शोध : मानव-नियति के प्रश्न और ‘परिंदे’ / डॉ. बीना जैन - अपनी माटी

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शनिवार, जुलाई 31, 2021

शोध : मानव-नियति के प्रश्न और ‘परिंदे’ / डॉ. बीना जैन

मानव-नियति के प्रश्न और परिंदे’ / डॉ. बीना जैन


शोध-सार :

निर्मल वर्मा का साहित्य आधुनिक समाज में मनुष्य के जीवन से जुड़े मूलभूत प्रश्नों, उसकी स्थिति और नियति पर सांस्कृतिक विमर्श के रूप में उपस्थित होता है।परिंदेप्रतीक के माध्यम से वे आधुनिक समाज की विडंबना को रूपायित करते हैं जिसमें मृत्यु का आतंक, हताशा, अवसाद, अकेलापन, अधूरापन, व्यर्थता-बोध मनुष्य की नियति बन गई है। कहानी के सभी चरित्र अपनी नियति में इन स्थितियों को झेलते हैं। वस्तुतः यह कहानी मृत्यु और जीवन के प्रश्नों को उपस्थित करती है। अकेलेपन और व्यर्थता-बोध के साथ जीने की विवशता की अनुभूति को सघन और व्यापक बनाती है।

 

बीज-शब्द : मृत्यु, अकेलापन, अधूरापन, प्रेम, नियति, स्मृति, आधुनिक सभ्यता।


मूल-आलेख :

परिंदेकहानी से अपनी अनुगूँज हिन्दी साहित्य में उत्पन्न करने व अपनी पहचान अलग से रेखांकित करने वाले निर्मल वर्मा सफल कहानीकार हैं। नामवर सिंह ने निर्मल वर्मा की 'परिंदेकहानी से नई कहानी की शुरुआत मानी है।अभी तक जो कहानी सिर्फ कथा कहती थी या कोई चरित्र पेश करती थी अथवा एक विचार का झटका देती थी वही निर्मल के हाथों जीवन के प्रति एक नया भावबोध जगाती है। साथ ही ऐसे दुर्लभ अनुभूति-चित्र प्रदान करती है जिन्हें हम कम से कम हिंदी में कहानी के माध्यम से प्राप्त करने के अभ्यस्त नहीं थे... फ़कत सात कहानियों का संग्रहपरिंदेनिर्मल वर्मा की ही पहली कृति नहीं है बल्कि जिसे हमनई कहानीकहना चाहते हैं उसकी भी पहली कृति है।'1 निर्मल की कहानियां क्योंकि कहानी का एक नई दिशा में मोड़ हैं इसलिए नंदकिशोर आचार्य भी अपनी सहमति नामवर सिंह के साथ दर्ज करते हुए निर्मल वर्मा की कहानियों को 'कहानी में एक नई परंपरा का आरंभ बिंदु' कहते हैं।2

 

निर्मल की कहानियां अपने तेवर में पूर्ववर्ती कहानी की किसी भी परंपरा का अनुसरण नहीं करती। व्यक्ति मन के जिस ठहराव और रीतेपन को निर्मल की कहानियां अभिव्यक्त करती हैं, वे जैनेंद्र और अज्ञेय की कहानियों से भिन्न अपनी जगह बनाती हैं। निर्मल वर्मा ने केवल कहानियां और उपन्यास नहीं लिखे बल्कि निबंध, यात्रा- संस्मरण, डायरी आदि गद्य की अन्य विधाओं में भी अपनी गहरी पैठ बनाई है। वे चाहे कुछ भी लिखें, उनका चिंतक और सर्जक साथ-साथ चलता है। उनकी कहानियों और उपन्यास में उनके चिंतन के विविध सूत्र विन्यस्त हैं। कहानियां लिखते समय उनका कहना है, “मैं कहानियां लिखता हूं, किंतु निबंध लिखने का शौक स्कूल से ही रहा है। मैंने अपने अधिकांश निबंध कहानियों के हाशिए पर नहीं उनके बीचो-बीच लिखे हैं। एक ही तर्क को दो तरफ से देखने की कोशिश की है।3 अपनी डायरी में उन्होंने स्वीकार किया है कि उनके लिए कहानी लिखना और चिंतन करना दो अलग-अलग कर्म नहीं हैं। अक्सर-हां दोनों अपनी चौहद्दी तोड़कर एक दूसरे की सीमा में घुसपैठ करने की कोशिश करते हैं। चिंतन वस्तुतः दर्शन का मुख्य अंग है और दर्शन मनुष्य और सृष्टि को केंद्र में रखकर बात करता है। निर्मल के चिंतन या चिंता का स्रोत भी मनुष्य है। वे आधुनिक युग में मनुष्य की स्थिति और मानव नियति के प्रश्नों को उठाते हैं। उनके लेखों और कहानियों में सभ्यता की अंधाधुंध प्रगति का परिणाम और उससे जुड़ा अभिशप्त जीवन व्यक्त होता रहा है। बीसवीं शताब्दी और आधुनिक समाज में उत्पन्न होने वाले संकटों का हल ढूंढने का प्रक्रम ही उनके तमाम रचनात्मक साहित्य की भाव-भूमि निर्मित करता है।

