होता है। सीखने-सिखाने की इस प्रक्रिया में एक भाषा के वर्चस्व को तोड़ना बहुत जरूरी है, जिससे विद्यार्थी भाषाई आसमान के एक छोर में नहीं अपितु समस्त आसमान में अपने पंखों को फैलाकर उत्साहित होकर उड़ान भर सके। भारत जैसे विशाल देश में लगभग 1632 भाषाओँ में से केवल 47 भाषाएं ही विद्यालयों में पठन-पाठन के रूप में इस्तेमाल की जाती हैं। जो बहुत कम आकड़ा है। भारत में अनेक विविधताओं के बावजूद अनेक भाषिक एवं सांस्कृतिक तत्व भारत को एक ही भाषिक व सामाजिक क्षेत्र के रूप में बांधते हैं। जहाँ देश में अधिकतर विद्यार्थी बहुभाषिक संभावनाओं के साथ विद्यालय आते हो वहां पर किसी एक या दो भाषाओँ का व्यवहार न्यायोचित नहीं है। “हमारी शिक्षा वयवस्था ने हमारे हमारे समाज की सबसे बड़ी खासियत- बहुभाषिकता से मिलते आ रहे फायदों को दबाने/कमजोर करने का काम किया है।”[i] कक्षा के अंत में मैंने विद्यार्थियों को कहा कि वे सभी अपनी-अपनी भाषा में कक्षा की वस्तुओं (स्यामपट, डेस्क, चाक, खिड़की, दरवाजे, आदि) को घर से लिखकर लाएंगे। सभी विद्यार्थी अगले दिन अपनी भाषा में कक्षा की वस्तुओं के नाम लिखकर लाए और सभी ने उत्साहित होकर उन चीजों के बारे मैं मुझे बताया।


बच्चों में जन्म से ही भाषा को समझने की क्षमता होती है। अधिकतर बच्चे विद्यालयी शिक्षा की शुरुआत से पहले ही भाषा की बनावट और बुनावट को अच्छी तरह समझ लेते हैं। बच्चे अपने माता-पिता, दादा-दादी और आस-पड़ोस से भाषा को सीखते हैं, जिसको हम उसकी मातृभाषा कहते हैं। बच्चे जब विद्यालय आते हैं तो उनके अन्दर एक या दो नहीं बल्कि तीन-तीन भाषाएँ बोलने की योग्यता होती हैं, जिनमें उनकी मातृभाषा भी शामिल होती हैं। उनका शब्द भण्डार भी अनोखा होता है। वे बहुत से शब्दों को घर, परिवार तथा अपने आस-पास के वातावरण से लेकर विद्यालय आते हैं। वे भाषा की कठिन संरचनाओं तथा भाषा के बहुत से नियमों को भी ग्रहण किए होते हैं। शब्द, वाक्य, और संवाद आदि पर भी उनका नियंत्रण होता हैं। बच्चे भाषा को न केवल सही-सही बोल पाते हैं अपितु उनका उचित प्रयोग भी वे आसानी से कर लेते हैं। “वास्तव में बहुभाषी समाज में अधिकांश बच्चे एक साथ कई भाषा सीखते हैं एवं प्रयोग करते हैं क्योंकि उनका ध्यान भाषा सीखने पर नहीं, बल्कि उस भाषा के शब्दों में छिपे संदेश पर केन्द्रित होता है।”[ii]


