शोध : हिन्दी कहावतों में लोक – जीवन / डॉ. ज्योति यादव - अपनी माटी

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शनिवार, जुलाई 31, 2021

शोध : हिन्दी कहावतों में लोक – जीवन / डॉ. ज्योति यादव

                                               हिन्दी कहावतों में लोक – जीवन / डॉ. ज्योति यादव


शोध-सार -


   भारत की आत्मा उसके गाँवों में बसती है। इन गाँवों में कहावतों का स्थान इतना महत्वपूर्ण है, जितना की दाल में नमक। वैज्ञानिक यंत्रों के आविष्कार से बहुत पहले ही ग्रामीण समाज अपने खान-पान, रहन-सहन, कृषि, वर्षा, सिंचाई, व्यापार और मौसम से संबंधित अनेक कहावतों से अपनी दिनचर्या को चलाते थे। जैसे- 'तीन सिंचाई, तेरह गोड़, तब देख गन्ना क पोर'। इसमें गन्ने की खेती के लिए तीन सिंचाई की बात की गई है। ऐसे ही अनेक उदाहरण ग्रामीण समाज के लोकजीवन में ऐसे घुले मिले हैं कि इन्हें अलग करना दूध से पानी को अलग करना होगा। किस मौसम में कब, किस ओर, किस दिशा में यात्रा करनी चाहिए या नहीं करनी चाहिए, इन सभी का उल्लेख भी हमें कहावतों में मिल जायेगा। सबसे प्रमुख बात यह है कि कहावतों को लोगों के जीवन से निकालना असंभव है। ग्रामीण समाज में हर जगह और हमेशा से ही इसका प्रयोग किया जा रहा है। ये कहावतें हमारे शब्दों का वजन तो बढ़ाती ही हैं, इसके अलावा इनके माध्यम से हम कम शब्दों में अपनी पूरी बात बहुत आसान तरीके से रख सकते हैं।


बीज-शब्द : किसान, किसानी, ग्रामीण, सिंचाई, घाघ, भड्डरी, कहावत, स्वास्थ्य, खेती, आनुवंशिकी, बीज, जीवन, अहीर, विधान, दिशाशूल, खान-पान, रहन- सहन

    

 मूल आलेख  -


    मुहावरे, कहावतें, लोकोक्तियाँ या मसल, ये सारी चीज़ें किसी भाषा और संस्कृति की पहचान होती हैं और इनमें ज्ञान भरा होता है। अरबी भाषा में एक कहावत है-"अल-मिस्लफ़िल कलाम कल-मिल्ह फ़िततआम’ यानी बातों में कहावतों या मुहावरों और उक्तियों की उतनी ही ज़रूरत है जितनी कि खाने में नमक की।"1 लोग अपनी बात में वजन पैदा करने के लिए अक्सर इनका इस्तेमाल करते हैं। ग्रामीण समाज के लोक जीवन में कहावतों की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। कहावतें गाँवों में पीढ़ी दर पीढ़ी से हस्तांतरित होती चली आ रही हैं। सबसे प्रमुख बात यह है कि इन्हें लिपिबद्ध नहीं किया गया है। ये वाचिक परम्परा से लगातार चलती आ रही हैं। अपढ़ और भोले-भाले श्रमजीवी समाज के लोग सदियों से इनमें छिपे उपयोगी रहस्यों से अपने दैनिक कार्य करते चले आ रहे हैं। इन कहावतों में जन-जीवन से जुड़ी प्रायः हर तरह की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, खेती-बाड़ी तथा मौसम से जुड़ी भविष्यवाणियाँ समाहित हैं। ग्रामीण समाज आज भी इनसे मार्गदर्शन लेता रहता है। वैज्ञानिक यंत्रों के आविष्कार से पहले ये कहावतें लोक-जीवन में किसानों की न केवल मार्गदर्शिका का काम करती थीं, अपितु उनकी हर छोटी–बड़ी दैनिक समस्या का समाधान ढूँढने में मदद भी करती थीं।2 इन कहावतों के रचनाकारों में घाघ और भड्डरी का नाम सबसे प्रमुख है।

