शोध : वेब मीडिया एवं भाषा अध्यापन / डॉ. भाऊसाहेब नवनाथ नवले - अपनी माटी

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शनिवार, जुलाई 31, 2021

शोध : वेब मीडिया एवं भाषा अध्यापन / डॉ. भाऊसाहेब नवनाथ नवले

वेब मीडिया एवं भाषा अध्यापन / डॉ. भाऊसाहेब नवनाथ नवले

 


शोध-सार 

    भाषा अध्यापन के परिप्रेक्ष्य में मास मीडिया तथा वेब मीडिया की महनीय भूमिका रही है। सूचना तकनीकी एवं प्रौद्योगिकीय क्रांति भारतीय शैक्षिक परिदृश्य के विकासोन्मु पहल तथा कदम दृष्टि से उपलब्धि कही जा सकती है। परिवर्तन के दौर तथा वेब मीडिया के बहुआयामी संदर्भों को सहर्ष स्वीकार करना होगा। वेब मीडिया वह मंच है जो छात्र तथा अध्यापक दोनों को समयसीमा को किनारे करते हुए अध्यापन में दो तरफे संवाद का अवसर उपलब्ध कराता है, जिससे छात्रों के बहुआयामी विकास में काफी सहायता मिलती है। वेब मीडिया आधारित अध्ययन-अध्यापन परिणाम, विश्वविद्यालय तथा अध्यापकीय प्रतिबद्धता आदि की सक्रियता भाषा अध्यापन को अत्यधिक प्रभावी बनाने में सहायक सिद्ध होगी इसमें संदेह नहीं है। आज वे दिन लद चुके हैं, जब छात्र अपनी जिज्ञासाओं की तुष्टि के लिए दर-दर की ठोकरें खाता था। वेब मीडिया ने छात्रों को अपनी जिज्ञासाओं की तुष्टि के लिए समय सीमाओं को लाँघते हुए वैश्विक  मंच तथा ज्ञानार्जन का खुला भांडार प्रदान किया है।  


 

बीज-शब्द : जनसंचार माध्यम, वेब मीडिया, औपचारिक-अनौपचारिक, इंटर अॅक्टिविटी, शैक्षिक संदर्भ एवं परिदृश्य, नवसृजन, शैक्षिक कार्यक्रम, विश्वसनीयता, पुस्तकालय एवं बजट, मॉडल महाविद्यालय, शैक्षिक फोरम, कठिन विषय, अध्यापकीय प्रतिबद्धता, चिठ्ठा जगत।


 

मूल आलेख 


    सूचना तकनीकी एवं प्रौद्योगिकी के दिन-ब-दिन हो रहे विकासोन्मुख परिदृश्य ने संपूर्ण दुनिया को किसी न किसी रूप में प्रभावित किया है, इस सच्चाई को स्वीकार करना पड़ता है। जनसंचार माध्यमों के समाज पर पड़े व्यापक परिप्रेक्ष्य तथा गहरे प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता। भाषाओं के विकास में भी संचार माध्यमों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। वस्तुतः अध्ययन एवं अध्यापन शिक्षा जगत से जुडे़ अहम् पहलू है। शैक्षिक प्रक्रिया औपचारिक और अनौपचारिक दो धरातलों पर चलती है। कक्षा अध्यापन की तुलना मे बच्चे अनौपचारिक रूप में अत्यधिक सीखते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि जो शिक्षा बच्चा कक्षा में प्राप्त करता है, वह अधिक प्रभावी है और जो अनौपचारिक रूप में सीखता है वह कम प्रभावशाली है। क्योंकि बच्चे बाहर के अनौपचारिक परिवेश से जिन चीजों को पाते हैं वे भी उनकी दृष्टि से महत्त्वपूर्ण एवं प्रभावशाली ही होती है। अनौपचारिक संचार माध्यमों में पत्र-पत्रिकाएँ, दैनिक अखबार, रेडियों, टी.वी, विज्ञापन, कॉमिक्स, फिल्म तथा एक-दूसरे से होते मौखिक संवादों के माध्यम से भी व्यवहारिक रूप में अत्यधिक सीखते हैं। एक प्रभावी संचार माध्यम के रूप में वेब मीडिया की महत्त्वपूर्ण भूमिका परिलक्षित होती है। जिस माध्यम ने अन्यान्य क्षेत्रों को काफी मात्रा में प्रभावित किया है। लेकिन जहाँ एक ओर वेब माध्यम के सकारात्मक पक्ष ने समाज के बहुआयामी परिदृश्य को व्यापक धरातल पर प्रभावित किया है वहाँ उसके नकारात्मक पक्ष को भी नकारा नहीं जा सकता।

 