लेकिन बड़े अफ़सोस की बात है कि ज्यादातर विद्यालयों में विद्यार्थियों की घरेलू भाषा की नकारात्मक छवि प्रस्तुत की जाती है। कक्षा में उनको बोलने का अवसर न देना और उनके बोलने में हस्तक्षेप करना, वास्तव में यह उनकी भाषा के अस्तित्व को मिटाने का गहरा षडयंत्र है। नेल्सन मंडेला का वह कथन आज भी प्रासंगिक है कि “यदि किसी समाज, समुदाय या देश की संस्कृति को नष्ट करना है तो उस समाज, समुदाय, या देश की भाषा को नष्ट कर दो” विद्यार्थी भाषा तथा उसकी समझ के माध्यम से विचारों, व्यक्तियों, वस्तुओं और अपने आस-पास के संसार से खुद को जोड़ पाता हैं। विद्यार्थियों के लिए भाषा केवल भाषा नहीं है बल्कि उसकी सामाजिक, सांस्कृतिक, धरोहर भी है। मानव का भाषा के साथ संबंध केवल आज की बात नहीं हैं, यह परम्परागत चला आ रहा एक ऐसा दस्तावेज है, जिससे किसी समुदाय की सभ्यता के बारे में हम जानकारी प्राप्त करते हैं।  आज इस बात पर जोर देने की आवश्कता है कि हम सब विद्यार्थियों की सहज भाषाई क्षमता को पहचाने और उसको उस भाषा में व्यवहार करने के अधिक से अधिक अवसर भी प्रदान करें।


कुछ महीनों पहले लेह-लद्दाक के एक दौरे के कारण श्री सोनम वांग्चुक के विद्यालय को देखने का अवसर प्राप्त हुआ। सोनम वांग्चुक से हुए साक्षात्कार में उन्होंने बताया कि “बहुत पहले लद्दाक के विद्यालयों में “कश्मीरी भाषा” शिक्षा प्राप्त करने का माध्यम थी, जिसका परिणाम ये होता था कि लगभग 95% विद्यार्थी कक्षा में फ़ैल हो गए। जब हमने विद्यार्थियों के फ़ैल होने के कारणों को जाना तो यह बात साफ़ उभर कर आई कि उनके फ़ैल होने का कोई अन्य कारण नही बल्कि वो अनजान भाषा है जिसको बच्चे समझते ही नहीं हैं।  लेकिन जब से कक्षा में विद्यार्थियों की घरलू भाषा अर्थात “लद्दाकी भाषा” में शिक्षण दिया जाने लगा तब से परिणाम बेहतर हुए और लगभग सभी बच्चे कक्षा में पास हो गए।” यदि विद्यार्थियों की भाषा और कक्षा की भाषा के बीच कोई जुड़ाव नहीं होता है तो विद्यार्थियों को लगता है कि कक्षा में उसकी कोई जरूरत नहीं है। कक्षा में उसकी कोई भूमिका नहीं है। ऐसे विद्यार्थी कक्षा में चुपचाप रहना पसंद करते है। यदि विद्यार्थियों को उनकी घरलू भाषा में कार्य करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, तो विद्यार्थी अधिक कुशलता से कार्य करते हैं। विद्यार्थियों का ध्यान किसी एक भाषा को सीखने में नहीं होता अपितु उस भाषा के शब्दों पर होता है, जिसकी साहयता से विद्यार्थी विषय-वस्तु के सम्पूर्ण अर्थ को ग्रहण कर लेते हैं।


कक्षा में बहुभाषिकता को व्यवहार में लाने में शिक्षक एक महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करता है। शिक्षक का दायित्व विद्यार्थियों को बहुभाषिक वातावरण प्रदान करना ही नहीं है बल्कि उनको धैर्यपूर्वक सुनना भी है। एक शिक्षक ही बच्चों के मन से संकोच को दूर कर सकता है। जब बच्चों के मन से झिझक दूर हो जाती है तो  बच्चे स्वयं को सहजतापूर्वक व्यक्त कर पाते हैं। हमें बच्चों के मन में आत्मविश्वास उपस्थित करने के लिए हर संभव प्रयास करना है।

 