 

    घाघ और भड्डरी सहित तमाम अन्य गुमनाम नायकों की ये कहावतें देश भर में कही-सुनी जाती हैं। इनमें थोड़ा-बहुत भाषागत अन्तर हो सकता है, लेकिन इनका अर्थ वही रहता है। रामनरेश त्रिपाठी का इन कहावतों के बारे में कहना है कि – “देहात में कहावतों का बड़ा प्रचार है। ऐसा मालूम होता है कि किसानों के जीवन का महल कहावतों ही की ईंटों पर बना हुआ है। घाघ और भड्डरी ही की नहीं, बीसों अन्य ग्रामीण अनुभवियों की कहावतें गाँव-गाँव में प्रचलित हैं। सब का संग्रह करना एक व्यक्ति का काम नहीं; पर संग्रह होना अत्यन्त आवश्यक है। मैं तो यहाँ तक कहूँगा कि वर्तमान हिन्दू जाति का सच्चा रूप देखना हो तो गाँवों में प्रचलित कहावतें पढ़नी चाहिए। ऐसा मालूम होता है कि ग्रामीण जनता ने अपना जीवन ही कहावतों के सुपुर्द कर रखा है। गाँवों में अब मनु, याज्ञवल्क्य या पराशर का भारतवर्ष नहीं है। अब तो वहाँ कहावतों का भारतवर्ष मिलेगा। अतएव जो देश की दशा जानना चाहें और देशवासियों के मनोभावों का ठीक-ठीक अध्ययन करना चाहें, उन्हें कहावतों का अध्ययन सबसे पहले करना चाहिए।”3

 

     घाघ के जन्म और जाति के बारे में काफी विवाद है। शिवसिंह ने अपने ‘सरोज’ में इन्हें ‘कान्यकुब्ज’ कहा तथा इनकी जन्मतिथि सं० १७५३ बताया है। मिश्रबन्धु अपने ‘विनोद’ में लिखते हैं- "ये महाशय १७५३ में उत्पन्न हुए और १७८० में इन्होंने कविता की। मोटिया नीति आपने बड़ी जोरदार ग्रामीण भाषा में कही है।" ‘भारतीय चरिताम्बुधि’ में इन्हें कन्नौज का बताया गया है। पीर मुहम्मद मूनिस घाघ के पद्यों की शब्दावली के आधार पर इन्हें पश्चिमी चम्पारण और मुजफ्फरपुर जिले की उत्तरीय सरहद के समीप किसी गाँव का बताते हैं। पण्डित कपिलेश्वर झा इन्हें ‘गोपकन्या’ से उत्पन्न बताते हैं। श्रीयुत वी०एन० मेहता, आई०सी०एस० अपनी ‘युक्तप्रान्त की कृषि सम्बन्धी कहावतें’ में लिखते हैं- "‘घाघ’ नामक एक अहीर की उपहासात्मक कहावतें भी स्त्रियों पर आक्षेप के रूप में हैं। रायबहादुर बाबू मुकुन्दलाल गुप्त ‘विशारद’ अपनी ‘कृषि-रत्नावली’ में लिखते हैं- "कानपुर जिलान्तर्गत किसी गाँव में संवत् १७५३ में इनका जन्म हुआ था। ये जाति के ग्वाला थे। १७८० में इन्होंने कविता की मोटिया नीति बड़ी जोरदार भाषा में कही।"4 रामनरेश त्रिपाठी इन्हें कन्नौज का ‘दूबे’ बताते हैं।5 यद्यपि घाघ और उनके द्वारा श्रमजीवी समाज पर कही गई कहावतों से यही सिद्ध होता है कि वे ‘ग्वाला’ ही थे। आज भी गाँवों में बहुतायत ‘अहीरों’ की आबादी कृषि-कर्म से जुड़ी हुई है। कृषि से जुड़ा व्यक्ति निश्चय ही मौसम, वर्षा और ऋतु संबंधित कहावतों का जन्मदाता हो सकता है। घाघ की तरह ही भड्डरी की जाति को  लेकर भी बड़ा विवाद है। आमतौर पर उन्हें भी ‘घाघ’की तरह ‘अहीर’ कन्या से उत्पन्न पुत्र बताया जाता है। श्री बी०एन० मेहता, आई०सी०एस० ने इन्हें ‘गड़रिया’ की कन्या से उत्पन्न पुत्र बताया है।6 कपिलेश्वर झा ने इन्हें ‘अहिरन’ के गर्भ से उत्पन्न  बताया है। बिहार में घाघ ही के लिए प्रसिद्ध है कि वे बराहमिहिर के पुत्र थे और घाघ के अन्य कई नाम भी बिहार वालों में प्रचलित है। जैसे- डाक, खोना, भाड आदि। भाड ही शायद भड्डरी हो। मारवाड़ में “डंक कहै सुनु भड्डली” का प्रचार है। संभवतः मारवाड़ का ‘डंक’ ही बिहार का ‘डाक’ है।7 फिलहाल इतना अवश्य है कि घाघ की तरह ही भड्डरी भी किसी श्रमजीवी समाज से ही जुड़े थे।