वर्तमान आम सोच को केंद्र में रखते हुए कहा जा सकता है कि भाषा अध्ययन एवं अध्यापन के प्रति उदासीनता परिलक्षित हो रही हे। इसके कई कारण हैं, जिस पर विचार करना समय एवं समाज की आवश्यकता बनी हुई है। पारंपरिक अध्ययन एवं अध्यापन पद्धति ने भी दुनिया को कई ज्ञानार्जन के स्रोत दिए हैं। विश्व  का कोई कोना नहीं है, जहाँ भारतीय शिक्षा प्राप्त विद्वानों ने दस्तक नहीं दी है। वस्तुतः भाषा के परिप्रेक्ष्य में पारंपरिक अध्ययन-अध्यापन पद्धति एवं वर्तमान परिप्रेक्ष्य को केंद्र में रखना जरूरी है। कहना गलत न होगा कि मास मीडिया को अध्यापन के साधन के रूप में अपनाना किसी चुनौती से कम नहीं है। सूचना तकनीकी का विकास तो हुआ है लेकिन शैक्षिक परिदृश्य में अपेक्षित परिणाम नहीं मिल सका है। शैक्षिक परिदृश्य को केंद्र में रखते हुए हमें सूचना तकनीकी एवं प्रौद्योगिकी के सकारात्मक प्रभाव तथा परिणाम की दृष्टि से सोचने की आवश्यकता दिखाई देती है।

 



वेब मीडिया - वर्तमान संदर्भ -

    

    हम वेब मीडिया को पत्रकारिता, इंटरनेट, मीडिया, ऑनलाइन मीडिया, सायबर मीडिया आदि रूपों में देख सकते हैं। सही रूप में वेब मीडिया संचार का मुख्य स्रोत है। प्रिंट एवं इलेक्ट्रिक मीडिया अत्यधिक लाभप्रद रहे हैं। “वेब मीडिया का ही करिश्मा है कि आज घर बैठे हम ऑनलाइन हिंदी की अनेक किताबें पढ़ सकते हैं। हिंदी में अपने विचार लिखकर उन्हें एक बड़े तबके तक पहुंचा सकते हैं। ..... 21वीं सदी के पहले दशक में ही गूगल न्यूज़, गूगल ट्रांसलेट तथा ऑनलाइन फोनेटिक टाइपिंग जैसे साधनों ने वेब की दुनिया में हिंदी के विकास में महत्वपूर्ण सहायता की।”1 कहना सही होगा कि वेबमीडिया संसाधन के रूप में समाज की हर इकाइयों के लिए उपलब्धि सिद्ध हो रहे है।  सूचना तकनीकी का ही परिणाम है कि ‘‘सूचना समाज के लिए सूचना ही सोना है, ज्ञान ही शक्ति है। लेकिन आज हर क्षेत्र में ज्ञान इतना ज्यादा है, सूचना का भंडार इतनी तेजी से बढ़ रहा है कि बड़े से बड़े पंडित के लिए भी अपने विषय की पूरी और पक्की जानकारी रख सकना असम्भव है।’’2  कहना समीचीन होगा कि ज्ञानार्जन के असीम स्रोतों को अपने में बांधने की क्षमता वेब मीडिया में परिलक्षित होती है। जिस तकनीकी का हर कोई लाभ उठा सकता है 

 


वेब मीडिया ने युवा पीढ़ी को जहाँ बेबाक अभिव्यक्ति का मंच प्रदान किया है, वहाँ युवाओं की अति-आत्मविश्वास की ओर भी संकेत किया हुआ परिलक्षित होता है। युवा पीढ़ी के सामने कई आह्वान भी हैं जो चिंता की अपेक्षा चिंतन की माँग करते हैं। आम पत्रकारिता को लेकर प्रमोद जोशी का कहना है कि ‘‘हमारे मीडिया में विस्फोट हो रहा है। उस पर जिम्मेदारी भारी है, पर वह इस पर ध्यान नहीं दे रहा। मैं वर्तमान के प्रति नकारात्मक नहीं सोचता और न वर्तमान पीढ़ी से मुझे शिकायत है, पर कुछ जरूरी बातों की अनदेखी से निराशा है।’’3. स्पष्ट है कि मीडिया को अपनी लोकतंत्रीय प्रतिबद्धता का निर्वाह करना होगा।

 


 आज युवा पीढ़ी वेब मीडिया में अत्यधिक मात्रा में सक्रिय है। निश्चित ही बेबाक युवा अभिव्यक्ति ने समाज में परिवर्तन की नींव डालने की कोशिश अवश्य की है। युवा पीढ़ी अपनी दबी हुई आवाज को विभिन्न ब्लॉग्स्, टयुटर, आर्कुट, फेसबुक तथा अन्यान्य माध्यमों के जरिए प्रस्तुत अवश्य कर रही है। युवा पीढ़ी की इस दबी हुई जुबान को जहाँ मुख्य धारा के माध्यम सामान्य मानते थे वही बातें आज वेब मीडिया के माध्यम से विशिष्टतम बनती जा रही है। इस सच्चाई को स्वीकार करना होगा। आजकल होते युवा आंदोलनों की नींव भी वेब मीडिया की ही उपलब्धि कही जा सकती है। राजनीति के शिकार मीडिया को कुछ मात्रा में बाहर निकालने का काम वेब मीडिया में सक्रिय युवा पीढ़ी ने ही किया है। दलित युवा की बेबाक अभिव्यक्ति को व्यापक धरातल पर प्रस्तुत करने में वेब मीडिया की ही महनीय भूमिका रही है। वैकल्पिक मीडिया के इस रूप ने अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य की पर्याप्त हिमायत की हुई परिलक्षित होती है। लेकिन विचारणीय पक्ष है कि युवाओं को अपने तथा राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य को केंद्र में रखते हुए वेब मीडिया तथा लोकतंत्र की सीमाओं को भी केंद्र में रखना समय एवं परिवेश की आवश्यकता प्रतीत होती है। 