संविधान की धारा 350क भी बच्चों को उनकी मातृभाषा में शिक्षण दिए जाने का समर्थन करती हैं। हमें बच्चों की भाषा को बिना सुधारे, बिना रोक-टोक के उसी रूप में स्वीकार करने की आज जरूरत है, जिस रूप में वह होती है। जब बच्चों का जुड़ाव कक्षा से स्थापित हो जाता है या वो सीखने के लिए तैयार हो जाता है तो बाद में बच्चे स्वयं भाषा के मानक रूप को ग्रहण कर लेते है। यदि कक्षा में बच्चों की घरलू भाषा के प्रति उचित सम्मान का भाव बना रहे और बच्चों को पर्याप्त और भिन्न-भिन्न प्रकार के रोचक अवसर प्रदान किए जाए तो बच्चे जल्दी ही भाषा की मानकता को प्राप्त कर लेते हैं।


“भाषा चाहे किसी भी प्रदेश की हो वह अपने स्थान, उस प्रदेश के भूगोल और इतिहास को लेकर चलती हैं। उस प्रदेश विशेष के जीवन दर्शन, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र और राजनैतिक चेतना को धारण करके आगे बढ़ती है और इन सब घटकों को स्थापित करती हैं।”[iii] दरअसल विद्यालयों में बहुभाषिकता को एक संसाधन के रूप में न देखकर उसे एक समस्यां के रूप में देखा जाता है। जब किसी विचार-गोष्ठी में बहुभाषिकता पर बात होती है कि किस प्रकार कक्षाओं में बहुभाषिकता का व्यवहार किया जाए, जिससे की हम विद्यार्थियों के साथ जुड़ाव स्थापित कर उनको सीखने के लिए तैयार कर सके? इस बात को सुनकर ज्यादातर शिक्षकों का उत्तर हैरान करने वाला होता है कि क्या अब हमें २२ भाषाओँ को सीखना पड़ेगा? यदि इस विषय पर और अधिक बात करने की कोशिश की भी जाती है तो वे इस बात को समझना ही नही चाहते हैं। उनकी नज़रों में बहुभाषिकता जैसा कोई विषय है ही नहीं जिसके बारे में बात की जाए।


देश-विदेश में प्रशिक्षण प्राप्त बहुत से शिक्षक भी बहुत आसानी से कह देते है की बहुभाषिकता जैसी कोई समस्यां देश में नहीं है। यदि कक्षा में विद्यार्थी सम्प्रेषण के दौरान अपनी घरलू भाषा के शब्दों का इस्तेमाल भूल से कर भी देता है, तो ज्यादतर शिक्षक उसके भावों पर ध्यान न देकर उसको डांटते हुए कहते है- बैठ जाओं तुम्हे पढ़ना नहीं आता। परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाओं को जांचते हुए शिक्षक का इस बात पर विशेष ध्यान रहता है कि विद्यार्थी ने उत्तर पुस्तिका में किस प्रश्न के उत्तर में व्याकरणिक त्रुटी की है, जिससे की शिक्षक उनको चिन्हित करके विद्यार्थी के नम्बर काट सके। विद्यार्थी को अपनी बात कहने के लिए उसके पास मानक भाषा के शब्द नहीं है, परंतु उसकी समझ पर्याप्त है। कभी-कभी ऐसे विद्यार्थियों को अपनी घरलू भाषा में यदि उत्तर देने को कहा जाता है तो वो मानक भाषा की तुलना में अपनी घरलू भाषा में बेहतर ढंग से उत्तर देते हैं।