 

खेती किसानी की कहावतें - घाघ और भड्डरी की खेती किसानी से संबंधित कहावतें किसानों के लिए गुरुमंत्र हैं। अच्छी फसलों के लिए किसान इन कहावतों की मदद लेते हैं। ये कहावतें जुताई, बुआई, निराई, गुड़ाई के साथ सिंचाई के लिए उपयुक्त मात्रा, समय तथा अवसर इत्यादि जानकारियों से भरपूर हैं। कब, किस फसल को बोने से अधिक उत्पादन हो सकता है और किस फसल से नुकसान, इन सब का लेखा-जोखा इन कहावतों में बखूबी मिलता है। रोजमर्रा की जिंदगी में किसान हमेशा से ही इन कहावतों की विधियों पर ध्यान देते  रहे  हैं। जब खेती ही आजीविका का प्रमुख आधार थी, तब ये कहावतें बेहद उपयोगी सिद्ध होती  रही हैं। कृषि विषयक एक कहावत देखें-

 

 “उत्तम खेती आप सेती। मध्यम खेती भाई सेती।

निकृष्ट खेती नौकर सेती। बिगड़ गई तो बलाये सेती।।”8

  

    भावार्थ यह है कि जो किसान स्वयं मेहनत करके खेती करता है,वह अधिक संतुष्ट रहता है। जो अपने भाइयों या अन्य के भरोसे रहता है, वह सामान्य स्थिति में रहता है। जो नौकरों या मजदूरों के सहारे पर ही खेती करता है, वह निकृष्ट होती है और इस भरोसे वाली खेती के बिगड़ने की ज्यादा संभावना होती है। ऐसा व्यक्ति परेशान ही रहता है।  ये कहावतें किसानों को आत्मनिर्भर होने की प्रेरणा देती हैं। दूसरों के भरोसे हाथ पर हाथ रखकर बैठने से बढ़िया है कि किसान स्वयं अपने खेतों में लगा रहे। किसी भी कार्य में सफलता का पहला सूत्र निरंतरता और कड़ी मेहनत होता है। घाघ और भड्डरी भी किसानों को हमेशा मेहनत करते रहने को कहते हैं-


“नित्तै खेती दुसरे गाय। नाहीं देखै तेकर जाय।।

घर बैठल जो बनवै बात। देह में बस्त्र न पेट में भात।।”9

 