 

निर्मल वर्मा के अनुसार हर लेखक अपने वर्तमान के संकट और मनुष्य की स्थिति को अपनी चिंताओं से जोड़कर एक पूरा संसार रचता है। निर्मल वर्मा के अनुसार रचना वह आईना है जिसमें दुनिया का यथार्थ नहीं (आत्म) सेल्फ की दुनिया प्रतिबिंबित होती है - मैं कौन हूँ, तुम कौन हो, वह कौन है, खोए हुए समय की भूल-भुलैया में अपने को ढूंढना है। नामवर सिंह उनकी कहानियों के आंतरिक सत्य को उद्घाटित करते हुए कहते हैं, “परिंदे से यह शिकायत दूर हो जाती है कि हिंदी कथा साहित्य अभी पुराने सामाजिक संघर्ष के स्थूल धरातल पर ही 'मार्क टाइम' कर रहा है। समकालीनों में निर्मल पहले कहानीकार हैं जिन्होंने इस दायरे को तोड़ा है- बल्कि छोड़ा है; और आज के मनुष्य की गहन आंतरिक समस्या को उठाया है।4 डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसारनिर्मल वर्मा मन की गहरी परतों को उघाड़ने वाले कहानीकार हैं।5

 

साहित्य उनके लिये अकेलेपन के क्षणों में अपने से साक्षात्कार है जहां सभी व्यवस्थाओं से मुक्त होकर सिर्फ अपने बारे में सोच सकें। वे समाज के ठोस यथार्थ और वास्तविकताओं के चित्रण की अपेक्षा आधुनिक संदर्भों में निरंतर अकेले होते जा रहे व्यक्ति के अंतर्मन की समस्याओं को विषय बनाते हैं।अंतर्मन - जो अकेला है। अकेलापन-जो दुःख, पीड़ा, आंसुओं से बाहर है - जो महज़ जीने के नंगे बनैले आतंक से जुड़ा है ...जिसे कोई दूसरा व्यक्ति निचोड़कर बहा नहीं सकता।6 निर्मल वर्मा सिमोन वेल के शब्दों को उद्धृत करते हुए कहते हैं, “मनुष्य की आत्मा की जरूरतों में अतीत की जरूरत सबसे अधिक शक्तिशाली है।7 उनके अनुसार हर शब्द किसी अनुभव की याद है। किसी स्मृति को जगाता है। कलाकृति का सत्य यदि हो सकता है तो वह मनुष्य को उसकी स्मृति में लौटाना है।

 