कई बार विद्यार्थी चित्रों वाले प्रश्न के उत्तर में भाषा की अपेक्षा चित्रों की सहायता से स्वयं को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त करते हैं। “कुछ साल पहले छत्तीसगढ़ के स्कूलों में 9वीं और 10वीं कक्षाओं के लिए हिंदी के पर्चे में छत्तीसगढ़ी में जवाब देने की बात हुई तो इसका सबसे ज्यादा विरोध स्थानीय शिक्षकों द्वारा किया गया। उनका कहना था कि हम हिंदी विषय में छत्तीसगढ़ी को बढ़ावा कैसे दे सकते हैं”[iv] इस तरह का नजरिया बहुभाषिकता के विरोध वाला नजरिया है, जो यह मानकर चलता है कि विचारों की अभिवयक्ति केवल मानक भाषा में ही संभव हो सकती है। प्रसिद्ध भाषाविद्ध रमाकांत अग्निहोत्री “मल्टीलिंग्वल एजुकेशन” के मसले पर कहते हैं- “बच्चों की भाषा को स्कूलों में खामोश कर दिया जाता है। यह स्थिति बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। बच्चे की मातृभाषा उसकी पहचान और ज्ञान की भाषा है। यह सामाजिक ताने-बने के बीच संवाद को बरकरार रखने वाली भाषा है”।


भाषाई अनेकरूपता देश में एक जटिल चुनौती तो है, लेकिन यदि हम इसको चुनौती न माने तो यह हमें अनेक नये-नये अवसर भी प्रदान करती है, जो बहुभाषिता के रूप को और अधिक खूबसूरत बनाते हैं। संसार के अन्य किसी भी देश में पांच भाषा परिवारों की भाषाएं नहीं पाई जाती। विशाल भाषा परिवार होने के कारण भारत में विभिन्न भाषाएं और संस्कृतियाँ सदियों से एक दूसरे को समृद्ध करती रहती हैं। त्रिभाषा फार्मूला भी इस भाषाई संस्कृति को बनाए रखने की बात करता है, जिसका प्राथमिक उद्देश्य भारत में बहुभाषिकता और राष्ट्रीय सदभाव का प्रसार करना है। यदि हमें समाज के हाशिए पर स्थित कमजोर, वंचित और पिछड़े वर्गों की संस्कृति को भी जीवित रखना है तो हमें उनकी भाषा को भी शिक्षण में स्थान देना होगा। जो ज्ञान बालक अपने समाज से लेकर आता है, उसको निरंतर आगे बढ़ाने में सहयोग की भावना रखना और उसका आदर करना बेहद जरूरी है। सभी वर्गों की भाषा के प्रति सम्मान की भावना ही बहुभाषाकिता का गुण है। यही कारण है कि सामाजिक सहिष्णुता के साथ बहुभाषिकता का बहुत ही महत्वपूर्ण अंत: सम्बन्ध है। भविष्य में असली जरूरत इस बात की है कि बहुभाषी कक्षा की सम्पूर्ण संभावनाओं तक पहुँचने की अधिक से अधिक कोशिश की जाए, जिससे विद्यार्थी विद्यालय को पारिवार के रूप में ग्रहण कर सके और वह सक्रीय होकर रुचिपूर्वक शिक्षा प्राप्त कर सके।[1]

 

संदर्भ      


[i] राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 (भारतीय भाषाओँ का शिक्षण), राष्ट्रीय फोकस समूह का आधारपत्र, पृष्ठ संख्या 20

[ii] अग्निहोत्री रमाकांत, बहुभाषिता एक कक्षा स्रोत, शैक्षणिक संदर्भ, अंक 28 (मूल अंक 85) पृष्ठ संख्या 44

[iii] डॉ एम. वेंकटेश्वर, भाषा वैचारिकी, पृष्ठ संख्या 145

[iv] बहुभाषिता कक्षा में हर भाषा का हो सम्मान, educationmirror.org/2015/09/29/%Eo%/A4%AC%EO%


डॉ. मुकेश कुमार

(मेंटोर शिक्षक, दिल्ली सरकार)

बी. 326 टाईप 2 प्रथम तल दिल्ली प्रशासन फ्लैट्स तिमार पुर, दिल्ली  110054

सम्पर्क : 9968503336, rs.sharma642@gmail.com

                                  अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-33, सितम्बर-2020, चित्रांकन : अमित सोलंकी

                                       'समकक्ष व्यक्ति समीक्षित जर्नल' ( PEER REVIEWED/REFEREED JOURNAL) 

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