 



परिवर्तन के दौर का स्वीकार -


    वेब मीडिया की स्वीकार्यता दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है, इस सच्चाई को स्वीकार करना होगा। लेकिन वेब मीडिया का दूसरा पक्ष उसका अध्ययन-अध्यापन का अंग बनना महत्त्वपूर्ण परिलक्षित होता है। गैब्रिएला इलेवा का कहना सही है कि  “हम शिक्षकों के लिए पी.पी.पी. (प्रेजेंटेशन, प्रैक्टिस और प्रोडक्शन) की पद्धति  की लीक से हटकर दूसरी विधा को अपनाना, अपनी सोच को बदलना और कक्षाओं में पाठ्यक्रम योजना बनाना क्रन्तिकारी परिवर्तन की तरह है. अध्यापकों को इक्कीसवीं सदी की योग्यताओं के लिए बेहतर ढंग से तैयार होना होगा जिससे कि वे अपने छात्रों को हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति पढ़कर और सिखाकर इक्कीसवी सदी के अनुकुल तैयार कर सकें और वैश्विक क्षमता के लिए तैयार हो जाए ।”4 स्पष्ट है कि व्यापक मात्रा में अध्ययन-अध्यापन प्रक्रिया में वेब मीडिया के प्रयोग के बाद शिक्षा अत्यधिक प्रभावी होगी इसमें दो राय नहीं है। कहना गलत न होगा कि वेब मीडिया की सबसे बड़ी ताकत होती है संवाद। इंटर अॅक्टिविटी अर्थात् दो तरफे संवाद के लिए यह माध्यम काफी सशक्त परिलक्षित होता है। निश्चित ही वेब मीडिया का यह सकारात्मक और विकासोन्मुख पहलू दृष्टिगोचर होता है। वेब मीडिया के कारण नवसृजन के लिए व्यापक मंच मिला है। कहना समीचीन होगा कि नए आयामों को उद्घाटित करने की प्रकिया को व्यापक धरातल पर अभिव्यक्ति देने में वेब मीडिया की महनीय भूमिका द्योतित होती है।

 

   

     वर्तमान समय परिवर्तन तथा चुनौतियों का समय है। समय के साथ चलते हम स्वयं पीछे नहीं रह सकते। यदि हम अपनी पारंपरिक अध्यापन पद्धतियों की ही दुहाई देते रहें तो भविष्य हमें माफ नहीं करेगा। आने वाली पीढ़ी नए की उम्मीद एवं कामना के बूते पर जी रही है। अतः हमें उनके आकांक्षापूर्ण जीवन एवं भूख को मिटाने की दृष्टि से प्रयास करने की आवश्यकता परिलक्षित होती है। आम तौर पर बच्चों की मानसिकता होती है कि वे नए शैक्षिक साधनों के प्रति अनभिज्ञ रहते हैं। अतः उनके मन में नए को जानने की असीम जिज्ञासा बनी रहती है। जहाँ एक ओर छात्र तैयार तो अवश्य है लेकिन अध्यापकों को भी परिवर्तन के दौर से मुँह मोड़ने के लिए गुंजाइश नहीं है। भाषिक पहलुओं को नए सिरे के साथ प्रस्तुत करना बुद्धिजीवी अध्यापकों का काम है। हम अध्यापकों का दायित्व है कि नई तकनीकी को अपनाने की सोच बनानी होगी। मात्र सरकार के नियमों तथा प्रतिबंध से नई तकनीकी के प्रयोग की अपेक्षा नहीं की जा सकती।  

 



सामान्य शैक्षिक कार्यक्रमों का आयोजन -


    जिस प्रकार आम शिक्षा को केंद्र में रखते हुए सामान्य शैक्षिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है, वैसे ही भाषा अध्यापन में भी इसी पद्धति के प्रयोग से अध्येताओं की रूचि में परिवर्तन की कामना की जा सकती है। है। अमेरिका में बच्चों के लिए शैक्षिक टी.वी., सीसेम स्ट्रीट तथा कनाडा में फार्म रेडियो फोरम की महनीय भूमिका रही है। इस टी.वी. के माध्यम से बच्चों को सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में बोरियत महसूस नहीं होती है। अध्यापक और छात्र इसमें संतुष्टि का अनुभव करते हैं। हमारे भारतवर्ष में भी इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी टी.वी. तथा वीडियो कॉन्फ्रेंसिग के माध्यम से तथा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, ई-पाठशाला आदि के माध्यम से शिक्षा को तकनीकी के साथ जोड़ने के प्रति प्रतिबद्ध अवश्य है। लेकिन भारत के संदर्भ में आरंभिक कक्षाओं से इसका सूत्रपात होने पर काफी बदलाव आ सकता है। यदि भाषा अध्यापन में आरंभिक कक्षाओं से ही इस तकनीकी को अपनाने का प्रयास होता है तो बच्चों की भाषिक क्षमताओं का विकास होने में काफी सहायता मिल सकती है। निश्चित ही आज बच्चों की भाषा अध्यापन के प्रति जो मानसिकता है, वह नहीं रहेगी। वह भाषा के प्रति सहज रूप में अपना रूझान बदल देगा इसमें संदेह नहीं है।