परिन्देकी लतिका का अकेलापन कोई दूर नहीं कर सकता। एक पहाड़ी हिल स्टेशन पर बतौर अध्यापिका और वार्डन के रूप में कार्यरत लतिका मेजर गिरीश की मृत्यु के पश्चात जीवन में आए अकेलेपन और खालीपन को दूर नहीं कर पाती संभवतः वह करना ही नहीं चाहती। भविष्य के प्रति उदासीनता उसका स्वभाव बन गया है। लतिका के मेजर गिरीश नेगी के साथ जिए और भोगे गए अनुभव उसकी स्मृति का हिस्सा बन गए हैं। वे बीत जरूर गए हैं पर अतीत नहीं बने हैं। लतिका को अपनी स्मृति में उस समय की, प्रेम की अनुगूंजें सुनाई देती रहती हैं। उसके अनुसार प्रेम एक ऐसी अनुभूति हैजिसे कोई भी लड़की बड़े चाव से संजोकर, संभाल कर, अपने में छिपाए रहती है, एक अनिर्वचनीय सुख, जो पीड़ा लिए है, पीड़ा और सुख को डुबोती हुई, उमड़ते ज्वर की खुमारी... दोनों को अपने में समो लेती है... एक दर्द जो आनंद से उपजा है और पीड़ा देता है...यहीं इसी देवदार के नीचे ... वह जी रही थी, उस क्षण को जो भय और विस्मय के बीच भिंचा था -बहका -सा पागल क्षण।8 वर्तमान प्रेम के उन गहन क्षणों को, उन स्मृतियों को, उस अतीत को, उस इतिहास को बार-बार जागृत कर देता है। पिकनिक पर देवदार का वृक्ष देखकर उसे याद हो आता है, “यह वही है जिस पर उसने अपने बालों के क्लिप से गिरीश का नाम लिखा था। पेड़ की छाल उतरती नहीं थी, क्लिप टूट- टूट जाता था, तब गिरीश ने अपने नाम के नीचे उसका नाम लिखा था... लतिका जो याद करती है वही भूलना भी चाहती है। लेकिन जब सचमुच भूलने लगती है तब उसे भय लगता है कि जैसे कोई उसकी किसी चीज को उसके हाथों से छीने लिए जा रहा है, ऐसा कुछ जो सदा के लिए खो जाएगा। निर्मल वर्मा की कहानियां पात्रों को बार-बार अकेलेपन से बाहर निकालती हैं लेकिन वे बार-बार अकेलेपन के घेरे में घुस जाने को जैसे विवश हों।…. देवदार पर खुदे हुए अधमिटे नाम लतिका की ओर निस्तब्ध- निरीह भाव से निहार रहे थे।9 लतिका के लिए वह समय उसका शाश्वत वर्तमान बन गया है जो अपने साथ अतीत को समाहित किए है। निर्मल वर्मा मानते भी हैं कि कला शाश्वत वर्तमान में जीती है। निर्मल वर्मा परिवर्तन में विश्वास नहीं करते। उनकी कहानियों के पात्र भी अपनी स्थितियों से बाहर नहीं आते।परिंदेकहानी की लतिका अपने जीवन में उपस्थित त्रासदी से बाहर नहीं आना चाहती।धूप का एक टुकड़ाकी नायिका का जीवन भी एक ढर्रे पर ही चल रहा है। निर्मल वर्मा के अनुसार तो 'कला परिवर्तन के विपरीत एक स्थिर और चिरंतन विश्वास पर टिके रहने की चेष्टा है।

 

उस छोटे से हिल स्टेशन पर रहते लतिका को खासा अरसा बीत गया है लेकिन कब पतझड़ और गर्मियों का घेरा पार कर सर्दी की छुट्टियों की गोद में सिमट जाता है, उसे कभी याद नहीं रहता। उससे पूछने पर कि वह घर नहीं जा रही, उसके पास एक ही वाक्य होता है, ‘आई लव द स्नो फॉल।यही बात उसने पिछले साल भी कही थी और शायद पिछले से पिछले साल भी। उसे लगा मानो लड़कियां उसे संदेह की दृष्टि से देख रही है, मानो उन्होंने उसकी बात पर विश्वास नहीं किया। उसका सिर चकराने लगा मानो बादलों का स्याह झुरमुट किसी अनजाने कोने से उठ कर उसे अपने में डुबो लेगा।10 लेकिन लतिका तमाम प्रश्नों, परेशानियों और थकान को नींद में भुलाने का प्रयास करती है। अपने कमरे की चहारदीवारी के भीतर वह सुरक्षित अनुभव करती है। वहां उसेइस अकेलेपन में कोई गिला नहीं, उलाहना नहीं, सब खींचातानी खत्म। जो अपना है, वह बिल्कुल अपना-सा हो गया है। जो अपना नहीं है, उसका दुख नहीं, अपनाने की फुर्सत नहीं…”11

 

मिस्टर ह्यूबर्ट उसे प्रेम पत्र लिखते हैं। उस पत्र को पाकर उसे यह खुशी अवश्य होती है कि उसकी उम्र बीत नहीं गई। अब भी वह दूसरों को अपनी ओर आकर्षित कर सकती है। लेकिन लतिका किसी अन्य से प्रेम करने में स्वयं को असमर्थ पाती है।हयूबर्ट ही क्यों, वह क्या किसी को भी चाह सकेगी, उस अनुभूति के संग, जो अब नहीं रही, जो छाया-सी उस पर मंडराती रहती है, न स्वयं मिटती है, न उसे मुक्ति दे पाती है।12 निर्मल वर्मा आधुनिक समाज में संबंधों के विघटन पर भी विचार करते हैं। इस समाज में कोई संबंध पूर्ण नहीं हो सकता क्योंकि मनुष्य अपने में पूर्ण नहीं है। इस अधूरेपन का अहसास ही अकेलेपन में परिणति प्राप्त करता है।पियानो के सुर सुनते हुए उसे लगता है मानो घने छायादार वृक्षों की कांपती छाया में कोई पगडंडी गुम हो गई हो, एक छोटी-सी मौत... जो मर जाती है, किंतु मिट नहीं पाती, मिट्ती नहीं इसलिए मर कर भी जीवित है, दूसरे सुरों में लय हो जाती है।13 उसे लगता है कि मृत्यु ऐसे ही आती है।