    जो किसान अपने खेतों में प्रतिदिन नहीं जाता, जो हर दूसरे दिन अपनी गाय को नहीं देखता, घर बैठे-बैठे जो केवल बात बनाता है और कामचोर होता है, ऐसे व्यक्ति को हमेशा परेशान ही रहना पड़ता है। उसके पास हमेशा ही पहनने को वस्त्र और खाने को अन्न का अभाव रहता है। खेती में सिंचाई सबसे अहम है। इसलिए घाघ किसानों को सचेत करते हैं कि –“खेत बेपनिया जोतो तब/ ऊपर कुंआ खोदाओ जब।।”10 अर्थात् किसानों को पहले फसलों की सिंचाई के लिए कुंआ खुदवाकर पानी की व्यवस्था कर लेनी चाहिए, तब जाकर खेती करनी चाहिए। एक अच्छे किसान के पास खेती से जुड़े सभी हलबा-हथियार होने चाहिए। इससे वह दूसरों पर निर्भर नहीं रहेगा। जैसे-


“बीघा बायरहोय / बाँध जो होय बँधाये।

भरा भुसौलाहोय/ बबुर जो होय बुवाये।

बढ़ई बसे समीप / बसूला बाढ़ धराये।

पुरखिनहोय सुजान / बियाबोउनिहा बनाये।

बरदबगौधाहोय / बरदिया चतुर सुहाये।

बेटवाहोय सपूत / कहे बिन करे कराये।”11

 

    खेती करने वाले के पास उससे जुड़ी मूलभूत सुविधाएँ होनी ही चाहिए, तभी वह अच्छा किसान कहलायेगा। जैसे- सब खेत एक ही जगह अर्थात् एक ही चक हो। सिंचाई के लिए उसके डाड़-मेड़ बंधे हुए हों। उसका घर भूसा से भरा हुआ हो,जिससे वह बैलों तथा अन्य जानवरों को चारा उपलब्ध करा सके। उसके पास कुदाल, हसिया, खुरपी, फरसा इत्यादि में बेंत लगवाने के लिए बबूल का एक पेड़ भी होना चाहिए। उसे लोहार के पास बसना चाहिए, ताकि जब जरूरत पड़े अपने बसूले में धार लगवा सके। घर की मालकिन चतुर रहे और वह बिना कहे ही बीज इत्यादि बना कर तैयार रखे। उसके बैल बगौधे की नस्ल के हों। हल जोतने वाला होशियार और नेक हो। बेटा तेज तर्रार हो और बिना बाप के कहे ही हमेशा खेतों में कार्य करने को तैयार रहे। इन गुणों से युक्त किसान की उन्नति निश्चित है। खेती में बीज की मात्रा बहुत मायने रखती है। बीज की मात्रा  पर यह कहावत विचारणीय है –


जो गेहूँ बोवै पाँच पसेर / मटर के बीघा तीसै सेर।।

बोवै चना पसेरी तीन / तिन सेर बीघा जोन्हरी कीन।।

दो सेर मोथी अरहर मास / डेढ़ सेर बिगहा बीज कपास।।

पाँच पसेरीबिगहा धान / तीन पसेरीजड़हन मान।।

सवा सेर बीघा साँवाँ मान / तिल्ली सरसों अँजुरी जान।।

बर्रेकोदो सेर बोआओ / डेढ़ सेर बीघा तीसीनाओ।।

डेढ़ सेर बजरा बजरी साँवाँ / कोदौकाकुनसवैयाबोवा।।

यहि विधि से जब बोवै किसान / दूना लाभ की खेती जान।।”12

  

    इन कहावतों से किसान सदैव लाभान्वित होते रहे हैं। जब हमारे पास मौसम के पूर्वानुमान एवं कृषि विषयक तकनीकों का अभाव था, तब ये कहावतें ही किसानों के जन-जीवन का आधार थीं।

 