 



वेब मीडिया और शैक्षिक संदर्भ -


    कम्प्यूटर एवं इंटरनेट तकनीकी ने शिक्षा के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन किया है। वेब संसाधन, ब्लॉग्स, वर्चुअल क्लासरूम, एम पी-3, प्लेअर्स, मोबाईल फोन, पर्सनल डिजिटल सहायक, वेबकास्ट (webcasts) और पॉडकास्ट (Podcasts) आदि का उपयोग शैक्षिक परिप्रेक्ष्य में किया जाता है। वेबकास्ट के माध्यम से शैक्षिक सामग्री अंतर्जाल पर प्रसारित की जा सकती है। इस शैक्षिक सामग्री के असीम दर्शक हो सकते हैं। पॉडकास्ट माध्यम के अंतर्गत ऑडियो-विडियो, रेडियो एवं पी.डी.एफ. का जिक्र किया जा सकता है। कहना सही होगा कि शैक्षिक संसाधनों को व्यापक धरातल पर अजमाने की आवश्यकता परिलक्षित होती है। इन्हीं माध्यमों का उपयोग भाषा अध्यापन को अत्यधिक संप्रेषित बनाने में हो सकता है। डॉ. मनीष कुमार मिश्रा का कहना है कि ‘’ व्यक्तिगत तौर पर भी अध्ययन-अध्यापन के क्षेत्र में प्रौद्योगिकी और तकनीक का बड़े पैमाने पर प्रयोग करना चाहिए।”5 कहना सही होगा कि आधुनिक वेबमीडिया संसाधनों के शैक्षिक प्रयोग से अध्ययन-अध्यापन कार्य अत्यधिक प्रभावी बन सकता है जिससे अध्यापक अपनी जवाबदेही सुनिश्चित कर सकते हैं। 

 

    

    हिंदी भाषा एवं साहित्य को अंतर्जाल के परिप्रेक्ष्य में परखने की आवश्यकता परिलक्षित होती है। पारंपरिक मीडिया का मोह एवं हिंदी लेखकों को भी सोचने की आवश्यकता दिखाई देती है। आज 25 वर्ष से 40 वर्ष के युवाओं की संख्या अत्यधिक है। उनकी अपनी भाषा एवं समझ है, जो छात्र तथा समाज को सोचने के लिए बाध्य करती है। आजकल छात्र तथा अध्यापक अंतर्जालीय व्यापक परिप्रेक्ष्य के कारण एक-दूसरे के करीब आते परिलक्षित होते हैं। अध्यापक यदि वेब अध्ययन एवं अध्यापन के प्रति असीम आस्था रखते हैं तो छात्र अध्यापक की तरह अत्यधिक मात्रा में अनुकरण करेंगे इसमें संदेह नहीं है। वेब मीडिया की उपलब्धि के कारण पुस्तकालयों में कैद तथा बंद साहित्य वैश्विक  स्रोत के रूप में वैश्विक  स्तर पर अभिव्यक्त हो रहा है। वेबस्थलों पर अखबार और संदर्भ तथा पाठ्यपुस्तकें भी सहज उपलब्ध हो रहे हैं। मोबाईल पर एक क्लिक के साथ चाहे जिस ज्ञानार्जन के स्रोत से अवगत हो सकते हैं। साक्षर-निरक्षर सभी इन सुविधाओं का लाभ उठा सकते हैं। भारतीय भाषाओं के अध्ययन -अध्यापन में कंप्यूटर के प्रयोग के बारे में कहा गया है कि “Certain Indian linguistic groups such as Kannadigas, Telugus and Tamils seem to be more advance in taking advantage of the computer revaluation to improve their language education.”6   कहना गलत न होगा कि बहुभाषिक देश में से मात्र तीन-चार भाषाओं ने कंप्यूटर को भाषा अध्यापन में अत्यधिक मात्रा में प्रयुक्त किया है। लेकिन दूसरी ओर कई भाषाएँ है जो कंप्यूटर से काफी दूर परिलक्षित होती है। इसका कारण है कि कन्नड, मलयालम, तेलुगु तथा तमिल आदि भाषा-भाषी अंग्रेजी को सहज रूप में समझते हैं। लेकिन मराठी, हिंदी, गुजराती तथा अन्य भारतीय भाषा अध्येता अंग्रेजी से कोसों दूर भागते नजर आते हैं। यही कारण है कि कंप्यूटर तथा वेबस्थलों के भाषिक अध्ययन से अपेक्षित जुड़ाव नहीं बन सका है। दूसरी ओर भारतीय भाषाओं ने यूनिकोड के के कारण कम-अधिक मात्रा में क्यों न हो, वेबस्थलों पर अपनी उपस्थिति अवश्य दर्ज की है।

 