 

लतिका के अलावा हयूबर्ट और डॉक्टर भी अकेले हैं। यह सभी चरित्र अपनी नियति में एक जैसे हैं -एक जैसे अधूरे और साथ होते हुए भी अकेले। अपने अंतर्मन में अकेले - जहां किसी अन्य की पहुंच नहीं। डॉक्टर अपने संबंध में अक्सर चुप रहते थे। वे नहीं चाहते कि कोई अतीत के संबंध में उनसे कुछ भी पूछे या सहानुभूति दिखलाए। बर्मा पर जापानियों का आक्रमण होने के बाद वह इस छोटे से पहाड़ी शहर में आ बसे थे। अकेलेपन और मृत्यु के बोध से डॉक्टर भी ग्रस्त है - “हजारों मील अपने मुल्क से दूर मैं यहां पड़ा हूं- यहां कौन मुझे जानता है... यहीं शायद मर भी जाऊंगा। हयूबर्ट क्या तुमने कभी महसूस किया है कि एक अजनबी की हैसियत से पराई जमीन पर मर जाना काफी खौफनाक बात है... !”14 हयूबर्ट अपने छाती में उठने वाले दर्द में मौत का संकेत पाता है। एक भयभीत बच्चे-सा कातर वह मानो अपने प्रश्न का उत्तर पा लेना चाहता है - “डॉक्टर क्या मैं मर जाऊंगा।15 मृत्यु के आतंक से ग्रस्त ह्यूबर्ट भी अपने अकेलेपन में धीरे -धीरे मर रहा है।

 

जिजीविषा बड़ा सत्य है। इस धरती पर कोई भी प्राणी अपनी मृत्यु को स्वयं नहीं चुनता। चाहे मनुष्य हो या जीव-जंतु सभी अपने प्राणों की, जीवन की खातिर संघर्ष करते हैं। ऊष्मा की तलाश में परिंदे बर्फीले प्रदेशों से सुदूर देशों तक यात्रा करते हैं और पुनः अपने आवास-स्थल पर लौट जाते हैं। हर साल सर्दी की छुट्टियों से मैदानों की ओर उड़ते परिंदे कुछ दिनों के लिए बीच के इस पहाड़ी स्टेशन पर बसेरा करते हैं, प्रतीक्षा करते हैं, बर्फ के दिनों की, जब वे नीचे अजनबी, अनजाने देशों में उड़ जाएंगे। निर्मल वर्मा उन परिंदों के माध्यम से जीवन सत्य से जुड़े प्रश्नों को उठाते हैं। लतिका उन्हें देखकर सोचती है, “क्या वे सब भी प्रतीक्षा कर रहे हैं ? वह, डॉक्टर मुखर्जी, मिस्टर ह्यूबर्ट -लेकिन कहां के लिए, हम कहां जाएंगे ?”16 नामवर सिंह के अनुसारप्रश्न मामूली है लेकिन कहानी के माहौल में वह सिर्फ पक्षियों का या लतिका का व्यक्तिगत प्रश्न नहीं रह जाता। जैसे इस प्रश्न से लतिका, डॉक्टर मुखर्जी, मिस्टर ह्यूबर्ट सब का संबंध है - इन सब का और इनके अलावा भी और सबका। देखते-देखते प्रेम की एक कहानी मानव-नियति की व्यापक कहानी बन जाती है और एक छोटा सा वाक्य पूरी कहानी को दूरगामी अर्थवृत्तों से वलयित कर देता है।हम कहां जाएंगेयह वाक्य सारी कहानी पर अर्थ गंभीर विषाद की तरह छाया रहता है।17 डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसारपरिंदेकहानी गंतव्य की तलाश की कहानी है।अनिश्चय यानि रुढ़ि मुक्ति इसकी रचना प्रक्रिया में है।18

 