स्वास्थ्य विषयक कहावतें – प्राचीन काल से ही हमारे गाँव पूर्णतया आत्मनिर्भर रहे हैं। सही मायनों में कहा जाए तो वे पूरा एक देश थे, जहाँ लोगों की जरूरतें एक दूसरे से ही पूरी हो जाती थीं। गांधी जी हमारे युग के महान वैज्ञानिक- द्रष्टा थे। वे इन गावों को ‘भारत की आत्मा’ कहते थे। गांधी जी कांग्रेस की बैठकों एवं अन्य जगहों पर उपस्थित लोगों से हमेशा कहा करते थे –“यदि तुम गांवों की सेवा करना चाहते हो तो शहरों में रहकर जो कुछ सीखा है, उसे भूल जाओ। गांव में जाकर रहो, चर्खा चलाओ। गांव वालों के रहन-सहन को देखो, उन्हें समझो और उनसे सीखने की कोशिश करो। ग्रामीण भाई-बहनों ने सदियों के अनुभव से जो कुछ सीखा है, उसे हम कैसे नकार सकते हैं! जीवन के विश्वविद्यालय में ‘प्रयोग और अनुभव’ से जो कुछ उन्होंने पाया है, उसे आज की परिस्थितियों के अनुकूल ही हम बना सकते हैं।”13 घाघ और भड्डरी लोक मन के चितेरे रहे हैं। उनकी कहावतें ग्रामीणों के जीवन में रची बसी हैं। खान-पान, रहन-सहन, साफ-सफाई इत्यादि स्वास्थ्य विषयक इनकी कहावतें खूब प्रचलित हैं। हमें किस मौसम में कब, कितना और क्या खाना चाहिए और क्या नहीं खाना चाहिए? इसका भरपूर वर्णन इन कहावतों में मिलता हैं-


“चैते गुड़ बैसाखे तेल / जेठ में पेठा असाढ़े बेल।।

सावन साग न भादो मही / कार करेला कातिक दही।।

अगहन जीरा पूसेधना / माहे मिश्री फागुन चना।।

इन बारह से बचे जो भाई / ता घर सपनेहुँ बैद न जाई।।”14

  

    इन ग्रामीण कहावतों में छुपे स्वास्थ्य संहिता से ही ग्रामीण लोग आज भी अपने स्वास्थ्य की रक्षा कर लेते हैं। हमें किस मौसम में क्या खाना चाहिए इसकी एक बानगी पेश करती ऐसी ही एक कहावत देखी जा सकती है –


“सावन हरै भादो चीत / क्वार मास गुड़ खायउ मीत।।

कातिक मूली अगहन तेल / पूस में करो दूध से मेल।।

माघ मास घिव खिचड़ी खाय / फागुन नित उठि प्रात नहाय।।

चैत मास में नीम बेसहति / बैसाखे में खायजड़हती।।

जेठ मास जो दिन में सोवै / तेकर जर अषाढ़ में रोवै।।”15

  

    खाना खाने के बाद हमें बाएँ करवट सोना चाहिए तथा बिस्तर पर जाने से पहले पेशाब करके सोना चाहिए। घाघ कहते हैं कि ऐसा करने वाले लोगों के यहाँ कभी वैद्य या चिकित्सक की जरूरत नहीं पड़ती है- खाय के मूतै सूते बाउं। काहे बैद बुलावै गाउं। गावों में व्यक्ति हमेशा क्रियाशील रहता है। उसे आलस्य न आए इसलिए, उन्हें ये कहावतें चेताती हैं –‘रहै निरोगी, जो कम खाय / काम न बिगरैजो गम खाय।’ यह कहावतें आज भी गावों में बहुतायत आबादी द्वारा हमेशा बोली जाती हैं। ये लोगों के जीवन और कामों में घुली-मिली हैं। प्रायः सभी घरों के बुजुर्ग इनका बहुतायत प्रयोग करते हैं। उनकी डाट-फटकार, हँसी-खुशी में ये ऐसे शामिल हो गयी हैं, जैसे ये उनके जीवन का अनिवार्य हिस्सा हों। इस टेलीवीजन और मोबाइल के युग में आज के नवयुवकों के अक्सर देर से उठने पर घर के बुजुर्ग नाराज रहते हैं। वे इन्हीं कहावतों के माध्यम से उलाहना देते हुए कहते हैं कि -


 ‘प्रातसमै खटिया से उठिकै, पीवै ठंडा पानी / ता घर वैद कबौ नहिं आवै, बात घाघ की मानी।’

 