वेब मीडिया और प्रिंट मीडिया की विश्वसनीयता का सवाल -


    जहाँ हम एक ओर वेबमीडिया तथा मास मीडिया को अध्यापन के साथ जोड़ने की कोशिश करते हैं, वहाँ दूसरी ओर शैक्षिक परिप्रेक्ष्य में दोनों की विश्वसनीयता का सवाल भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। अत्यधिक विद्वानों का मानना है कि प्रिंट मीडिया की तुलना में वेबमीडिया की विश्वसनीयता को लेकर काफी संदिग्धता परिलक्षित होती है। इसका अर्थ यह नहीं कि प्रिंट मीडिया अर्थांत अन्य संचार साधनों की विश्वसनीयता निर्विवाद है ?  विश्वसनीयता का परिप्रेक्ष्य दोनों धरातलों पर अलग-अलग मायने रखता है। जो सावधानी मास मीडिया की विश्वसनीयता को लेकर बरती जाती है, यदि वही सावधानी वेबमीडिया में अपनाने पर विश्वसनीयता का सवाल नहीं उठेगा। हाँ, उपयोगकर्ता अध्यापक तथा अध्येताओं का दायित्व बनता है, कि वे वेबस्थलों पर प्रकाशित शैक्षिक सामग्री की सत्यता तथा शुद्धता को भी बारीकी से देखें तथा परखें। अध्यापक तो वेबमीडिया पर प्रकाशित सामग्री की विश्वसनीयता के मानदंडों को जाँच सकते हैं, लेकिन आम उपयोगकर्ता अर्थात छात्र निश्चित ही विश्वसनीयता की कसौटी को नहीं पहचान सकेंगे। इसलिए वेबस्थलों पर प्रसारित तथा प्रकाशित सामग्री के प्रकाशन से पहले ही विश्वसनीयता विषयक पहलुओं को केंद्र में रखने पर विश्वसनीयता का सवाल उभर नहीं सकता।

 



वेबमीडिया और भाषा अध्यापन सुविधा -


    वेब मीडिया ने छात्र तथा पाठकों की भूख तुष्ट करने के प्रति काफी हद तक प्रतिबद्धता दिखाई है, इसमें दो राय नहीं है। C-DAC Pune has designed two multimedia software packages for learning Hindi - Leela Hindi Swayam Teachers (for foreigners) and Leela Hindi Prabodh Software (prescribed by Department of Official Language for Government employees) software package”7 स्पष्ट है कि हिंदी भाषा अध्यापन की दृष्टि से सीडैक द्वारा किया गया यह प्रयास सराहनीय कहा जा सकता है। लेकिन यह प्रयास भी भाषा अध्यापन की दृष्टि से अत्यल्प मात्रा में ही परिलक्षित होता है ।

 


 

प्रवक्ता डॉट कॉम, हिंदी नेस्ट, महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय आदि वेब माध्यम हिंदी भाषा एवं साहित्य के अध्येताओं की भूख को परितुष्ट करने में सफल परिलक्षित होते हैं। आज वेब माध्यमों के जरिए किसी भी दूर-दराज में रहकर हर किसी विषय तथा भाषा को सहज सीखा जा सकता है। सुपरप्रोफ डॉट को इन supperprof.co.in वेब स्थल संपूर्ण भारत में लगभग चौदह हजार अडसठ अध्यापक अध्यापन का काम कर रहे हैं। अन्यान्य क्षेत्रों के अध्येता इस सुविधा का लाभ उठा रहे हैं। उल्लेखनीय है कि इस माध्यम से रोजगार की उपलब्धता भी हो रही है और अर्थाभाव के कारण जो अपनी अध्ययन की प्यास बुझाने में असमर्थ थे, वे भी घरबैठे कम खर्च में अपनी आवश्यकतानुरूप भाषा का अध्ययन कर रहे हैं। unipune1.academia.edu जालस्थल पर हिंदी, मराठी तथा अंग्रेजी के साथ अन्यान्य विषयों की पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है। इस सामग्री का उपयोग कई स्नातक तथा अनुसंधाता उठाते हैं। निश्चित ही वेब मीडिया का यह सकारात्मक पक्ष कहा जा सकता है। एक समय था, जब अध्यापकों को किसी अध्याय के अध्यापन में काफी कठिनाइयाँ महसूस होती थी। पाठ्यक्रम की अध्ययन सामग्री उपलब्ध नहीं होती थी। ग्रंथालयों में पर्याप्त ग्रंथ उपलब्ध नहीं होते थे। लेकिन वेब मीडिया के कारण दुनिया के किसी भी विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम के किसी भी इकाई से संबंधित सामग्री सहज रूप में न मात्र अध्यापकों ही उपलब्ध होती है, बल्कि छात्र भी अपनी इच्छा के अनुरूप जब चाहे सामग्री की खोज करता है और अध्ययन की प्यास बुझाता है। वर्तमान में अध्यापक एवं छात्र Skype, Adobe connect, WhatsApp, Video calling, Yahoo messenger, Instagram जैसे सॉफ्टवेयर के माध्यम से विशेषज्ञों से वीडियो एवं ऑडियो वार्तालाप कर सकते हैं। इन संसाधनों के प्रयोग के कारण छात्र तथा अध्यापक में निहित आपसी आदरयुक्त दूरिया भी कम होती दिखाई दे रही है। आज छात्र मात्र गुड मॉर्निंग तथा गुड नाईट तक वार्तालाप नहीं करते हैं अपितु वे इन संसाधनों का प्रयोग अपने शैक्षिक जीवन के परिप्रेक्ष्य में भी करते नजर आते हैं।