हम कहां जाएंगे? मानव की अंतिम नियति मृत्यु का संकेत करती है। गिरीश नेगी की मृत्यु का संदर्भ वर्तमान को भी प्रभावित करता है। वर्तमान जीवन के जीवंत संदर्भ अर्थहीन, महत्त्वहीन और निरर्थक लगते हैं; केवल गतकालिक समय और उसकी स्मृतियां वर्तमान को संचालित करती है। जीवन जीने का उपक्रम न होकर ढोने का उपक्रम बन गया है। समय बीते घाव को भरने का प्रयास करता है जिसकी साक्षी स्वयं लतिका का मानना है, “अब ऐसा दर्द नहीं होता।19 लेकिन लतिका अतीत को खोने के डर से उस अतीत की स्मृतियों को खजाना मानकर सहेज कर रखना चाहती है।स्मृतियों का खजाना, जिसमें गिरीश था, वह धरोहर है जिसे लतिका खो नहीं सकती। वह फिर जानबूझकर उस घाव को कुरेदती है, जो भरता जा रहा है, खुद - -खुद उसकी कोशिशों के बावज़ूद भरता जा रहा है…”20 जैसे स्वप्न जागने के पश्चात धूमिल होता जाता वैसे ही मेजर गिरीश के साथ बीते पलों की स्मृतियाँ भी धूमिल होने लगी हैं लेकिन लतिका उन्हें वापस जागृत करती है। वे लतिका की चेतना की धुरी, उसके जीवन की धुरी, उसके यंत्र- चालित जीवन की धुरी, उसके समस्त कार्यकलापों- दिनचर्या की धुरी बन गई हैं और लतिका को लगता है कि उस धुरी, उस आधार के स्खलित होते ही वह बिखर जाएगी।

 

    अकेलेपन से जूझते हुए परिंदों को पता है, उन्हें कहां से कहां जाना है और कब लौटना है। लेकिन ये तीनों ऐसे परिंदे हैं जो अपने मूल स्थान से छिटक कर इस अनजान पर्वतीय प्रदेश में आ बसे हैं, पर कहां जाएंगे? नहीं पता। गंतव्यहीन, उद्देश्यहीन, अनजानी धरती... ये वो परिंदे नहीं हैं, जिन्होंने समूह में यात्रा की है। जो एक मौसम के बाद अपने मूल स्थान पर वापस चले जाते हैं। ये तीनों अजनबी हैं। स्थितियों ने इन्हें एक स्थान पर इकट्ठा भर कर दिया है मौसम दर मौसम बीत गए, ये वहीं हैं, अटके हुए, भटके हुए, भयभीत पक्षियों की तरह। समाज इस कहानी में सिरे -से अनुपस्थित है। परिंदे ऊष्मा की तलाश में संघर्ष करते हैं। संघर्ष की चेतना से विहीन हताशा, अवसाद, अकेलेपन और अंधेरे में डूबी धीरे-धीरे मरती लतिका समस्त कहानी पर मृत्यु की छाया की प्रतीक है, मृत्यु का आतंक है।वस्तुतः यह कहानी मृत्यु और जीवन के प्रश्नों को उपस्थित करती है। कहानी अकेलेपन, निरर्थकता और विसंगति की पहचान कराती है। अकेलेपन और व्यर्थता-बोध के साथ जीने की विवशता है जो मानव की नियति है। यह कहानी अकेलेपन की अनुभूति को सघन और व्यापक बनाती है

 

डॉक्टर के अनुसार मरने वाले के संग खुद थोड़े ही मरा जाता है… ‘लेट द डेड डाईलेकिन लतिका मर रही है- मरे हुए मेजर के संग। कहानी के आरंभ मे एक प्रश्न उठाया गया है- ‘can we do nothing for the dead ? And for a long time the answer had been -nothing’ लतिका का सम्पूर्ण जीवन उस प्रश्न का प्रत्युत्तर है।

 