    हमारा ग्रामीण समाज सदियों से इन प्राकृतिक चिकित्सा पद्धतियों का उपयोग करता रहा है। हमारे बुजुर्गों ने पीढ़ी दर पीढ़ी इनका हस्तांतरण किया। उन्होंने अपना या परिजनों का ही नहीं अपने साथ रह रहे पशु-पक्षियों तक का इलाज इन कारगर तरीकों से किया। चोट लगने पर हल्दी और प्याज का लेप आज भी गावों में लगाया जाता है। गरम दूध में गुड़ और हल्दी आज भी दर्द निवारक का काम करता है। सर्दी-जुकाम होने पर अजवाईन, काली मिर्च, तुलसी के पत्ते इत्यादि का गरमा-गरम काढ़ा आज भी सबसे बेहतर इलाज माना जाता है। इन चिकित्सा पद्धतियों की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि इनका कोई नुकसान (साइड इफेक्ट) नहीं है। आज जब पूरा विश्व ‘कोरोना’ महामारी के भयंकर चपेट में है, तब विज्ञान और तकनीकी के इस विकसित युग में भी चिकित्सकों द्वारा इसी प्राकृतिक काढ़े के पीने की सलाह ‘प्रतिरोधक क्षमता’ को बढ़ाने के लिए दिया जा रहा है। सचमुच यह देशी चिकित्सा पद्धतियाँ भारत के श्रमजीवी समाज की बहुत बड़ी उपलब्धि थीं।

 

अन्य कहावतें – ग्रामीण समुदाय अपने जन-जीवन में इन कहावतों का उपयोग विविध स्थानों पर अपने तरीके से करता था। इन कहावतों में वर्षा, अकाल, वायु ज्ञान, सिंचाई, निराई, गुड़ाई, कटाई, मड़ाई, खाद, पशुओं की देखभाल, नीति-अनीति, शुभ -अशुभ, ज्योतिष, दिशा-ज्ञान सहित शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र इनसे अछूता रहा हो, जहाँ वे इनका उपयोग न करते हों।आज भी लोग ग्रामीण समाज में मंगलवार तथा शनिवार को बाल बनवाने से बचते हैं। दिशाशूल के अनुसार वे आने जाने का निर्णय करते हैं, जिनके बारे में इन लोक प्रचलित कहावतों में बहुत पहले ही बताया गया है कि कब किस दिशा में आना-जाना चाहिए –


 “सोम सनीचर पुरुब न चालू / मंगरबुद्ध, उतरदिसि कालू।।

 बिहफै दक्खिन करै पयाना / नहि समुझें ताको घर आना।।

 बूध कहै मैं बड़ा सयाना / मोरे दिन किह्यौ पयाना।।

 कौड़ी से नहिं भेट कराऊँ / छेमकुसल से घर पहुँचाऊँ।।”16

     

    अब जरुरी तो नहीं है कि हमेशा इसका पालन हो ? व्यक्ति का जाना जरुरी हो इसी निषेध के दिन तब ? उसका भी विधान इन कहावतों में दिया गया है। ऐसी ही एक कहावत द्रष्टव्य है, जिसमें ऐसी निषेध यात्राओं का निदान है-


“रवि तामूल सोम के दरपन / भौमवार गुरधनियाँचरबन।।

बुध मिठाई बिहफै राई / सुक्र कहै मोहिँ दही सुहाई।।

सन्नी बाउभिरंगी भावै / इन्द्रोजीति पुत्र घर आवै।।”17

 

    इन कहावतों में मौसम की सटीक भविष्यवाणी भी रहती थी। लोग अपनी दिनचर्या इनसे तय करते थे। आने वाले मौसम में कैसी हवा चलेगी, बारिश कितनी होगी, कौन- सी फसल इन परिस्थितियों में ठीक रहेगी? इसका पूरा विवरण इनमें दर्ज है –