 



वेब मीडिया और ग्रंथालय बजट -


    वेब मीडिया के व्यापक प्रयोग के कारण आज पुस्तकों के लिए तथा संदर्भ ग्रंथों की खरीद के लिए अलग से आर्थिक बजट की आवश्यकता नहीं है। ग्रामीण तथा शहरी परिवेश में भी ग्रंथालयीन सामग्री की खरीद और संस्थाओं के बजट अहम भूमिका रखता था। अर्थाभाव के कारण ग्रंथालय मात्र, खंडहर बने रहते थे, लेकिन आज स्थितियाँ काफी बदली हुई परिलक्षित होती है। ई-ग्रंथालय के रूप में ग्रंथालय वेब के साथ जुड़ रहे हैं। ग्रंथालयों की समृद्धि आज पुस्तकों की मुद्रित प्रतियों पर नहीं, अपितु ग्रंथ तथा पुस्तकों के ई-संस्करणों पर अधिक परिलक्षित हो रही है। वेब मीडिया का ही परिणाम है कि डिजिटल ग्रंथालय की संकल्पना व्यापक रूप धारण कर रही है। संस्थानों के अर्थाभाव के कारण ग्रंथालयों में समय पर पुस्तकें उपलब्ध करना मुश्किल होता था। सरकार की ओर से भी ग्रंथालयों के लिए किसी भी प्रकार आर्थिक प्रबंध नहीं हो पाता था। परिणामस्वरूप छात्रों को अपनी ज्ञानार्जन की भूख से वंचित रहना पड़ता था। डिजिटल तकनीकी के कारण आज छात्र भी डिजिटल छात्र के रूप में अपनी पहचान बना रहे हैं। ‘‘मोबाईल एप्स ने पुस्तकालयों से किताबें उधार लेने की पुरानी परम्परा को समाप्त सा कर दिया है। वर्तमान में विद्यार्थी लाइब्रेरीमोबाईल एप्स के द्वारा किताबों के ई-बुक्सरूप को उपयोग में लेते हैं जिनका वे किसी भी समय और कहीं पर भी अपने मोबाईल के माध्यम से पढ़ सकते हैं।’’8  अब वह दिन नहीं होंगे, जब छात्रों को ग्रंथालयों में पुस्तकों की खोज के लिए जाना पड़ता था, आज छात्र स्वयं ग्रंथालय को अपनी मुठ्ठी में लिए हुए हैं। उसे सिर्फ उसके सकारात्मक पक्ष को केंद्र में रखकर अपनी ज्ञानार्जन की भूख को तृप्त करना होगा।

 

 


वेब मीडिया अध्यापन और विश्वविद्यालयों की भूमिका -


    वेब तकनीकी आधारित अध्ययन-अध्यापन पद्धति में विश्वविद्यालयों के अहम् भूमिका निर्वहन करने पर वेब मीडिया आधारित भाषा-अध्यापन अत्यधिक प्रभावी होगा इसमें संदेह नहीं है। विश्वविद्यालयों को चाहिए कि वे वेब तकनीकी अध्यापन की दृष्टि से मॉडल महाविद्यालयों को विकसित करें। जिससे वे महाविद्यालय सक्रिय भूमिका अदा करते हुए विश्वविद्यालय से संलग्न अन्य महाविद्यालयों के अध्यापकों को भी वेब आधारित अध्ययन-अध्यापन पद्धति से लाभान्वित होने का अवसर मिलेगा। आज हर विश्वविद्यालय किसी न किसी रूप में मॉडल महाविद्यालय की संकल्पना चरितार्थ कर रहे हैं। उसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए वेब मीडिया अध्यापन से संबंधित नए-नए सॉफ्टवेअर विकसित करके छात्रों को सहज सुविधा उपलब्ध कराए। निश्चित ही छात्र नई नीति तथा तकनीकी के माध्यम से भाषा तथा अन्य विषयों के अध्ययन में अत्यधिक रुचि लेंगे। अमृता व्हर्च्युअल लर्निग आय.आय.टी. के अंतर्विद्याशाखीय विषयों से संबंधित लेक्चर्स प्रसारित होते हैं। लेकिन दुर्भाग्य है कि भाषा से संबंधित व्याख्यान इस प्रणाली के माध्यम से प्रसारित नहीं होते।

 

 


वेबमीडिया अध्ययन-अध्यापन परिणाम -


    अध्यापक श्रव्य एवं दृश्य माध्यम कंप्यूटर और इंटरनेट के उपयोग के जरिए शिक्षण सामग्री उपलब्ध करा सकते हैं। निश्चित ही यह बात कक्षा और कक्ष की सीमाओं के भेद को मिटा सकती है। अध्यापक गृहकार्य हो या परियोजना तथा कोई भी शैक्षिक गतिविधि क्यों न हो, अध्यापक छात्रों को ई-मेल तथा शैक्षिक फोरम का उपयोग कर सकते हैं। इन संसाधनों के कारण अध्यापक तथा छात्र दोनों को भी भौतिक रूप से उपस्थित होने की आवश्यकता नहीं है।

 

    