परिंदेकहानी की केंद्रीय पात्र लतिका और ऊष्मा की तलाश में सफरयाफ्ता परिंदों के माध्यम से निर्मल वर्मा पूरी कहानी में चिंतक की मुद्रा में जीवन, मृत्यु, दु:, पीड़ा, नियति, समाज, अकेलापन- इन प्रश्नों का सामना करते नजर आते हैं। उसी के अनुरूप कहानी की भाषा भी करवट लेती है। कभी गंभीर, कभी दार्शनिकता को लपेटे, कभी बहती- बहाती, कल-कल करती संगीतात्मकता उत्पन्न करती, कभी अतल गहराइयों में डूबी शांत, कभी प्रश्न उठाती, कभी प्रकृति को दृश्यमान करती, बिंबों और प्रतीकों से समृद्ध कहानी की भाषा पाठक के मन-मस्तिष्क को उस रीतेपन और अकेलेपन का साक्षात्कार कराती।संगीतात्मकता और दृश्यों का संवेदनशील वर्णन उनकी शैली की विशेषता है। निर्मल वर्मा संवेदना की सूक्ष्मता और पारदर्शिता के लिए महत्त्वपूर्ण हैं, व्यापकता के लिए नहीं।21 नामवर सिंह के अनुसार, “कहानी का गद्य इतना संवेदनशील तो पहले कभी न था।परिंदेको देखकर लगता है कि भाषा के क्षेत्र में जो काम इतने दिन में प्रयोगशील कविता भी न कर सकी उसे अंततः कहानी के गद्य ने कर दिखाया। निर्मल के मानव- चरित्र प्राकृतिक वातावरण में किसी पौधे, फूल या बादल की तरह अंकित होते हैं गोया वे प्रकृति के ही अंग हैं। कहानी प्रभाव सृष्टि की दृष्टि से संगीत की हद छू सकती है या नहीं मुझे नहीं मालूम लेकिन इतना मालूम है कि निर्मल की कहानियां संगीत का- सा प्रभाव उत्पन्न करने में समर्थ हैं। निर्मल ने शब्द की अभेद्य दीवार को लांघ कर शब्द के पहले केमौन जगत्में प्रवेश करने का भी प्रयत्न किया है और वहां जाकर प्रत्यक्ष इंद्रिय- बोध के द्वारा वस्तुओं के मूल रूप को पकड़ने का साहस दिखलाया है इसीलिए उनकी कहानी कला में नवीनता है,  भाषा में नव-जातक की - सी सहजता और ताजगी है।22 यही निर्मल की भाषा की ताकत है, एक भिन्न तेवर है, एक नई ज़मीन की तलाश है जो उन्हें पूर्ववर्ती कहानीकारों की पांत से अलग खड़ा कर देती है।

 

संदर्भ - 

1. नामवर सिंह : कहानी नई कहानी-लोकभारती प्रकाशन, 1982, पृ.-59

2. निर्मल वर्मा : अन्तर्यात्रा: सं. नंदकिशोर आचार्य- वाणी प्रकाशन, 2003, भूमिका से

3. निर्मल वर्मा : शब्द और स्मृति- निर्मल वर्मा-राजकमल प्रकाशन, 1979  पृ.12

4. नामवर सिंह : कहानी नई कहानी- नामवर सिंह- पृ.-62

5. विश्वनाथ त्रिपाठी : हिंदी साहित्य का सरल इतिहास-ओरिएंट ब्लैकस्वॉन प्रकाशन, 2007, पृष्ठ 163

6.-निर्मल वर्मा : वे दिन-राजकमल प्रकाशन, 1991, पृष्ठ-162

7. निर्मल वर्मा : कला का जोखिम-राजकमल प्रकाशन, 1981, पृ. 27

8 निर्मल वर्मा : अन्तर्यात्रा: सं. नंदकिशोर आचार्य- वाणी प्रकाशन, 2003, पृ. 53

9. वही, पृ. 53-54

      10. वही, पृ. 32-33

11. वही, पृ. 57-58

12. वही, पृ. 36

13. वही, पृ. 46

14. वही, पृ. 37

15.वही, पृ. 59

16..वही, पृ. 57

17. नामवर सिंह : कहानी नई कहानी- पृ. 60

18. विश्वनाथ त्रिपाठी : कहानी के साथ-साथ, वाणी प्रकाशन, 2016. पृ. 14

19. निर्मल वर्मा :अन्तर्यात्रा: सं. नंदकिशोर आचार्य- वाणी प्रकाशन, 2003. पृ. 54

20. वही, पृ. 54

21. विश्वनाथ त्रिपाठी : हिंदी साहित्य का सरल इतिहास. पृ.-163

22. नामवर सिंह : कहानी नई कहानी. पृ.-62, 64, 74


डॉ. बीना जैन
एसोसिएट प्रोफेसर
किरोड़ीमल महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय
9213579592, beenajain61@gmail.com

  अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati)

अंक-35-36, जनवरी-जून 2021

चित्रांकन : सुरेन्द्र सिंह चुण्डावत

        UGC Care Listed Issue 

'समकक्ष व्यक्ति समीक्षित जर्नल' ( PEER REVIEWED/REFEREED JOURNAL) 


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