“होली झर को करो विचार / सुभ अरु असुभ कहा फल सार।।

पच्छिम बायु बहै अति सुन्दर / समयो निपजै सजल बसुन्धर।।

पूरबदिशि की बहै जो बाई / कछु भीजै कछु कोरोजाई।।

दक्खिन बाय बहे बध नास / समया निपजेसनई घास।

उत्तर बाय बहे दड़बड़िया / पिरथी अचूक पानी पड़िया।।

जोर झकोरैचारो बाय / दुखयापरघा जीव डराय।

जोर झलो आकाशै जाय / तौ पृथ्वी संग्राम कराय।।”18

 

    इस प्रकार हम कह सकते हैं कि ग्रामीणों के लोक जीवन में यह कहावतें पूरी तरह रची-बसी थी। वे इनके अनुसार अपने जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय लेते थे। इन कहावतों में सदाचार की शिक्षा भी समाहित है, जो आज भी गाँव में प्रचलित है- ‘बाढ़ै पूत पिता के धर्मे, खेती उपजै अपने कर्मे।’ ये कहावतें विज्ञान के ‘आनुवांशिकी सिद्धांत’ की भी पुष्टि करती है। जैसे- ‘माँ ते पूत पिता ते घोड़ा, बहुत नहीं तो थोड़ा -थोड़ा।’ यह कहावतें यदि पूरी तरह सत्य नहीं तो सत्य के बहुत निकट थीं। इनमें केवल गम्भीर बातें ही नहीं अपितु ग्रामीण जीवन के हास-परिहास भी मिलते हैं- ‘बिना माघ घिव खिचड़ी खाय, बिन गौने ससुरारी जाय / बिन बरखा के पहिरेपउवा, कहै घाघ ये तीनों कउवा।’ नीति विषयक इन हास परिहास की कहावतों में भी बहुत गम्भीर निहितार्थ छुपे रहते थे, जो हमारे पूर्वजों के तपे-तपाये अनुभव से परिष्कृत होकर लोक में आए हुए हैं। इसीलिए ग्रामीण समाज के लोक जीवन में आज भी इन कहावतों का महत्व बना हुआ है।

 

सन्दर्भ-

1-     https://www.bbc.com/hindi/learningenglish/2010/05/100503_proverb_english_mb

2-     रामजी यादव (सं.) : गाँव के लोग पत्रिका, वर्ष-2, अंक-10, वाराणसी, पृष्ठ : 33 

3-     रामनरेश त्रिपाठी, घाघ और भड्डरी, हिन्दुस्तानी एकेडेमी यू.पी., इलाहाबाद, (1931), पृष्ठ:12

4-     वही, पृ. 15-16

5-     वही, पृ. 17-18

6-     वही, पृ. 12

7-     वही

8-     रमेश प्रताप सिंह, घाघ और भड्डरी की कहावतें, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ, (2019), पृष्ठ : 62

9-     वही : 63

10- रामनरेश त्रिपाठी, घाघ और भड्डरी, हिन्दुस्तानी एकेडेमी यू.पी., इलाहाबाद, (1931), पृष्ठ 57

11- वही, पृ. 60

12- वही, पृ. 81

13- जयप्रकाश भारती, ग्रामीण जीवन में विज्ञान, लेखक का वक्तव्य, प्रकाशन विभाग, भारत सरकार, नई दिल्ली (1995)

14- हरिहरप्रसाद त्रिपाठी, घाघ और भड्डरी की कहावतें, बिन्देश्वरी प्रसाद बुक्सेलर, आसभैरो चौक, बनारस, पृष्ठ 3 – 4

15- वही, पृ. 5 – 6

16- घाघ और भड्डरी की कहावतें (2019), पृष्ठ 159

17- वही, पृ. 156

18- घाघ और भड्डरी, पृष्ठ 140

 

 

डॉ. ज्योति यादव
शोध प्रवक्ता (हिन्दी)
राज्य हिन्दी संस्थान उत्तर प्रदेश, वाराणसी
9451337577 umesh198129@gmail.com

  अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati)

अंक-35-36, जनवरी-जून 2021

चित्रांकन : सुरेन्द्र सिंह चुण्डावत

        UGC Care Listed Issue

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