    मोबाईल एप, व्हाटस्एप तथा शिक्षा विषयक कोई भी एप क्यों न हो वह वेब मीडिया का ही एक नया आयाम है। भले ही हम उसके व्यापक कुप्रभाव से प्रभावित क्यों न हुए हों। लेकिन गौरतलब है कि उसके अत्यधिक मात्रा में दृष्टिगत सकारात्मक पक्ष को नकारा नहीं जा सकता है। इन संसाधनों से समय सीमा से परे होकर अपनी आवश्यकतानुरूप ज्ञानार्जन की भूख तृप्त होने में काफी सहायता हो रही है, इस सच्चाई को स्वीकार करना पड़ेगा। आज छात्र तथा अध्यापक दोनों भी एक क्लिक के साथ अपनी आवश्यकता तथा जिज्ञासा का समाधान कर सकते हैं। एक समय था, जब छात्र अपनी समस्याओं को दूसरे दिन अध्यापक के सामने प्रस्तुत करता था, और अध्यापक तत्पश्चात समाधान ढूँढते थे। आज स्थितियों में काफी परिवर्तन आया है। 

 


 छात्र अपने अध्ययन के दौरान दिक्कत आने पर रात-बे-रात, जब चाहे वेब तकनीकी के आधार पर अपनी जिज्ञासा को शीघ्र तृप्त कर सकता है। उल्लेखनीय है कि वेबमीडिया आधारित अध्ययन-अध्यापन पद्धति के कारण अध्ययन-अध्यापन कौशल में भी सुधार परिलक्षित हो रहा है। अध्यापक को अध्यापन करते समय आज काल्पनिक चित्र बनाने की आवश्यकता नहीं है, वह आज तुरंत किसी कार्टून के माध्यम से अपना लक्ष्य निर्धारित कर सकता है। कहना गलत न होगा कि इन संसाधनों के कारण छात्रों की पढ़ाई का स्तर भी बदलेगा इसमें संदेह नहीं है। वैसे भी घिसी-पिटी विधियों को सुनकर छात्र अक्सर उबते नजर आते थे, वे आज इस उबन के शिकार नहीं है, अपितु वे चाव के साथ कठिन से कठिन विषय को भी सहज स्वीकारने में अपनी सहर्ष रुचि दिखाते हैं।

 

अध्यापकीय प्रतिबद्धता और वेब मीडिया -


    देश  के आजाद हुए लगभग 72 वर्षों  के उपरांत भी हमारी शिक्षा व्यवस्था में अपेक्षित परिवर्तन नहीं हुआ है। निश्चित ही इस तथ्य के कई कारण हैं। हम अध्यापकों का दायित्व है कि हमें नई तकनीकी अपनाने की सोच बनानी होगी। कब तक हम नई तकनीकी से मुँह मोडेंगे ? यह सवाल चिंता की अपेक्षा चिंतन के लिए मजबूर करता हुआ दिखाई देता है। पुरानी पीढ़ी के अध्यापक इस विधि को धीरे-धीरे क्यों न सही लेकिन सीख सकते हैं। परंतु अध्यापकों की नई पीढ़ी नए तकनीकी संसाधनों के प्रति प्रतिबद्ध दिखाई देती है। निश्चित ही नव अध्यापकों की यह सोच परिवर्तनोन्मुखी दृष्टिगत होती है। आज नई पीढ़ी के अध्यापक अपने अध्यापकीय ब्लाग के माध्यम से छात्रों से हर समय जुड़े रहते हैं। आज वे दिन नहीं है, जब रात्रि के समय अपने अध्यापक से बात करना बस की बात नहीं थी। लेकिन आज स्थितियां काफी बदली हुई है। ‘‘ब्लॉग के द्वारा शिक्षक एवं विद्यार्थी अपनी सोच, विचार आदि प्रकट करने के साथ- साथ उपलब्ध विषयवस्तु पर अपनी टिप्पणियाँ कर सकते हैं तथा अपने विचारों पर टिप्पणियाँ भी प्राप्त कर सकते हैं। इस तरह एक दूसरे से अन्तःक्रिया करके सीखने के लिए वातावरण का निर्माण करते हैं।’’9  चिठ्ठा जगत के माध्यम से दो तरफा संवाद होने में सहायता हो रहीं है। कहना समीचीन होगा कि ब्लॉग के माध्यम से छात्र तथा अध्यापकों के बीच अभिव्यक्ति की नई पहल होने में सहायता हो रही है। अध्यापकों के अवकाश के दौरान होती कमी को इस माध्यम से पूरा करना संभव हो पा रहा है।

     

   

   

     ‘‘आज कंप्यूटर शिक्षा को रोजगार का पर्याय कहा जाए तो अनुचित नहीं होगा। सीधे शब्दों में कम्प्यूटर है जहाँ, रोजगार है वहाँ।... नई तकनीकी को अपनाकर अपने विकास का मार्ग स्वयं प्रशस्त किया है। कम्प्यूटर और सूचना तकनीकी के विकास क्रम में पढ़ने, लिखने और कार्य करने के लिए भाषा के माध्यम का कायाक्लप किया है।’’10  कहना सही होगा कि विश्व की अन्यान्य भाषाएँ वेब तथा कंप्यूटर की दृष्टि से समर्थ परिलक्षित होती है। आवश्यकता सिर्फ, हम अध्यापकों के प्रतिबद्ध होने की दिखाई देती है। वेब संसाधनों के प्रयोग तथा उपयोग के पक्ष पर एकांगी बात करना भी किसी अतिशयोक्ति से कम नहीं है।

  


आज स्वाधीनता के लंबे अंतराल के बाद भी हमारे कई गाँवों में बिजली तथा आवश्यक सुविधाओं का अभाव परिलक्षित होता है। सही रूप में भौतिक संसाधनों की उपलब्धता का सवाल काफी गंभीर दिखाई देता है। हम धड़ल्ले के साथ डिजिटल इंडिया की बात तो करते हैं, लेकिन हम कितने डिजिटल है और कितने नहीं, इस पर व्यापक परिपेक्ष्य में सोचने की आवश्यकता दृष्टिगोचर होती है। सूचना तथा वैज्ञानिक तकनीकी के विकासोन्मुख परिदृश्य के बावजूद आज भी भाषिक सॉफ्टवेअर की पूर्ति की दृष्टि से प्रयास की आवश्यकता है। इंटरनेट की सुविधा भी रामभरोसे ही है। कभी मुफ्त में तो कभी बस में ही नहीं है। ऐसे हालातों में हम सभी विद्वज्जनों को भाषाओं के भविष्य की चिंता की अपेक्षा चिंतन और चिर प्रयासों की आवश्यकता परिलक्षित होती है।

 



निष्कर्ष-


    उक्त तथ्यों के विवेचनोपरांत कहना सही होगा कि भाषा-अध्यापन के परिप्रेक्ष्य में मास मीडिया तथा वेब मीडिया की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। सूचना तकनीकी एवं प्रौद्योगिकीय क्रांति भारतीय शैक्षिक परिदृश्य के विकासोन्मुख पहल तथा कदम दृष्टि से उपलब्धि कही जा सकती है। परिवर्तन के दौर तथा वेब मीडिया के बहुआयामी संदर्भों को सहर्ष स्वीकार करना होगा। अध्ययन एवं अध्यापन प्रक्रिया के मात्र छात्र केंद्री होने से काम नहीं बनेगा, अपितु इस प्रक्रिया को दो तरफा चलना होगा। वेब मीडिया वही मंच है जो छात्र तथा अध्यापक दोनों की समयसीमा को किनारे करते हुए अध्यापन में दो तरफे संवाद का अवसर उपलब्ध कराता है, जिससे छात्रों के बहुआयामी विकास में काफी सहायता मिलती है। वेब मीडिया आधारित अध्ययन-अध्यापन परिणाम, विश्वविद्यालय तथा अध्यापकीय प्रतिबद्धता आदि की सक्रियता भाषा अध्यापन को अत्यधिक प्रभावी बनाने में सहायक सिद्ध होगी इसमें संदेह नहीं है। आज वे दिन लद चुके हैं, जब छात्र अपनी जिज्ञासाओं की तुष्टि के लिए दर-दर की ठोकरें खाता था। वेब मीडिया ने छात्रों को अपनी जिज्ञासाओं की तुष्टि के लिए समय सीमाओं को लाँघते हुए वैश्विक मंच प्रदान किया है।  

 


संदर्भ-  


1. https://www.amarujala.com/channels/downloads?tm_source=text_share

2.  मनोहर श्याम जोशी : मास मीडिया और समाज, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2014, पृ. 47

3 . http://www.samachar4media.com/articles/2013/05/30

4. गैब्रिएला इलेवा : ‘इक्कीसवीं सदी में हिंदी शिक्षण का नया मार्ग‘ बहुवचन, 58 , जुलाई, सितम्बर 2018 पृ. 70  

5. मनीष कुमार मिश्रा : भारत में उच्च शिक्षा और तकनीक, वेब मीडिया और हिंदी का वैश्विक परिदृश्य (सं. मनीष   

    कुमार मिश्रा), हिंदी युग्म प्रकाशन, नई दिल्ली, 2013, पृष्ट-415

6. K. Jayalakshmi: ‘The Global Scenario of Hindi in Web Media’ JOURNAL OF CRITICAL

    REVIEWS, VOL 7, ISSUE 17, 2020, Page- 1644

7. L. Manjulakshi : Indian Mass Media And Language Education, Language In India, Volume   

    3,  2003 http://www.languageinindia.com/april2003/massmedia.html

8.  राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रषिक्षण परिषद छत्तीसगढ : शैक्षिक तकनीकी, 2017, पृ.47

9.  वही, पृ. 53

10. अमृता श्रीवास्तव : शिक्षा में कम्प्यूटर का महत्त्व,  2015, पृ. 59, 64

 


डॉ. भाऊसाहेब नवनाथ नवले

अध्यक्ष एवं शोध-निर्देशक, हिंदी विभाग

प्रवरा ग्रामीण शिक्षण संस्था का, कला, वाणिज्य एवं विज्ञान महाविद्यालय,सात्रल

तहसील-राहुरी, जिला-अहमदनगर, महाराष्ट्र-413711,

bhausahebnavale83@gmail.com

9922807085, 8788417569

 अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati)

अंक-35-36, जनवरी-जून 2021

चित्रांकन : सुरेन्द्र सिंह चुण्डावत

        UGC Care Listed Issue

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